कलरीपायट्टु

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Kalaripayattu
Kadhara.jpg
मूल देश Flag of भारत Kerala, India
Parenthood Historic
ओलम्पिक खेल No
കളരിപയറ്റ്
കളരിപയറ്റ്
अन्य लिप्यान्तरण: कलारीपयट
कलारी पयट
कलरी पयट्ट
कलरीपयट्ट
कलरी पायट्टु
कलारीपयट्ट
कलारी पयट्ट

साँचा:Indian martial arts sidebar कलरीपायट्टु (मलयालमകളരിപയറ്റ്)उच्चारित [kaɭəɾipːajətːɨ̆] दक्षिणी राज्य केरल से व्युत्पन्न भारत की एक युद्ध कला है. संभवतः सबसे पुरानी अस्तित्ववान युद्ध पद्धतियों में से एक,[1] ये केरल में और तमिलनाडुकर्नाटक[2] से सटे भागों में साथ ही पूर्वोत्तर श्रीलंका और मलेशिया के मलयाली समुदाय के बीच प्रचलित है. इसका अभ्यास मुख्य रूप से केरल की योद्धा जातियों जैसे नायर[3][4], एज्हावा द्वारा, किया जाता था[5].

कलारी पयट में हमले, पैर से मारना, मल्लयुद्ध, पूर्व निर्धारित तरीके, हथियारों के जखीरें और उपचार के तरीके शामिल हैं.[2] इसके क्षेत्रीय स्वरुप केरल की भौगोलिक स्थिति के अनुसार वर्गीकृत हैं, ये हैं मलयालियो की उत्तरी शैली, तमिलों की दक्षिणी शैली और भीतरी केरल से केन्द्रीय शैली. उत्तरी कलारी पयट कठिन तकनीक के सिद्धांत पर आधारित है, जबकि दक्षिणी शैली मुख्यतः नर्म तकनीकों का अनुसरण करती है, हालांकि दोनों प्रणालियां आंतरिक और बाह्य अवधारणाओं का उपयोग करतीं हैं.

कलारी पयट के कुछ युद्ध अभ्यासों को नृत्य[2] में उपयोग किया जा सकता है और वो कथकली नर्तक जो युद्ध कला को जानते थे, वे स्पष्ट रूप से अन्य दूसरे कलाकारों की तुलना में बेहतर थे. कुछ पारंपरिक भारतीय नृत्य स्कूल अभी भी कलारी पयट को अपने व्यायाम नियम के हिस्से के रूप में शामिल करते हैं[6].

शब्द का उदगम[संपादित करें]

कलारी पयाट्टू शब्द, दो शब्दों की तत्पुरुष संधि है, पहला कलारी (मलयालम:കളരി)जिसका अर्थ विद्यालय या व्यायामशाला है, तथा दूसरा पयाट्टू (मलयालम:പയററ്) जिसे पयाट्टूका से लिया गया है एवं जिसका अर्थ युद्ध/व्यायाम या "कड़ी मेहनत करना" है.

इस धारणा को गलत साबित करते हुए कि युग्म रूप में ये शब्द उतने ही प्राचीन समय से प्रयोग हो रहे हैं जितने कि कलारी और पयाट्टू एकल रूप में, एक अप्रकाशित मलयालम शब्दकोश ये बताता है कि इस शब्द युग्म कलारिपयाट्टू का प्राचीनतम प्रयोग बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में उल्लूर एस.परमेस्वरा अय्यर के नाटक अम्बा में हुआ था, तब संभवतः इस युद्ध कला ने वो स्वरुप धारण कर लिया होगा जिसके समरूपी शैली में ये आज विद्यमान है. एम.डी.राघवन ने सुझाव दिया है कि कलारी संस्कृतkhalrikג से व्युत्पन्न हुआ था.(परेड मैदान, क्षेत्र) जबकि बुर्रो ने आम तौर पर स्वीकार विचारkhalrikג का अनुकरण किया है कि इसका मूल शब्द, द्रविड़ शब्द खला- (जमीन पर पीटना) से उधार ले कर बना है.

इतिहास[संपादित करें]

दक्षिण केरल के भारतीय राज्य है जहां कलारी उत्पन्न पयट

उत्पत्तियां[संपादित करें]

गाये जाने वाले लोकगीत, लगभग 3000 साल पहले कलारी पयट के सृजन का श्रेय हिंदू देवताओं को देते हैं. एक्स्हेटर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर फिलिप ज़र्रिल्ली, कलारी पयट पर पश्चिम के कुछ अधिकृत जानकारों में से एक, का अनुमान है कि ये कला कम से कम 12 वीं सदी तक पुरानी है.[2] इतिहासकार एलमकुलम कुंजन पिल्लै कलारी पयट के जन्म का श्रेय 11 वीं शताब्दी में चेर और चोल राजवंशों के बीच लम्बे समय तक चले युद्ध को देते हैं.[2] ये कला, कलारी के माध्यम से प्रचारित की गयी, जो आधुनिक शिक्षा पद्धति के आने के पहले शिक्षा के सक्रिय केंद्र हुआ करते थे. आज भी चल रहे ये संस्थान, उस समय छात्रों को एक जगह एकत्रित होकर विभिन्न विषयों गणित, भाषा, खगोल विज्ञान और विभिन्न नाट्य कलाओं पर ज्ञान प्राप्त करने का अवसर देते थे. युद्ध कला को पयाट्टू कलारी में सिखाया जाता था, जिसका अर्थ है, युद्ध कला विद्यालय.

