गॉन्डोफर्नीज
| गुदफर | |
|---|---|
| शहंशाह | |
गुदफर का रजत सिक्का | |
| हिन्द-पहलवी राजा | |
| शासनावधि | ल॰ 19 – ल॰ 46 |
| पूर्ववर्ती | टैंलिस मार्डेटीज़[1] |
| उत्तरवर्ती | गुडन (ड्रैंगियाना और सरस्वती) अवदगष (गंधार) |
| निधन | 46 |
गुदफर (प्राचीन यूनानी: Γονδοφαρης, Υνδοφερρης, गंधारी: 𐨒𐨂𐨡𐨥𐨪, 𐨒𐨂𐨡𐨥𐨪𐨿𐨣, 𐨒𐨂𐨡𐨂𐨵𐨪) हिन्द-पहलवी राज्य के संस्थापक थे, जिन्होंने 19 से 46 तक राज किया। उनके शासनकाल के दौरान, वह अपने राज्य को पहलवी साम्राज्य से मुक्त करके ड्रैंगियाना, सरस्वती और गंधार तक राज किये।[2] उन्हें थोमा के काम, तख़्त-ए-बाही शिलालेख और अपने रजत एवं कांस्य सिक्कों से जाना जाता है।
गुदफर के राज के बाद, ड्रैंगियाना एवं सरस्वती के राजा गदन बने और गंधार के राजा उनके भतीजे अवदगष बने।[3][4]
इतिहास
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गुदफर के बारे में पहली जानकारी अप्रामाणिक "एक्टस ऑफ टॉमस दि एपोसल" के जरिए मिलती है, जिसमें कहा गया है, कि संत टॉमस गुदफर के दरबार में गए, जहां उन्हें शाही महल बनाने की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी। लेकिन निर्माण के लिए दी गयी राशि को लोक कल्याण में खर्च करने के कारण उन्हें बंदी बना लिया गया। कहानी के अनुसार, उसी दौरान राजा के भाई गैड की मृत्यु हो गयी और फरिश्तों ने उन्हें स्वर्ग ले जाकर संत टॉमस के अच्छे कर्मों द्वारा निर्मित महल दिखाया। गैड को फिर से जीवन प्रदान किया गया और उन्होने व गुदफर ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया।[5]
कालक्रम
[संपादित करें]गुदफर के सिक्के, जिनमें से कुछ पर उनका भारतीय नाम गुन्दफर्न अंकित है, यह संभावना दर्शाते हैं कि उन्होने पूर्वी ईरान और पश्चिमोत्तर भारत, दोनों पर एकछत्र शासन किया होगा। तख्त-ए-बही (पेशावर के निकट) के अभिलेख के अनुसार गुदफर ने कम से कम 26 वर्षों तक शासन किया, जो संभवत: 19 से 45 ई. तक रहा।[6]
सन्दर्भ
[संपादित करें]- ↑ Rezakhani 2017, p. 56.
- ↑ Rezakhani 2017, p. 35.
- ↑ Rezakhani 2017, p. 37.
- ↑ Gazerani 2015, p. 25.
- ↑ [भारत ज्ञानकोश, खंड-2, पृष्ठ संख्या-68, प्रकाशक: पापयुलर प्रकाशन मुंबई, आई एस बी एन-81-7154-993-4]
- ↑ Ernst Herzfeld, Archaeological History of Iran, London, Oxford University Press for the British Academy, 1935, p.63; name="Bivar_2003"/> cf. name="Bivar_1983_51">Bivar, A. D. H. (1983), "The Political History of Iran under the Arsacids", in Yarshater, Ehsan (ed.), Cambridge History of Iran, vol. 3.1, London: Cambridge UP, p. 51