पर्यावरण

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पर्यावरण हमारे जीवन को प्रभावित करने वाले सभी जैविक और अजैविक तत्वों, तथ्यों, प्रक्रियाओं और घटनाओं के समुच्चय से निर्मित इकाई है।[1] यह हमारे चारों ओर व्याप्त है और हमारे जीवन की प्रत्येक घटना इसी के अन्दर सम्पादित होती है तथा हम मनुष्य अपनी समस्त क्रियाओं से इस पर्यावरण को भी प्रभावित करते हैं। इस प्रकार एक जीवधारी और उसके पर्यावरण के बीच अन्योन्याश्रय का संबंध भी होता है।[2] [3]

पर्यावरण के जैविक संघटकों में सूक्ष्म जीवाणु से लेकर कीड़े-मकोड़े, सभी जीव-जंतु और पेड़-पौधे आ जाते हैं और इसके साथ ही उनसे जुड़ी सारी जैव क्रियाएँ और प्रक्रियाएँ भी। अजैविक संघटकों में जीवनरहित तत्व और उनसे जुड़ी प्रक्रियाएँ आती हैं, जैसे: चट्टानें, पर्वत, नदी, हवा और जलवायु के तत्व इत्यादि।

सामान्यतया पर्यावरण को मनुष्य के संदर्भ में परिभाषित किया जाता है और मनुष्य को एक अलग इकाई और उसके चारों ओर व्याप्त अन्य समस्त चीजों को उसका पर्यावरण घोषित कर दिया जाता है। किन्तु यहाँ यह भी ध्यातव है कि अभी भी इस धरती पर बहुत सी मानव सभ्यताए हैं जो अपने को पर्यावरण से अलग नहीं मानतीं और उनकी नज़र में समस्त प्रकृति एक ही इकाई है जिसका मनुष्य भी एक हिस्सा है। वस्तुतः मनुष्य को पर्यावरण से अलग मानने वाले वे हैं जो तकनीकी रूप से विकसित हैं और विज्ञान और तकनीक के व्यापक प्रयोग से अपनी प्राकृतिक दशाओं में काफ़ी बदलाव लाने में समर्थ हैं।

तकनीकी मानव द्वारा आर्थिक उद्देश्य और जीवन में विलासिता के लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु प्रकृति के साथ व्यापक छेड़छाड़ के क्रियाकलापों ने प्राकृतिक पर्यावरण का संतुलन नष्ट किया है जिससे प्राकृतिक व्यवस्था या प्रणाली के अस्तित्व पर ही संकट उत्पन्न हो गया है। इस तरह की समस्याएँ पर्यावरणीय अवनयन कहलाती हैं।

पर्यावरणीय समस्याएँ जैसे प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन इत्यादि मनुष्य को अपनी जीवनशैली के बारे में पुनर्विचार के लिये प्रेरित कर रहे हैं और अब पर्यावरण संरक्षण और पर्यावरण प्रबंधन की चर्चा है।[4] मनुष्य वैज्ञानिक और तकनीकी रूप से अपने द्वारा किये गये परिवर्तनों से नुकसान को कितना कम करने में सक्षम है, आर्थिक और राजनैतिक हितों की टकराहट में पर्यावरण पर कितना ध्यान दिया जा रहा है और मनुष्यता अपने पर्यावरण के प्रति कितनी जागरूक है, यह आज के ज्वलंत प्रश्न हैं।[5] [6]

नामोत्पत्ति[संपादित करें]

पर्यावरण और पारितंत्र[संपादित करें]

और पारिस्थितिकी

पर्यावरणीय समस्याएँ[संपादित करें]

प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन

पर्यावरण भौतिक वातावरण का द्योतक है। आजकल के यान्त्रिक और औद्योगिक युग में इसको दूषण से बचाना अनिवार्य है। सामान्य जीवन प्रक्रिया में जब अवरोध होता है तब पर्यावरण की समस्या जन्म लेती है। यह अवरोध प्रकृति के कुछ तत्वों के अपनी मौलिक अवस्था में न रहने और विकृत हो जाने से प्रकट होता है। इन तत्वों में प्रमुख हैं जल, वायु, मिट्टी आदि। पर्यावरणीय समस्याओं से मनुष्य और अन्य जीवधारियों को अपना सामान्य जीवन जीने में कठिनाई होने लगती है और कई बार जीवन-मरण का सवाल पैदा हो जाता है।

