शिशुनाग
| शिशुनाग | |
|---|---|
| मगध के राजा | |
| शासनावधि | ल. 413 – ल. 395 BCE |
| पूर्ववर्ती | नागदासक (हर्यक वंश) |
| उत्तरवर्ती | कालाशोक (काकवर्ण) |
| संतान | कालाशोक |
| राजवंश | शैशुनाग |
शिशुनाग (लगभग 413–395 ईसा पूर्व) मगध साम्राज्य के शिशुनाग वंश के संस्थापक थे। शुरू में वे हर्यंक वंश के समय मगध के एक अधिकारी (अमात्य) थे। हर्यंक शासकों के खिलाफ हुए विद्रोह के बाद जनता ने उन्हें राजा बनाया। पुराणों के अनुसार, उन्होंने अपने बेटे को वाराणसी का शासन दिया और खुद गिरिव्रज (राजगृह) से शासन किया।
उनके बाद उनके बेटे कालाशोक (काकवर्ण) ने राज संभाला।
प्रारम्भिक जीवन
[संपादित करें]महावंसटिका के अनुसार, शिशुनाग वैशाली के एक लिच्छवि शासक के पुत्र थे।[1] उनका जन्म एक ‘‘नगर-शोभिनी’’ से हुआ था और उनका पालन-पोषण राज्य के एक अधिकारी के रूप में हुआ। विद्रोह के समय वे हर्यंक वंश के अंतिम राजा नागदासक के अधीन वाराणसी में उपराज्यपाल (वाइसरॉय) के पद पर कार्यरत थे।[2]
शासन
[संपादित करें]शिशुनाग ने 413 ईसा पूर्व से 395 ईसा पूर्व तक शासन किया।[3][4] प्रारम्भ में उनकी राजधानी राजगृह थी और वैशाली उनका दूसरा राजनिवास था। बाद में उन्होंने अपनी राजधानी वैशाली स्थानांतरित कर दी। उन्होंने प्रद्योत वंश के अंतिम राजा नन्दिवर्धन (या अवन्तिवर्धन) को हराकर अवन्ती राज्य पर विजय प्राप्त की।[5] ऐसा माना जाता है कि इस विजय को उज्जयिनी में आर्यक को सिंहासन पर बैठाने वाली क्रांति ने भी सहायता प्रदान की।[2]
पुराणों के अनुसार, उन्होंने अपने पुत्र को वाराणसी में शासन सौंपा जबकि वे स्वयं गिरिव्रज (राजगृह) से शासन करते थे।[6][7]
विस्तार
[संपादित करें]उन्होंने अवन्ती के प्रद्योत वंश का अंत किया और कोसल तथा वत्स राज्यों पर विजय प्राप्त की।[1]
उत्तराधिकारी
[संपादित करें]उनके बाद उनके पुत्र कालाशोक (जिसे काकवर्ण भी कहा जाता है) ने शासन संभाला।[2][1]
संदर्भ
[संपादित करें]- 1 2 3 Upinder Singh 2016, p. 272.
- 1 2 3 Raychaudhuri 1972, pp. 193–5.
- ↑ Raychaudhuri 1972, p. 201.
- ↑ Thapar 1990.
- ↑ Kailash Chand Jain 1972, p. 103.
- ↑ Raychaudhuri 1972, p. 193.
- ↑ Mahajan 2007, pp. 250–1.