दिल्ली के दर्शनीय स्थल

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दिल्ली भारत की राजधानी ही नहीं पर्यटन का भी प्रमुख केंद्र भी है। राजधानी होने के कारण भारतीय सरकार के अनेक कार्यालय, राष्ट्रपति भवन, संसद भवन आदि अनेक आधुनिक स्थापत्य के नमूने तो यहाँ देखे ही जा सकते हैं प्राचीन नगर होने का कारण इसका ऐतिहासिक महत्व भी है। पुरातात्विक दृष्टि से कुतुबमीनार और लौह स्तंभ जैसे विश्व प्रसिद्ध निर्माण यहाँ पर आकर्षण का केंद्र समझे जाते हैं। एक ओर हुमायूँ का मकबरा जैसा मुगल शैली की ऐतिहासिक राजसिक इमारत यहाँ है तो दूसरी ओर दूसरी ओर निज़ामुद्दीन औलिया की पारलौकिक दरगाह।

लगभग सभी धर्मों के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल यहाँ हैं बिरला मंदिर, बंगला साहब का गुरुद्वारा, बहाई मंदिर और देश पर जान देने वालों का स्मारक भी राजपथ पर इसी शहर में निर्मित किया गया है। भारत के प्रधान मंत्रियों की समाधियाँ हैं, जंतर मंतर है, लाल किला है साथ ही अनेक प्रकार के संग्रहालय और बाज़ार हैं जो दिल्ली घूमने आने वालों का दिल लूट लेते हैं।

अनुक्रम

अर्चना स्थल[संपादित करें]

लक्ष्मी नारायण मंदिर[संपादित करें]

बिरला मंदिर

यह मंदिर बिड़ला मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी को समर्पित यह मंदिर दिल्ली के प्रमुख मंदिरों में से एक है। इसका निर्माण 1938 में हुआ था और इसका उद्घाटन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने किया था। बिड़ला मंदिर अपने यहां मनाई जाने वाली जन्माष्टमी के लिए भी प्रसिद्ध है। जन्माष्टमी का त्यौहार यहां बहुत हर्षोल्लामस के साथ मनाया जाता है। इसके वास्तुशिल्प की बात की जाए तो यह मंदिर उड़ियन शैली में निर्मित है। मंदिर का बाहरी हिस्सा सफेद संगमरमर और लाल बलुआपत्थिर से बना है जो मुगल शैली की याद दिलाता है। मंदिर में तीन ओर दो मंजिला बरामदे हैं और पिछले भाग में बगीचे और फव्वारे हैं।

छतरपुर मंदिर[संपादित करें]

छतरपुर मंदिर दिल्ली के सबसे बड़े और सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में एक है। यह मंदिर गुंड़गांव-महरौली रोड पर स्थित है। छतरपुर मंदिर सफेद संगमरमर से बना हुआ है और इसकी सजावट बहुत की आकर्षक है। दक्षिण भारतीय शैली में बना यह मंदिर विशाल क्षेत्र में फैला है। मंदिर परिसर में खूबसूरत लॉन और बगीचे हैं। मूल रूप से यह मंदिर मां दुर्गा को समर्पित है। इसके अतिरिक्तं यहां भगवान शिव, विष्णु, देवी लक्ष्मी, हनुमान, भगवान गणेश और राम आदि देवी-देवताओं के मंदिर भी हैं।

दुर्गा पूजा और नवरात्रि के अवसर पर पूरे देश से यहां भक्त एकत्र होते हैं और समारोह में भाग लेते हैं। इस दौरान यहां भक्तों की भारी भीड़ होती है। यहां एक पेड़ है जहां श्रद्धालु धागे और रंग-बिरंगी चूड़ियां बांधते हैं। लोगों का मानना है कि ऐसा करने से मनोकामना पूर्ण होती है।

बहाई मंदिर[संपादित करें]

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कालकाजी मंदिर के पीछे स्थित है बहाई प्रार्थना केंद्र जिसे लोटस टैंपल या कमल मंदिर के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर एशिया महाद्वीप में बना एकमात्र बहाई प्रार्थना केंद्र है। भारत के अलावा पनामा, कंपाला, इल्लिनॉइस, फ्रैंकफर्ट, सिडनी और वेस्ट समोआ में इसके केंद्र हैं। ये सभी केंद्र बहाई आस्था के प्रतीक हैं और अपने अद्वितीय वास्तु शिल्प के लिए प्रसिद्ध हैं। 26 एकड़ में फैले इस मंदिर का निर्माण 1980 से 1986 के बीच हुआ था। इसे बनाने में कुल 10 मिलियन रु. की लागत आई थी। श्रद्धालुओं के लिए इसे दिसंबर 1986 में खोला गया था। तालाब और बगीचों के बीच यह मंदिर ऐसे लगता है जसे पानी में कमल तैर रहा हो। इसका डिजाइन फरीबर्ज सभा ने बनाया था। कमल भारत की सर्वधर्म समभाव की संस्कृति को दर्शाता है। मंदिर के प्रार्थना हॉल में कोई मूर्ति नहीं है। किसी भी धर्म के अनुयायी यहां आकर ध्यान लगा सकते हैं। मंदिर में एक सूचना केंद्र भी है। प्रार्थना का समय: 1000-1015 बजे, 1200-1215 बजे, 1500-1515 बजे, 1700-1715 बजे

