खुली अर्थव्यवस्था

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खुली अर्थव्यवस्था एक अर्थव्यवस्था का दर्शन (philosophy) है। खुली अर्थव्यवस्था को अगर उसके शाब्दिक अर्थ से समझें तो इसका मतलब होता है एक ऐसा देश या समाज जहाँ किसी को किसी से भी व्यापार करने की छूट होती है। ऐसा नही कि इस व्यापार पे कोइ सरकारी अंकुश या नियंत्रण नही होता। पर सर्कार ऐसी नीतियाँ बनाती है जिससे आम लोग उद्योग और अन्य प्रकार के व्यापार आसानी से शुरू कर सकें। ऐसी अर्थव्यवस्था मे व्यापारों को आज़ाद रूप से फलने-फूलने दिया जाता है। सरकारी नियंत्रण ऐसे बनाये जातें है जिनमें व्यापारों को किसी भी प्रकार की बेईमानी से तो रोका जाता है पर नियंत्रण को इत्ना भी कडा नही किया जाता है कि ईमान्दार व्यापार मे असुविधा हो। खुली अर्थव्यवस्था न केवल उस समाज य देश के अंतरूनी व्यापार के लिये होती है बल्कि बाहरी व्यापार को भी उसी द्रिश्टि से देखा जाता है।

भारतीय इतिहास[संपादित करें]

ब्रिटिश राज से पहले[संपादित करें]

खुली अर्थव्यवस्था का विचार भारत मे कोइ नया नही है। इतिहास को ध्यान से पढ्ने पे पता है कि आदि काल से भारत मे व्यापार के लिये खुली अर्थव्यवस्था की नीति थी। सम्राट चंर्द्रगुप्त मौर्य के समय मे भारत मे चीन से और यूरोप से व्यापार के बारे मे पढ्ने को मिल्ता है। सिल्क रूट अंतर्राश्ट्रीय व्यापार मे भारत के योग्दान का एक उदाहरण है। सम्राट चंर्द्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक के समय मे काश्ठ (लकडी) का व्यापार होता था। अकबर से समय में भारत मे व्यापार काफी फलता-फूलता था। अंग्रेज़ भी भारत मे व्यापार करने आये थे। मतलब 1700-1800 मे भी भारत मे विदेशी मूल के व्यापाअरियों से व्यापार होता था। सम्भव्तह ईस्ट इंडिया कम्पनी के व्यापारियों से साशक बनने से भारतीय समाज में व्यापार को ले के एक ऐसी धारणा बन गयी कि बाद मे 1947 मे भारत के आज़ाद होने पे भारत मे खुली अर्थव्यवस्था का सपोर्ट ज़्यादा नेताओं ने नही किया। भारत के पहले प्रधाअन्मंत्री पं नेहरू रूसी समाजवाद से काफी प्रभावित थे। आज़ादी के बाद नेहरू के भारत मे समाज्वाद की स्थापना करने का प्रयत्न किया। शायद ये भारत की अर्थव्यवस्था के क्शेत्र मे सब्से बडी भूल थी।

आज़ादी के बाद से 1990 तक[संपादित करें]

1947 से 1990 तक भारत मे खुली अर्थव्यवस्था नही थी। भारत ने आयात और निर्यात पे कयी तरह के कर लगाये जाते थे। निर्यात पे होने वले करों की वजह से भारतीय उद्योग यहा बनाया हुआ माल अंतर-राश्ट्रीय बाज़ार मे सस्ता नही बेंच पाते थे। अंतर-राश्ट्रीय बाज़ार की प्रतिस्पर्धा मे भारतीय उद्योगों के ना टिक पाने से भारत पीछे रह गया। इस दौरान जापान, चीन, कोरिया, ताइवान जैसे देशो ने अंतर-राश्ट्रीय बाज़ार मे अपना दब्दबा बनाया।

