टमाटर

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टमाटर
पौधे में लगे हुए पके टमाटर के फल
पौधे में लगे हुए पके टमाटर के फल
वैज्ञानिक वर्गीकरण
जगत: पादप
(अश्रेणिकृत) एंजियोस्पर्म
(अश्रेणिकृत) एकबीजपत्री
गण: Solanales
कुल: Solanaceae
प्रजाति: Solanum
जाति: S. lycopersicum
द्विपद नाम
Solanum lycopersicum
L.
पर्याय

Lycopersicon lycopersicum
Lycopersicon esculentum[1]

टमाटर विश्व में सबसे ज्यादा प्रयोग होने वाली सब्जी है। इसका पुराना वानस्पतिक नाम लाइकोपोर्सिकान एस्कुलेंटम मिल है। वर्तमान समय में इसे सोलेनम लाइको पोर्सिकान कहते हैं। बहुत से लोग तो ऐसे हैं जो बिना टमाटर के खाना बनाने की कल्पना भी नहीं कर सकते। [2]

टमाटर के गुणकारी तत्व[संपादित करें]

समूचा टमाटर (ऊपर) व बीच से कटे हुए उसके दो भाग (नीचे)

टमाटर में भरपूर मात्रा में कैल्शियम, फास्फोरस व विटामिन सी पाये जाते हैं। एसिडिटी की शिकायत होने पर टमाटरों की खुराक बढ़ाने से यह शिकायत दूर हो जाती है। हालाँकि टमाटर का स्वाद अम्लीय (खट्टा) होता है, लेकिन यह शरीर में क्षारीय (खारी) प्रतिक्रियाओं को जन्म देता है। लाल-लाल टमाटर देखने में सुन्दर और खाने में स्वादिष्ट होने के साथ पौष्टिक होते हैं। इसके खट्टे स्वाद का कारण यह है कि इसमें साइट्रिक एसिड और मैलिक एसिड पाया जाता है जिसके कारण यह प्रत्यम्ल (एंटासिड) के रूप में काम करता है। टमाटर में विटामिन 'ए' काफी मात्रा में पाया जाता है। यह आँखों के लिये बहुत लाभकारी है।

टमाटर का उपयोग[संपादित करें]

शरीर के लिए टमाटर बहुत ही लाभकारी होता है। इससे कई रोगों का निदान होता है। टमाटर शरीर से विशेषकर गुर्दे से रोग के जीवाणुओं को निकालता है। यह पेशाब में चीनी के प्रतिशत पर नियन्त्रण पाने के लिए प्रभावशाली होने के कारण यह मधुमेह के रोगियों के लिए भी बहुत उपयोगी होता है। कार्बोहाइड्रेट की मात्रा कम होने के कारण इसे एक उत्तम भोजन माना जाता है। टमाटर से पाचन शक्ति बढ़ती है। इसके लगातार सेवन से जिगर बेहतर ढँग से काम करता है और गैस की शिकायत भी दूर होती है। जो लोग अपना वजन कम करने के इच्छुक हैं, उनके लिए टमाटर बहुत उपयोगी है। एक मध्यम आकार के टमाटर में केवल 12 कैलोरीज होती है, इसलिए इसे पतला होने के भोजन के लिए उपयुक्त माना जाता है। माना जाता है कि टमाटर इतने पौष्टिक होते हैं कि सुबह नाश्ते में केवल दो टमाटर सम्पूर्ण भोजन के बराबर होते हैं। ऐसा नियमित सेवन करते रहने से आपके वजन में जरा भी वृद्धि नहीं होगी। इसके साथ साथ यह पूरे शरीर के छोटे-मोटे विकारों को भी दूर करता है। टमाटर के नियमित सेवन से श्वास नली का शोथ कम होता है। प्राकृतिक चिकित्सकों का कहना है कि टमाटर खाने से अतिसंकुचन भी दूर होता है और खाँसी तथा बलगम से भी राहत मिलती है। अधिक पके लाल टमाटर खाने वालों को कैन्सर रोग नहीं होता। इसके सेवन से रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है।

स्वास्थ्य संरक्षण में टमाटर[संपादित करें]

कुदरत का करिश्मा-वह भी टमाटर में!