प्रदूषण भी एक पर्यावरणीय समस्या है जो आज एक विश्वव्यापी समस्या बन गई है। पशु-पक्षी, पेड़-पौधे और इंसान सब उसकी चपेट में हैं। उद्योगों और मोटरवाहनों का बढ़ता उत्सर्जन और वृक्षों की निर्मम कटाई प्रदूषण के कुछ मुख्य कारण हैं। कारखानों, बिजलीघरों और मोटरवाहनों में खनिज ईंधनों (डीजल, पेट्रोल, कोयला आदि) का अंधाधुंध प्रयोग होता है। इनको जलाने पर कार्बन डाइआक्साइड, मीथेन, नाइट्रस आक्साइड आदि गैसें निकलती हैं। इनके कारण हरितगृह प्रभाव नामक वायुमंडलीय प्रक्रिया को बल मिलता है, जो पृथ्वी के तापमान में वृद्धि करता है और मौसम में अवांछनीय बदलाव ला देता है। अन्य औद्योगिक गतिविधियों से क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सीएफसी) नामक मानव-निर्मित गैस का उत्सर्जन होता है जो उच्च वायुमंडल के ओजोन परत को नुकसान पहुंचाती है। यह परत सूर्य के खतरनाक पराबैंगनी विकिरणों से हमें बचाती है। सीएफसी हरितगृह प्रभाव में भी योगदान करते हैं। इन गैसों के उत्सर्जन से पृथ्वी के वायुमंडल का तापमान लगातार बढ़ रहा है। साथ ही समुद्र का तापमान भी बढ़ने लगा है। पिछले सौ सालों में वायुमंडल का तापमान 3 से 6 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है। लगातार बढ़ते तापमान से दोनों ध्रुवों पर बर्फ गलने लगेगी। अनुमान लगाया गया है कि इससे समुद्र का जल एक से तीन मिमी प्रतिवर्ष की दर से बढ़ेगा। अगर समुद्र का जलस्तर दो मीटर बढ़ गया तो मालद्वीप और बंग्लादेश जैसे निचाईवाले देश डूब जाएंगे। इसके अलावा मौसम में बदलाव आ सकता है - कुछ क्षेत्रों में सूखा पड़ेगा तो कुछ जगहों पर तूफान आएगा और कहीं भारी वर्षा होगी।

प्रदूषक गैसें मनुष्य और जीवधारियों में अनेक जानलेवा बीमारियों का कारण बन सकती हैं। एक अध्ययन से ज्ञात हुआ है कि वायु प्रदूषण से केवल 36 शहरों में प्रतिवर्ष 51,779 लोगों की अकाल मृत्यु हो जाती है। कलकत्ता, कानपुर तथा हैदराबाद में वायु प्रदूषण से होने वाली मृत्युदर पिछले 3-4 सालों में दुगुनी हो गई है। एक अनुमान के अनुसार हमारे देश में प्रदूषण के कारण हर दिन करीब 150 लोग मरते हैं और सैकड़ों लोगों को फेफड़े और हृदय की जानलेवा बीमारियां हो जाती हैं।

उद्योगीकरण और शहरीकरण से जुड़ी एक दूसरी समस्या है जल प्रदूषण। बहुत बार उद्योगों का रासायनिक कचरा और प्रदूषित पानी तथा शहरी कूड़ा-करकट नदियों में छोड़ दिया जाता है। इससे नदियां अत्यधिक प्रदूषित होने लगी हैं। भारत में ऐसी कई नदियां हैं, जिनका जल अब अशुद्ध हो गया है। इनमें पवित्र गंगा भी शामिल है। पानी में कार्बनिक पदार्थों (मुख्यतः मल-मूत्र) के सड़ने से अमोनिया और हाइड्रोजन सलफाइड जैसी गैसें उत्सर्जित होती हैं और जल में घुली आक्सीजन कम हो जाती है, जिससे मछलियां मरने लगती हैं। प्रदूषित जल में अनेक रोगाणु भी पाए जाते हैं, जो मानव एवं पशु के स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा हैं। दूषित पानी पीने से ब्लड कैंसर, जिगर कैंसर, त्वचा कैंसर, हड्डी-रोग, हृदय एवं गुर्दों की तकलीफें और पेट की अनेक बीमारियां हो सकती हैं, जिनसे हमारे देश में हजारों लोग हर साल मरते हैं।