भारत मे आयात पर भी काफी कर लगाये जाते थे। इस कारण से विदेशी उद्योग भारत मे अपना सामान बेचने मे दिक्कत कह्सूस कर्ते थे। विदेशों बने समान भारत मे बहुत महंगे होने की वजह से भारत मे ज़्यादा लोग खरीद नही पाते थे। जो तक्नीक भारत के बाहर जन्म लेती थी वे आसानी से भारत के लोगों तक नही पहुंच पाती थीं। इस्से एक तरफ तो भारत के नागरिक 1947 से 1980'ज़ तक कम्प्यूटर, आधुनिक घडियों, आधुनिक टेलीफोन, कारों, इत्यादि से वंचित रह गये तो दूसरी तरफ भारतीय उद्योगों को ज़रूरी तक्नीकें नही मिल पयी। अंतर-राश्ट्रीय तरीको और तक्नीकों से अपने उत्पाद न बना पाने की वजह से भारत के कयी उद्योग जैसे टैक्स्टाइल, कृशि, एवियेशन, मन्युफैक्चरिंग, इत्यादि अंतर-राश्ट्रीय मानकों से पीछे रह गये। भारत का ग्रोथ रेट करीब 3.0% रह गया और इसे विश्व मे हिन्दू ग्रोथ रेट से जाना जाने लगा। भारत के उद्योगों के विकसित ना हो पाने की वजह से भारत के तमाम लोग गरीबी रेखा से नीचे रह गये। इस दौरान भारत के मूल्भूत धांचे (इंफ्रास्ट्रकक्चर) का बहुत धीमि गति से विकास हुआ। भारत का बिजली, पानी, सडके, सूच्ना तंत्र इत्याअदि कफी खराब होता चला गया। मुद्रास्फीति की दर बहुत ज़्यादा होने से महंगाई कफी बढ्ती चली गयी पर उद्योगों की बीमार हालत के चलते लोगो की आमदनी मुद्रास्फीति दर के बराबर न बढ सकी।

भारत मे सन 1985 से बैलैंस औफ पेमेंट की सम्सया शुरू हुई। 1991 मे चन्द्रशेखर सरकार के शासन के दौरान भारत मे बैलैंस औफ पेमेंट की समस्या ने विकराल रूप धारण किया और भारत की पहले से चर्मरायी हुई अर्थव्यवस्था घुट्नो पे आ गयी। भारत मे विदेशी मुद्रा का भंडार केवल तीन हफ्ते के आयातो के बराबर रह गया। ये एक बहुत ही गम्भीर समस्या थी। इस दौरान समस्या इत्नी गम्भीर हो चुकी थी कि भारत के पास देश को चलाने के लिये जरूरी धन खतम हो गया था। भारत सरकार ने अपने स्वर्ण भन्डार से सोना बैंक ओफ इंग्लैंड के पास गिरवी रखने की तैयारियां शुरू कर दी थी। नर्सिम्हा राओ के नेत्रत्व वाली भारतीय सरकार ने भारत मे बडे पैमाने मे आर्थिक सुधार कर्ने क फैस्ला किया। उदारीकरण कह्लाने वाले इन सुधारो के आर्किटेक्ट थे मनमोहन सिंहमनमोहन सिंह ने आने वाले समय मे भारत की अर्थ्नीति को पूरी तरह से बदल्ने की शुरुआत की। ये वोह समय था जबकि भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था को खुला करने की शुरुआत की। ज़्यादातर लोगों के नज़रिये से 1990 से अबक किये गये आर्थिक सुधारों ने ही भारत को दुनिया में एक सशक्त आर्थिक देश का दर्ज़ा दिलाया।

1990 के बाद[संपादित करें]

1990 से 1996 तक मनमोहन सिंह भारत के वित्त मंत्री थे। उस समय नर्सिम्हा राओ भारत के प्रधान मंत्री थे। मनमोहन सिंह का साथ देने वाले कयी कयी और लोग सरकार मे थे। सी. रंगराजन, मौंटैक सिन्ह अहलूवालिया, शंकर आचार्या, वाई. वेणुगोपाल रेड्डी इस्में से प्रमुख थे।

1996 से 1998 तक पी चिदम्ब्रम भारत के वित्त मंत्री हुए और उन्होने मनमोहन सिंह की नीतियो को आगे बढाया।

1998 से 2004 तक देश मे भारतीय जनता पार्टी की सर्कार ने और भी ज़्यादा उदारीकरण और निजीकरण किया।

इस्के बाद 2004 मे आधुनिक भारत की अर्थ्नीति के रचयिता मनमोहन सिंह भारत के प्रधान्मंत्री बने और पी चिदम्ब्रम वित्त मंत्री।

इन सभी सालो मे भारत ने काफी तेज़ तरक्की की। अर्थव्यवस्था मे आमूल-चूल परिवर्तन हुए और भारत ने विश्व अर्थव्यवस्था मे अपना स्थान बनाना शुरू किया।