टमाटर लगभग हर सब्जी में प्रयोग किया जाता है। इसके बिना खाना अधूरा माना जाता है। सलाद के रूप में भी इसे काफी पसन्द किया जाता है। टमाटर में प्रोटीन, विटामिन, वसा आदि तत्व विद्यमान होते हैं। यह सेब व संतरा दोनों के गुणों से युक्त होता है। इतना ही नहीं, यह अनेक बीमारियों का इलाज भी करता है। टमाटर खाने से निम्न रोगों का उपचार होता है -

  • बच्चों को सूखा रोग होने पर आधा गिलास टमाटर के रस का सेवन कराने से फायदा होता है।
  • दो या तीन पके हुए टमाटरों का नियमित सेवन करने से बच्चों का विकास शीघ्र होता है।
  • शरीर का भार घटाने के लिए सुबह-शाम एक गिलास टमाटर का रस पीना लाभप्रद है।
  • यदि गठिया रोग में एक गिलास टमाटर के रस की सोंठ तैयार करके उसमें एक चम्मच अजवायन का चूर्ण मिलाकर सुबह-शाम पीने से लाभ होता है।
  • गर्भवती महिलाओं के लिए सुबह एक गिलास टमाटर के रस का सेवन फायदेमंद है।

टमाटर की चटनी[संपादित करें]

भारत में बेहद लोकप्रिय टमाटर की चटनी को बहुत ही कम समय में बनाया जा सकता है। यह चटनी नाश्ते में समोसे, आलू बड़ा, पकोड़े, बड़े, डबलरोटी आदि के साथ आसानी से खायी जा सकती है। वैसे टमाटर की मीठी चटनी टुमैटो कैचप या सॉस के रूप में आम बाज़ार में भी मिलती है। अब तो इसका व्यावसायिक दृष्टि से उत्पादन भी होने लगा है।

टमाटर की खेती[संपादित करें]

जलवायु और मिट्टी[संपादित करें]

टमाटर गर्मी के मौसम की फ़सल है जो पाला नहीं सहन कर सकती है। 12 डिग्री से०ग्रे० से 26 डिग्री से०ग्रे० के तापमान के बीच इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है। रात का आदर्श तापमान 25 डिग्री से०ग्रे० से 20 डिग्री से०ग्रे० है। टमाटर की फ़सल पोषक तत्वों से युक्त दोमट मिट्टी में सबसे अच्छी होती है। लेकिन इसकी अगेती क़िस्मों के लिए बलुई तथा दोमट बलुई मिट्टी अधिक उपयुक्त है। इसके अलावा यदि जल निकास की व्यवस्था अच्छी हो तो इसे मटियार तथा तलहटी दोमट में भी उगाया जा सकता है।

टमाटर की क़िस्में[संपादित करें]

विभिन्न प्रान्तों में स्थान विशेष के अनुरूप विभिन्न क़िस्मों को उगाने की सिफारिश की गई है।

पूसा रूबी: यह अगेती किस्म है, जिसके फल रोपाई के 60-65 दिनों बाद पक जाते है। फल हल्की धारियों वाले चपटे और समान रूप से लाल होते हैं। यह भारी पैदावार देने वाली किस्म हैं।

पूसा-120: सूत्रकृमि से होने वाली बीमारियों को सह सकने वाली यह किस्म अधिक पैदावार देने वाली है। जिसके फल मझौले आकार के आकर्षक और समान रूप से लाल होते है।

पूसा शीतल: इस किस्म में मध्यम आकार के चपटे, गोल फल होते हैं। अगेती बसन्त ऋतु की फ़सल के लिए उपयुक्त है। 8 डिग्री से०ग्रे० तक तापमान पर इसके फल लग सकते हैं।

पूसा गौरव: इसके फल अडांकार, चिकने, परत मोटी और लाल होते हैं। यह लम्बी दूरी तक ले जाने की दृष्टि से उपयुक्त है। अधिक उपज देने वाली क़िस्म खरीफ और बसन्त दोनों मौसमों के लिए उपयुक्त है।

पूसा सदाबहार: इसके मध्यम आकार के अंडाकार गोल फल होते हैं। यह उत्तरी भारत के मैदानों में, जुलाई-सितम्बर के अलावा पूरे साल उगाने के लिए उपयुक्त है। 6 डि.ग्री. से०ग्रे० से 30 डिग्री से०ग्रे० तक रात के तापमान पर भी इसके फल लग सकते हैं।

पूसा उपहार: इसके मध्यम आकार के गोल फल होते हैं। फल गुच्छे में लगते हैं। यह भारी पैदावार देने वाली तथा अधिक बढ़वार वाली किस्म है।

पूसा संकर-1 यह अधिक फलदायक किस्म है। फल मध्यम आकार के चिकने, आकर्षक व गोल होते हैं। यह संकर किस्म जून-जुलाई के अधिक तापमान में भी फल दे सकती है।

पूसा संकर-2 यह भी अधिक उपज देने वाली संकर किस्म है। फल गोल, चिकने तथा चमकदार होते है। यह सूउत्रकृमि प्रतिरोधी तथा मोटी परत वाली समान-रूप से पकने वाली किस्म है।

पूसा संकर-4 यह अधिक उपज देने वाली संकर किस्म है। यह किस्म दूर तक ले जाने के लिए उत्तम है। इसके फल गोल आकार के चिकने एवं आकर्षक होते हैं।

बीज की मात्रा और बुआई[संपादित करें]

बीज की मात्रा; एक हेक्टेयर क्षेत्र में फ़सल उगाने के लिए नर्सरी तैयार करने हेतु लगभग 350 से 400 ग्राम बीज पर्याप्त होता है।