काली बाड़ी मंदिर[संपादित करें]

बिड़ला मंदिर के पास ही काली बाड़ी मंदिर स्थित है। यह छोटा-सा मंदिर काली मां को समर्पित है। नवरात्रि के दौरान यहां भव्य समारोह आयोजित किया जाता है। काली मां को देवी दुर्गा का ही रौद्र रूप माना जाता है। इस मंदिर में देवी को शराब का चढ़ावा चढ़ाया जाता है। काली बाड़ी मंदिर दिखने में छोटा और साधारण अवश्यम है लेकिन इसकी मान्यमता बहुत अधिक है । मंदिर के अंदर ही एक विशाल पीपल का पेड़ है। भक्तेगण इस पेड को पवित्र मानते हैं और इस पर लाल धागा बांध कर मनोकामनाएं पूर्ण होने की कामना करते हैं।

दिगंबर जैन मंदिर[संपादित करें]

दिल्लीग का सबसे पुराना जैन मंदिर लाल किला और चांदनी चौक के सामने स्थित है। इसका निर्माण 1526 में हुआ था। वर्तमान में इसकी इमारत लाल पत्थ रों की बनी है। इसलिए यह लाल मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यहां कई मंदिर हैं लेकिन सबसे प्रमुख मंदिर भगवान महावीर का है जो जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे। यहां जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ की प्रतिमा भी स्थाकपित है। जैन धर्म के अनुयायियों के बीच यह स्थारन बहुत लोकप्रिय है। यहां का शांत वातावरण लोगों का अपनी ओर खींचता है।

गुरुद्वारा बंगला साहिब[संपादित करें]

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गुरु हरिकिशन साहिब को समर्पित यह गुरुद्वारा सिक्खों का प्रमुख धार्मिक केंद्र है। गुरु हरि किशन सिक्खों के आठवें गुरु थे। प्रारंभ में गुरुद्वारा बंगला साहिब एक हवेली थी जहां गुरु हरि किशन 1664 में अपनी दिल्ली यात्रा के दौरान रुके थे। कहा जाता है कि उनके दिल्ली प्रवास के दौरान यहां महामारी फैल गई थी। उस समय गुरु हरि किशन ने बिना किसी भेदभाव के गरीब और असहाय लोगों की सेवा की। उनकी मृत्यु छोटी उम्र में ही हो गई थी क्योंकि उन्होंने शहर से महामारी हटाने के लिए सारी बीमारियां अपने ऊपर ले ली थी। गुरुद्वार के परिसर में एक माध्यमिक स्कूल, संग्रहालय, किताबों की दुकान, पुस्तकालय, अस्पताल और एक पवित्र तालाब भी है। देश-विदेश से श्रद्धालुओं का यहां आना जाना लगा रहता है।

जामा मस्जिद[संपादित करें]

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लाल किले से महज 500 मी. की दूरी पर जामा मस्जिद स्थित है जो भारत की सबसे बड़ी मस्जिद है। इस मस्जिद का निर्माण 1650 में शाहजहां ने शुरु करवाया था। इसे बनने में 6 वर्ष का समय और 10 लाख रु.लगे थे। बहुआ पत्थर और सफेद संगमरमर से निर्मित इस मस्जिद में उत्तर और दक्षिण द्वारों से प्रवेश किया जा सकता है। पूर्वी द्वार केवल शुक्रवार को ही खुलता है। इसके बार में कहा जाता है कि सुल्तान इसी द्वार का प्रयोग करते थे। इसका प्रार्थना गृह बहुत ही सुंदर है। इसमें ग्यारह मेहराब हैं जिसमें बीच वाला महराब अन्य से कुछ बड़ा है। इसके ऊपर बने गुंबदों को सफेद और काले संगमरमर से सजाया गया है जो निजामुद्दीन दरगाह की याद दिलाते हैं।

खिड़की मस्जिद[संपादित करें]

इस मस्जिद का निर्माण फिरोज शाह तुगलक के प्रधानमंत्री खान-ई-जहान जुनैन शाह ने 1380 में करवाया था। मस्जिद के अंदर बनी खूबसूरत खिड़कियों के कारण इसका नाम खिड़की मस्जिद पड़ा। यह मस्जिद दो मंजिला है। मस्जिद के चारों कोनों पर बुर्ज बने हैं जो इसे किले का रूप देते हैं। तीन दरवाजों पर मीनारें बनी हैं। पुराने समय में पूर्वी द्वार से प्रवेश किया जाता था लेकिन अब दक्षिण द्वार पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए खुला रहता है।

कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद[संपादित करें]

टूटी हुई कुव्वत उल इस्लाम मस्जिद के बीच से दिखता लौह स्तंभ

इस मस्जिद का निर्माण गुलाम वंश के प्रथम शासक कुतुब-उद-दीन ऐबक ने 1192 में शुरु करवाया था। इस मस्जिद को बनने में चार वर्ष का समय लगा। लेकिन बाद के शासकों ने भी इसका विस्तार किया। जैसे अल्तमश ने 1230 में और अलाउद्दीन खिलजी ने 1351 में इसमें कुछ और हिस्से जोड़े। यह मस्जिद हिन्दू और इस्लामिक कला का अनूठा संगम है। एक ओर इसकी छत और स्तंभ भारतीय मंदिर शैली की याद दिलाते हैं, वहीं दूसरी ओर इसके बुर्ज इस्लामिक शैली में बने हुए हैं। मस्जिद प्रांगण में सिकंदर लोदी (1488-1517) के शासन काल में मस्जिद के इमाम रहे इमाम जमीम का एक छोटा-सा मकबरा भी है।

फतेहपुरी मस्जिद[संपादित करें]

फतेहपुरी मस्जिद चांदनी चौक की पुरानी गली के पश्चिमी छोर पर स्थित है। इसका निर्माण मुगल बादशाह शाहजहां की पत्नी फतेहपुरी बेगम ने 1650 में करवाया था। उन्हीं के नाम पर इसका नाम फतेहपुरी मस्जिद पड़ा। लाल पत्थरों से बनी यह मस्जिद मुगल वास्तुकला का एक बेहतरीन नमूना है। मस्जिद के दोनों ओर लाल पत्थर से बने स्तंभों की कतारें हैं। इस मस्जिद में एक कुंड भी है जो सफेद संगमरमर से बना है। यह मस्जिद कई धार्मिक वाद-विवाद की गवाह रही है।

पुरातात्विक स्थल[संपादित करें]

लाल किला[संपादित करें]

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लाल किले की नींव शाहजहां के शासन काल में पड़ी थी। इसे पूरा होने में 9 साल का समय लगा। अधिकांश इस्लामिक इमारतों की तरह यह किला भी अष्टभुजाकार है। उत्तर में यह किला सलीमगढ़ किले से जुड़ा हुआ है। लाहौरी गेट के अलावा यहां प्रवेश का दूसरा द्वार हाथीपोल है। इसके बारे में माना जाता है कि यहां पर राजा और उनके मेहमान हाथी से उतरते थे। लाल किले के अन्य प्रमुख आकर्षण हैं मुमताज महल, रंग महल, खास महल, दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, हमाम और शाह बुर्ज। यह किला भारत की शान है। इसी किले पर स्वतंत्रता दिवस के दिन भारत के प्रधानमंत्री राष्ट्रीय ध्वज फहराते हैं और भाषण देते हैं। हुमायूं का मकबरा

हुमायुं का मकबरा}}हुंमायूं एक महान मुगल बादशाह था जिसकी मृत्यु शेर मंडल पुस्तकालय की सीढ़ियों से गिर कर हुई थी। हुमायूं का मकबरा उनकी पत्नी हाजी बेगम ने हुमायूं की याद में बनवाया था। 1562-1572 के बीच बना यह मकबरा आज दिल्ली के प्रमुख पर्यटक स्थलों में एक है। इसके फारसी वास्तुकार मिरक मिर्जा गियायुथ की छाप इस इमारत पर साफ देखी जा सकती है। यह मकबरा यमुना नदी के किनारे संत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह के पास स्थित है। यूनेस्कों ने इसे विश्वश धरोहर का दर्जा दिया है।

पुराना किला[संपादित करें]