कलारी पयट 9 वीं सदी में और विकसित हो गया और नायर समुदाय जो केरल के योद्धा थे, इसका अभ्यास राजा और राज्य की रक्षा के लिए करते थे. 11 वीं और 12 वीं सदी में केरल छोटी-छोटी रियासतों में विभाजित था, जो आपस में मल्ल युद्ध लड़ा करते थे. इन द्वंद युद्धों या अंकम को चेकावर द्वारा एक अंकथात्तु नाम के चार से छः फीट ऊंचे एक अस्थाई मंच पर लड़ा जाता था.[7] नगर शासक की सेवा के लिए युद्ध कला का अभ्यास करने का अधिकार और कर्तव्य अधिकांशतः नायर और एज्हावा के साथ जुड़ा था.[2] उत्तर केरल के लोहार बौद्ध योद्धा थे[8] जो कलारीपयट का अभ्यास करते थे.

प्राम्भिक औपनिवेशिक इतिहासकारों जैसे वर्थेमा, लोगन और व्हाईटवे के लेखन से पता चलता है कि कलारी पयट केरल के लगभग सभी जाति, लिंग और सम्प्रदायों के लोगों में अच्छी तरह से स्थापित था. कहा जाता है कि ये, अंततः पढ़ने और लिखने की तरह ही प्रचलित हो गया था. कुछ महान परिवारों में, युवा लड़कियों को भी मासिक धर्म के शुरू होने तक इसका प्रारंभिक प्रशिक्षण मिलता था.[2] एक गाथागीत वदक्कन पत्तुकल से ये भी पता लगता है कि प्रसिद्ध चेकवारों की कम से कम कुछ महिलायें इसका अभ्यास करती रही और इसमें ऊंची विशेषज्ञता हासिल कर पायीं.[2] उनमें से सबसे प्रसिद्ध केरल के लोकगीत की उन्निअरचा थीं, वो उरूमि या लचीली तलवार की निपुण योद्धा थी.

कलारी पयट का सबसे पहला पश्चिमी उल्लेख पुर्तगाली अन्वेषक बर्बोसा दुआर्ते का है(ई. 1518).[2]

इन योद्धाओं में से अधिकतर को तभी स्कूलों में भेज दिया जाता है, जब वे सात साल की उम्र के होते हैं, जहां उन्हें फुर्ती और कौशल के कई गुर सिखाये जाते हैं; वहां वे उन्हें नृत्य करना, पलटना और जमीन पर विभिन्न प्रकार के घुमाव लेना, शाही छलांग लेना, दूसरी अन्य तरह की छलांगें लगाना सिखाते है, और जब तक ये बच्चे होते हैं, ये इसे दिन में दो बार सीखते हैं, इस प्रकार वे इतने शिथिल जोड़ वाले व लचीले हो जाते हैं कि उनका शरीर प्रकृति के विपरीत मोड़े जाने में सक्षम हो जाता है; और जब ये इसमें पूरी तरह से अभ्यस्त हो जाते हैं तो, वे इन्हें हथियारों को चलाना सिखाते हैं, जिसके कि वे सर्वाधिक इच्छुक होते हैं, कुछ तीर धनुष के साथ, तो कुछ लाठी व भाले के योद्धा बनने के लिए-लाठियों के साथ, लेकिन अधिकतर तलवार और ढाल(जो इनके बीच सबसे अधिक प्रयोग की जाती है) के साथ, इन सीमाओं के भीतर लगातार अभ्यास करते रहते हैं. जो गुरु उन्हें ये सिखाते हैं उन्हें पणिक्कर कहा जाता है.

पतन और पुनरुद्धार[संपादित करें]

19 वीं सदी में, आग्नेयास्त्रों के आने के कारण, जब नायर योद्धा अंग्रेजों से हार गए और विशेष रूप से ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की पूर्ण स्थापना के कारण कलारी पयट पतन की अवस्था में चला गया.[2] अंग्रेजों ने अंततः विद्रोह और विरोधी औपनिवेशिक भावनाओं को रोकने के लिए कलारी पयट और तलवार धारण करने की नायरों की प्रथा पर प्रतिबन्ध लगा दिया. इस दौरान, कई भारतीय युद्ध कलाओं का गुप्त रूप से अभ्यास किया जाने लगा जो अक्सर ग्रामीण क्षेत्रों तक सीमित था.

