भारतीय सिनेमा

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साँचा चक्र मिला: साँचा:Infobox cinema market भारतीय सिनेमा के अन्तर्गत भारत के विभिन्न भागों और विभिन्न भाषाओं में बनने वाली फिल्में आती हैं जिनमे आंध्र प्रदेश और तेलंगाना, असम, बिहार, गुजरात, हरियाणा, जम्मू एवं कश्मीर, झारखंड, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, ओडिशा, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और बॉलीवुड शामिल है । [1] भारतीय चलचित्र ने २०वीं सदी के आरम्भिक काल से ही विश्व के चलचित्र जगत पर गहरा प्रभाव छोड़ा है। । भारतीय फिल्मों का अनुकरण पूरे [दक्षिण एशिया [| दक्षिणी एशिया]], ग्रेटर मध्य पूर्व, दक्षिण पूर्व एशिया, और पूर्व सोवियत संघ में भी होता है । बढ़ती हुई भारतीय प्रवासी जनसँख्या की वजह से अब संयुक्त राज्य अमरीका और यूनाइटेड किंगडम भी भारतीय फिल्मों के लिए एक महत्वपूर्ण बाजार बन गए हैं। एक माध्यम के रूप में सिनेमा ने देश में अभूतपूर्व लोकप्रियता हासिल की और भारत में सिनेमा की लोकप्रियता का इसी से अन्दाजा लगाया जा सकता है कि यहाँ सभी भाषाओं में मिलाकर प्रति वर्ष 1,600 तक फिल्में बनीं हैं। [2][3]

दादा साहेब फाल्के भारतीय सिनेमा का जनक के रूप में जाना जाते है । [4][5][6][7] भारतीय सिनेमा के लिए आजीवन योगदान के लिए दादा साहेब फाल्के पुरस्कार की 1969 में [भारत सरकार] द्वारा स्थापना उनके सम्मान में की गयी. यह भारतीय सिनेमा में सबसे प्रतिष्ठित और वांछित पुरस्कार हो गया है। [8]


२०वीं सदी में भारतीय सिनेमा आंध्र प्रदेश और तेलंगाना हॉलीवुड संयुक्त राज्य अमरीका का सिनेमा तथा चीनी फिल्म उद्योग के साथ एक वैश्विक उद्योग बन गया था। [9] 2013 में भारत वार्षिक फिल्म निर्माण में पहले स्थान पर था, नौलीवुड । नाइजीरिया सिनेमा, हॉलीवुड [3][10] और चीन के सिनेमा से आगे। < [11] 2012 में, भारत में 1602 फीचर फिल्मों का निर्माण हुआ जिसमे तमिल सिनेमा तेलुगू सिनेमा और बॉलीवुड अग्रणी थे। [3] Indian film industry reached overall revenues of $1.86 billion (INR 93 billion) in 2011. This is projected to rise to $3 billion (INR 150 billion) in 2016.[12] बढ़ती हुई तकनीक और ग्लोबल प्रभाव ने भारतीय सिनेमा का चेहरा बदला है। अब सुपर हीरो तथा विज्ञानं कल्प जैसी फ़िल्में न केवल बन रही हैं बल्कि ऐसी कई फिल्में एंथीरन, रा.वन, ईगा और कृष 3 ब्लॉकबस्टर फिल्मों के रूप में सफल हुई है।[9] भारतीय सिनेमा ने 90 से ज़्यादा देशों में बाजार पाया है जहाँ भारतीय फिल्मे प्रदर्शित होती हैं। [13]