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इस किले का निर्माण सूर वंश के संस्थापक शेरशाह सूरी ने 16वीं सदी में करवाया था। 1539-40 में शेरशाह सूरी ने अपने चिर प्रतिद्वंद्वी मुगल बादशाह हुमायूं को हराकर दिल्ली और आगरा पर कब्जा कर लिया। 1545 में उनकी मृत्यु के बाद हुमायूं ने पुन: दिल्ली और आगरा पर अधिकार कर लिया था। शेर शाह सूरी द्वारा बनवाई गई लाल पत्थरों की इमारत शेर मंडल में हुमायूं ने अपना पुस्तकालय बनाया। इतिहासकारों के अनुसार इसी इमारत से गिरने की वजह से हुमायूं की मृत्यु हुई थी। यह किला केवल देशी-विदेशी पर्यटकों को ही आकर्षित नहीं करता बल्कि इतिहासकारों और पुरातत्ववेत्ताओं को भी लुभाता है। हाल ही में भारतीय पुरातत्व विभाग की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि जिस स्थान पर पुराना किला बना है उस स्थान पर इंद्रप्रस्थ बसा हुआ था इंद्रप्रस्थ को पुराणों में महाभारत काल का नगर माना जाता है। इसमें प्रवेश करने के तीन दरवाजे हैं- हुमायूं दरवाजा, तलकी दरवाजा और बड़ा दरवाजा। लेकिन आजकल केवल बड़ा दरवाजा की प्रयोग में लाया जाता है। सभी दरवाजे दो-मंजिला हैं। ये विशाल द्वार लाल पत्थर से बनाए गए हैं। कई शासकों का शासन देख चुका पुराना किला अनेक उतार-चढ़ावों का साक्षी रहा है। वर्तमान में यहां एक बोट क्ल ब है जहां नौकायन का आनंद लिया जा सकता है। पास ही चिडि़याघर भी है।

जंतर मंतर[संपादित करें]

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इसका निर्माण सवाई जय सिंह द्वितीय ने 1724 में करवाया था। यह इमारत प्राचीन भारत की वैज्ञानिक उन्नति की मिसाल है। जय सिंह ने ऐसी वेधशालाओं का निर्माण जयपुर, उज्जैन, मथुरा और वाराणसी में भी किया था। दिल्ली का जंतर-मंतर समरकंद की वेधशाला से प्रेरित है। मोहम्मद शाह के शासन काल में हिन्दु और मुस्लिम खगोलशास्त्रियों में ग्रहों की स्थित को लेकिर बहस छिड़ गई थी। इसे खत्म करने के लिए सवाई जय सिंह ने जंतर-मंतर का निर्माण करवाया। ग्रहों की गति नापने के लिए यहां विभिन्न प्रकार के उपकरण लगाए गए हैं। सम्राट यंत्र सूर्य की सहायता से वक्त और ग्रहों की स्थिति की जानकारी देता है। मिस्र यंत्र वर्ष के सबसे छोटे ओर सबसे बड़े दिन को नाप सकता है। राम यंत्र और जय प्रकाश यंत्र खगोलीय पिंडों की गति के बारे में बताता है।

कुतुब मीनार[संपादित करें]

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कुतुब मीनार का निर्माण कुतुब-उद-दीन ऐबक ने 1199 में शुरु करवाया था और इल्तुमिश ने 1368 में इसे पूरा कराया। इस इमारत का नाम ख्वाजा कुतबुद्दीन बख्तियार काकी के नाम पर रखा गया। ऐसा माना जाता है कि इसका प्रयोग पास बनी मस्जिद की मीनार के रूप में होता था और यहां से अजान दी जाती थी। लाल और हल्के पीले पत्थर से बनी इस इमारत पर कुरान की आयतें लिखी हैं। कुतुबमीनार मूल रूप्‍ा से सात मंजिल का था लेकिन अब यह पांच मंजिल का ही रह गया है। कुतुब मीनार की कुल ऊंचाई 72.5 मी. है और इसमें 379 सीढ़ियां हैं। समय-समय पर इसकी मरम्मत भी हुई हैं। जिन बादशाहों ने इसकी मरम्मत कराई उनका उल्लेख इसकी दीवारों पर मिलता है। कुतुब मीनार परिसर में और भी कई इमारते हैं। भारत की पहली कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद, अलई दरवाजा और इल्तुमिश का मकबरा भी यहां बना हुआ है। मस्जिद के पास ही चौथी शताब्दी में बना लौहस्तंभ भी है जो पर्यटकों को खूब आकर्षित करता है

इंडिया गेट[संपादित करें]

राजपथ पर स्थित इंडिया गेट का निर्माण प्रथम विश्व युद्ध और अफगान युद्ध में मारे गए 90000 भारतीय सैनिकों की याद में कराया गया था। 160 फीट ऊंचा इंडिया गेट दिल्ली का पहला दरवाजा माना जाता है। जिन सैनिकों की याद में यह बनाया गया था उनके नाम इस इमारत पर खुदे हुए हैं। इसके अंदर अखंड अमर जवान ज्योति भी जलती रहती है। इसकी नींव 1921 में ड्यूक ऑफ कनॉट ने रखी थी और इसे कुछ साल बाद तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इर्विन ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया था। अमर जवान ज्योति की स्थापना 1971 के भारत-पाक युद्ध में भाग लेने वाले सैनिकों की याद में की गई थी। इंडिया गेट दिल्ली की महत्वपूर्ण इमारत है। दिल्ली आने वाले पर्यटक यहां अवश्य आते हैं।

राजघाट[संपादित करें]

