आधुनिक केरल

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केरल का आधुनिक इतिहास 18 वीं शती से शुरू होता है। ब्रिटिश उपनिवेशीय शासन के प्रारम्भ से लेकर आज तक का इतिहास इसी काल खण्ड में आता है। इसी कालखण्ड में आधुनिक केरल का गठन हुआ था। इस काल का सबसे शक्तिशाली राज्य तिरुवितांकूर था जहाँ ब्रिटिशों का प्रत्यक्ष शासन नहीं था।

ब्रिटिश शासन[संपादित करें]

दूसरे यूरोपीय देशों की तरह ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी व्यापार को लक्ष्य बनाकर भारत भी पहुँची थी। इस कंपनी ने सन् 1664 में कोष़िक्कोड में व्यापार केन्द्र की स्थापना की। सन् 1684 में उन्होंने तिरुवितांकूर के अंचुतेंगु नामक हिस्से को आट्टिन्गल रानी से ले लिया और सन् 1695 में वहाँ एक दुर्ग बनवाया। इसी काल में उन्होंने तलश्शेरी पर भी अपना अधिकार जमाया। अप्रैल 1723 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और तिरुवितांकूर के बीच संधि हो गयी। सन् 1792 में श्रीरंगपट्टणम् संधि के तहत टीपू का मलबार ब्रिटिशों को प्राप्त हो गया। सन् 1791 में कंपनी ने कोच्चि के साथ भी संधि कर ली। इस के अनुसार ब्रिटिशों को वार्षिक कर देकर कोच्चि राजा ब्रिटिश राज्य का सामंत बना। 1800 से कोच्चि मद्रास की ब्रिटिश सरकार के अधीन हो गया। 1795 की संधि के अनुसार तिरुवितांकूर ने भी ब्रिटिश राज्य की प्रभुता स्वीकार कर ली। अतः एक ब्रिटिश रेसिडेन्ट तिरुवनन्तपुरम में प्रशासन की देखरेख करने लगा। तिरुवितांकूर ब्रिटिश सरकार को प्रतिवर्ष आठ लाख रुपये कर रूप में देता था। 1805 में हुई संधि के अनुसार यदि तिरुवितांकूर में किसी तरह की गृह कलह हो तो उसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार ब्रिटिशों का था। इस प्रकार धीरे - धीरे समूचा केरल ब्रिटिशों के अधिकार में आ गया।

ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह[संपादित करें]

ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अपने देश से प्रेम रखने वालों में विरोध उठना स्वाभाविक था। केरल वर्मा, पष़श्शि राजा, वेलुत्तम्पि दलवा और पालियत्तच्छन ने ब्रिटिशों के विरुद्ध हथियार उठाये। यद्यपि उनका विद्रोह विफल हो गया था तथापि यह जनता में ब्रिटिशों के प्रति नफरत एवं देश भक्ति जगाने में सहायक हुआ। ब्रिटिशों ने मलबार पर जो कर लागू किया उसके विरोध में कोट्टयम् राजवंश के पष़श्शिराजा ने सशस्त्र विद्रोह किया। ब्रिटिश शासन राजाओं से कर वसूल करता था। लेकिन राजा सीधे जनता से कर वसूल करते थे। ब्रिटिश सरकार ने कोट्टयम में कर वसूली का अधिकार पष़श्शिराजा को न देकर उसके मामा कुरुम्ब्रा रियासत के शासक को दिया था। इसका विरोध करते हुए पष़श्शिराजा ने सन् 1795 में कर वसूली का सारा काम बंद कर दिया। सन् 1793 - 1797 और 1800 - 1805 में वीर पष़श्शिराजा के सैनिकों ने ब्रिटिश सैनिकों के साथ युद्ध किया। पष़श्शिराजा अपनी सेना के साथ वयनाड के वनों में घुस कर युद्ध करने लगे। किन्तु 30 नवम्बर 1805 को ब्रिटिश तोपों ने उन्हें खत्म कर दिया। इस तरह पष़श्शिराजा ने ब्रिटिश सरकार के विरोध में जो विद्रोह की दीवार खडी की थी, वह टूट गई। तिरुवितांकूर के गृहकार्यों में अनावश्यक हस्तक्षेप करने के कारण रेसिडेन्ट मेकाळे वेलुत्तम्पि दळवा के विरोध का कारण बना। यह विरोध युद्ध में परिणत हुआ। वेलुत्तम्पि ने कोच्चि के प्रधानमंत्री पालियत्तच्छन के साथ ब्रिटिश सेना पर आक्रमण किया। वेलुत्तम्पि ने 11 नवम्बर 1809 को ब्रिटिश आधिपत्य के विरुद्ध विद्रोह करने केलिए लोगों का आह्वान करते हुए एक घोषणा निकाली जो कुण्डरा घोषणा नाम से जानी जाती है। फिर भी ब्रिटिश सेना ने तिरुवितांकूर सेना के शक्ति दुर्गो को एक-एक करके अपने अधीन कर लिया। अपने को हारते देख वेलुत्तम्पि ने आत्महत्या कर ली। सन् 1812 में वयनाडु के कुरिच्यर और कुरुम्पर नामक आदिवासी वर्गों ने भी ब्रिटिशों के विरुद्ध हथियार उठाये। लेकिन उनके विद्रोह को कुचल दिया गया।

