पर्यावरण

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प्राकृतिक पर्यावरण - जम्मू-कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र में नुब्रा घाटी का एक दृश्य
मानव निर्मित पर्यावरण - कोलोरोडो क्षेत्र में मानव आवास का एक दृश्य
पर्यावरण प्रदूषण - कारखानों द्वारा धुएँ का उत्सर्जन

पर्यावरण उन सभी भौतिक, रासायनिक एवं जैविक कारकों की समष्टिगत इकाई है जो किसी जीवधारी अथवा पारितंत्रीय आबादी को प्रभावित करते हैं तथा उनकी रूप, जीवन और जीविता को तय करते हैं।[1]सामान्य अर्थों में यह हमारे जीवन को प्रभावित करने वाले सभी जैविक और अजैविक तत्वों, तथ्यों, प्रक्रियाओं और घटनाओं के समुच्चय से निर्मित इकाई है।[2] यह हमारे चारों ओर व्याप्त है और हमारे जीवन की प्रत्येक घटना इसी के अन्दर सम्पादित होती है तथा हम मनुष्य अपनी समस्त क्रियाओं से इस पर्यावरण को भी प्रभावित करते हैं। इस प्रकार एक जीवधारी और उसके पर्यावरण के बीच अन्योन्याश्रय का संबंध भी होता है।[3] [4]

पर्यावरण के जैविक संघटकों में सूक्ष्म जीवाणु से लेकर कीड़े-मकोड़े, सभी जीव-जंतु और पेड़-पौधे आ जाते हैं और इसके साथ ही उनसे जुड़ी सारी जैव क्रियाएँ और प्रक्रियाएँ भी। अजैविक संघटकों में जीवनरहित तत्व और उनसे जुड़ी प्रक्रियाएँ आती हैं, जैसे: चट्टानें, पर्वत, नदी, हवा और जलवायु के तत्व इत्यादि।[5]

सामान्यतया पर्यावरण को मनुष्य के संदर्भ में परिभाषित किया जाता है और मनुष्य को एक अलग इकाई और उसके चारों ओर व्याप्त अन्य समस्त चीजों को उसका पर्यावरण घोषित कर दिया जाता है। किन्तु यहाँ यह भी ध्यातव है कि अभी भी इस धरती पर बहुत सी मानव सभ्यताए हैं जो अपने को पर्यावरण से अलग नहीं मानतीं और उनकी नज़र में समस्त प्रकृति एक ही इकाई है जिसका मनुष्य भी एक हिस्सा है।[6] वस्तुतः मनुष्य को पर्यावरण से अलग मानने वाले वे हैं जो तकनीकी रूप से विकसित हैं और विज्ञान और तकनीक के व्यापक प्रयोग से अपनी प्राकृतिक दशाओं में काफ़ी बदलाव लाने में समर्थ हैं।

मानव हस्तक्षेप के आधार पर पर्यावरण को दो प्रखण्डों में विभाजित किया जाता है - प्राकृतिक या नैसर्गिक पर्यावरण और मानव निर्मित पर्यावरण[7] हालाँकि पूर्ण रूप से प्राकृतिक पर्यावरण (जिसमें मानव हस्तक्षेप बिल्कुल न हुआ हो) या पूर्ण रूपेण मानव निर्मित पर्यावरण (जिसमें सबकुछ मनुष्य निर्मित हो), कहीं नहीं पाए जाते। यह विभाजन प्राकृतिक प्रक्रियाओं और दशाओं में मानव हस्तक्षेप की मात्रा की अधिकता और न्यूनता का द्योतक मात्र है। पारिस्थितिकी और पर्यावरण भूगोल में प्राकृतिक पर्यावरण शब्द का प्रयोग पर्यावास (habitat) के लिये भी होता है।

तकनीकी मानव द्वारा आर्थिक उद्देश्य और जीवन में विलासिता के लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु प्रकृति के साथ व्यापक छेड़छाड़ के क्रियाकलापों ने प्राकृतिक पर्यावरण का संतुलन नष्ट किया है जिससे प्राकृतिक व्यवस्था या प्रणाली के अस्तित्व पर ही संकट उत्पन्न हो गया है। इस तरह की समस्याएँ पर्यावरणीय अवनयन कहलाती हैं।

पर्यावरणीय समस्याएँ जैसे प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन इत्यादि मनुष्य को अपनी जीवनशैली के बारे में पुनर्विचार के लिये प्रेरित कर रहे हैं और अब पर्यावरण संरक्षण और पर्यावरण प्रबंधन की चर्चा है।[8] मनुष्य वैज्ञानिक और तकनीकी रूप से अपने द्वारा किये गये परिवर्तनों से नुकसान को कितना कम करने में सक्षम है, आर्थिक और राजनैतिक हितों की टकराहट में पर्यावरण पर कितना ध्यान दिया जा रहा है और मनुष्यता अपने पर्यावरण के प्रति कितनी जागरूक है, यह आज के ज्वलंत प्रश्न हैं।[9] [10]