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यमुना नदी के पश्चिमी किनारे पर महात्मा गांधी की समाधि स्थित है। काले संगमरमर से बनी इस समाधि पर उनके अंतिम शब्द हे राम उद्धृत हैं। अब यह एक खूबसूरत बाग का रूप ले चुका है। यहां पर खूबसूरत फव्वारे और अनेक प्रकार के पेड़ लगे हुए हैं। यहां पास ही शांति वन में भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु की समाधि भी है। भारत आने वाले विदेशी उच्चाधिकारी महात्मा गांधी को श्रद्धांजली देने के लिए राजघाट अवश्य आते हैं।

उद्यान[संपादित करें]

मुगल गार्डन[संपादित करें]

मुगल गार्डन राष्ट्रपति भवन  Yes check.svg ke peechhe स्थित है और देशी-विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। इसका डिजाइन सर एडविन लुटियंस ने लेडी हार्डिग के लिए बनाया था। 13 एकड़ में फैले इस गार्डन में मुगल और ब्रिटिश शैली का मिश्रण दिखाई देता है। यहां कई छोटे-बड़े बगीचे हैं जैसे पर्ल (मोती) गार्डन, बटरफ्लाय (तितली) गार्डन और सकरुलर (वृताकार) गार्डन। बटरफ्लाय गार्डन में फूलों के पौधों की बहुत सी पंक्तियां लगी हुई हैं। यह माना जाता है कि तितलियों को देखने के लिए यह जगह सर्वोत्तीम है। मुगल गार्डन में अनेक प्रकार के फूल देखे जा सकते हैं जिसमें गुलाब, गेंदा, स्वीट विलियम आदि शामिल हैं। इस बाग में फूलों के साथ-साथ जड़ी-बूटियां और औषधियां भी उगाई जाती हैं। मुगल गार्डन फरवरी में पर्यटकों के लिए खुलता है।

गार्डन ऑफ फाइव सेंसिस[संपादित करें]

Example of night photography at The Garden of Five Senses, New Delhi.JPG

यह एक खूबसूरत और विशाल बाग है। इसका निर्माण दिल्ली पर्यटन विकास निगम ने किया था। इसके विकास का उद्देश्य एक ऐसी जगह का निर्माण करना था जहां लोग आराम से आकर बैठ सकें और सामाजिक गतिविधियों में भाग ले सकें। यहां समय-समय पर कार्यक्रम आयोजित होते रहते हैं। धीरे-धीरे यह पर्यटकों के बीच अपनी जगह बना रहा है। 20 एकड़ क्षेत्र में फैला यह पार्क सैद-उल-अजब गांव में स्थित है। यह बाग अलग-अलग हिस्सों में बंटा हुआ है। एक ओर खास बाग है जो मुगल गार्डन की तर्ज पर बनाया गया है। यहां पर फूलों के पौधे और फव्वारे लगे हुए हैं। दूसरी ओर खाने-पीने और खरीदारी का इंतजाम भी है।

तालकटोरा गार्डन[संपादित करें]

यह एक ऐतिहासिक जगह है। यहीं पर 1738 में मुगलों ने मराठों को हराया था। पुराने समय में यहां एक कुंड और स्वीमिंगपूल था। इसलिए इस जगह का नाम तालकटोरा रखा गया। यह गार्डन बड़ी संख्या में पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। विशेष रूप से वसंत ऋतु में यहां पर्यटकों की संख्या में वृद्धि हो जाती है। विभिन्न प्रकार के फूलों के अलावा यहां स्टेडियम भी है जहां खेलों और कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। निश्चित समयावधि के लिए यहां बच्चों के लिए कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं ताकि उनमें बागवानी के प्रति रुचि बढ़े। यह सभी दिन खुला रहता है।

लोदी गार्डन[संपादित करें]

लोदी गार्डन सफदरजंग के मकबरे से 1 किमी. पूर्व में स्थित है। पहले इस बाग का नाम लेडी विलिंगटन पार्क था। यहां के खूबसूरत फव्वारे, तालाब, फूल और जॉगिंग ट्रैक सभी उम्र के लोगों को लुभाते हैं। लोदी गार्डन मूल रूप से गांव था जिसके आस-पास 15वीं-16वीं शताब्दी के सैय्यद और लोदी वंश के स्मारक थे। अंग्रेजों ने 1936 में इस गांव को दुबारा बसाया। यहां नेशनल बोंजाई पार्क भी है जहां बोजाई का अच्छा संग्रह है। यहां पेड़ों की विभिन्न प्रजातियां, रोज गार्डन और ग्रीन हाउस है जहां पौधों का रखा जाता है। पूरे वर्ष यहां अनेक प्रकार के पक्षी देखे जा सकते हैं। बगीचे के बीच में बारा गुंबद नामक मस्जिद है जो 1494 में बनाई गई थी। इस गार्डन में शीश गुंबद, मोहम्मद शाह का मकबरा और सिकंदर लोदी का मकबरा है। सर्दियों के दिनों में यहां बड़ी संख्या में लोग आते हैं।