तिरुवितांकूर[संपादित करें]

तिरुवितांकूर नाम की उत्पत्ति के बारे में कहा जाता है कि केरल के दक्षिणी सिरे पर पश्चिमी घाट और अरब सागर के बीच की उर्वरक भूमि को 'श्रीवाष़ुंकोड' नाम से जाना जाता था जिसका शाब्दिक अर्थ है कि वह भूभाग जहाँ लक्ष्मी का वास हो। यही शब्द 'तिरुवारंकोड' बना जिसका देशीय रूप 'तिरुवंकोड' बन गया और कालान्तर में यही शब्द तिरुवितांकूर बन गया। ईसा के बाद के काल में इस प्रदेश के शासक आय राजवंश के थे। यही प्रदेश वेणाड नाम से विख्यात हुआ। महाराजा मार्ताण्ड वर्मा के शासनकाल में (सन् 1729 - 1758) वेणाड प्रदेश कोच्चि तक फैलकर तिरुवितांकूर नाम से प्रसिद्ध हो गया। मार्ताण्ड वर्मा ने ही गृह कलह को समाप्त किया और आट्टिंगल, कोल्लम, कोट्टारक्करा, कायंकुळम, अम्बलप्पुष़ा रियासतों को मिलाकर तिरुवितांकूर नामक शक्तिशाली प्रदेश की आधारशिला रखी थी। किन्तु उनके उत्तराधिकारी कार्तिक तिरुन्नाल रामवर्मा और धर्मराजा (1758 - 1798) को मैसूर के सुलतान टीपू के आक्रमण का सामना करना पडा। फिर भी उन्होंने देश की प्रगति को लक्ष्य बनाते हुए शासन किया। उनके बाद

  • अविट्टम तिरुन्नाल बालराम वर्मा (1798 - 1810),
  • रानी गौरी लक्ष्मी बाई (1810 - 1815),
  • रानी गौरी पार्वती बाई (1815 - 1829),
  • स्वाति तिरुन्नाल (1829 - 1847),
  • उत्रम तिरुन्नाल मार्ताण्ड वर्मा (1829 - 1860),
  • आयिल्यम् तिरुन्नाल (1860 - 1880),
  • विशाखम् तिरुन्नाल (1880 - 1885),
  • श्रीमूलम तिरुन्नाल (1885 - 1924),
  • रानी सेतु लक्ष्मी बाई (1924 - 1931),
  • श्रीचित्तिरा तिरुन्नाल बालराम वर्मा (1931 - 1949)

आदि ने तिरुवितांकूर पर शासन किया। नवीन तिरुवितांकूर की राजधानियाँ - पद्मनाभपुरम और तिरुवनन्तपुरम थी। तिरुवनन्तपुरम को स्थायी रूप से राजधानी बनानेवाले धर्मराज थे। तिरुवितांकूर के इतिहास में तीन राजा सर्वाधिक प्रसिद्ध थे, वे थे वेलुत्तम्पि दलवा, जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध आवाज़ उठाई, दूसरे राजा स्वाति तिरुन्नाल जो पंडित और संगीतज्ञ थे और तीसरे अंतिम शासक चित्तिरा तिरुन्नाल थे जिन्होंने सभी हिन्दु जातियों के लिए मंदिर के द्वार खोल दिये। दीवान सी. पी. रामस्वामी अय्यर ने यह घोषणा की थी कि ब्रिटिश सरकार के देश छोडने पर तिरुवितांकूर स्वतंत्र राज्य बनेगा। इसी घोषणा के परिणाम स्वरूप हुए आंदोलन के कारण तिरुवितांकूर भारत संघ में सम्मिलित हुआ। पट्टम् ताणुपिळ्ळै के नेतृत्व में पहला प्रजातांत्रिक मंत्रि मंडल मार्च 1948 में शासन में आया। 1 जुलाई 1949 को तिरुवितांकूर और कोच्चि को मिलाकर तिरुकोच्चि राज्य बनाया गया और 1 नवम्बर 1956 को मलबार को भी मिलाकर केरल राज्य बनाया गया। केरल राज्य के गठन काल तक तिरुवितांकूर और तिरुकोच्चि के राजप्रमुख का पद राजा चित्तिरा तिरुन्नाल को दिया गया।