एक अन्य पर्यावरणीय समस्या वनों की कटाई है। विश्व में प्रति वर्ष 1.1 करोड़ हेक्टेयर वन काटा जाता है। अकेले भारत में 10 लाख हेक्टेयर वन काटा जा रहा है। वनों के विनाश के कारण वन्यजीव लुप्त हो रहे हैं। वनों के क्षेत्रफल में लगातार होती कमी के कारण भूमि का कटाव और रेगिस्तान का फैलाव बढ़े पैमाने पर होने लगा है।

फसल का अधिक उत्पादन लेने के लिए और फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों को मारने के लिए कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है। अधिक मात्रा में उपयोग से ये ही कीटनाशक अब जमीन के जैविक चक्र और मनुष्य के स्वास्थ्य को क्षति पहुंचा रहे हैं। हानिकारक कीटों के साथ मकड़ी, केंचुए, मधुमक्खी आदि फसल के लिए उपयोगी कीट भी उनसे मर जाते हैं। इससे भी अधिक चिंतनीय बात यह है कि फल, सब्जी और अनाज में कीटनाशकों का जहर लगा रह जाता है, और मनुष्य और पशु द्वारा इन खाद्य पदार्थों के खाए जाने पर ये कीटनाशक उनके लिए अत्यंत हानिकारक सिद्ध होते हैं।

आज ये सब पर्यावरणीय समस्याएं विश्व के सामने मुंह बाए खड़ी हैं। विकास की अंधी दौड़ के पीछे मानव प्रकृति का नाश करने लगा है। सब कुछ पाने की लालसा में वह प्रकृति के नियमों को तोड़ने लगा है। प्रकृति तभी तक साथ देती है, जब तक उसके नियमों के मुताबिक उससे लिया जाए।

एक बार गांधीजी ने दातुन मंगवाई। किसी ने नीम की पूरी डाली तोड़कर उन्हें ला दिया। यह देखकर गांधीजी उस व्यक्ति पर बहुत बिगड़े। उसे डांटते हुए उन्होंने कहा, जब छोटे से टुकड़े से मेरा काम चल सकता था तो पूरी डाली क्यों तोड़ी? यह न जाने कितने व्यक्तियों के उपयोग में आ सकती थी। गांधीजी की इस फटकार से हम सबको भी सीख लेनी चाहिए। प्रकृति से हमें उतना ही लेना चाहिए जितने से हमारी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हो सकती है। पर्यावरणीय समस्याओं से पार पाने का यही एकमात्र रास्ता है।