राष्ट्रीय जैविक उद्यान[संपादित करें]

इसे चिड़ियाघर भी कहा जाता है। दिल्ली का चिड़ियाघर एशिया के सबसे अच्छे चिड़ियाघरों में एक है। यह पुराने किले के पास ही स्थित है। 1959 में बने इस चिड़ियाघर का डिजाइन श्रीलंका के मेजर वाइनमेन और पश्चिम जर्मनी के कार्ल हेगलबेक ने बनाया था। 214 एकड़ में फैले इस जैविक उद्यान में जानवरों और पक्षियों की 22000 प्रजातियां और 200 प्रकार के पेड़ हैं। यहां पर ऑस्टेलिया, अफ्रीका, अमेरिका और एशिया से लाए गए पशु-पक्षी भी देखे जा सकते हैं। चिड़ियाघर में एक पुस्तकालय भी है जहां से पेड़, पौधों, पशु-पक्षियों के बारे में जानकारी ली जा सकती है। समय: गर्मियां में सुबह 8-शाम 6 बजे तक, सर्दियों में सुबह 9- शुक्रवार को बंद रहता है और खाने पीने की चीजें लाना मना है

संग्रहालय[संपादित करें]

क्राफ्ट म्यूजियम[संपादित करें]

क्राफ्ट म्यूजियम प्रगति मैदान में स्थित दिल्ली का प्रमुख पर्यटक स्थल है। इस संग्रहालय में भारत की समृद्ध हस्तशिल्प परंपरा को प्रदर्शित किया गया है। देश के विभिन्नस राज्योंष की सांस्कृ तिक झलक यहां देखी जा सकती है। इस जगह देश के विभिन्न भागों से आए शिल्पकार अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। इस संग्रहालय में देशभर से लाए गए दुर्लभ कला और हस्त शिल्प का विस्तृदत संग्रह है। यहां आदिवासी और ग्रामीण शिल्प,कपड़ों आदि से संबंधित अलग-अलग दीर्घाएं हैं। क्राफ्ट म्यूजियम में क्राफ्ट म्यूजियम शॉप भी है। संग्रहालय और शिल्पकारों से पूजा का सामान, गहने, शॉल और किताबें खरीदी जा सकती हैं। समय: जुलाई से सितंबर सुबह 9.30-शाम 5 बजे तक अक्टूबर से जून सुबह 9.30-शाम 6 बजे तक, सोमवार और राष्ट्रीय नोट: अवकाश के दिन बंद

राष्ट्रीय संग्रहालय[संपादित करें]

1960 में निर्मित इस संग्रहालय में भारतीय सभ्यता के विकास से संबंधित चीजों को प्रदर्शित किया गया है। इसमें से कुछ चीजें प्रागेतिहासिक काल की हैं। यहां चोल काल के पत्थर और कांसे से बनी मूर्तियां रखी हुई हैं। यहां विश्वि के सर्वाधिक लघु चित्रों का संग्रह है। इसके अलावा घर की सजावट और गहनों का प्रदर्शित करती दीर्घाएं भी यहां हैं। इस राष्ट्रीय संग्रहालय में एक संरक्षण प्रयोगशाला है। इस प्रयोगशाला में अनेक कलाकृतियों को संभाल कर रखा जाता है और छात्रों को प्रशिक्षण भी दिया जाता है।

भारतीय रेल संग्रहालय[संपादित करें]

दक्षिण दिल्ली के चाणक्यपुरी इलाके में स्थित रल संग्रहालय भारतीय रेल के 140 साल के इतिहास की झलक प्रस्तुत करता है। विभिन्न प्रकार के रेल इंजनों को देखने के लिए देश भर से लाखों पर्यटक यहां आते हैं। यहां पर रेल इंजनों के अनेक मॉडल और कोच हैं जिसमें भारत की पहली रेल का मॉडल और इंजन भी शामिल हैं। इसका निर्माण ब्रिटिश वास्तुकार एम जी सेटो ने 1957 में किया था। 10 एकड़ में फैले इस संग्रहालय में एक टॉय रेल भी है जहां सैर का आनंद लिया जा सकता है। इसके अलावा यहां रेस्टोरेंट और बुक स्टॉल है। तिब्बती हस्तशिल्प का प्रदर्शन भी यहां किया गया है। समय: गर्मियों में सुबह 9.30-शाम 7 बजे तक, सर्दियों में सुबह 9.30-शाम 5 बजे तक

डॉल म्यूगजियम[संपादित करें]