तिरुवितांकूर प्रगति पथ पर[संपादित करें]

18 वीं - 19 वीं शताब्दियों में शासकों ने जो नीति अपनाई उसके कारण केरल सामाजिक प्रगति के पथ पर उन्मुख हुआ। तिरुवितांकूर में सडकें बनीं, नियम सुधारे गए। कर-व्यवस्था भी बनायी गई। नवीन तिरुवितांकूर के शिल्पी थे मार्त्ताण्ड वर्मा और कार्त्तिक तिरुनाल। दोनों ने तिरुवितांकूर राज्य की सुदृढ नींव डाली। दोनों रानियों गौरी लक्ष्मी बाई और गौरी पार्वती बाई के शासन काल में भी समाज सुधार के अनेक कार्य हुए। स्वाति तिरुनाल रामवर्मा (1829 - 1847) का काल तिरुवितांकूर का सुवर्णकाल माना जाता है। उन्होंने अंग्रेज़ी शिक्षा का प्रारंभ किया, कला और विज्ञान को भी बढावा दिया। सन् 1836 में उन्होंने तिरुवनन्तपुरम में प्लेनेटोरियम की स्थापना की। उन्होंने 1834 में तिरुवनन्तपुरम में जो इंग्लीश स्कूल शुरू किया वह 1866 में यूनिवर्सिटी कॉलेज बना, जो आज भी है। सन् 1836 में तिरुवितांकूर में जनगणना भी हुई।

महाराजा उत्रम् तिरुनाल के काल में (सन् 1847 - 1860) चाणार (नाडार) जाति की नारियों को छाती ढंकने की अनुमति दी गई। तिरुवनन्तपुरम में सन् 1859 में जो स्कूल लड़कियों के लिए खोला गया वही आज का सरकारी महिला विद्यालय है। तिरुवितांकूर का पहला डाकघर आलप्पुष़ा में खोला गया तथा सन् 1859 में पहली आधुनिक कयर फैक्टरी भी खोली गई।

आयिल्यम तिरुनाल महाराजा के काल (1860 - 1880) में भूस्वामित्व व्यवस्था में बड़ा परिवर्तन हुआ जो पण्डारप्पाट्टा घोषणा (सरकार के स्वामित्व की घोषणा) (1865), भूस्वामी और कुटियान (भूस्वामी की भूमि पर रहने वाला) घोषणा (1867) का परिणाम था। दीवान सर टी. माधव राव (1858 - 1872) अनेक योजनाएँ बनाकर तिरुवितांकूर को प्रगति पथ पर ले चले।

महाराजा श्रीमूलम् तिरुनाल (1885 - 1924) ने क्रान्तिकारी परिवर्तन की पृष्ठभूमि तैयार की। यह युग दो घटनाओं का गवाह बना - एक शिक्षा के क्षेत्र में हुई अभूतपूर्व क्रान्ति और दो बिधान सभा का गठन, जो भारतीय रियासतों में प्रथम था। श्री मूलम तिरुनाल के शासन की सबसे बडी उपलब्धि 1888 में गठित विधान परिषद है। 1904 में सरकार द्वारा चयनित जनप्रतिनिधियों की प्रजासभा (पोपुलर एस्सेम्बिलि) का गठन हुआ। 1922 में बनाये नियम के अनुसार विधान परिषद (लेजिस्लेटीव काउन्सिल) की सदस्य संख्या बढ़ाकर 50 कर दी गई। नारियों को भी मतदान का अधिकार दिया गया।