कलारी पयट में सार्वजनिक रूचि का पुनरुत्थान तेल्लिचेर्री में 1920 के दशक में सम्पूर्ण दक्षिण भारत[2] में पारंपरिक कलाओं के पुनराविष्कार की लहर के रूप में शुरू हुआ और 1970 तक दुनिया भर में युद्ध कला में रूचि के बढ़ने तक जारी रहा.[9] हाल के वर्षों में,अंतर्राष्ट्रीय और भारतीय फिल्मों जैसे इंडियन (1996), अशोका (2001), द मिथ (2005), द लास्ट लीजन (2007), और जापानी अनिमे/मंगा श्रृंखला में इसके शामिल होने के साथ इस कला को और लोकप्रिय बनाने का प्रयास किया जा रहा हैKenichi: The Mightiest Disciple.

विविधताएं[संपादित करें]

कलारी पयट की कई शैलियाँ हैं, जिन्हें तीन क्षेत्रीय स्वरूपों में वर्गीकृत किया जा सकता है. ये तीन मुख्य विचार शैलियाँ अपने पर हमला करने और रक्षात्मक तरीकों से पहचानी जाती हैं. इन शैलियों के बीच अंतर का परिचय जानने के लिए ळुइजेन्दिज्क की पुस्तक सर्वश्रेष्ठ है जो कलारी पयट के अभ्यास और उनके अनुप्रयोगों को दिखाने के लिए कई तस्वीरों का उपयोग करती है. उसकी पुस्तक के प्रत्येक अध्याय में तीन मुख्य परंपराओं में से प्रत्येक का प्रतिनिधित्व है.

उत्तरी कलारीपयाट्टू[संपादित करें]

उत्तरी कलारी पयट का मुख्य रूप सेउत्तर मालाबार में अभ्यास किया जाता है.[2] यह खाली हाथों की अपेक्षा हथियारों पर अधिक बल देता है.[2] परशुराम, विष्णु के छठे अवतार, को इस शैली की मौखिक व लिखित दोनों परंपराओं का संस्थापक माना जाता है.[2] इस प्रणाली में गुरुओं को गुरुक्कल या कभी-कभी असन कहा जाता है, और अक्सर सम्माननीय उपाधियाँ दी जातीं थी, विशेष रूप से पणिक्कर .[2]

उत्तरीय शैली को इसके मेईपयाट्टू -शारीरिक प्रशिक्षण और पूरे शरीर की तेल की मालिश से पहचाना जाता है.[2] उपचार की प्रणाली और मालिश, और अभ्यास के बारे मान्यताएं, आयुर्वेद से निकट से जुड़े रहे हैं.[2] औषधीय तेल मालिश का प्रयोजन अभ्यास करने वालों के लचीलेपन को बढाने के लिए, अभ्यास के दौरान लगी मांसपेशियों की चोटों के इलाज के लिए, या जब रोगी को हड्डी के ऊतकों से जुड़ी, मांसपेशियों से जुड़ी, या तंत्रिका तंत्र से संबंधित समस्या हो तो उसके लिए है. इस तरह की मालिश के लिए थिरुमल शब्द है और शारीरिक लचीलेपन के लिए की जाने वाली मालिश को चावुट्टी थिरुमल कहते हैं, जिसका शाब्दिक अर्थ है "मोहर मालिश" या "पैरों की मालिश". मालिश करनेवाले मालिश के लिए अपने पैर और शरीर के वजन का प्रयोग कर सकते हैं.

कई सारी प्रजातियां/शैलियां(सम्प्रदायम ) हैं, जिनमे से'थुलुनादन'सबसे अच्छा माना जाता है.प्राचीन समय में छात्र अपने दोषों(कुट्म थिरक्कल) पर काबू पाने के लिए थुलुनादु कलारी करते थे. कई विद्यालयों में इनमे से एक से अधिक परम्पराओं को सिखाया जाता है. उदाहरण के लिए कन्नूर के आसपास के कुछ परंपरागत कलारी पिल्लातान्नी , अरप्पुकई और कतादानाथ शैलियों का एक मिश्रण सिखाते हैं.[7]

दक्षिणी कलारीपयाट्टू[संपादित करें]

चमेली सिम्हलन बोरोबुदुर में कलारी पयट और सिलाम्बम का प्रदर्शन करते हुए.

दक्षिणी कलारी पयट का मुख्य रूप से नायर और नादर[2]के द्वारा मुख्यतः पुराने त्रावणकोर में अभ्यास किया जाता था, जिसमे तमिलनाडु[2] का वर्तमान कन्याकुमारी जिला शामिल है. खाली हाथ तकनीक पर जोर देते हुए,[2] ये तमिल सिलाम्बम और श्रीलंका के अंगमपोर से काफी नजदीकी से जुड़ा है.