सत्यजीत रे, ऋत्विक घटक, मृणाल सेन, अडूर गोपालकृष्णन, बुद्धदेव दासगुप्ता, जी अरविंदन, अपर्णा सेन, शाजी एन करुण, और गिरीश कासरावल्ली जैसे निर्देशकों ने समानांतर सिनेमा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है और वैश्विक प्रशंसा जीती है। शेखर कपूर, मीरा नायर और दीपा मेहता सरीखे फिल्म निर्माताओं ने विदेशों में भी सफलता पाई है। 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के प्रावधान से 20वीं सेंचुरी फॉक्स, सोनी पिक्चर्स, वॉल्ट डिज्नी पिक्चर्स और वार्नर ब्रदर्स आदि विदेशी उद्यमों के लिए भारतीय फिल्म बाजार को आकर्षक बना दिया है। [14][15] and Warner Bros..[16] एवीएम प्रोडक्शंस, प्रसाद समूह, सन पिक्चर्स, पीवीपी सिनेमा,जी, यूटीवी, सुरेश प्रोडक्शंस, इरोज फिल्म्स, अयनगर्न इंटरनेशनल, पिरामिड साइमिरा, आस्कार फिल्म्स पीवीआर सिनेमा यशराज फिल्म्स धर्मा प्रोडक्शन्स और एडलैब्स आदि भारतीय उद्यमों ने भी फिल्म उत्पादन और वितरण में सफलता पाई। [16] मल्टीप्लेक्स के लिए कर में छूट से भारत में मल्टीप्लेक्सों की संख्या बढ़ी है और फिल्म दर्शकों के लिए सुविधा भी। 2003 तक फिल्म निर्माण / वितरण / प्रदर्शन से सम्बंधित 30 से ज़्यादा कम्पनियां भारत के नेशनल स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध की गयी थी जो फिल्म माध्यम के बढ़ते वाणिज्यिक प्रभाव और व्यसायिकरण का सबूत हैं।

दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योग दक्षिण भारत की चार फिल्म संस्कृतियों को एक इकाई के रूप मेंपरिभाषित करता है। ये कन्नड़ सिनेमा, मलयालम सिनेमा, तेलुगू सिनेमा और तमिल सिनेमा हैं। हालाँकि ये स्वतंत्र रूप से विकसित हुए हैं लेकिन इनमे फिल्म कलाकारों और तकनीशियनों के आदान-प्रदान और वैष्वीकरण ने इस नई पहचान के जन्म में मदद की।

भारत से बाहर निवास कर रहे प्रवासी भारतीय जिनकी संख्या आज लाखों में हैं, उनके लिए भारतीय फिल्में डीवीडी या व्यावसायिक रूप से संभव जगहों में स्क्रीनिंग के माध्यम से प्रदर्शित होती हैं। [17] इस विदेशी बाजार का भारतीय फिल्मों की आय में 12% तक का महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है। इसके अलावा भारतीय सिनेमा में संगीत भी राजस्व का एक साधन है. फिल्मों के संगीत अधिकार एक फिल्म की 4 -5  % शुद्ध आय का साधन हो सकते हैं.

अनुक्रम

इतिहास[संपादित करें]

25 मई 1912 के टाइम्स ऑफ़ इंडिया में भारत की पहली फीचर फिल्म, दादासाहेब तोरणे की श्री पुण्डलिक का विज्ञापन

लंदन (1895) में लुमिएरे (Lumière) चल चित्र की स्क्रीनिंग के बाद सिनेमा यूरोप भर में एक सनसनी बन गई और जुलाई 1896 तक इन फिल्मों को बंबई (अब मुंबई) में भी प्रदर्शित किया गया था। अगले एक साल में प्रोफेसर स्टीवेंसन द्वारा एक फिल्म प्रस्तुति कलकत्ता स्टार थियेटर में एक स्टेज शो में की गयी । स्टीवेंसन के प्रोत्साहन और कैमरा से हीरालाल सेन, एक भारतीय फोटोग्राफर ने उस स्टेज शो के दृश्यों से 'द फ्लॉवर ऑफ़ पर्शिया' (1898) [फारस के फूल] फिल्म बनाई। एच एस भटवडेकर की द रेस्टलेर्स (1899) [पहलवान] जो मुंबई के हैंगिंग गार्डन में एक कुश्ती मैच को दिखती है किसी भारतीय द्वारा शूट की हुई पहली फिल्म थी । यह पहली भारतीय वृत्तचित्र फिल्म भी थी।

दादासाहब तोरणे की श्री पुण्डलिक, एक मूक मराठी फिल्म पहली भारतीय फिल्म थी जो 18 मई 1912 को 'कोरोनेशन सिनेमेटोग्राफ', मुंबई, भारत में रिलीज़ हुई. [18][19] कुछ लोगो का मत है की पुण्डलिक पहली भारतीय फिल्म के सम्मान की अधिकारी नहीं है क्यूंकि ये 1. एक लोकप्रिय मराठी नाटक की रिकॉर्डिंग मात्र थी, 2. इसका चलचित्रकार जॉनसन एक ब्रिटिश नागरिक था 3. इस फिल्म की प्रोसेसिंग लंदन में हुई थी [20][21]