वृक्षारोपण

असफलता के कारण व उपाय:- पहला कारण:- लगाए गए पौधों की वृद्धि में सबसे बड़ी समस्या पौधों को मवेशियों (गाय, बकरी आदि)द्वारा चरने से होती है। पौधों में ज्यों ही नये पत्ते आते हैं, मवेशियों द्वारा उन्हेें खा जिया जाता है। बार-बार की चराई से पौधे बढ़ नहीं पाते तथा कुछ समय बाद मर जाते हैं। यों तो वृक्षारोपण के बाद पौधों को लोहे की जाली, ईंट आदि से घेराव किया जाता है, जो कि अत्यधिक खर्चीला होता है। इस प्रकार के घेरे अधिक ऊँचे नहीं होते अत: जब पौधे इन घेरों के बाहर आते है तब भी मवेशी इन्हें चर लेते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में पौधों को काँटों से घेरा जाता है। इससे अधिक श्रम व समय लगता है तथा ये काँटे भी कुछ समय बाद नष्ट हो जाते है। इस प्रकार के घेरे के भीतर की घास बड़ी-बड़ी हो जाती है जिसे खाने के लालच में इन्हें मवेशी भी तोड़ देते हैं। उपरोक्त बताए गए घेरे अधिक खर्चीले व श्रमसाध्य होते है तथा अधिक संख्या में वृक्षारोपण करने के लिए उपयुक्त वही छोटे लोहे की जाली व ईंटों की चोरी की सम्भावना होती है। समाधान:- पौधों की सुरक्षा सम्बन्धी उपरोक्त समस्या के निवारण हेतु विचार आया कि क्यों न पौधों की नर्सरी बनाकर पौधों को नर्सरी में ही इतना बड़ा कर लिया जाए कि जब उन्हें रोपा जाए तो उनका बसकसे उपरी सिरा मवेशियों के पहुँच के बाहर हो जाए। अर्थात् पौधों को नर्सरी में ही 7 से 9 फीट व्यास या अधिक की मोटी पॉलीथिन में मिट्टी, रेत व गोबर खाद बराबर मात्रा में मिलाकर भरें। यदि रेत उपलब्ध न हो तो मिट्टी व गोबर खाद बराबर मात्रा में मिलाकर पॉलीथिन में भरें। पॉलीथिन के उपरी हिस्से को लगभग 2 इंच खाली रहने दें ताकि उसमें पानी भरा जा सके। भारी पॉलीथिन के नीचे तरफ किनारे सूजा या मोटेक खीले से एक दो छेद कर दें, ताकि अतिरिक्त पानी इन छेदों से निकल जाए, अन्यथा अधिक पानी के कारण जड़ें गल सकती हैं। इस प्रकार मिट्टी व खाद के मिश्रण से भरी पॉलीथिन का चौड़ाई में चार या पांच की संख्या व लम्बाई में अपनी सुविधानुसार रखकर क्यारी बना लेना चाहिए। यदि दूसरी क्यारी बनानी हो तो दो क्यारियों के बीच 2 से 3 फीट की जगह आने जाने के लिए छोडऩी चाहिए। क्यारी तैयार होने के बाद सभी पॉलीथिन में अच्छी तरह पानी भरकर अच्छी तरह भीगों देवें। हो सके तो पॉलीथिन में छेद करने का काम मिट्टी को एक बारी भीगो देने के बाद करना चाहिए। अब सभी पॉलीथिन में जो पौधे लगाने हों उनके बीज या थरहा लगा देना चाहिए। इस प्रकार नर्सरी तैयार होने के बाद सभी पॉलीथिन में समय-समय पर पानी सींचन करना चाहिए। पानी बागवानी वाले झारे या पाईप के सामने बाथरूम मे उपयोगी शावर लगाकर देना अधिक उचित होता है। पानी कभी भी पाईप से तेज धार में नहीं देना चाहिए, ऐसा करने से पॉलीथिन फटने की सम्भावना रहती है। समय-समय पर पौधे के आसपास उगने वाली खरपतवार को उखाडक़र फेंकते रहना चाहिए। इस प्रकार नर्सरी में ही पौधों को एक दो वर्ष तक रखकर 7-8 फीट ऊँचाई तक बढऩे देना चाहिए। सम्भव हो तो पॉलीथिन को धूप से बचाने के लिए क्यारी के चारों कोने में करीब 2 फीट ऊँची लकड़ी गड़ाकर कपड़ा या बोरा बांधकर पॉलीथिन के लिए छांव की व्यवस्था करनी चाहिए। दूसरा चरण:- वृक्षारोपण के असफलता के दूसरा प्रमुख कारण है समय-समय पर पौधों को पानी न मिल पाना। प्राय: वृक्षारोपण तो कर दिया जाता है, परन्तु वृक्षारोपण वाली जगह दूर होने के कारण या अन्य कारणों से उन्हें समय-समय पर पानी नहीं दिया जाता परिणामस्वरूप पौधे गर्मी में मरकर नष्ट हो जाते हैं। समाधान: - इसके लिए कम से कम एक से डेढ़ फीट लम्बा व इतना ही चौड़ा गड्ढा खोदकर नर्सरी में तैयार पौधे की पॉलीथिन फाडक़र पौधारोपण करें व सम्भव हो तो साथ में गोबर खाद में गड्ढ में भर दें पौधा हवा से झूके मत इतके बबूल, बेर या अन्य किसी प्रकार की डण्डी पौधे के साथ गड़ाकर रस्सी से हल्की गठान द्वारा बांध दें। वृक्षारोपण बारिश में ही करना चाहिए अन्यथा निरन्तर पौधों का पानी देना पड़ेगा। यदि बारिश के शुरुआती दिनों में कम से कम डेढ़ फीट गहरे गड्ढ में 7-8 फीट लंबा घनी जड़ वाले पौधे का रोपण किया जाता है, तो बारिश के तीन चार महीनों में उसकी जड़ें कम से कम एक-दो फीट और नीचे पहुँच जाती है। अर्थात् सतह से लगभग तीन फीट की गहराई में पहुँच जाती है। जमीन की सतह से लगभग तीन फीट गहराई में वर्ष भर नमी रहती है, इसलिए इस प्रकार रोपे गये पौधों को ग्रीष्म ऋतु में इनकी सतत निगरानी करना चाहिए व पत्ते मुरझाकर नीचे झूकने लगे तो तत्काल पानी देना चाहिए। वर्षा ऋतु में गहरा गड्ढा करके वृक्षारोपण करने से आगे के दिनों पानी देने की समस्या पूर्णरूपेण तो नहीं पर लगभग समाप्त हो जाती है।