श्रीमूलम तिरुनाळ के बाद रानी सेतु लक्ष्मी बाई रीजन्ट बनीं। वे 1925 में नायर रेगुलेशन नियम लायीं जिसमें मातृसत्तात्मक उत्तराधिकार नियम रद्दकर पितृसत्तात्मक उत्तराधिकार नियम को मान्यता दी गई। तत्पश्चात् श्री चित्तिरा तिरुनाल बालराम वर्मा शासक बने।

चित्तिरा तिरुनाल का शासनकाल तीन बातों के लिए चिरस्मरणीय हो गया - 1) विधान सभा सुधार 2) व्यापार उद्योग नीति 3) समाज सुधार

प्रस्तुत कालखण्ड स्वतंत्रता संग्राम, कम्यूरिस्ट आन्दोलन का विकास और देश की स्वतंत्रता प्राप्ति आदि महत्वपूर्ण घटनाओं का साक्षी बना। सन् 1936 में जो मंदिर प्रवेश घोषणा की गई उसने चित्तिरा तिरुनाल को यशस्वी बनाया। इसी काल में तिरुवितांकूर विश्वविद्यालय (1927), लैन्ड मोर्टगेज बैंक (भूमि बंधक बैंक) (1932), ट्रैवनकूर रबड वर्क्स, कुण्डरा क्ले फैक्टरी, पुनलूर प्लाईवुड फैक्टरी, पल्लिवासल जल विद्युत परियोजना, स्टेट रोड ट्रान्स्पोर्ट सर्विस (राज्य सडक परिवहन सेवा) इत्यादि का प्रारम्भ हुआ। इन सब योजनाओं को कार्यान्वित करने वाले दीवान सर सी. पी. रामस्वामी अय्यर थे जो राजनीति की दृष्टि से उन लोगों में थे जिनका सर्वाधिक विरोध होता था। देश स्वतंत्र होने के बाद 1 जुलाई 1949 को तिरुवितांकूर और कोच्चि को मिलाकर तिरुकोच्चि राज्य का गठन किया गया।

कोच्चि[संपादित करें]

तिरुवितांकूर की तरह कोच्चि और मलबार ने भी प्रगति के कई सोपान पार किये। सन् 1912 से 1947 तक के काल में ब्रिटिशों द्वारा नियुक्त दीवान ही कोच्चि का शासन संभालते थे। वे दीवान जो स्वतंत्रता प्राप्ति तक शासक नियुक्त हुए, उनके नाम और शासन काल की सूची इस प्रकार है - कर्नल मन्रो (1812 - 1818), नञ्चप्पय्या (1815 - 1825), शेषगिरि राव (1825 - 1830), एडमना शंकर मेनन (1830 - 1835), वेंकट सुब्बय्या (1835 - 1840), शंकर वारियर (1840 - 1856), वेंकट राव (1856 - 1860), तोट्टक्काट्टु शंकुण्णि मेनन (1860 - 1879), तोट्टक्काट्टु गोविन्द मेनन (1879 - 1889), तिरुवेंकिटाचार्य (1889 - 1892), सुब्रह्मण्य पिळ्ळै (1892 - 1896), पी. राजगोपालाचारी (1896 - 1901), एल. लोक्क (1901 - 1902), एन. पट्टाभिराम राव (1902 - 1907), ए. आर. बैनर्जी (1907 - 1914), जे. डब्ल्यू. भोर (1914 - 1919), टी. विजयराघवाचारि (1919 - 1922), पी. नारायण मेनन (1922 - 1925), टी. एस. नारायण अय्यर (1925 - 1930), सी. जी. हरबर्ट (1930 - 1935), आर. के. षण्मुखम चेट्टि (1935 - 1941), एफ. डब्ल्यू. डिक्सन (1941 - 1943), सर जार्ज बाँग (1943 - 1944) और सी. पी. करुणाकर मेनन (1944 - 1947)। कर्नल मन्रो ने ऐसे नवीन कार्य किये जिनसे कोच्चि में नवजागरण आ गया। उन्होंने रणादार नाम से पुलिस सेना का गठन किया और एरणाकुलम में हज़ूर कच्चेरि (राज्य संबन्धी कचहरी) की स्थापना की। सन् 1821 में गुलामों के उत्पीडन के विरोध की घोषणा की गयी। उन्होंने 'पुतन' नाम से नया सिक्का चलाया। शंकर वारियर के काल में (1854) गुलाम प्रथा समाप्त कर दी गयी। सन् 1845 में एलिमेन्टरी स्कूल की स्थापना हुई, वही महाराजा कॉलेज बन गया। सन् 1889 में तृश्शूर में प्रथम कन्या पाठशाला हुई। कोच्चि का नवीकरण किया गया। षोरणूर से एरणाकुलम तक रेल का निर्माण, एरणाकुलम में कोर्ट की स्थापना, कण्डेष़ुत्तु (खेत और स्थल का वृक्ष समेत विवरण या गणना) की पूर्ति, लोकस्वास्थ्य विभाव का गठन, एरणाकुलम शहर में पेय जल वितरण योजना इत्यादि ने मिलकर कोच्चि को नया रूप दिया। सन् 1925 में कोच्चि में विधान सभा स्थापित हुई। 18 जून 1938 को 'हाई कोर्ट' का उद्घाटन हुआ।