पहली पूरी अवधि की फीचर फिल्म राजा हरिशचंद्र (1913) का एक दृश्य
निर्माता, निर्देशक, पठ कथा लेखक दादासाहब फाल्के, भारतीय सिनेमा के जनक .[4][5][6][7]
चेन्नई का एवीएम स्टूडियो भारत का सबसे पुराना अस्तित्व में फिल्म स्टूडियो

भारत की पहली पूरी अवधि की फीचर फिल्म का निर्माण दादासाहब फाल्के द्वारा किया गया था। दादासाहब भारतीय फिल्म उद्योग के अगुआ थे. वो भारतीय भाषाओँ और संस्कृति के विद्वान थे जिन्होंने संस्कृत महा काव्यों के तत्वों को आधार बना कर राजा हरिशचंद्र (1913), मराठी भाषा की मूक फिल्म का निर्माण किया। इस फिल्म में पुरुषों ने महिलाओं का किरदार निभाया। [22] यह फिल्म भारतीय सिनेमा के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुई। इस फिलम का सिर्फ एक ही प्रिंट बनाया गया था और इसे 'कोरोनेशन सिनेमेटोग्राफ' में 3 मई 1913 को प्रदर्शित किया गया। फिल्म को व्यावसायिक सफलता मिली और इसने अन्य फिल्मो के निर्माण के लिए अवसर प्रदान किया। तमिल भाषा की पहली मूक फिल्म कीचका वधम का निर्माण रंगास्वामी नटराज मुदालियर ने 1916 में किया. मुदालियर ने मद्रास में दक्षिण भारत के पहले फिल्म स्टूडियो की स्थापना भी की [23][24]

पारसी उद्यमी जमशेदजी फ्रामजी मदन के मदन थिएटर पहली भारतीय सिनेमा थिएटर श्रृंखला थे। जमशेदजी 1902 से हर साल 10 फिल्मों का निर्माण और उनका भारतीय उपमहाद्वीप में वितरण करते थे। [22] उन्होंने कलकत्ता । कोलकाता में एल्फिंस्टन बॉयोस्कोप कंपनी की स्थापना भी की. एल्फिंस्टन का 1919 में मदन थिएटर लिमिटेड । मदन थिएटर विलय हुआ जिसके माध्यम से बंगाल के कई लोकप्रिय साहित्यिक कार्यों को स्टेज पर आने का मौका मिला।. उन्होंने 1917 में सत्यवादी राजा हरिशचंद्र का निर्माण भी किया जो दादासाहब फाल्के की राजा हरिशचंद्र (1913) का रीमेक थी.

रघुपति वेंकैया नायडू एक कलाकार थे जो मूक और बोलती भारतीय फिल्मों के अगुआ थे। [25] 1909 से वो भारतीय सिनेमा इतिहास के कई पहलुओं से जुड़े थे, जैसे की एशिया के विभिन्न क्षेत्रों में फिल्मो के प्रचार और बढ़ावे के लिए भ्रमण. वो मद्रास के पहले भारतीय सिनेमा हाल गेयटी टॉकीज के निर्माता और स्वामी थे. [26]

बीसवी सदी के प्रारंभिक सालों में सिनेमा भारत की जनता के विभिन्न वर्गों में एक माध्यम के रूप में लोकप्रिय हुआ। [27] सिनेमा टिकट को कम दाम पर आम जनता के लिए सस्ता बनाया गया. आर्थिक रूप से सक्षम लोगों के लिए अतिरिक्त आराम देकर प्रवेश टिकट के दाम बढ़ाये गए [27] क्यूंकि मनोरंजन के इस सस्ते माध्यम सिनेमा की टिकट बम्बई में 1 आना (4 पैसा ) के कम दाम में मिलती थी इसी लिए दर्शकों के भीड़ सिनेमा घरों में नज़र आने लगी। [27] भारतीय व्यावसायिक सिनेमा की विषय वस्तु को जल्दी से जनता के आकर्षण के हिसाब से ढाला गया. [27] युवा भारतीय निर्माता भारत के सामाजिक जीवन और संस्कृति के तत्वों को सिनेमा में सम्मिलित करने लगे। [28] अन्य निर्माता विश्व के कई कोनो से विचार लाने लगे[28] इन सब वजहों से दुनिया भर के फिल्म दर्शक और फिल्म बाजार भारतीय फिल्म उद्योग के बारे में जानने लगे. .[28]