इसके संस्थापक और संरक्षक संत परसुराम की जगह ऋषि अगस्त्य माने जाते हैं.[2] गुरुओं को असान[2]   के नाम से जाना जाता है.प्रशिक्षण के चरण इस प्रकार हैं, चुवातु (एकल रूप),जोड़ी (साथी के साथ प्रशिक्षण/मल्लयुद्ध), कुरुन्थादी (छोटी छड़ी), नेदुवादी (लंबी छड़ी),  , कट्ठी (चाकू), कटारा (कटार) , वलुम परिचयुम (तलवार और ढाल), चुत्तुवल(लचीली तलवार), दोहरी तलवार, कलारी कुश्ती और  मर्म (दबाव बिंदु) .[7]  

ज़र्रिल्ली दक्षिणी कलारी पयट को वर्म अति (चोट पहुचाने का नियम),मर्म अति (महत्वपूर्ण जगहों पर चोट करना) या वर्म कलारी (कलारी की कला) कहते हैं.[2] प्राथमिक खाली हाथ की वर्म अति तकनीकों को खाली अदिथाडा(चोट पहुचाओं/रक्षा करो) के नाम से जाना जाता है.[2] मर्म अति विशिष्ट रूप से महत्वपूर्ण स्थानों पर इन तकनीकों के इस्तेमाल को बताता है.[2] हथियारों में बांस का बल्लम, छोटी छडी, और हिरन की दोहरी सींगें शामिल हैं.[2]

दक्षिणी शैली में चिकित्सा उपचार को सिद्ध कहा गया है,[9] ये पारंपरिक द्रविड़ चिकित्सा की व्यवस्था है, जो उत्तर भारतीय आयुर्वेद से भिन्न है. सिद्ध चिकित्सा प्रणाली, जो सिद्ध वैद्यम के रूप में भी जानी जाती है, अगस्त्य की देन मानी जाती है.

केंद्रीय कलारिपयाट्टू[संपादित करें]

केंद्रीय कलारी पयट, का अभ्यास मुख्यतः केरल के कोझीकोड, मलप्पुरम, पालाक्काड, त्रिश्शूर और एर्नाकुलम जिले के कुछ भागों में होता है.[2] यह दक्षिणी और उत्तरी शैली का संगम है, जिसमे शामिल हैं, उत्तरी मेइप्पयत्तु की प्रारम्भिक कसरतें, दक्षिणी महत्त्व की खाली हाथ की चालें तथा इसकी अपनी फर्श पर की जाने वाली विशिष्ट तकनीकें जिन्हें कलम कहते हैं.[2]

शैलियां[संपादित करें]

वदक्कन पत्तुकल में निर्दिष्ट कलारी की विभिन्न शैलियां,

करुवंचेरी कलारी
कोदुमाला कलारी
कोलास्त्री नाडू कलारी
कुरुन्गोत कलारी
मथिलुर कलारी
माय्याज्ही कलारी
मेलुर कलारी
नादापुरम कलारी
पनूर मधम कलारी
पय्यम्पल्ली कलारी
पोंनियम कलारी
पुथुस्सेरी कलारी
पुथुरम कलारी
थाचोली कलारी
थोतुवोर कलारी
तुलुनादन कलारी

प्रशिक्षण[संपादित करें]

गुरुक्कल पुत्तारा सीवीएन (CVN) कलारी, एत्तुमनूर के सामने प्रार्थना करते हुए.

दीक्षा समारोह[संपादित करें]

छात्रों के प्रशिक्षण की शुरुआत लगभग सात वर्ष की उम्र में होती है, जिसमे गुरुक्कल द्वारा औपचारिक दीक्षा रीति की जाती है. नए सत्र के उदघाटन के दिन, एक नौसिखिये(ज्यादातर नायर पुराने समय में एज्हावा) को गुरुक्कल या एक वरिष्ठ छात्र की उपस्थिति में कलारी में भर्ती किया जाता है और उन्हें चौखट के आर-पार दाहिने पैर को रखने का निर्देश दिया जाता है. छात्र दहिने हाथ से मैदान को छूता है और फिर सम्मान की निशानी के रूप में माथे पर लगाता है. उसे फिर गुरुथारा की और ले जाया जाता है, जहां एक दीपक कलारी के सभी गुरुओं के सम्मान में जला कर रखा होता है, इस पूजा की विधि को दोहराने के लिए. फिर वह गुरु को पान के पत्ते में रख कर दक्षिणा स्वरुप कुछ धन पेश करते हैं, और दंडवत हो कर, गुरु का पैर छूते हैं, जो समर्पण का द्योतक है. और फिर गुरु शिष्य के सिर पर हाथ रख कर आशीर्वाद देता है और उसके लिए प्रार्थना करता है. ये अनुष्ठान - जमीन छूना, पुत्तरा, गुरुथारा और गुरु के पैर छूना हर रोज दोहराया जाता है. यह देवा, कलारी और इस कला में पूर्ण समर्पण और गुरु की स्वीकृति का प्रतीक है.

