चेत सिंह

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search

बनारस के सामंत जमींदार बलवंतसिंह के पुत्र चेतसिंह के उत्तराधिकार ग्रहण (१७७० ई.) करने के बाद, उक्त जमींदारी अवध के आधिपत्य से ईस्ट इंडिया कंपनी के अंतर्गत ले ली गई (१७७५)। हेस्टिंग्ज़ ने तब चेतसिंह को वचन दिया था कि उनके नियमित कर देते रहने पर, उनसे किसी भी रूप में अतिरिक्त धन नहीं लिया जाएगा। किंतु मरहठा युद्ध से उत्पन्न आर्थिक संकट में हेस्टिंग्ज ने उनसे पाँच लाख रुपयों की माँग की (१७७८)। चेतसिंह के आनाकानी करने पर हेंस्टिंग्ज ने पाँच दिनों के अंदर भूगतान की धमकी दे रकम वसूल ली। अगले वर्ष उनसे पाँच लाख की दुबारा माँग की। चेतसिंह के पूर्व आश्वासन का विनम्र उल्लेख करने पर, हेस्टिंग्ज ने सक्रोध हर्जाने के रूप में बीस हजार रुपए भी साथ वसूले।

१७८० में हेस्टिंग्ज ने उतना ही धन (पाँच लाख) देने का फिर आदेश दिया। चेतसिंह ने हेंस्टिंग्ज को मनाने अपना विश्वासपात्र नौकर कलकत्ते भेजा; साथ में दो लाख रुपए की घूस भी अर्पित की। हेस्टिंग्ज ने घूस तो स्वीकार करली, लेकिन भारी दंड सहित उक्त धन तीसरी बार भी वसूल किया। अब उसने चेतसिंह को एक हजार घुड़सवार भेजने की फरमाइश की। चेतसिंह के पाँच सौ घुड़सवार और पाँच सौ पैदल तैयार करने पर, हेंस्टिंग्ज ने पाँच करोड़ रुपए का जुर्माना थोप दिया। हेस्टिंग्ज के बनारस पहुँचने पर उसने चेतसिंह से मिलना ही अस्वीकार नहीं किया, बल्कि उनके नम्रतापूर्ण पत्र को विद्रोहप्रदर्शन घोषित कर, उन्हें बंदी बना लिया। इस दुर्व्यवहार से उत्तेजित हो चेतसिंह की सेना ने स्वत: विद्रोह कर, हेस्टिंग्ज का निवास स्थान घेर लिया। हेस्टिंग्ज ने प्राणापन्न संकट में धैर्य और साहस से विद्रोह का दमन किया; यद्यपि अंग्रेजी सेना के बनारस का पूरा खजाना लूट लेने के कारण हेस्टिंग्ज के हाथ कुछ न लगा। चेतसिंह विद्रोहजनित अवस्था में लाभ उठाकर विजयगढ़ भाग गए और विजयगढ़ से ग्वालियर। हेस्टिंग्ज ने बनारस की जमींदारी अपहृत कर चेतसिंह के किशोरवयस्क भांजे को, यथेष्ट लगानवृद्धि के साथ सौंप दी। चेतसिंह के प्रति हेस्टिंग्ज के इस लज्जाजनक दुर्व्यवहार के मूल में हेस्टिंग्ज की व्यक्तिगत प्रतिशोध की भावना निहित थी, जिसकी पार्लियामेंट में भर्त्सना हुई।