1927 में ब्रिटिश सरकार ने ब्रिटिश फिल्मों को अमरीकी फिल्मों पर प्राथमिकता देने के लिए इंडियन सिनेमेटोग्राफ इन्क्वारी कमेटी गठित की . आई सी सी में टी. रंगाचारी, (मद्रास के एक वकील) के नेतृत्व में तीन ब्रिटिश और तीन भारतीय मेम्बर थे. [29] इस कमेटी ने ब्रिटिश फिल्मो को समर्थन देने की वांछित सिफारिश देने की जगह नवजात भारतीय फिल्म उद्योग को समर्थन की सलाह दी . परिणाम स्वरुप इनकी सिफारिशों को ख़ारिज कर दिया गया.

आर्देशिर ईरानी ने पहली भारतीय बोलती फिल्म आलम आरा 14 मार्च 1931 को रिलीज़ करी .[22] ईरानी केवल 7 महीने बाद 31 अक्टूबर 1931, को रिलीज़ हुई पहली दक्षिण भारतीय बोलती फिल्म एच. एम. रेड्डी द्वारा निर्देशित तमिल फिल्म कालिदास के निर्माता भी थे [30][31] जुमई शास्ति पहली बंगाली बोलती फिल्म थी. 'टॉकीज' के भारत आगमन के बाद कई फिल्म स्टारों की मांग बहुत बढ़ गयी और वह अभािनय के माध्यम से आरामदायक आमदनी कमाने लगे। [22] चित्तोर वी. नागया, पहले बहुभाषी फिल्म अभिनेता, गायक, संगीतकार निर्माता और निर्देशक थे. वो भारत के पॉल मुनि के रूप में जाने जाते थे[32][33]

1933 में ईस्ट इंडिया फिल्म कंपनी ने कलकत्ता में शूट हुई अपनी पहली भारतीय फिल्म सावित्री रिलीज़ करी। 75 हज़ार के बजट में बानी यह फिल्म प्रसिद्ध नाटक म्यलवरम बाल भारती समाजम, पर आधारित थी. निर्देशक सी. पुलइया ने इसमें थिएटर अभिनेता वेमुरी गगइया और दसारी रामाथिलकम को यम और सावित्री के रूप में लिया [34] इस ब्लॉकबस्टर फिल्म को वेनिस फिल्म समारोह माननीय डिप्लोमा मिला .[35]

पहला तेलुगु फिल्म स्टूडियो दुर्गा सिनेटोन 1936 में निदामरथी सुरैय्या द्वारा राजाहमुन्द्री, आंध्र प्रदेश में स्थापित किया गया [36] 1930 के दशक में भारतीय सिनेमा में ध्वनि तकनीक की प्रगति के साथ संगीत और संगीतमय फिल्में जैसे इंद्र सभा और देवी देवयानी के माध्यम से फिल्मों में नाच और गाने का प्रारभ हुआ [22] देवदास , जैसी फिल्मों की देशव्यापी सफलता के बाद और फिल्म निर्माण के एक शिल्प के रूप में उदय के साथ कई मुख्य शहरों मद्रास । चेन्नई , कलकत्ता । कोलकाता और बम्बई । मुंबई में फिल्म स्टूडियो उभरे। [37] 1940 की फिल्म विश्व मोहिनी भारतीय फिल्म जगत को दर्शाने वाली पहली फिल्म है. इस फिल्म को वाइ. वी. राव ने निर्देशित किया और बलिजेपल्ली लक्ष्मीकांता कवि ने लिखा था .[38]