कलारी[संपादित करें]

कलारीएक विद्यालय या प्रशिक्षण हॉल है जहां युद्ध कला को सिखाया जाता है. ये मूलतः वास्तु शास्त्र के अनुसार बनाए जाते थे, जिनमे प्रवेश द्वार पूर्व मुखी और मुख्य द्वार केंद्र के दाहिनी और होता था. स्थान की ऊर्जा के स्तर को संतुलित करने के लिए मन्त्र शास्त्र, तंत्र शास्त्र, और मर्म शास्त्र सरीखे विज्ञानों का उपयोग होता है. प्रशिक्षण क्षेत्र के दक्षिण पश्चिम किनारे में एक पुत्तारा (सात परतों वाला मंच) होता है. संरक्षक देवता (आमतौर परभगवती का एक अवतार, काली) या शिव) यहाँ स्थित होते है, और प्रत्येक प्रशिक्षण सत्र के शुरू होने के पहले पुष्प,धूप और जल के साथ इनकी पूजा की जाती है. उत्तरी शैली में अभ्यास, विशेष छत वाले गड्ढे में होता है, जहां फर्श जमीन के स्तर से 3.5 फुट नीचे होता है, तथा गीली लाल मिट्टी से बना होता है, जो चोटों से बचाव के लिए गद्देदार प्रभाव पैदा करता है. फर्श की गहराई प्रशिक्षु को हवाओं से बचाती है जो शरीर के तापमान को नुक्सान पहुचा सकती हैं. दक्षिणी शैली में अभ्यास आमतौर पर खुली हवा या बिना छत वाले ताड़ की शाखाओं से बने बाड़े में किया जाता है.[2] परंपरागत रूप से, जब कलारी को बंद कर दिया जाता था तो इसे संरक्षक देवता के एक छोटे मंदिर की तरह बना दिया जाता था.

चित्र:Kalaripayattu3.JPG
कलारिपयाट्टू.

अभ्यास[संपादित करें]

प्रत्येक अभ्यास के साथ जुड़े विशिष्ट आवाहन को वयतरी कहा जाता है.

कालकल

कालकल का शाब्दिक अर्थ है पैर. कलारी के संदर्भ में ये पैर के प्रहार और लचीलापन बढाने के लिए पैर उठा कर किये जाने वाले अभ्यास काल एदुप्पू के रूप में जाना जाता है.

  1. पाद चक्रम (पैर की घुमावदार चोट- अंदर से बाहर की ओर)
  2. पाद भ्रमणं (पैर की घुमावदार चोट- बाहर से अंदर की ओर)
  3. नेर काल (पैर की सीधी चोट)
  4. कोना काल (दाएँ से बाएँ, बाएँ से दाएँ, पैर की चोट)
  5. वीथी काल (पैर की घुमावदार चोट -अंदर से बाहर )
  6. नेर-कोना-वीथी काल (पैर की संयुक्त चोट)
  7. थिरिची काल (दोनों ओर पैर की चोट - सीधी पैर की चोट फिर घूम कर पैर की चोट)
  8. आगा काल (पैर की घुमावदार चोट - बाहर से अन्दर)
  9. इरुथ्थी काल (पैर की चोट करना और बैठ जाना)
  10. इरुथ्थी काल 2 (पैर की चोट करना और बैठ जाना- मुड़ना और बैठ जाना)
कैकुथ्थिप्पयाट्टू

कैकुथ्थिप्पयाट्टू ,काई (हाथ)), कुथ्थी (मारना) और पयाट्टू (व्यायाम) का एक संयुक्त शब्द है. तुलुनादन वंश से शुरू हुआ, यह सभी दूसरी शैलियों में अपनाया गया है. इसमें घूंसे मारना, पैर की चालों, खिचाव, घुमाव और उछाल को एक विशिष्ट क्रम में किया जाता है. यह मुककट्टू या शरीर को गर्म करने के बाद किया जाता है. कलारी पयट के दूसरे अभ्यासों की तरह कैकुथ्थिपयाट्टू को 18 चरणों में विभाजित किया गया है, और इसकी जटिलता चरणों के साथ-साथ बढ़ती जाती है.

चुमत्तादी

चुमत्तादी कई तथा सभी ओर से आये विरोधियों पर हमले और रक्षा करना सिखाता है. ये 18 चरणों में विभाजित है, और इसमें घूंसे, काट, उछाल और रोक शामिल हैं. इसकी हरकत चारों दिशाओं में होती है. इस अभ्यास का प्रयोग बहुत तीव्र गति और शक्ति के साथ किया जाना चाहिए.

मेईपयाट्टू

मेईपयाट्टू लचीलेपन पर केंद्रित है. ये भी 18 चरणों में विभाजित है, यह अभ्यासकर्ता को आक्रामक बनाता है और उसकी युद्ध की जागरूकता को बढाता है. इस कसरत का अभ्यास गति और चपलता के साथ किया जाना चाहिए.

