कालका शिमला रेलवे

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भारत की पर्वतीय रेल*
युनेस्को विश्व धरोहर स्थल

तारादेवी स्टेशन पर शिवालिक डीलक्स एक्स्प्रेस
राष्ट्र पार्टी भारत
मानदंड ii, iv
देश {{{country}}}
क्षेत्र एशिया-प्रशांत
प्रकार सांस्कृतिक
आईडी 944
शिलालेखित इतिहास
शिलालेख 1999  (23वां सत्र)
विस्तार 2005; 2008
* नाम, जो कि विश्व धरोहर सूची में अंकित है
यूनेस्को द्वारा वर्गीकृत क्षेत्र

रास्ता[संपादित करें]

कालका–शिमला रेलवे
Head station
0 किमी कालका
Stop on track
6 किमी टकसाल
Station on track
11 किमी गुम्मन
Stop on track
17 किमी कोटी
Stop on track
27 किमी सनवारा
Stop on track
33 किमी धर्मपुर
Stop on track
39 किमी कुमारहट्टी
Station on track
43 किमी बड़ोग
Station on track
47 किमी सोलन
Stop on track
53 किमी सलोगड़ा
Stop on track
59 किमी कंडाघाट
Stop on track
65 किमी कनोह
Stop on track
73 किमी कैथलीघाट
Stop on track
78 किमी शोघी
Stop on track
85 किमी तारादेवी
Stop on track
90 किमी टोटु (जतोग)
Stop on track
93 किमी समर हिल
End station
96 किमी शिमला


ब्रिटिश शासन की ग्रीष्मकालीन राजधानी शिमला को कालका से जोड़ने के लिए १८९६ में दिल्ली अंबाला कंपनी को इस रेलमार्ग के निर्माण की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। समुद्र तल से ६५६ मीटर की ऊंचाई पर स्थित कालका (हरियाणा) रेलवे स्टेशन को छोड़ने के बाद ट्रेन शिवालिक की पहाड़ियों के घुमावदार रास्ते से गुजरते हुए २,०७६ मीटर ऊपर स्थित शिमला तक जाती है।

रेलमार्ग[संपादित करें]

दो फीट छह इंच की इस नैरो गेज लेन पर नौ नवंबर, १९०३ से आजतक रेल यातायात जारी है। कालका-शिमला रेलमार्ग में १०३ सुरंगें और ८६९ पुल बने हुए हैं। इस मार्ग पर ९१९ घुमाव आते हैं, जिनमें से सबसे तीखे मोड़ पर ट्रेन ४८ डिग्री के कोण पर घूमती है।

वर्ष १९०३ में अंग्रेजों द्वारा कालका-शिमला रेल सेक्शन बनाया गया था। रेल विभाग ने ७ नवम्बर २००३ को धूमधाम से शताब्दी समारोह भी मनाया था, जिसमे पूर्व रेलमंत्री नितीश कुमार ने हिस्सा लिया था। इस अवसर पर नितीश कुमार ने इस रेल ट्रैक को हैरिटेज का दर्जा दिलाने के लिए मामला यूनेस्को से उठाने की घोषणा की थी।

विश्व धरोहर स्थल[संपादित करें]

यूनेस्को की टीम ने कालका-शिमला रेलमार्ग का दौरा करके हालात का जायजा लिया। टीम ने कहा था कि दार्जिलिंग रेल सेक्शन के बाद यह एक ऐसा सेक्शन है जो अपने आप में अनोखा है। यूनेस्को ने इस ट्रैक के ऐतिहासिक महत्व को समझते हुए भरोसा दिलाया था कि इसे वल्र्ड हैरिटेज में शामिल करने के लिए वह पूरा प्रयास करेंगे। और अन्ततः २४ जुलाई २००८ को इसे विश्व धरोहर घोषित किया गया।

६० के दशक में चलने वाले स्टीम इंजन ने इस स्टेशन की धरोहर को बरकरार रखा है और यह आज भी शिमला और कैथलीघाट के बीच चल रहा है। इसके बाद देश की हैरिटेज टीम ने इस सेक्शन को वल्र्ड हैरीटेज बनाने के लिए अपना दावा पेश किया था।