स्वामीकन्नु विन्सेंट, कोयंबटूर, में पहले सिनेमा हॉल का निर्माता ने "टेन्ट सिनेमा" की शुरुआत की जिसमे शहर या गाँव के नज़दीक खुले मैदान में टेंट लगा कर फिल्मों का प्रदर्शन किया जाता है. एडिसन ग्रैंड सिनेमामेगाफोन नामक पहला स्थाई टेंट सिनेमा मद्रास के एस्प्लेनेड में शुरू हुआ। [39] 1934 में हिमांशु राय, देविका रानी और , राजनारायण दुबे ने उद्योगपति एफ ई दीनशॉ, सर फ़िरोज़ सेठना के साथ मिल कर बॉम्बे टॉकीज स्टूडियो शुरू किया. पूना । पुणे के प्रभात स्टूडियो ने मराठी दर्शकों के लिए फिल्मों का निर्माण शुरू किया। [37] फिल्मनिर्माता आर इस डी चौधरी की फिल्म व्राथ (1930) पर ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत में प्रतिबन्ध लगाया गया क्यों की इसमें भारतीयों को नेताओं के रूप में और भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान इस तरह के चित्रण पर रोक थी .[22] तुकाराम (1608–50), वरकरी संत और आध्यात्मिक कवि के जीवन पर आधारित 1936 की फिल्म संत तुकाराम 1937 वेनिस फिल्म समारोह के दौरान प्रदर्शित हुई और किस अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में दिखाई गयी पहली फिल्म बन गयी. [40] 1938 में गुडावल्ली रामाब्रह्मम, द्वारा सह निर्मित और निर्देशित सामाजिक समस्या फिल्म रायथू बिड्डा, ब्रिटिश प्रशासन द्वारा प्रतिबंधित की गयी क्यों की इसमें किसानों द्वारा ज़मींदार के विरूद्ध बगावत दिखाई गयी थी. [41][42]

भारतीय मसाला फिल्म — रोमांस, नाच, गाने वाली व्यावसायिक फिल्म के लिए कठबोली शब्द — का उद्भव दुसरे विश्व युद्ध के बाद हुआ [37] दक्षिण भारतीय सिनेमा ने एस एस वासन के फिल्म Chandralekha के साथ पूरे भारत में शोहरत हासिल करी .[37] 1940 के दशक के दौरान पूरे भारत के सिनेमा हालों में से आधे से ज़्यादा दक्षिण भारत में थे और सिनेमा को सांस्कृतिक पुनर्निर्माण के साधन के रूप में देखा जाने लगा। [37] स्वंतत्र के बाद भारत का विभाजन की वजह से भारत की सिनेमा परिसंपत्तियाँ भी विभाजित हुई और कई स्टूडियो नव निर्मित पाकिस्तान के पास चले गए [37] बटवारे का विवाद और दंगे अगले कई दशको तक फिल्म निर्माण के लिए चिरस्थायी विषय बने रहे .[37]

भारत की स्वतंत्रता के बाद, एस. के. पाटिल समिति ने भारतीय सिनेमा की तहकीकात व् समीक्षा की। [43] एस. के. पाटिल, समिति प्रमुख ने भारत में सिनेमा को 'कला, उद्यम और मनोरंजन' का मिश्रण कहा और इसके व्यावसायिक महत्व पर भी ध्यान दिया। [43] पाटिल ने वित्त मंत्रालय के अंतर्गत फिल्म फाइनेंस कारपोरेशन की स्थापना की सिफारिश भी की। [44] इस परामर्श को मानते हुए 1960 में पूरे भारत के प्रतिभाशाली फिल्मकारो की आर्थिक मदद के लिए इस की स्थापना की गयी [44] भारत सरकार ने 1948 फिल्म डिवीज़न को स्थापित किया जो आगे चल कर सालाना 200 लघु वृत्तचित्र (18 भाषा में 9000 प्रिंट संपूर्ण भारत में स्थायी सिनेमाघरों के लिए) का निर्माण कर के विश्व का सबसे बडा वृत्तचित्र निर्माता बन गया । [45]

इंडियन पीपलस थिएटर एसोसिएशन (इप्टा), कम्युनिस्ट झुकाव वाले एक कला आंदोलन ने 1940 और 1950 के दशक में स्वरुप लिया। [43] इप्टा के कई यथार्थवादी नाटकों जैसे 1944 में बीजोन भट्टाचार्य' का नबन्ना (1943 बंगाल अकाल त्रासदी पर आधारित ), ने भारतीय सिनेमा में यथार्तवाद की जड़ें मज़बूत करीं। इसका उदहारण ख़्वाजा अहमद अब्बास' की धरती के लाल (1946) है .[43] इप्टा प्रेरित आंदोलन लगातार सच्चाई और वास्तविकता पर ज़ोर देता रहा जिसके फलस्वरूप मदर इंडिया और प्यासा सरीखी भारत की सबसे अधिक पहचानी जाने वाली फिल्मों का निर्माण हुआ [46]