अदिथादा

अदिथादा, चोट पहुचाने (अदि ) और रोक पैदा करने (थाडू ) शब्दों से आता है. ऊपर वर्णित अभ्यासों के विपरीत, अदिथादा के लिए दो या अधिक प्रशिक्षुओं की आवश्यकता होती है. जब एक प्रतिपादक हमला करता है, तो दूसरा रोकता है और फिर जवाबी हमला करता है.

ओत्तोथारम

हमले को रक्षा की तरह कैसे इस्तेमाल करना है ये ओत्तोथारम सिखाता है. जैसा कि अदिथादा के साथ होता है, इसका अभ्यास दो प्रतिपादकों के द्वारा किया जाता है, लेकिन छात्रों के अनुभव के साथ इस संख्या को बढ़ाया जा सकता है.

चरण[संपादित करें]

प्रशिक्षण चार मुख्य भागों मिथारी, कोल्थारी, अन्कथारी और वेरुम्कई में विभाजित है.

मिथारी (മെയ്ത്താരി)[संपादित करें]

मिथारी ऐठ्नों, मुद्राओं और जटिल उछाल तथा घुमाव वाले कठोर शारीरिक क्रमों वाला प्राम्भिक चरण है. बारह मेईपयाट्टू अभ्यास, शरीर की बुनियादी मुद्राओं का पालन करते हुए तंत्रिका-पेशी समन्वय, संतुलन और लचीलेपन के लिए किये जाते हैं. कलारी पयट आक्रामकता में नहीं बल्कि स्वयं को अनुशासित करने से उत्पन्न होता है. इसलिए प्रशिक्षण की शुरुआत भौतिक शरीर को अनुशासित और मानसिक संतुलन को प्राप्त करने से होती है. यह युद्ध कला सीखने वाले के लिए ही नहीं बल्कि किसी भी व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण है. प्रशिक्षण के पहले चरण में शक्ति, लचीलापन, संतुलन और सहनशक्ति का विकास करने के लिए शारीरिक व्यायाम शामिल है. इसमें कूद, फर्श पर नीचे आसन, चक्करदार क्रम, पैर से चोट करना, आदि शामिल हैं. इसमें शरीर के प्रत्येक अंग को निपुण बनाने का प्रयास किया जाता है. ये अभ्यास दिमाग में सतर्कता लाते हैं, और ये सतर्कता आगे के स्तरों में सिखाई जाने वाली आत्मरक्षा के क्रमों की प्रक्रियाओं को समझने में सहायक होते हैं.

कोल्थारी (കോല്തരി)[संपादित करें]

एक बार छात्र शारीरिक रूप से सक्षम हो जाय तो, उनका परिचय लकड़ी के लम्बे हथियारों के साथ युद्ध के लिए होता हैं. पहले सिखाया जाने वाला हथियार बल्लम केत्तुकारी है, जो आमतौर पर लम्बाई में 5 फिट(1.5 मी) या जमीन से छात्र के माथे जितना लंबा होता है. दूसरा हथियार जो सिखाया जाता है वो चेरुवादी या मुचन है, जो एक तीन बालिश्त, लगभग ढाई फीट या 75 सेमी.लम्बी होती है. तीसरा सिखाया जाने वाला हथियार ओट्टा है, जो हाथी की सूड़ जैसी दिखने वाली एक लकड़ी की मुडी हुई छड़ी होती है. इसका सिरा गोल है और प्रतिद्वंद्वी के शरीर में महत्वपूर्ण स्थानों पर प्रहार करने के लिए इस्तेमाल होती है. इसे प्रमुख हथियार माना जाता है, और सहनशक्ति, चपलता, शक्ति तथा कौशल विकसित करने का ये मूलभूत उपकरण है. ओट्टा के प्रशिक्षण में 18 क्रम होते हैं.

अंक्थरी (അങ്കത്തരി)[संपादित करें]

अन्कथारी जिसमें दोनों विरोधी चुत्तुवल और परिचा धारण किये हैं.

एक बार अभ्यास करने वाला लकड़ी के सभी हथियारों में कुशल हो जाता है तो, वह अन्कथारी (शाब्दिक अर्थ "युद्ध प्रशिक्षण")शुरू करता है, जिसकी शुरुआत धातु के हथियारों से होती है, उनकी घातक प्रकृति के कारण जबरदस्त एकाग्रता की आवश्यकता होती है. पहला सिखाया जाने वाला धातु का हथियार कधरा है, जो घुमावदार धार वाली कटार है. इसके बाद तलवार(वैल) और ढाल (परिचा) सिखाई जाती है. बाद के हथियारों में शामिल है भाला कुन्थम , त्रिशूल त्रिसूल,और कुल्हाड़ी (वेंमज्हू) . आमतौर पर अंतिम सिखाया जाने वाला हथियार, लचीली तलवार (उरूमि या चुत्तुवल) है, ये एक बेहद खतरनाक हथियार है और सबसे कुशल छात्रों को ही सिखाया जाता है. ऐतिहासिक रूप से, अन्कथारी पूरा होने के बाद छात्र विशेषज्ञ बनने हेतु (जैसे विशेषज्ञ तलवारबाज या छडी योद्धा), अपने लिए एक हथियार का चुनाव करता है.