बस स्टॉप का नाम भी १०३

इस सेक्शन पर १०३ सुरंगों की के कारण शिमला में आखिरी सुरंग को १०३ नंबर सुरंग का नाम दिया गया है। इसी कारण से ठीक ऊपर बने बस स्टॉप को भी अंग्रेजों के जमाने से ही १०३ स्टेशन के नाम से जाना जाने लगा, जबकि इसका नाम १०२ स्टॉप होना चाहिए।

जगह-जगह दरकने लगा है यह रेल ट्रैक

भले ही इस ट्रैक को वल्र्ड हैरिटेज का दर्जा मिल गया है, लेकिन १०५ वर्ष पुराने इस ट्रैक पर कई खामियां भी हैं। इस ट्रैक पर बने कई पुल कई जगह इतने जर्जर हो चुके हैं कि स्वयं रेलवे को खतरा लिखकर चेतावनी देनी पड़ रही है। ऐसे असुरक्षित पुलों पर ट्रेन निर्धारित गति २५ किलोमीटर प्रतिघंटा की जगह २० किलोमीटर प्रतिघंटा की गति से चलती है।

प्रतिदिन लगभग डेढ़ हजार यात्री चलते हैं इस ट्रैक पर

कालका-शिमला रेलमार्ग पर सामान्य सीजन में लगभग डेढ़ हजार यात्री यात्रा करते हैं, जबकि पीक सीजन मे यह आंकड़ा दुगुना हो जाता है।

कल्पा में बना था प्लान: अंग्रेजों ने हिमाचल के किन्नौर जिले के कल्पा में इस रेल ट्रैक को बनाने का प्लान बनाया था। पहले यह रेल ट्रैक कालका से किन्नौर तक पहुंचाया जाना था, लेकिन बाद में इसे शिमला लाकर पूरा किया गया।

कर्नल बड़ोग की आत्महत्या

अंग्रेजों ने इस रेल ट्रैक पर जब काम शुरू किया तो बड़ोग में एक बड़ी पहाड़ी की वजह से ट्रैक को आगे ले जाने में दिक्कतें आने लगीं। एक बार तो हालात यह बन गए कि अंग्रेजों ने इस ट्रैक को शिमला तक पहुंचाने का काम बीच में ही छोड़ने का मन बना लिया। इस वजह से ट्रैक का काम देख रहे कर्नल बड़ोग ने आत्महत्या तक कर ली। उन्हीं के नाम पर आज बड़ोग स्टेशन का नाम रखा गया है।

नए इंजनों के इंतजार में ३६ वर्ष बूढ़े इंजन

इस ऐतिहासिक रेलमार्ग पर चलने वाले अधिकतर इंजन ३६ वर्षों की यात्रा के बाद भी सवारियों को कालका-शिमला की ओर ढो रहे हैं। इस रेलमार्ग पर वर्तमान मे लगभग १४ इंजन चल रहे हैं, इनमे १० इंजन ३६ वर्ष पूरे कर चुके हैं और शेष ४ इंजन भी २० से २५ वर्ष पुराने हो चुके हैं।

ज्ञात हो की पहाड़ों पर चलने वाले टॉय ट्रेन इंजन का जीवनकाल लगभग ३६ वर्ष का ही होता है। इस प्रकार इस रेलमार्ग पर चलन वाले १० इंजन अपनी यात्रा पूरी कर चुके हैं। इन सभी इंजनों की कालका स्थित नैरोगेज डीजल इंजन वर्कशॉप में मरम्मत और रख रखाव किया जाता है, लेकिन पुराने हो चुके इंजनों के स्पेयर पार्ट्स न मिलने के कारण इनके मेंटेनेंस में भी परेशानी होती है।

रेल विभाग इस सेक्शन के लिए मुंबई स्थित परेल वर्कशॉप से चार नए इंजन तैयार कराने की बात लगभग १० महीने से कर रहा है। रेल विभाग इन इंजन को यहां कभी मार्च, कभी अप्रैल तो जून में लाने की बात करता रहा है, लेकिन अभी तक ये इंजन यहां नहीं पहुंचे है।


इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

बाहरी कड़ियां[संपादित करें]