नामोत्पत्ति[संपादित करें]

पर्यावरण शब्द संस्कृत भाषा के 'परि' उपसर्ग (चारों ओर) और 'आवरण' से मिलकर बना है जिसका अर्थ है ऐसी चीजों का समुच्चय जो किसी व्यक्ति या जीवधारी को चारों ओर से आवृत्त किये हुए हैं। पारिस्थितिकी और भूगोल में यह शब्द अंग्रेजी के environment के पर्याय के रूप में इस्तेमाल होता है।

अंग्रेजी शब्द environment स्वयं उपरोक्त पारिस्थितिकीय अर्थ में काफ़ी बाद में प्रयुक्त हुआ और यह शुरूआती दौर में आसपास की सामान्य दशाओं के लिये प्रयुक्त होता था। यह फ़्रांसीसी भाषा से उद्भूत है[11] जहाँ यह "state of being environed" (see environ + -ment) के अर्थ में प्रयुक्त होता था और इसका पहला ज्ञात प्रयोग कार्लाइल द्वारा जर्मन शब्द Umgebung के अर्थ को फ्रांसीसी में व्यक्त करने के लिये हुआ।[12]

पर्यावरण और पारितंत्र[संपादित करें]

घास का मैदान रुपी पारितंत्र, गोरोंगोरो संरक्षण क्षेत्र, तंजानिया में

पर्यावरण अपनी सम्पूर्णता में एक इकाई है जिसमें अजैविक और जैविक संघटक आपस में विभिन्न अन्तर्क्रियाओं द्वारा संबद्ध और अंतर्गुम्फित होते हैं। इसकी यह विशेषता इसे एक पारितंत्र का रूप प्रदान करती है क्योंकि पारिस्थितिक तंत्र या पारितंत्र पृथ्वी के किसी क्षेत्र में समस्त जैविक और अजैविक तत्वों के अंतर्सम्बंधित समुच्चय को कहते हैं। अतः पर्यावरण भी एक पारितंत्र है।[13]

पृथ्वी पर पैमाने (scale) के हिसाब से सबसे वृहत्तम पारितंत्र जैवमंडल को माना जाता है। जैवमंडल पृथ्वी का वह भाग है जिसमें जीवधारी पाए जाते हैं और यह स्थलमंडल, जलमण्डल तथा वायुमण्डल में व्याप्त है। पूरे पार्थिव पर्यावरण की रचना भी इन्ही इकाइयों से हुई है, अतः इन अर्थों में वैश्विक पर्यावरण, जैवमण्डल और पार्थिव पारितंत्र एक दूसरे के समानार्थी हो जाते हैं।

माना जाता है कि पृथ्वी के वायुमण्डल का वर्तमान संघटन और इसमें ऑक्सीजन की वर्तमान मात्रा पृथ्वी पर जीवन होने का कारण ही नहीं अपितु परिणाम भी है। प्रकाश-संश्लेषण, जो एक जैविक (या पारिस्थितिकीय अथवा जैवमण्डलीय) प्रक्रिया है, पृथ्वी के वायुमण्डल के गठन को प्रभावित करने वाली महत्वपूर्ण प्रक्रिया रही है। इस प्रकार के चिंतन से जुड़ी विचारधारा पूरी पृथ्वी को एक इकाई गाया[14] या सजीव पृथ्वी (living earth) के रूप में देखती है।[15]

इसी प्रकार मनुष्य के ऊपर पर्यवारण के प्रभाव और मनुष्य द्वारा पर्यावरण पर डाले गये प्रभावों का अध्ययन मानव पारिस्थितिकी और मानव भूगोल का प्रमुख अध्ययन बिंदु है।[16][17][18]

पर्यावरणीय समस्याएँ[संपादित करें]

* यह भी देखें: प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन

जयादातर पर्यावरणीय समस्याएँ पर्यावरणीय अवनयन और मानव जनसंख्या और मानव द्वारा संसाधनों के उपभोग में वृद्धि से जुड़ी हैं। पर्यावरणीय अवनयन के अंतर्गत पर्यावरण में होने वाले वे सारे परिवर्तन आते हैं जो अवांछनीय हैं[19] और किसी क्षेत्र विशेष में या पूरी पृथ्वी पर जीवन और संधारणीयता को खतरा उत्पन्न करते हैं।अतः इसके अंतर्गत प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का क्षरण और अन्य प्राकृतिक आपदाएं इत्यादि शामिल की जाती हैं। पर्यावरणीय अवनयन के साथ मिलकर जनसंख्या में चरघातांकी दर से हो रहि वृद्धि तथा मानव द्वारा उपभोग के बदलते प्रतिरूप लगभग सारी पर्यावरणीय समस्याओं के मूल कारण हैं।