खुली अर्थव्यवस्था के फायदे[संपादित करें]

खुली अर्थव्यवस्था का सबसे बडा फय्दा है आज़ादी। आज़ादी मुक्त रूप से व्यापार करने की, उन्नति करने की, पैसा कमाने की। चूकि खुली अर्थव्यवस्था मूल रूप से उद्योगों और व्यापार को बढावा देती है, तो ऐसे समाज मे नागरिकों को एक ही उत्पाद खरीगदने के कयी ऑप्शंस होते है। ऐसे मे हर उद्योग पे अपने उत्पादों को और बेह्तर और सस्ता बनाने का एक प्रकृतिक दबाव होता है। इस्से उद्योग नयी से नयी तक्नीक का इस्तेमाल करते है। जिस्से उत्पादों की गुणवत्ता बेह्तर होती है। चूकि ऐसी अर्थव्यवस्था मे उद्योगों को बढावा दिया जाता है तो ज़्यादा से ज़्यादा कार्खानें और दफ्तर खुल्ते है। इस्से लोगों को ज़्यादा रोज़्गार के साधन मिल्ते है।

बाज़ार मे होने वाली प्रतिस्तपर्धा का सबको फयदा होता है। नये उत्पाद बनते है। पुराने उत्पादों की गुणवत्ता बेह्तर बनती है। लोगों को रोज़्गार मिल्ता है। उद्योगों पे कर्म्चारियों की मांग बढ्ने से इस्मे भी प्रतिस्पर्धा पनप्ती है। और सभी उद्योग अपने कर्म्चरियों को ज़्यादा तंख्वाह दे के विरोधी कम्पनी मे जाने से रोकते है। ऐसा होने से लोगो की पर्चेज़िंग पावर बढती है। लोगो के पास ज़्यादा पैसा आने से उनका रहन सहन बेह्तर होता है। वे बडे घर मे रह सकते है। अपने बच्चों को बेह्तर स्कूल भेज सकते है और अपनी पारिवारिक और सामाजिक ज़िम्मेवारियों का बेहरती से वहन कर सकते है।

खुली अर्थव्यवस्था मे बहुत सारी चीज़ों पे से सरकार का नियंत्रण कम होता है। इसको निजीकरण भी कह्ते है। मस्लन अब काफी व्यापार पे बैंक और अन्य वित्तीय संस्थानों की नज़र होती है। जब कोइ वित्तीय संस्थान किसी उद्योग में पूंजी निवेश कर्ता है तो वोह ये देखने को बाध्य होता है कि यह उद्योग थीक से काम करे। वित्तीय संस्थान ये भी देख्ता है के उद्योग ऐसा कुछ ना करे जिस्से कि उसपे किसी तरह का लीगल प्रौब्लम हो।

खुली अर्थव्यवस्था मे बाज़ार स्वतह ही ऐसे काम कर्ता है जिसकी की लोगों को ज़रूरत है। अगर कोइ उत्पाद या सेवा ऐसी है जिसकी लोगों को ज़रूरत है तो पुराने उद्योग्पति या कोइ नया आंत्रप्रेन्यौर उस तरह के उत्पाद या सेवा को लोगो तक पहुंचाने लग्ता है। आखिर इस्मे उत्पादक और उत्भोग्ता - दोनो का ही फयदा है। अगर कोइ उत्पाद या सेवा ऐसी है जिसकी लोगों को अब ज़रूरत नही है तो वह धीरे धीरे बन्द हो जाती है। अगर लोग खरीदेने नही तो कम्पनी को घाटा होगा और वह या तो अपना उत्पाद वक्त के साथ बदलेगी या उसे बनाना बन्द कर देगी।

खुली अर्थव्यवस्था से नयी तक्नीकों का विकास होता है। बाज़ार मे होने वाली प्रतिस्पर्धा उद्योगो को नयी तक्नीकों के विकास को बाध्य कर्ती है।

विभिन्न उद्योगों का भारत मे विकास[संपादित करें]

1990 के बाद से भारत मे काफी सारे उद्योगों का तेज़ी से विकास हुआ है। ज़्यादातर लोगों के नज़रिये से 1990 से अबक किये गये आर्थिक सुधारों ने ही भारत को दुनिया में एक सशक्त आर्थिक देश का दर्ज़ा दिलाया। विभिन्न उद्योगों का भारत में विकास अभूत्पूर्व है।