केरल का भोजन

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केरलीयों का प्रमुख भोजन चावल है। मलयाली साग-सब्जियाँ, मछली, मांस, अंडा इत्यादि से बनी सब्जियों से मिलाकर चावल खाना पसन्द करते हैं। गेहूँ, मैदा आदि भी केरलीयों को प्रिय है। यहाँ ऐसे पकवान प्रिय हैं जो भाप में पकाये जाते हैं या फिर तेल में तले जाते हैं। मीठी खीर भी यहाँ पसन्द की जाती है। कंदमूलों को पकाकर बनाये जाने वाले खाद्य भी यहाँ खाये जाते हैं। आजकल केरलीयों के खाद्य पदार्थों, खाद्य संस्कारों तथा पाक कला में ऐसा परिवर्तन आया है जो भारत के अन्य क्षेत्रों के प्रभाव का परिणाम है, ओपनिवेशिकता के परिणाम स्वरूप विदेशी प्रभाव भी इसका कारण है।

भोजन संस्कार[संपादित करें]

वर्तमान कालीन केरल में प्रांतीय भोजन के स्थान पर जो संस्कार बना है उसमें बहुदेशीय संस्कार का प्रभाव है, किन्तु चावल, भात तथा नारियल केरलीय भोजन का प्रमुख अंग है। केरल के भोजन संस्कार को रूपायित करने में धर्म, जाति-संप्रदाय, औपनिवेशिकता इत्यादि का बड़ा योगदान है। 15 वीं सदी में पुर्तगाली शासक लैटिन अमरिका से अनेक साग-सब्जियाँ लाए जिनका केरलीय खाद्य पदार्थों में प्रमुख स्थान हैं। यदि केरल के भोजन संस्कार का इतिहास पढ़ें तो उपर्युक्त विभिन्न स्रोतों का प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होगा। केरल में भोजन संबन्धित अनेक रीति-रिवाज़ हैं। यहाँ खाना परोसने का विशेष प्रकार है। 'सद्या' नाम से अभिहित दावत या प्रीति भोज भी केरल में विशेष महत्व रखती हैं। केरल की अपनी पाक-कला भी है। किन्तु सम्पूर्ण केरल की पाक-कला एक समान नहीं है। सामान्यतः उत्तर केरल, मध्य केरल तथा दक्षिण केरल की पाक-कला में थोडी-बहुत भिन्नता है। हिन्दू, ईसाई, मुस्लिम धर्मावलंबियों की पाक-कला एक दूसरे से भिन्न है। अक्सर गाँवों की पाक-कला में भी अंतर पाया जाता है। हिन्दू धर्म की भिन्न-भिन्न जातियों के बीच भी पाक-कला में भिन्नता रहती है। हिन्दू मंदिरों में जो प्रसाद दिया जाता है वह विशेष पाक-विधि से बनाया जाता है।

सामान्यतः केरल का भोजन तीखा और खुश - सुगन्धित होता है। केले के पत्ते में भोजन करने का रिवाज़ पुराने काल से ही चला आ रहा है। बर्तनों में भोजन करने की रीति बाद में चली। आज भी प्रीतिभोज में केले के पत्ते का प्रयोग होता है।

भोजन - संस्कार का इतिहास[संपादित करें]

केरल का भोजन संस्कार युग-युगों से रूपायित हुआ है। उस पर सामाजिक आर्थिक, राजनीतिक एवं कृषिपरक तत्वों का प्रभाव लक्षित होता है। यद्यपि केरल में चावल की कृषि का प्रारंभ हुए कई शताब्दियाँ बीत गयी हैं तथापि चावल को सभी लोगों के खाद्य पदार्थ बने बहुत समय नहीं हुआ। इसका मुख्य कारण जाति प्रथा थी। उच्चवर्ग के नंपूतिरि, अंपलवासी, नायर आदि चावल खाते थे। नंपूतिरि और अंपलवासी शाकाहारी थे। नायर और अवर्ण जाति के लोग मांसाहारी थे। 19 वीं शताब्दी में केरल के आम आदमी दिन में दो बार ही भोजन करते थे। इतिहासकारों का कहना है कि नायर और अवर्ण जाति के विपन्न लोगों में चावल खाने की आदत कम थी।

साधारण जनता बाजरा (Millet), रागी (Ragi), ओट्स (Oats) मटर आदि पकाकर खाती थी। जबकि नंपूतिरि लोग अच्छा भोजन करते थे। ब्राह्मण जैसे ऊँची जाति के लोगों को दावत खाने का खूब अवसर मिलता था। मंदिरों के प्रसाद एवं राजाओं और ज़मीनदारों द्वारा आयोजित 'ऊट्टुकल' नामक प्रीतिभोज पर अकेले ब्राह्मणों का ही अधिकार था।

केरलीयों के खाद्य क्रम एवं पाक - कला का विकास जाति व्यवस्था से जुड़कर विकसित हुआ था। प्रत्येक जाति एवं धर्म के लोगों की अपनी खाद्य वस्तुएँ एवं पाक कलाएँ हुआ करती थीं। 19 वीं शादी के केरल में 'पुट्टु' (चावल से पकाया गया एक तरह का पकवान) ईष़वा जाति का खाद्य था।

खाद्य पदार्थों को भोज्य और अभोज्य नाम से विभक्त किया गया था। प्राचीन केरल में 20 वीं शताब्दी के प्रथम दशक तक यह जारी रहा। उसी प्रकार भोजन की रीतियाँ, भोजन से जुड़े व्रत खाद्य - पदार्थों में ग्राह्य - त्याज्य आदि भोजन संस्कार के इतिहास का अविभाज्य अंग है।

अभोज्य खाद्य पदार्थ[संपादित करें]

