शैल रस्तोगी

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डॉ॰ शैल रस्तोगी (जन्म : १ सितंबर १९२७) हिन्दी साहित्यकार हैं। [1] हिन्दी के एकांकीकारों में आपका प्रमुख स्थान है।[2]


श्रीमती शैल रस्तोगी का जन्म १ सितंबर १९२७ को मेरठ में हुआ था। उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से एम.ए किया और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से डॉ हजारीप्रसाद द्विवेदी के निर्देशन में अपना पीएचडी किया।

उन्होंने रघुनाथ कन्या महाविद्यालय, मेरठ (उत्तर प्रदेश) में ३४ वर्षों तक अध्यापन के पश्चात ससम्मान अवकाश प्राप्त किया। अब पूरी तन्मयता से स्वतंत्र लेखन करतीं हैं।

कृतियाँ[संपादित करें]

यों मुक्तछंद-काव्य, दोहा, लघुकथा, कहानी, एकांकी, आलोचना इत्यादि प्राय: सभी विधाओं में भी पर्याप्त लेखन है। उनकी प्रकाशित कृतियाँ है:

एकांकी: भटकन, 'एक जिंदगी बनजारा' (उत्तर प्रदेश के राज्य पुरस्कार से सम्मानित), 'बिना रंगों के इंद्रधनुष' और 'सावधान सासूजी!'।

गीत : 'पराग', 'जंग लगे दर्पण', 'मन हुए हैं कांच के' और 'धूप लिखे आखर'। 'चांदनी धरती पालागन' (प्रेस में)।

हाइकु : 'प्रतिबिंबित तुम', 'सन्नाटा खिंचे दिन', 'दु:ख तो पाहुन हैं', 'बांसुरी है तुम्हारी' और 'अक्षर हीरे मोती'।

सन्दर्भ[संपादित करें]