बुआई का तरीका: बीज उठी हुई 65 सें०मी० चौड़ी क्यारियों में उगाया जाता है। खरीफ के मौसम में क्यारियों की चौड़ाई कम करके 60 सें०मी० की जा सकती है। जब पौध 15 सें०मी० ऊँची हो जाए तो वह रोपे जाने के लिए उपयुक्त हो जाती है। संकर क़िस्मों मे बीज की मात्रा 200 ग्राम प्रति हेक्टेयर पर्याप्त रहती है।

बुआई का समय: उत्तरी भारत के मैदानों में टमाटर की फ़सल एक साल में दो बार ली जा सकती है। पहली फ़सल के लिए बीज क्यारियों में जुलाई-अगस्त में बोया जाता है। पौध रोपाई का कार्य अगस्त के अन्त तक किया जा सकता है दूसरी फ़सल नवम्बर-दिसम्बर के महीने में बोई जा सकती है। जिसकी पौध रोपाई का कार्य जब पाले का खतरा टल जाए तो जनवरी-फरवरी में किया जाना चाहिए।

वैसे अक्टूबर के आरम्भ में भी यह फ़सल बोई जा सकती है, जिसकी पौध नवम्बर में रोपी जाती है। फ़सल पाले रहित क्षेत्रों में उगायी जानी चाहिए या इसकी पाले से समुचित रक्षा करनी चाहिए। रोपाई 60 सें०मी० चौड़ी मेडों पर हमेशा शाम के समय करनी चाहिए और इसके बाद सिंचाई भी कर देनी चाहिए। पंक्ति ओर पौध से पौध की दूरी 60 सें०मी० रखी जाती है।

उर्वरकों का प्रयोग[संपादित करें]

खेत तैयार करते समय 25 से 30 मीट्रिक टन अच्छी सड़ी गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर की दर से डालें। इसके अलावा 400 कि०ग्रा० सुपर फ़ॉस्फ़ेट तथा 60 से 100 कि०ग्रा० पोटेशियम सल्फ़ेट डाला जाना चाहिए। 300-400 कि०ग्रा० अमोनियम सल्फ़ेट या सी.ए.एन. को दो बराबर मात्रा फ़सल में डालें। पहली, रोपाई के एक पखवाडे बाद और दूसरी, उसके 20 दिन बाद।

सिंचाई[संपादित करें]

पहली सिंचाई रोपाई के तुरन्त बाद करनी चाहिए। इसके बाद सर्दियों के मौसम में फ़सल को हर दसवें या ग्यारहवें दिन, बसंत के मौसम में छठे या सातवें दिन सींचना चाहिए।

फ़सल सुरक्षा[संपादित करें]

टमाटर की फ़सल को मुख्यतः सरसों सॉ फ्लाई तथा माहू से नुकसान पहुँचाता है।

कीटः जैसिड, सफेद मक्खी और फल छेदक प्रमुख कीट हैं।

टमाटर फल छेदक: यह टमाटर का सबसे प्रमुख शत्रु है। टमाटर की फ़सल में इसकी पहचान फलों में मौजूद छेदों से होती है। इन कीड़ों की इल्लियाँ हरे फलों में घुस जाती है और इनके प्रभाव से फल सड़ जाते हैं।

जैसिड: ये हरे रंग के छोटे कीड़े होते हैं जो पौधों की कोशिका से रस चूस लेते हैं। जिसके कारण पौधों की पत्तियाँ सूख जाती हैं।

सफेद मक्खी: ये सफेद छोटे-छोटे कीड़े होते हैं जो पौधों से उनका रस चूस लेते हैं। इनसे पत्तियाँ मुड़ जाने वाली बीमारी फैलती है। इस कीड़े से प्रभावित पत्तियाँ मुरझाकर धीरे-धीरे सूख जाती हैं।

रोकथाम का उपाय[संपादित करें]

फल की बढ़वार की आरम्भिक अवस्था में मक्खी और जैसिड की रोकथाम के लिए 0.05 मेटासिस्टोकस उथवा डाइमैथेएट का छिड़काव करना चाहिए। फल छेदक से प्रभावित फलों और इस कीड़े के अंडों को इकट्ठा करके नष्ट कर दें। यदि इस कीड़े का आक्रमण गम्भीर रूप से हुआ हो तो फ़सल पर 0.05 मैलाथियान अथवा 0.1 कार्बोरिल का छिड़काव करें। एक पखवाडे के अन्तराल पर यह छिड़काव दुबारा करना चाहिए।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "Molecular phylogenetic analyses have established that the formerly segregate genera Lycopersicon, Cyphomandra, Normania, and Triguera are nested within Solanum, and all species of these four genera have been transferred to Solanum." See: Natural History Museum, Solanaceae Source: Phylogeny of the genus Solanum.
  2. http://hindi.webdunia.com/miscellaneous/health/health/1006/01/1100601033_1.htm

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]