चिन्तामणि त्रिपाठी(रीतिग्रंथकार कवि)

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टिकमापुर , जन्म स्थान

चिंतामणि त्रिपाठी हिन्दी के रीतिकाल के कवि हैं।

ये यमुना के समीपवर्ती गाँव टिकमापुर या भूषण के अनुसार त्रिविक्रमपुर (जिला कानपुर) के निवासी काश्यप गोत्रीय कान्यकुब्ज त्रिपाठी ब्राह्मण थे। इनका जन्मकाल संo १६६६ विo और रचनाकाल संo १७०० विo माना जाता है। ये रतिनाथ अथवा रत्नाकर त्रिपाठी के पुत्र (भूषण के 'शिवभूषण' की विभिन्न हस्तलिखित प्रतियों में इनके पिता के उक्त दो नामों का उल्लेख मिलता है) और कविवर भूषण, मतिराम तथा जटाशंकर (नीलकंठ) के ज्येष्ठ भ्राता थे। चिंतामणि कभी-कभी अपनी रचनाओं में अपना नाम 'मनिलाल' और 'लालमनि' भी रखते थे। इनका संबंध शाहजहाँ, चित्रकूटाधिपति रुद्रशाह सोलंकी, जैनुद्दीन अहमद और नागपुर के भोंसला राजा मकरदशाह के राजदरबारों से था, जहाँ से इन्हें पर्याप्त सम्मान और प्रतिष्ठा मिली। नागपुर में उस समय कोई मकरदशाह संज्ञक भोंसला राजा नहीं था, इसलिये मकरंदशाह नामधारी इस कवि के आश्रयदाता संभवत: शिवाजी के पितामह ही थे, जो 'मालो जी' नाम से प्रख्यात हैं और भूषण ने जिनका स्मरण 'माल मकरद' कहकर किया है। जिनके कहने पर चिंतामणि ने पिंगल विषयक ग्रंथ लिखा, जिसे उन्होने स्वयं स्वीकार किया है-


चिंतामणि कवि को हुकुम किए साहि मकरंद।

करौ लच्छि लच्छ्न सहित भाषा पिंगल छंद ॥

कृतियाँ[संपादित करें]

चिंतमणि की अब तक दस कृतियों का पता लगा है, परंतु उपलब्ध मात्र तीन पुस्तकें हैं --

(१) काव्यविवेक, (२) कविकुलकल्पतरु (३) काव्यप्रकाश, (४) छंदोलता (५) कवित्त रामायण और (६) रसमंजरी (७) पिंगल (८) कृष्णचरित (९) कवित्त विचार (१०) शृंगार मंजरी

'शृंगारमंजरी रचना अभी हाल में प्रकाश में आई है, जो तेलुगु लिपि में लिखित संस्कृत के गद्य ग्रंथ का ब्रजभाषा में पद्यबद्ध अनुवाद है। 'रामायण' के अतिरिक्त कवि की उक्त सभी रचनाएँ काव्यशास्त्र से संबंधित हैं, जिनमें सर्वोपरि महत्व 'कविकुलकल्पतरु' का है। संस्कृत ग्रंथ 'काव्यप्रकाश' के आदर्श पर लिखी गई यह रचना अपने रचयिता की कीर्ति का मुख्य कारण है।

'पिंगल' कृति की सूचना शिवसिंह सरोज में दी गई है। 'कवित्त विचार' की खंडित प्रति प्राप्त हुई है ।[1]
हिंदी रीतिकाव्य के आचार्य कवि चिंतामणि का महत्व इस दृष्टि से सर्वाधिक है कि इन्होंने अपने से पूर्ववर्ती केशवदास की उस आलंकारिक परंपरा और पद्धति को छोड़कर, जो भामह और दंडी आदि को लेकर चली थी, मम्मट और विश्वनाथ की रसवादी दृष्टि का पल्ला पकड़ा, जिसका अनुगमन सैकड़ों परवर्ती रीतिकाव्याचार्य कवियों ने किया। इसीलिये हिंदी रीतिग्रंथों की अखंड परंपरा और रीतिकाल का आरंभ आचार्य रामचंद्र शुक्ल चिंतामणि से ही मानते हैं। सरस भावव्यंजना में कभी अपने अनुज मतिराम से होड़ लेते दिखाई पड़ते हैं। भाषा विशुद्ध ब्रजभाषा है। मधुरता, लालित्य और अनुप्रासमयता कवि की भाषाशैली के प्रमुख गुण हैं।

  1. शोध त्रयमासिकी, अंक ३२, प्रो० सूर्यप्रसाद दीक्षित (जुलाई–सितंबर 2018). "चिंतामणि ग्रंथावली". खोज. स्वाध्याय प्रकाशन, लखनऊ. 32: 31.