इस संग्रहालय की स्था‍पना मशहूर कार्टूनिस्टर के.शंकर पिल्ल्ई ने की थी। यहां विभिन्न परिधानों में सजी गुडि़यां का संग्रह विश्व9 के सबसे बड़े संग्रहों में से एक है। यह संग्रहालय बहादुर शाह जफर मार्ग पर चिल्ड्र न बुक ट्रस्टव की बिल्डिंग में स्थित है। यह संग्रहालय दो हिस्सों में बंटा है। एक हिस्से में यूरोपियन देशों, इंग्लैंेड, अमेरिका, ऑस्ट्रेालिया, न्यूमजीलैंड, राष्ट्र मंडल देशों की गुडि़यां रखी गई हैं। दूसरे भाग में एशियाई देशों, मध्यइ पूर्व, अफ्रीका और भारत की गुडि़यां प्रदर्शित की गई हैं। वर्तमान समय में यहां 85 देशों की करीब 6500 गुडि़यों का संग्रह देखा जा सकता है। समय: सुबह 10 बजे से शाम 6 बजे तक, सोमवार को बंद

बाज़ार[संपादित करें]

चांदनी चौक[संपादित करें]

दिल्ली। आने वाले किसी भी व्य क्ति की यात्रा तब तक पूरी नहीं हो सकती जब तक वह चांदनी चौक न जाए। यह दिल्लीा के थोक व्यािपार का प्रमुख केंद्र है। पुराने समय में तुर्की, चीन और हॉलैंड के व्या पारी यहां व्यावपार करने आते थे। यह मुगल काल में प्रमुख व्यीवसायिक केंद्र था। इसका डिजाइन शाहजहां की पुत्री जहांआरा बेगम ने बनाया था। यहां की गलियां संकरी हैं। इसलिए यहां गा‍ड़ी लेकर न आने की सलाह दी जाती है।

कनॉट प्लेस[संपादित करें]

कनॉट प्लेनस दिल्लीस का प्रमुख व्यीवसायिक केंद्र है। इसका नाम ब्रिटेन के शाही परिवार के सदस्यप ड्यूक ऑफ कनॉट के नाम पर रखा गया था। इस मार्केट का डिजाइन डब्यू एच निकोल और टॉर रसेल ने बनाया था। यह मार्केट अपने समय की भारत की सबसे बड़ी मार्केट थी। अपनी स्थारपना के 65 साल बाद भी यह दिल्ली में खरीदारी का प्रमुख केंद्र है। यहां के इनर सर्किल में लगभग सभी अंतर्राष्ट्री य ब्रैंड के कपड़ों के शोरूम, रेस्टोररेंट और बार हैं। यहां किताबों की दुकानें भी हैं जहां आपको भारत के बारे में जानकारी देने वाली बहुत अच्छीद किताबें मिल जाएंगी।


बाजार[संपादित करें]

जनपथ और पालिका बाजार[संपादित करें]

नई दिल्ली की प्रमुख मार्गों में से एक है|इसे अँग्रेज़ोँ द्वारा क़्वींस वे कहा जाता था।यह लूट्यंस की रचित नई दिल्ली का एक अभिन्न एवं प्रमुख हिस्सा

दिल्ली हाट[संपादित करें]

दिल्लीक हाट एम्स से थोड़ी ही दूरी पर स्थित है। यहां पर आकर संपूर्ण भारत के एक साथ दर्शन हो जाते हैं। यहां पर भारत के विभिन्न प्रांतों के हस्तपशिल्प् को प्रदर्शित करती दुकानें हैं। दक्षिण भारतीय व्यं।जन से लेकर सुदूर उत्ततर पूर्व के खाने के स्टॉल भी यहां मिल जाते हैं। यहां समय समय पर सांस्कृहतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाता है। यहां आप नृत्यि और संगीत का भी आनंद उठा सकते हैं।

दिल्लीं के आस पास दर्शनीय स्थल[संपादित करें]

आगरा[संपादित करें]

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आगरा दिल्ली= से 200 किमी. दूर है। यमुना नदी के किनारे बसा यहं शहर ताजमहल के लिए विश्वर भर में प्रसिद्ध है। विश्वय के सात अजूबों में शामिल ताजमहल का निर्माण मुगल सम्राट शाहजहां ने 1631 से 1648 के बीच करवाया था। उन्हों ने इसे अपनी बेगम मुमताज महल की याद में बनवाया था। वर्ष भर लाखों देशी विदेशी पर्यटक यहां आते हैं। दिल्लीह के साथ-साथ यहां भी आना अच्छा रहेगा।

फतेहपुर सीकरी[संपादित करें]