भारतीय सिनेमा का स्वर्ण युग[संपादित करें]

सत्यजित राय 20वीं शताब्दी के सर्वोत्तम फ़िल्म निर्देशकों में गिने जाते है.[47][48][49][50][51][52]
चित्र:Patherpanchali 1.png
ट्रेन की झलक पाने को भागते हुए अपु और दुर्गा, प्रसिद्ध बंगाली फिल्म पथेर पांचाली का एक विख्यात दृश्य [53]
तमिल फिल्म चंद्रलेखा (1948) का नृत्य दृश्य

भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के बाद, 1944 से 1960 की काल अवधि फिल्म इतिहासकारों द्वारा भारतीय सिनेमा का स्वर्ण युग मन जाता है. [54][55][56] पूरे भारतीय सिनेमा इतिहास की समीक्षकों द्वारा सर्वाधिक प्रशंसित फिल्में इस समय निर्मित हुई थी.

इस अवधि में बंगाली सिनेमा के नेतृत्व में एक नया समानांतर सिनेमा आंदोलन उभरा [57] इस आंदोलन की कुछ पहले उदाहरण फिल्मों चेतन आनंद'की नीचा नगर (1946),[58] ऋत्विक घटक'की नागरिक (1952),[59][60] और बिमल रॉय की दो बीघा ज़मीन (1953), ने नव यथार्तवाद[61] और "नयी भारतीय लहर " की नींव रखी .[62] पथेर पांचाली (1955), जो की सत्यजित राय की अपु त्रयी (1955–1959) का पहला भाग था, ने रॉय के भारतीय सिनेमा में प्रवेश की घोषणा थी. [63] अपु त्रयी ने विश्व भर के प्रधान फिल्म समारोहों में प्रमुख पुरुस्कार जीते और भारतीय सिनेमा में 'समानांतर सिनेमा' आंदोलन को सुदृढ़ता से स्थापना की. विश्व सिनेमा पर इसका प्रभाव उन " युवा कमिंग ऑफ ऎज नाटक फिल्मों के रूप में देखा जा सकता है जो 1950 से कला घरों में बाढ़ के रूप में फ़ैल रही है और "अपु त्रयी की कर्ज़दार" हैं। [64]

चलचित्रकार सुब्रत मित्र, जिनकी पहली फिल्म पथेर पांचाली थी का विश्व सिनेकला पर महतवपूर्ण प्रभाव पड़ा . उनकी एक ज़रूरी तकनीक थी बाउंस लाइटिंग, जिसका इस्तमाल करके वह सेट पर दिन के प्रकाश का प्रभाव लाते थे। उन्होंने इस तकनीक को अपराजितो (1956),अपु त्रयी का दूसरा भाग की शूटिंग के दौरान पहली बार इस्तेमाल किया। [65] कुछ और प्रोयगात्मक तकनीक जिनकी सत्यजित राय ने अगुआई करी, उसमे शामिल हैं फोटो-नेगेटिव फ्लैशबैक(कथन) and एक्स -रे विषयांतर प्रतिद्वंदी (1972) की शूटिंग के दौरान .[66] कैंसिल हुई 'द एलियन' नामक फिल्म के 1967 में लिखी हुई पठकथा को स्टीवन स्पीलबर्ग की फिल्म ई.टी. द एक्स्ट्रा टेरेस्ट्रियल (1982) की प्रेरणा माना जाता है .[67][68][69] सत्यजित राय और ऋत्विक घटक ने आगे चलकर कई और समीक्षक प्रशंसित कला फिल्म का निर्देशन किया। उनके अनुरसरण उनके पद चिन्हों पर चलते हुए अन्य प्रशंसित स्वतंत्र भारतीय फ़िल्मकार मृणाल सेन, मणि कौल, अडूर गोपालकृष्णन, जी. अरविन्दन और बुद्धदेब दासगुप्ता ने किया.[57] 1960s के दशक में इंदिरा गांधी के सूचना और प्रसारण मंत्री कार्यकाल में उनके हस्तक्क्षेप से फिल्म फाइनेंस कारपोरेशन द्वारा और भिन्न सिनेमाई अभिव्यक्ति वाली फिल्मों का निर्माण हुआ। [44]