संसाधन न्यूनीकरण[संपादित करें]

संसाधन न्यूनीकरण का अर्थ है प्राकृतिक संसाधनों का मनुष्य द्वारा अपने आर्थिक लाभ हेतु इतनी तेजी से दोहन की उनका प्राकृतिक प्रक्रियाओं द्वारा पुनर्भरण (replenishment) न हो पाए। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में संसाधन क्षरण के लिये जनसंख्या के दबाव, तेज वृद्धि दर और लोगों के उपभोग प्रतिरूप का भी प्रभाव जिम्मेवार माना जा रहा है।[20][21]

संसाधनों को दो वर्गों में विभक्त किया जाता है - नवीकरणीय संसाधन और अनवीकरणीय संसाधन। इसके आलावा कुछ संसाधन इतनी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं कि उनका क्षय नहीं हो सकता उन्हें अक्षय संसाधन कहते हैं जैसे सौर ऊर्जा

अनवीकरणीय संसाधनों का तेजी से दोहन उनके भण्डार को समाप्त कर मानव जीवन के लिये कठिन परिस्थितियां पैदा कर सकता है। कोयला, पेट्रोलियम, या धत्वित्क खनिजों के भण्डारों का निर्माण एक दीर्घ अवधि की घटना है और जिस तेजी से मनुष्य इन का दोहन कर रहा है ये एक न एक दिन समाप्त हो जायेंगे। वहीं दूसरी ओर कुछ नवीकरणीय संसाधन भी मनुष्य द्वारा इतनी तेजी से प्रयोग में लाये जा रहे हैं कि उनका प्राकृतिक प्रक्रियाओं द्वारा पुनर्भरण उतनी तेजी से संभव नहीं और इस प्रकार वे भी अनवीकरणीय संसाधन की श्रेणी में आ जायेंगे।

प्रदूषण[संपादित करें]

प्रदूषण अथवा पर्यावरणीय प्रदूषण पर्यावरण में किसी पदार्थ (ठोस, द्रव या गैस) अथवा ऊर्जा (ऊष्मा, ध्वनि, रेडियोधर्मिता इत्यादि) के प्रवेश को कहते हैं यदि इसकी गति इतनी तेज हो कि सामान्य और प्राकृतिक प्रक्रियाओं द्वारा इसका परिक्षेपण, मंदन, वियोजन, पुनर्चक्रण अथवा अहानिकारक रूप में संरक्षण न हो सके।[22] इस प्रकार प्रदूषण के दो स्पष्ट सूचक हैं, किसी पदार्थ या ऊर्जा का पर्यावरण में प्रवेश और उसका प्राकृतिक पर्यावरण के प्रति हानिकारक या अवांछित होना। इस तरह के अवांछित तत्व को प्रदूषक या दूषक कहते हैं।

प्रदूषण का वर्गीकरण प्रदूषक के प्रकार, स्रोत अथवा पारितंत्र के जिस हिस्से में उसका प्रवेश होता है, के आधार पर किया जाता है। उदाहरण के तौर पर वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण, इत्यादि प्रकार इस आधार पर निश्चित किये जाते हिया कि पारितंत्र के इस हिस्से में दूषक तत्व का प्रवेश होता है। वहीं दूसरी ओर रेडियोधर्मी प्रदूषण, प्रकाश प्रदूषण, ध्वनि या रव प्रदूषण इत्यादि प्रकार प्रदूषक के खुद के प्रकार पर आधारित वर्गीकरण हैं।


जलवायु परिवर्तन[संपादित करें]

जैवविविधता ह्रास[संपादित करें]

प्राकृतिक आपदाएँ[संपादित करें]

पर्यावरण संरक्षण[संपादित करें]

पर्यावरण प्रबंधन[संपादित करें]

पर्यावरण प्रबंधन का तात्पर्य पर्यावरण के प्रबंधन से नहीं है, बल्कि आधुनिक मानव समाज के पर्यावरण के साथ संपर्क तथा उसपर पड़ने वाले प्रभाव के प्रबंधन से है। प्रबंधकों को प्रभावित करने वाले तीन प्रमुख मुद्दे हैं राजनीति (नेटवर्किंग), कार्यक्रम (परियोजनायें) और संसाधन (धन, सुविधाएँ, आदि)। पर्यावरण प्रबंधन की आवश्यकता को कई दृष्टिकोणों से देखा जा सकता है।