कुछ ध्यान देने योग्य बातें:-

1. बारिश में वृक्षारोपण करने से पौधे को शीत व ग्रीष्म ऋतु में पानी देने की आवश्यकता लगभग नहीं रहती फिर भी उनकी सतत निगरानी करते रहना चाहिए और यदि पौधों के पत्ते नीचे की ओर झूकने लगे अर्थात् पौधा मुरझाने लगे तो तत्काल पानी देना चाहिए। 2. वृक्षारोपण के समय गड्ढा के ऊपरी भाग को कुछ गहरा रखना चाहिए व गड्ढा के चारों ओर मिटटी कापार बनाना चाहिए ताकि पानी डालने पर पानी अगल बगल न बहे। 3. सम्भव हो तो पौधे के साथ कोई डंडा या बांस गाड़ कर बांध व उसमें बबूल, बेर आदि की कंटीली झाडिय़ां बांध दें या पौधे के चारों ओर गाडक़र या बिखेर कर रख दें, ताकि जानवर पौधों के पास न जा पाए या उसे न रगड़े। 4. पौधों का लम्बा होना ही पर्याप्त नहीं है, पौधों के तनों में पर्याप्त मोटाई आने तक उनकी देखभाल आवश्यक है। 5. निचली जगह जहां वारिस में पानी भर जाता हो वहां पौधों की जड़ गल जाती है। ऐसी गहरी जगहों मे कहवा, जामुन, इमली, करंज के पौधे लगाना चाहिए। इन पौधों का ऊपरी भाग पानी की सतह से ऊपर होने पर ये पानी भरी जगहों मे भी जीवित रहकर वृद्धि करते हैं। अन्य पौधों के मरने की सम्भावना रहती है। 6. सम्भव हो तो घर पर ही छोटी-छोटी पॉलीथिन में मिट्टी भरकर पीपल, बरगद आदि सभी प्रकार के पौधों को बीज या थरहा के माध्यम से लगाकर रखना चाहिए व जब भी बड़ी पॉलीथिन में नर्सरी बनायें तो इन पौधों को छोटी पॉलीथिन फाडक़र बड़ी पॉलीथिन में स्थानांतरित कर देना चाहिए ऐसा करने से पौधे तुरन्त बढऩे लगते हैं। 7. उखाडक़र लगाए गए पौधों की जड़ टूटकर प्राप्त होने पर पॉलीथिन में रोपण के बाद इनके पत्ते सूखकर गिर जाते हैं तथा कुछ दिन बाद नये पत्ते आ जाते हैं। 8. रोपने के बाद यदि पौधे मर जाता है तो उस पॉलीथिन में दूसरा पौधा लगा देना चाहिए। 9. पॉलीथिन में लगे पौधे के तनों में अगल बगल से निकलने वाली शाखाओं की सावधानी से कटाई कर देनी चाहिए ताकि पौधा सीधा ऊपर की बढ़े। ==पर्यावरण संरक्षण==

पर्यावरण प्रबंधन[संपादित करें]

पर्यावरण प्रबंधन का तात्पर्य पर्यावरण के प्रबंधन से नहीं है, बल्कि आधुनिक मानव समाज के पर्यावरण के साथ संपर्क तथा उसपर पड़ने वाले प्रभाव के प्रबंधन से है. प्रबंधकों को प्रभावित करने वाले तीन प्रमुख मुद्दे हैं राजनीति (नेटवर्किंग), कार्यक्रम (परियोजनायें), और संसाधन (धन, सुविधाएँ, आदि)। पर्यावरण प्रबंधन की आवश्यकता को कई दृष्टिकोणों से देखा जा सकता है।

भारतीय संस्कृति में पर्यावरण चिंतन[संपादित करें]


पर्यावरण विज्ञान[संपादित करें]

पर्यावरण विधि[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

संदर्भ[संपादित करें]

वाह्य सूत्र[संपादित करें]