व्यावसायिक बॉलीवुड । हिंदी सिनेमा भी कामयाब हो रहा था। इस दौर की प्रशंसित फिल्मों में गुरु दत्त की प्यासा (1957) and कागज़ के फूल (1959) और राज कपूर की आवारा (1951) and श्री 420 (1955). ये फिल्मे उस दौर के सामाजिक विषय जो की उस वक़्त के शहरी कामकाजी वर्ग की ज़िन्दगी से जुड़े थे को दर्शाती थी ; आवारा में शहर को भयावह और खूबसूरत सपने की तरह दिखाया गया जबकि प्यासा ने शहरी जीवन के मायाजाल की आलोचना की।[57] कुछ प्रसिद्ध फिल्मे भी इस समय निर्मित हुई जैसे मेहबूब खान की मदर इंडिया (1957), जिसे विदेशी भाषा की सर्वश्रेष्ठ फिल्म के अकादमी पुरुस्कार, [70] का नामांकन भी मिला and और के. आसिफ'की मुग़ल-ए-आज़म (1960)(1960).[71] वी. शांताराम 'की दो आँखें बारह हाथ (1957) को हॉलीवुड फिल्म द डर्टी डॉजेन (1967) की प्रेरणा भी कहा जाता है. (1967).[72] बिमल रॉय द्वारा निर्देशित और ऋत्विक घटक द्वारा लिखित मधुमती (1958) ने पुनर्जन्म के विषय को लोकप्रिय पश्चिम संस्कृति में बढ़ावा दिया.[73] अन्य लोकर्पिय मुख्य धारा के फिल्मेकर थे कमाल अमरोही और विजय भट्ट


Ever since Chetan Anand's social realist film Neecha Nagar won the Grand Prize at the first Cannes Film Festival,[58] Indian films were frequently in competition for the Palme d'Or at the Cannes Film Festival for nearly every year in the 1950s and early 1960s, with a number of them winning major prizes at the festival. Satyajit Ray also won the Golden Lion at the Venice Film Festival for Aparajito (1956), the second part of The Apu Trilogy, and the Golden Bear and two Silver Bears for Best Director at the Berlin International Film Festival.[74] Ray's contemporaries, Ritwik Ghatak and Guru Dutt, were overlooked in their own lifetimes but had belatedly generated international recognition much later in the 1980s and 1990s.[74][75] Ray is regarded as one of the greatest auteurs of 20th century cinema,[76] with Dutt[77] and Ghatak.[78] In 1992, the Sight & Sound Critics' Poll ranked Ray at No. 7 in its list of "Top 10 Directors" of all time,[79] while Dutt was ranked No. 73 in the 2002 Sight & Sound greatest directors poll.[77]

चित्र:SivajiGanesan 19620824.jpg
Sivaji Ganesan (1928-2001)

Sivaji Ganesan became India's first ever actor to receive an international award when he won the "Best Actor" award at the Afro-Asian film festival in 1960 and was awarded the title of Chevalier in the Legion of Honour by the French Government in 1995.[80] Tamil cinema is also influenced by Dravidian politics,[81] with prominent film personalities like C N Annadurai, M G Ramachandran, M Karunanidhi and Jayalalithaa becoming Chief Ministers of Tamil Nadu.[82]

Adurthi Subba Rao was recognized as the intellectual fountain head of Indian drama films.[83]

A number of Indian films from this era are often included among the greatest films of all time in various critics' and directors' polls. At this juncture, south cinema saw the production works based on the epic Mahabharata, such as Mayabazar, listed by IBN Live's 2013 Poll as the greatest Indian film of all time,[84] and Narthanasala received awards for best production design and best actor to S. V. Ranga Rao, at the Indonesian Film Festival.[85] A number of Satyajit Ray films appeared in the Sight & Sound Critics' Poll, including The Apu Trilogy (ranked No. 4 in 1992 if votes are combined),[86] The Music Room (ranked No. 27 in 1992), Charulata (ranked No. 41 in 1992)[87] and Days and Nights in the Forest (ranked No. 81 in 1982).[88] The 2002 Sight & Sound critics' and directors' poll also included the Guru Dutt films Pyaasa and Kaagaz Ke Phool (both tied at #160), the Ritwik Ghatak films Meghe Dhaka Tara (ranked #231) and Komal Gandhar (ranked #346), and Raj Kapoor's Awaara, Vijay Bhatt's Baiju Bawra, Mehboob Khan's Mother India and K. Asif's Mughal-e-Azam all tied at #346.[89] In 1998, the critics' poll conducted by the Asian film magazine Cinemaya included The Apu Trilogy (ranked No. 1 if votes are combined), Ray's Charulata and The Music Room (both tied at #11), and Ghatak's Subarnarekha (also tied at #11).[78] In 1999, The Village Voice top 250 "Best Film of the Century" critics' poll also included The Apu Trilogy (ranked No. 5 if votes are combined).[90] In 2005, The Apu Trilogy and Pyaasa were also featured in Time magazine's "All-TIME" 100 best movies list.[91]