मलाबार[संपादित करें]

ब्रिटिश काल में मलबार प्रदेश मद्रास राज्य का एक जिला था। इस प्रान्त की तिरुकोच्चि की जैसी उन्नति हुई। ब्रिटिश सरकार ने सड़कों तथा उद्यानों के निर्माण में ध्यान दिया। यही नहीं शिक्षा के प्रचार-प्रसार को बढावा दिया। सन् 1848 में बासल मिशन ने कोष़िक्कोड के कल्लायी प्रान्त में एक प्राथमिक पाठशाला खोली जो आगे चलकर मलबार क्रिश्चिन कॉलेज बना। हरमन गुण्डेर्ट जैसे ईसाई धर्मप्रचारकों ने मलबार भाषा की महान सेवा की। मद्रास नगर विकास नियम के अनुसार सन् 1866 और 1867 में कोष़िक्कोड, तलश्शेरी, कण्णूर, पालक्काड, फोर्ट कोच्चि आदि में म्युनिसिपल्टी बनी। लेकिन विकास कार्य के साथ ब्रिटिश शासन द्वारा किया जा रहा शोषण भी जारी था। सन् 1836 - 1853 में सामंतों तथा उनके सहायक ब्रिटिश अधिकारियों की नीतियाँ एरनाड तथा वल्लुवनाड तहसीलों में माप्पिला मुसलमानों के दंगे का कारण बनीं। इनका सामना करने के लिए सन् 1854 में 'मलबार विशेष पुलिस बल' का गठन किया गया। 19 वीं शताब्दी के अंतिम दशकों में मुद्रणालयों का प्रचार-प्रसार, समाचार पत्रों तथा विद्यालयों का आविर्भाव, साहित्य का विकास आदि हुआ जो केरल के विकास का कारण बना। 20 वीं शताब्दी के प्रारंभ में जनता में राजनीतिक जागरण हुआ। राष्ट्रीय आन्दोलनों की लहर केरल में भी उठी।

आधुनिक केरल राज्य[संपादित करें]

केरल के वर्तमान स्वरूप को निर्मित करनेवाले तत्त्वों में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम तथा उसकी पृष्ठभूमि में कार्य कर रहे नव जागरण आंदोलनों का योगदान है। नवकेरल के निर्माण में योग देने वालों की लंबी सूची है - श्री नारायण गुरु, चट्टम्पि स्वामी, अय्यनकाली, ब्रह्मानंद शिवयोगी, वागभटानन्द गुरु, वैकुण्ड स्वामी आदि। इसी तरह यदि धार्मिक संगठनों, सुधारात्मक आंदोलनों और राजनीतिक दलों का सामूहिक प्रयास एवं शैक्षिक उन्नति न होती तो नव केरल के निर्माण संभव न होता। स्वतंत्रता के पूर्व ही केरल में शासन तथा सामाजिक अधिकार के लिए सत्याग्रह हुए। 1 जुलाई 1949 को तिरुवितांकूर तथा कोच्चि को मिलाकर तिरुकोच्चि राज्य का गठन किया गया जिसके प्रथम मुख्यमंत्री थे टी. के. नारयण पिळ्ळै। 1949 में राज्य पुनर्गठन के समय तोवाला, अगस्तीश्वरम्, कलक्कुळम्, विल्वन्कोड आदि चार दक्षिणी तहसीलों को तमिलनाड (उन दिनों मद्रास राज्य) में मिलाया गया। मलबार जिला तथा दक्षिणी केनरा जिले की कासरकोड तहसील केरल के साथ मिलाया गया। इस प्रकार 1956 में वर्तमान केरल की स्थापना हुई।