वेरुम्कई (വെറുംകൈ)[संपादित करें]

सभी हथियारों में महारत हासिल करने के बाद, अभ्यासकर्ता को नंगे हाथ से स्वयं की रक्षा करने की तकनीकों को सिखाया जाता है. इसमें शामिल हैं बाजू बांध, जूझना, और दबाव बिदुओं पर चोट(मर्मम) . इसे सबसे उन्नत युद्ध कौशल माना जाता है, अतः गुरुक्कल बहुत थोड़े से, भरोसेमंद छात्रों को मर्मम का ज्ञान देते हैं.

मर्मशास्त्रम और मालिश[संपादित करें]

यह दावा किया जाता है कि सीखे हुए योद्धा अपने विरोधियों को सिर्फ सही मर्मम (महत्वपूर्ण बिंदु) पर छू कर अक्षम कर सकते हैं या मार सकते हैं. तकनीक के दुरुपयोग को हतोत्साहित करने के लिए, ये केवल सबसे होनहार और शांत-चित्त व्यक्तियों को ही सिखाया जाता है. मर्मशास्त्रम मर्मम के ज्ञान पर जोर देता है और ये मर्म उपचार मर्मचिकित्सा के लिए भी इस्तेमाल होता है. मर्म उपचार की यह प्रणाली सिद्ध वैद्यम के तहत आती है, जिसके लिए ऋषि अगस्त्य और , उनके शिष्यों को श्रेय दिया जाता है. कलारी पयट के आलोचकों ने बताया है कि बाहरी तटस्थ व्यक्तियों पर मर्मम तकनीकों का उपयोग हमेशा सत्यापित परिणाम नहीं देता हैं.

मर्मम का सबसे प्राचीन उल्लेख ऋगवेद में मिलता है, जहां इन्द्र, वृत्र के मर्मम पर वज्र से प्रहार करके उसे पराजित करता है.[10] अथर्व वेद में भी मर्मम का संदर्भ मिलता है.[11] वैदिक और महाकाव्यों में अनेक बिखरे हुए सन्दर्भ सूत्रों के साथ, ये तय हो जाता है कि भारत के प्राचीन योद्धा महत्वपूर्ण बिन्दुओं की जानकारी रखते थे और आक्रमण व रक्षा के लिए इसका उपयोग भी करते थे.[12] सुश्रुत (6ठी शताब्दी ईसा पूर्व) ने सुश्रुत संहिता में मानव शरीर के 107 महत्वपूर्ण बिंदुओं की पहचान की और उन्हें परिभाषित किया था.[13] इन 107 बिन्दुओं में से 64 को घातक रूप में वर्गीकृत किया गया है, यदि इन पर छड़ी या मुट्ठी से सही प्रहार से किया जाए तो ये खतरनाक हो सकता है.[14] सुश्रुत के कार्य ने चिकित्सा की व्यवस्था आयुर्वेद को आधार प्रदान किया, जिसे विभिन्न भारतीय युद्ध कलाओं के साथ सिखाया जाता था, जिसका महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर जोर था, जैसे वर्म कलाई और मर्म आदि.[14]

शरीर मानव के बारे में सीखने के परिणाम स्वरुप, भारतीय युद्ध कला का अभ्यास करने वाले पारंपरिक चिकित्सा व मालिश के क्षेत्र के जानकार बन गए. कलारी पयट शिक्षक अक्सर छात्रों के शारीरिक लचीलेपन या प्रशिक्षण के समय लगी मांसपेशी की चोट का इलाज करने के लिए औषधीय तेलों से उनकी मालिश करते हैं.मलयालम: uzhichil ऐसी मालिश को आम तौर पर थिरुमल कहा जाता है और लचीलापन बढाने के लिए की जाने वाली अद्वितीय मालिश को कट्चा थिरुमल के रूप में जाना है. यह आयुर्वेद के उपचार उज्हिचिल जितनी परिष्कृत मानी जाती है. कलारी पयट ने आयुर्वेद से बड़े पैमाने पर उधार लिया है और सामान रूप से इसे प्रदान भी किया है.

तकनीक[संपादित करें]

कलारी पयट की तकनीक (अतावु) में, पद (चुवातु) और मुद्राओं (वदिवु) का संयोजन है. कुल पांच पद हैं और उत्तरी शैलियों में दस मुद्राएं (अष्ट वादिवुकल) हैं. प्रत्येक पद का अपना शक्ति संयोजन, कार्य और तकनीकों का समूह है. सभी आठ मुद्राएं जानवरों पर आधारित हैं.