भारतीय संस्कृति में पर्यावरण चिंतन[संपादित करें]


पर्यावरण विज्ञान[संपादित करें]

पर्यावरण विधि[संपादित करें]

भारत में[संपादित करें]

पर्यावरणीय विधि अथवा पर्यावरण विधि समेकित रूप से उन सभी अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय अथवा क्षेत्रीय सन्धियों, समझौतों और संवैधानिक विधियों को कहा जाता है जो प्राकृतिक पर्यावरण पर मानव प्रभाव को कम करने और पर्यावरण की संधारणीयता बनाये रखने हेतु हैं।

भारत में पर्यावरण क़ानून पर्यावरण (रक्षा) अधिनियम 1986 से नियमित होता है जो एक व्‍यापक विधान है। इसकी रूप रेखा केन्‍द्रीय सरकार के विभिन्‍न केन्‍द्रीय और राज्‍य प्राधिकरणों के क्रियाकलापों के समन्‍वयन के लिए तैयार किया गया है जिनकी स्‍थापना पिछले कानूनों के तहत की गई है जैसाकि जल अधिनियम और वायु अधिनियम।

अन्य विधियों में भारतीय वन अधिनियम, 1927 और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 प्रमुख हैं।

एक राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण का भी गठन किया गया है।[23]

अ न्तर्राष्ट्रीय[संपादित करें]


इन्हें भी देखें[संपादित करें]

संदर्भ[संपादित करें]

  1. environment (biology), Encyclopedia Brittanica; "environment, the complex of physical, chemical, and biotic factors that act upon an organism or an ecological community and ultimately determine its form and survival."
  2. सुरेश लाल श्रीवास्तव प्रतियोगिता दर्पण, मार्च, २००९ पृष्ठ १४२३
  3. दामोदर शर्मा आधुनिक जीवन और पर्यावरण
  4. मधु अस्थानापर्यावरण एक संक्षिप्त अध्ययन
  5. बासक, अनिंदिता - पर्यावरणीय अध्ययन, गूगल पुस्तक, (अभिगमन तिथि 04-08-2014
  6. Jamieson, Dale. (2007). The Heart of Environmentalism. In R. Sandler & P. C. Pezzullo. Environmental Justice and Environmentalism. (pp. 85-101). Massachusetts Institute of Technology Press.
  7. बासक, अनिंदिता - पर्यावरणीय अध्ययन, गूगल पुस्तक, (अभिगमन तिथि 04-08-2014
  8. सुरेश लाल श्रीवास्तव प्रतियोगिता दर्पण, मार्च, २००९
  9. सुरेश लाल श्रीवास्तव प्रतियोगिता दर्पण, मार्च, २००९
  10. मधु अस्थानापर्यावरण एक संक्षिप्त अध्ययन
  11. अंग्रेजी विक्षनरी
  12. Online etymology dictionary
  13. सविन्द्र सिंह, जैव भूगोल, प्रयाग पुस्तक भवन
  14. गाया परिकल्पना, ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी पर (अभिगमन तिथि 05-08-2014)
  15. Lovelock, J.E. (1 August 1972). "Gaia as seen through the atmosphere". Atmospheric Environment (1967) (Elsevier) 6 (8): 579–580.
  16. Richards, Ellen H. (1907 (2012 reprint))Sanitation in Daily Life, Forgotten Books. pp. v.
  17. आर॰ डी॰ दीक्षित, भौगोलिक चिंतन का विकास पृष्ठ सं॰ 253, गूगल पुस्तक (अभिगमन तिथि 25-07-2014)
  18. हार्लेन एच॰ बैरोज, (1923), Geography as Human Ecology, Annals of the Association of American Geographers, 13(1):1-14
  19. Johnson, D.L., S.H. Ambrose, T.J. Bassett, M.L. Bowen, D.E. Crummey, J.S. Isaacson, D.N. Johnson, P. Lamb, M. Saul, and A.E. Winter-Nelson. 1997. Meanings of environmental terms. Journal of Environmental Quality 26: 581–589.
  20. Richard Anderson, Resource depletion: Opportunity or looming catastrophe?, BBC News पर, (अभिगमन तिथि 05-08-2014)
  21. Fred Magdoff, Global Resource Depletion: Is Population the Problem?, Monthly Review, 2013, Volume 64, Issue 08 (January), (अभिगमन तिथि 05-08-2014)
  22. pollution (environment), Encyclopedia Brittanica; "pollution, also called environmental pollution, the addition of any substance (solid, liquid, or gas) or any form of energy (such as heat, sound, or radioactivity) to the environment at a rate faster than it can be dispersed, diluted, decomposed, recycled, or stored in some harmless form."
  23. राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण

वाह्य सूत्र[संपादित करें]