सूबेदार जोगिंदर सिंह

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सूबेदार
जोगिंदर सिंह
(परमवीर चक्र सम्मानित)
जन्म 26 सितम्बर 1921
मोगा पंजाब
देहांत 20-01-1961
बुम ला, अरुणाचल प्रदेश
निष्ठा ब्रिटिश भारत
Flag of India.svg भारत
सेवा/शाखा ब्रिटिश भारतीय सेना
Flag of Indian Army.svg भारतीय थलसेना
सेवा वर्ष 1936–1962
उपाधि Subedar - Risaldar of the Indian Army.svg सूबेदार
सेवा संख्यांक JC-4547[1]
दस्ता प्रथम बटालियन, सिख रेजिमेंट
युद्ध/झड़पें द्वितीय विश्व युद्ध
१९४७ का भारत-पाक युद्ध
भारत-चीन युद्ध
सम्मान Param-Vir-Chakra-ribbon.svg परम वीर चक्र

सूबेदार जोगिंदर सिंह (26 सितंबर 1921 - 23 अक्टूबर 1962)[2] (पिता : शेर सिंह, माता किशन कौर) सिख रेजिमेंट के एक भारतीय सैनिक थे। इन्हें १९६२ के भारत-चीन युद्ध में असाधारण वीरता के लिए मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।[3] सिंह 1936 में ब्रिटिश भारतीय सेना में शामिल हुए और सिख रेजिमेंट की पहली बटालियन में कार्यरत रहे। 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान वह नार्थ ईस्ट फ्रॉंटियर एजेंसी (नेफा / NEFA) में तान्पेंगला, बुम ला मोर्चे पर एक टुकड़ी का नेतृत्व कर रहे थे। उन्होंने बहादुरी से अपनी टुकड़ी का नेतृत्व किया तथा जब तक वह घायल नहीं हुए, तब तक अपनी पोस्ट का बचाव किया। श्री सिंह इस युद्ध में लापता हो गए थे तथा चीनी सेना की ओर से भी कोई उनके बारे में कोई सूचना नहीं मिली।

प्रारम्भिक जीवन[संपादित करें]

जोगिंदर सिंह का जन्म 26 सितंबर 1921 को पंजाब में मोगा जिले के गाँव मेहाकलन, ब्रिटिश भारत में हुआ था। जोगिन्दर सिंह बहुत समृद्ध परिवार से नहीं थे इसी कारण उनकी विधिवत शिक्षा भी लगभग नहीं हुई थी। उन्होंने अपना बचपन एक ही गांव में बिताया। उनके पिता शेर सिंह एक कृषक सैनी सिख परिवार के थे, जो कि होशियारपुर जिले के गांव मुनाका से महलकलन में स्थानांतरित हो गए थे। जोगिंदर सिंह ने गुरदयाल कौर बंगा से शादी की थी, जो कोठय राणा सिंह गाँव के एक सैनी परिवार से थीं। उन्होंने प्राथमिक स्तर की पढाई नाथू अला गांव में तथा उसके बाद दरोली गांव के मिडिल स्कूल से की। बाद में उन्होंने सेना में शामिल होने का फैसला किया, जिससे कि वह उन्हें "पहचान और उद्देश्य" मिल सके।

सैन्य जीवन[संपादित करें]

ब्रिटिश भारतीय सेना में शामिल होने पर सिंह को 28 सितंबर 1936 को सिख रेजिमेंट (1 सिख) की पहली बटालियन में तैनात किया गया था। सेना में शामिल होने के बाद, उनकी प्रतिभा का विकास हुआ और उन्होंने वहाँ सेना की परीक्षाएं उत्तीर्ण कीं तथा उन्हें यूनिट शिक्षा प्रशिक्षक के रूप में नियुक्त किया गया। उन्होंने बर्मा की ओर से द्वितीय विश्व युद्ध तथा भारत-पाकिस्तान युद्ध 1947-1948 के दौरान श्रीनगर में भाग लिया।

भारत-चीन युद्ध[संपादित करें]

हिमालय क्षेत्र में विवादित सीमाओं पर लंबे समय से भारत और चीन के बीच असहमति थी। विवादित क्षेत्र में बढ़ते चीनी घुसपैठ का सामना करने के लिए, भारत के प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उनसे निपटने के लिए रणनीतियों के बारे में पूछा। हालांकि, भारतीय सेना द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया था। इसके बजाय उन्होंने "फॉरवर्ड पॉलिसी" नामक एक नौकरशाह द्वारा प्रस्तावित एक योजना को मंजूरी दी जिसमे चीनी सीमा के क्षेत्र में कई छोटी-छोटी पोस्टों की स्थापना के लिए कहा गया था। चीनी घुसपैठ के खिलाफ सार्वजनिक आलोचना में गंभीर वृद्धि के कारण नेहरू ने सेना की सलाह के खिलाफ "फॉरवर्ड पॉलिसी" को लागू कर दिया। चीन को भौगोलिक लाभ प्राप्त था और यह सेना के लिए चिंता का विषय था। अतिरिक्त चीनी हमले के समय कई छोटी-छोटी पोस्टों को बनाए रखना असंगत था। इस पर नेहरू ने यह मान लिया था कि चीनी हमला नहीं करेंगे। लेकिन चीन ने चीन-भारत युद्ध की शुरुआत कर दी।

बुम ला की लड़ाई[संपादित करें]

9 सितम्बर 1962 को तत्कालीन भारत के रक्षा मन्त्री वी. के. कृष्ण मेनन ने एक सभा में एक निर्णय लिया कि चीन को थागला रिज की दक्षिणी सीमा से बाहर कर देना है। यह निर्णय नेहरू के समर्थन में था, जो राष्ट्रमंडल प्रधानमंत्रियों के सम्मेलन में भाग लेने के लिए लंदन गए थे। रक्षा मन्त्री की मीटिंग में लिए गए निर्णय से नेहरू जी को अवगत कराया गया और उन्होंने उस पर अपनी सहमति दे दी और इसके बाद 7वीं इन्फैंट्री ब्रिगेड , जिसमें 1 सिख भी शामिल थी, को नामका चू जाने का आदेश दिया गया, जिसे सैन्य रूप से अस्वस्थ माना जाता था और चीनी सेना के लिए एक लाभप्रद मैदान था। इस ठिकाने पर चीनी फौजों का जमावड़ा पूरी तैयारी से घात लगाए बैठा था। यहाँ एक नासमझी और हुई। इस निर्णय और खबर को भारतीय प्रेस ने भरपूर ढंग से बढ़ा - चढ़ा कर छापा जिसमें चीन के लिए ललकार भी थी। जब कि असलियत में भारत की फौजों की तैयारी उतनी अच्छी नहीं थी। हथियारों और गोला बारूद की भारी कमी के बावजूद भारत के सैनिक और अफसर बेहद बहादुर और जोश से भरे हुए थे। आखिर 20 अक्तूबर 1962 को चीन और भारत बूमला मोर्चे पर अपनी-अपनी फौजों के साथ आपने-सामने आ गए।

सम्मान[संपादित करें]

देश के लिए अपने महान कार्यों और अपने सैनिकों को युद्ध के दौरान प्रेरित करने के उनके प्रयासों के कारण उन्हें भारत सरकार द्वारा वर्ष 1962 में परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।[4]


सन्दर्भ[संपादित करें]