रुख (वदिवु)
गजवादिवु हाथी रुख
सिम्हावादिवु शेर रुख
अस्ववादिवु घोड़ा रुख
वरहवादिवु सूअर रुख
सर्पवादिवु साँप रुख
मर्जरावादिवु बिल्ली रुख
कुक्कुवादिवु मुर्गा रुख
मत्स्यवादिवु मछली रुख [गुरुक्कल गोविंदकुट्टी नायर और सी.वी.एन.(CVN) शैली]
मयुरावादिवु मोर रुख (गुरुक्कल पी.के.बालन शैली)
पद (चुवातु)
वत्ता चुवातु
चक्र पद
आक्का चुवातु
अंदर पद
नीक्का चुवातु
आगे बढ़ते पद
कोण चुवातु
किनारे वाले पद
ओत्ताक्कल चुवातु
एकल पैर पद


चित्र:Kalaripayattu2.JPG
कलारिपयाट्टू.

हथियार[संपादित करें]

हालांकि अब अभ्यास सत्र में इनका इस्तेमाल नहीं होता, लेकिन हथियार कलारी पयट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. यह उत्तरी शैली के लिए विशेष रूप से सच है जो ज्यादातर हथियार आधारित है. कुछ मध्ययुगीन संगम साहित्य में वर्णित के हथियार अब अप्रचलित हो गए हैं, और कलारी पयट में अब बहुत कम सिखाये जाते हैं.

वर्तमान समय में कलारीपयट में प्रयुक्त हथियार
Kalaripayattu weapons.jpg
वाल
तलवार
परिचा
ढाल
केत्तुकारी / नेदुवती शरीरावादी / पिराम्बू
बल्लम
कुरुन्थादी / चेरुवादी / मोचन
छड़ी
कुरुवादी
छोटी छड़ी
लाठी
लम्बी छड़ी
कुंथम
भाला
वेत्तुकाठी
खुखरी / छुरा
गदा
गदा / लाठी
छुरिका
छोटी तलवार
मदुवु
हिरण सींग की कटार
कत्तरी
कटार
ओत्ता
घुमावदार छड़ी
उरूमि / चुत्तुवल
लचीली तलवार
ऐतिहासिक रूप से कलारीपयट में प्रयुक्त हथियार
वेंमज्हू
कुल्हाड़ी
अम्बुम विल्लुम
धनुष और तीर
पोंटि
कठुथाला
त्रिसूल
त्रिशूल


आंतरिक लिंक[संपादित करें]

  • कलारीपयाट्टू तकनीक
  • कलारीप्पयाट्टू फ़िल्में

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

  • उत्तरी मालाबार
  • अंकम
  • चेकावर
  • कलारी
  • वर्मा अति

साँचा:Indian martial arts

संदर्भ[संपादित करें]

  1. कलारीपयट -डिस्कवरी चैनल
  2. Zarrilli, Phillip B. (1998). When the Body Becomes All Eyes: Paradigms, Discourses and Practices of Power in Kalarippayattu, a South Indian Martial Art. Oxford: Oxford University Press. 
  3. द इन्स्यक्लोपीडिया ऑफ़ रिलिजन, वोल्यूम 9 बाई मिर्किया एलिअदे, चार्ल्स जे एडम्स, पेज.225
  4. http://books.google.co.in/books?id=DuwUAAAAYAAJ&pg=PA71
  5. Hortus Malabaricus: A Contribution to the History of Dutch Colonial Botany, Page 50. CRC Press. 1986. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9789061916819. http://books.google.co.in/books?id=8VWN_LnFZKwC&pg=PA50&vq=silgos&dq=Silgos+fencing&source=gbs_search_s&cad=0. अभिगमन तिथि: 2008-11-25. 
  6. ळुइजेन्दिज्क 2008
  7. Luijendijk, D.H. (2005). Kalarippayat: India's Ancient Martial Art. Paladin Press. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 1-58160-480-7. 
  8. कलारी
  9. 1992 ज़र्रिल्ली
  10. मारियाना फेदोरोवा (1990). Die Marmantheorie in der klassischen indischen Medizin .
  11. सुभाष रानाडे (1993). नेचुरल हीलिंग थ्रू आयुर्वेद (पेज. 161). पैसेज प्रेस. यूटा अमेरिका.
  12. ज़र्रिल्ली, फिलिप बी ए साउथ इन्डियन मार्शल आर्ट एंड द योग एंड आयुर्वेदिक पैराडिग्म यूनिवर्सिटी ऑफ़ विस्कॉन्सिन- मेडिसन.
  13. जी.डी. सिंघल, एल.वी. गुरु (1973). ऐनाटोमिक एंड ओब्सटेत्रिकल कंसीडरेशनस इन एन्शियंट इन्डियन सर्जरी बेस्ड ऑन शरीर-स्थान ऑफ़ सुश्रुत संहिता.
  14. जे आर स्विन्थ (2002). ए क्रोनोलोजिकल हिस्ट्री ऑफ़ द मार्शल आर्ट्स एंड कोम्बेटिव स्पोर्ट्स. इलेक्ट्रॉनिक जर्नल्स ऑफ़ मार्शल आर्ट्स एंड साइंस.

आगे पढने के लिए[संपादित करें]

वाह्य कड़ियाँ[संपादित करें]