भोजन को लेकर केरलीय समाज में कई प्रतिबंध थे जो ब्राह्मण तथा अन्य उच्च जातियों में प्रचलित थे। आज भी केरलीय समाज में छोटे पैमाने पर ये प्रतिबंध जारी है। आधी रात, दोपहर, सुबह एवं संध्या वेळा में खाना मना है। वैसे ही भीगे कपडे़ पहनकर भोजन करना, झरोखे में बैठकर भोजन करना, किसी की गोद में बैठकर भोजन करना, नंगे होकर तथा धरती के स्पर्श के बिना भोजन करना, हाथ में रखकर खाना खाना, घर के बाहर बैठकर भोजन करना आदि मना है। ग्रहण के समय खाना नहीं चाहिए। रात में दही नहीं खाना चाहिए। दिन में दूध नहीं पीना चाहिए। माता-पिता के खाने से पहले नहीं खाना चाहिए। जो काम करना है उसे पूरा किए बिना नहीं खाना चाहिए। यह सब केरलीय ब्राह्मणों पर लगाए गए नियम है। शंकराचार्य द्वारा लिखित शंकर स्मृति नामक ग्रन्थ में भोजन संबधी निम्नलिखित नियम बताए गए हैं।

यही शाकाहारी ब्राह्मण अनजाने में मांस खाएगा तो उसे प्रायश्चित्त करना चाहिए। जो जान बूझकर मांस खाता हो उसे जाति से बाहर निकाल देना चाहिए। इसी प्रकार स्नान के बाद ही खाना बनाना, ठंडा चावल न खाना, बच्चों की जूठन को छोडना, हाथ से चावल न परोसना आदि प्रतिबंध भी प्रचलित थे। नंपूतिरियों को प्याज खाना मना था। केरलीय समाज में बाएँ हाथ से खाना आज भी बुरा माना जाता है।

भोजन में त्याज्य-ग्राह्य नियम[संपादित करें]

प्राचीन केरल में भोजन के संदर्भ में जाति से जुडे़ त्याज्य-ग्राह्य नियम का पालन होता था। यह विभाजन केवल भोज्य वस्तुओं को लेकर ही नहीं, प्रीतिभोजों में भी लागू होता था। 20 वीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में हुए जाति विरोधी आन्दोलन तथा शक्तिशाली नवोत्थान आन्दोलन ने यह विभाजन समाप्त कर दिया। जाति व्यवस्था के उच्च शिखर पर विराजमान नंपूतिरि लोग इस विभाजन के जनक थे। उपजातियों में भी यह भेद था। इसमें सबसे प्रमुख भेद-भाव साथ खाने के लिए होता था। कुछ खास भोज्य पदार्थ खास जाति के लोग ही खा सकते हैं। ब्राह्मणों के साथ बैठकर खाने का अधिकार किसी दूसरे को नहीं था। वे अपने से निम्न जाति के लोगों के साथ बैठकर भोजन नहीं करते थे। बाद में केरल ने इसके खिलाफ 'पंक्ति भोजन' नामक अभियान चलाया।

नंपूतिरि समुदाय में ही विभिन्न उपजातियाँ थीं। वे साथ में बैठकर भोजन नहीं कर सकते थे। अगर कोई आचार के विरुद्ध भोजन करता तो वह बिरादरी से बाहर हो जाता। यदि अछूत जाति का भोजन ऊँची जाति का आदमी करता तो जाति से बाहर हो जाता था। 19 वीं शताब्दी में नंपूतिरि लोग 'पुट्टु' नहीं खाते थे क्योंकि वह ईष़वों का खाना माना जाता था। विशेष प्रकार का केला नंपूतिरि ही खा सकते थे। पुराने केरल में स्त्री को अपने पति के साथ भोजन करने की अनुमति नहीं थी। वैसे ही अवर्ण जाति के लोगों को दूकान या बाज़ार से खाद्य पदार्थ खरीदने की अनुमति नहीं थी। वे नमक तक खरीद नहीं सकते थे। अवर्णों को गाय को पालने या दुहकर दूध लेने की इज़ाज़त नहीं थी। 19 वीं शताब्दी तक केरल में दूध तथा दूध से बनी चीज़ें सवर्ण जातियों के लिए आरक्षित थीं।

उपवास[संपादित करें]

केरल के भोजन - संस्कार का ही हिस्सा है उपवास। भोजन पर नियंत्रण करने का उद्देश्य स्वास्थ्य संरक्षण था। सवर्ण जाति के लोग उपवासों का अनुष्ठान करते थे। केरल में आज भी उपवासों का अनुष्ठान होता रहता है। उपवास ही भोजन-व्रत का आधार है। यद्यपि प्रत्येक उपवास स्वास्थ्य संरक्षण की दृष्टि से किया जाता है तो भी धार्मिक अनुष्ठान के रूप में उसको स्थान दिया गया है। प्रत्येक मास की एकादशी, शुक्ळ पक्ष और श्वेत पक्ष, मास का प्रथम शनिवार, श्रावण मास की चतुर्थी, संक्रान्ति, अष्टमी रोहिणी, शिवरात्रि आदि दिनों में व्रत का अनुष्ठान होता था। सोम-व्रत स्त्रियों का उपवास है। व्रत कई प्रकार के होते हैं किसी-किसी में चावल नहीं खाया जाता, पानी तक न पिया जाता, रात्रि-भोजन नहीं किया जाता।

दिन भर न खाना उपवास है, एक दिन दोपहर से दूसरे दिन दोपहर तक भोजन न करने वाले उपवास को एकनक्तम् कहते है। कृच्छ्रम, पराकं, चन्द्रायनम, मासवासर इत्यादि कई दूसरे उपवास सम्प्रदाय प्रचलित रहे हैं।