आधुनिक भारतीय सिनेमा[संपादित करें]

ग्लोबल आदान प्रदान[संपादित करें]

प्रभाव[संपादित करें]

बहुभाषी[संपादित करें]

1930 के दशक की कुछ भारतीय फिल्मे "बहुभाषी" (multilingual) के रूप में जानी जाती है. इन फिल्मो को मिलती जुलती लेकिन असमान रूपांतर में विभिन्न भाषाओँ में शूट किया गया था. ' इनसाइक्लोपीडिया ऑफ इंडियन सिनेमा (१९९४) में राजधक्ष्य और विलेमेन के अनुसार, एक बहुभाषी फिल्म According to Rajadhyaksha and Willemen in the Encyclopaedia of Indian Cinema (1994), अपने सटीक रूप में

एक बहुभाषी या त्रिभाषी [फिल्म] एक प्रकार की फिल्म है जो 1930s में स्टूडियो युग में बनी थी, जिसमे अलग भाषाओँ में हर दृश्य के अलग लेकिन समान शॉट लिए जाते थे जिसमे अभिनेता अलग होते थे लेकिन तकनिकी कर्मी और संगीत एक होते थे। [92]:15

राजधक्ष्य और विलेमेन के अनुसार अपने इनसाइक्लोपीडिया के शोध के दौरान उन्हें बहुभाषी , डब फिल्मो , रीमेक इत्यादि के बीच में भेद करने में काफी कठिनाई हुई। कुछ मामलो में वही फिल्म अलग शीर्षक के साथ भिन्न फिल्म के रूप में दूसरी भाषा में सूचीबद्ध की गयी हैं. कई वर्षों के विद्वत्तापूर्ण कार्य के बाद ही इसमें निर्णायक विवरण निकाला जा सकता है। "[92]:15

क्षेत्रीय सिनेमा[संपादित करें]

Table: भाषा अनुसार वर्गीकरण
केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड द्वारा 2012 की भारतीय फीचर फिल्मों का भाषा अनुसार वर्गीकरण.[93]
भाषा फिल्मों की संख्या
तमिल 262
तेलुगु 256
हिंदी 221
मलयालम 185
कन्नड़ 128
मराठी 123
बंगाली 123
भोजपुरी 87
गुजराती 72
उड़िया 30
पंजाबी 26
छत्तीसगढ़ी 20
असमिया 11
अंग्रेजी 10
राजस्थानी 8
हरियाणवी 6
Brijbhasha[94] 5
कोंकणी 4
तुलु 4
शेरुडुकपेन 1
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बंगाली सिनेमा[संपादित करें]

ब्रज भाषा सिनेमा[संपादित करें]

भोजपुरी सिनेमा[संपादित करें]

छत्तीसगढ़ी सिनेमा[संपादित करें]

गुजराती सिनेमा[संपादित करें]

हिंदी सिनेमा[संपादित करें]

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पंजाबी सिनेमा[संपादित करें]

सिंधी सिनेमा[संपादित करें]

Sherdukpen सिनेमा[संपादित करें]

तमिल सिनेमा[संपादित करें]

तेलुगू सिनेमा[संपादित करें]

तुलु सिनेमा[संपादित करें]

प्रकार और शैली[संपादित करें]

मसाला फिल्म[संपादित करें]

समानांतर सिनेमा[संपादित करें]

फिल्मी संगीत[संपादित करें]

भारत में 10 फिल्म स्थल[संपादित करें]

पुरस्कार[संपादित करें]

भारत में 12 फिल्म संस्थान[संपादित करें]

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नोट्स[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

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