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लाल पत्थफरों से बना यह शहर आगरा से 37 किमी. दूर है। इसका निर्माण अकबर ने 1571 से 1585 के बीच करवाया था। फतेहपुर सीकरी मुगल स्थाटपत्यम कला का अच्छा। उदाहरण है। यहां की इमारतें हिन्दू और मुस्लिम वास्तु्कला का अनूठा मिश्रण हैं। कहा जाता है कि फतेहपुर सीकरी की मस्जिद मक्काि की मस्जिद की नकल है और यह फारसी व हिंदू शैली में बनी है। ऐतिहासिक इमारतों में रुचि रखने वालों के लिए यह सही जगह है।

जयपुर[संपादित करें]

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जयपुर जिसे गुलाबी नगरी के नाम से भी जाना जाता है, भारत के राजस्थान प्रान्त की राजधानी है। यह प्राचीन रजवाड़ा जिसे जयपुर नाम से जाना जाता था उसकी भी राजधानी थी। इस शहर की स्थापना 1728 में जयपुर के महाराजा जयसिंह द्वितीय द्वारा की गयी थी। जयपुर शहर की पहचान यहाँ के महलों और पुराने घरों में लगे गुलाबी पत्थरों से होती है जो यहाँ के स्थापत्य की खासियत है।

चंडीगढ़[संपादित करें]

रॉकगार्डन

पंजाब और हरियाणा की राजधानी चंडीगढ़ भारत के सबसे खूबसूरत और नियोजित शहरों में एक है। इस केन्द्र शासित प्रदेश को प्रसिद्ध फ्रेंच वास्तुकार ली कोर बुसियर ने डिजाइन किया था। इस शहर का नाम एक दूसरे के निकट स्थित चंडी मंदिर और गढ़ किले के कारण पड़ा जिसे चंडीगढ़ के नाम से जाना जाता है। शहर में बड़ी संख्या में पार्क हैं जिनमें लेसर वैली, राजेन्द्र पार्क, बॉटोनिकल गार्डन, स्मृति उपवन, तोपियारी उपवन, टेरस्ड गार्डन और शांति कुंज प्रमुख हैं। चंडीगढ़ में ललित कला अकादमी, साहित्य अकादमी, प्राचीन कला केन्द्र और कल्चरल कॉम्प्लेक्स को भी देखा जा सकता है।

मथुरा[संपादित करें]

दिल्ली से दक्षिण भारत या मुम्बई जाने वाली सभी ट्रेने मथुरा होकर गुजरती हैं। सडक द्वारा भी पहुंचा जा सकता है। आगरा से मात्र 55 किलोमीटर दूर है। वृन्दावन पहुचने के लिये यह वृन्दावन की वेबसाईटकाफी सूचना देती हे| स्टेशन के आसपास कई होटल हैं और विश्राम घाट के आसपास कई कमखर्च वाली धर्मशालाएं रूकने के लिए उपलब्ध हैं। घूमने के लिए टेक्सी कर सकते हैं, जिससे मथुरा, वृन्दावन एक दिन में घूमा जा सकता है। अधिकतर मंदिरों में दर्शन सुबह १२ बजे तक और सांय ४ से ६-७ बजे तक खुलते हैं, दर्शनार्थियों को इसी हिसाब से अपना कार्यक्रम बनाना चाहिए। आटो और तांगे भी उपलब्ध है। यमुना में नौका विहार और प्रातःकाल और सांयकाल में विश्राम घाट पर होने वाली यमुना जी की आरती दर्शनीय है।

आवागमन[संपादित करें]

वायु मार्ग

दिल्ली का इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा देश के लगभग सभी हवाई अड्डों से जुड़ा है। अनेक विदेशी फ्लाइट्स भी यहां आती हैं।

रेल मार्ग

दिल्ली में पुरानी दिल्ली, नई दिल्ली, हजरत निजामुद्दीन, सराय रोहिल्ला और दिल्ली छावनी स्टेशन हैं जो दिल्ली को अन्य शहरों से जोड़ते हैं। सुपरफास्ट राजधानी एक्सप्रैस दिल्ली से महानगरों के बीच चलती हैं जैसे कलकत्ता, मुंबई, चेन्नई, बैंगलोर और हैदराबाद। शताब्दी एक्सप्रैस दिल्ली को प्रमुख राज्यों की राजधानियों से जोड़ती है जैसे भोपाल, अमृत्सर और लखनऊ।

सड़क मार्ग

दिल्ली, राष्ट्रीय राजमार्ग 2 से बर्धमान, वाराणसी, इलाहबाद, कानपुर और आगरा के रास्ते कोलकता से जुड़ी है, राष्ट्रीय राजमार्ग 8 से सूरत, अहमदाबाद, उदयपुर, अजमेर और जयपुर के रास्ते मुंबई से जुड़ी है, राष्ट्रीय राजमार्ग 1 से जालंधर, लुधियाना और अंबाला होते हुए अमृतसर और राष्ट्रीय राजमार्ग 24 से रामपुर और मुरादाबाद के रास्ते लखनऊ से जुड़ी है।


बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]