शमशेर बहादुर सिंह

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शमशेर बहादुर सिंह
जन्म: १३ जनवरी १९११
देहरादून, उत्तर प्रदेश, भारत
कार्यक्षेत्र: कवि, लेखक
राष्ट्रीयता:भारतीय
भाषा:हिन्दी
काल:आधुनिक काल
विधा:गद्य और पद्य
विषय:कविता, कहानी, निबंध, समीक्षा
साहित्यिक
आन्दोलन
:
नई कविता,
प्रमुख कृति(याँ):चुका भी नहीं हूँ मैं, प्लाट का मोर्चा
१९७७ में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित
तार सप्तक के प्रमुख कवि


शमशेर बहादुर सिंह 13 जनवरी 1911- 12 मई 1993 आधुनिक हिंदी कविता की प्रगतिशील त्रयी के एक स्तंभ हैं। हिंदी कविता में अनूठे माँसल एंद्रीए बिंबों के रचयिता शमशेर आजीवन प्रगतिवादी विचारधारा से जुड़े रहे। तार सप्तक से शुरुआत कर चुका भी नहीं हूँ मैं के लिए साहित्य अकादमी सम्मान पाने वाले शमशेर ने कविता के अलावा डायरी लिखी और हिंदी उर्दू शब्दकोश का संपादन भी किया।

जीवन वृत[संपादित करें]

शमशेर का जन्म १3 जनवरी 1911 को देहरादून में हुआ। उनके पिता का नाम तारीफ सिंह और माँ का परम देवी था। उनके भाई तेज बहादुर उनसे दो साल छोटे थे। उनकी मां दोनों भाइयों को 'राम-लक्ष्मण की जोड़ी' कहती थीं। शमशेर 8-9 साल के थे जब उनके माँ की मृत्यु हो गई। लेकिन दोनों भाइयों की यह जोड़ी शमशेर की मृत्यु तक बनी रही। उनकी प्रारंभिक शिक्षा उनके ननिहाल देहरादून में हुई। बाद की शिक्षा गोंडा और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हुई। १९३५-३६ में उन्होंने उकील बंधुओं से कला प्रशिक्षण लिया।

सन् 1929 में 18 वर्ष की अवस्था में उनका विवाह धर्मवती के साथ हुआ। छः वर्ष के साथ के बाद 1935 में टीबी से धर्मवती की मृत्यु हो गई। चौबीस वर्ष के शमशेर को मिला जीवन का यह अभाव कविता में विभाव बनकर हमेशा मौजूद रहा। काल ने जिसे छीन लिया, उसे अपनी कविता में सजीव रखकर वे काल से होड़ लेते रहे।

युवाकाल में शमशेर वामपंथी विचारधारा और प्रगतिशील साहित्य से प्रभावित हुए। उनका जीवन निम्नमध्यवर्गीय व्यक्ति का था।

उनकी मृत्यु 12 मई 1993 को अहमदाबाद में हुई। अहमदाबाद उनपर शोधकर्ती

कार्यक्षेत्र[संपादित करें]

'रूपाभ', इलाहाबाद में कार्यालय सहायक (१९३९), 'कहानी' में त्रिलोचन के साथ (१९४०), 'नया साहित्य', बंबई में कम्यून में रहते हुए (१९४६, माया में सहायक संपादक (१९४८-५४), नया पथ और मनोहर कहानियाँ में संपादन सहयोग। दिल्ली विश्वविद्यालय में विश्वविद्यालय अनुदान की एक महत्वपूर्ण परियोजना 'उर्दू हिन्दी कोश' का संपादन (१९६५-७७), प्रेमचंद सृजनपीठ, विक्रम विश्वविद्यालय के अध्यक्ष (१९८१-८५)

महत्वपूर्ण कृतियां[संपादित करें]

  • काविता-संग्रह:- कुछ कविताएं (१९५६), कुछ और कविताएं (१९६१), चुका भी नहीं हूं मैं (१९७५), इतने पास अपने (१९८०), उदिता - अभिव्यक्ति का संघर्ष (१९८०), बात बोलेगी (१९८१), काल तुझसे होड़ है मेरी (१९८८)।
  • निबन्ध-संग्रह:- दोआब
  • कहानी-संग्रह":- प्लाट का मोर्चा

शमशेर का समग्र गद्य कु्छ गद्य रचनायें तथा कुछ और गद्य रचनायें नामक पुस्तकों में संग्रहित हैं ! उनकी प्रमुख कविताओं में 'अमन का राग'(प्रकाशित१९५२),'एक पीली शाम'(१९५३),'एक नीला दरिया बरस रहा' प्रमुख है।

विचारधारा[संपादित करें]

हिंदी साहित्य में माँसल एंद्रीए सौंदर्य के अद्वीतीय चितेरे शमशेर आजीवन प्रगतीवादी विचारधारा के समर्थक रहे। उन्होंने स्वाधीनता और क्रांति को अपनी 'निजी चीज' की तरह अपनाया। इंद्रिय-सौंदर्य के सबसे संवेदनापूर्ण चित्र देकर भी वे अज्ञेय की तरह सौंदर्यवादी नहीं है। उनमें एक ऐसा ठोसपन है जो उनकी विनम्रता को ढुलमुल नहीं बनने देता, साथ ही किसी एक चौखटे में बंधने भी नहीं देता। निराला उनके प्रिय कवि थे। उन्हें याद करते हुए शमशेर ने लिखा था-

'भूल कर जब राह- जब-जब राह.. भटका मैं/ तुम्हीं झलके हे महाकवि,/ सघन तम की आंख बन मेरे लिए।'

शमशेर के राग-विराग गहरे और स्थायी थे। अवसरवादी ढंग से विचारों को अपनाना-छोड़ना उनका काम नहीं था। अपने मित्र-कवि केदारनाथ अग्रवाल की तरह शमशेर एक तरफ 'यौवन की उमड़ती यमुनाएं' अनुभव कर सकते थे, दूसरी तरफ 'लहू भरे गवालियर के बाजार में जुलूस' भी देख सकते थे। उनके लिए निजता और सामाजिकता में अलगाव और विरोध नहीं था, बल्कि दोनों एक ही अस्तित्व के दो छोर थे।

शमशेर उन कवियों में थे, जिनके लिए मा‌र्क्सवाद की क्रांतिकारी आस्था और भारत की सुदीर्घ सांस्कृतिक परंपरा में विरोध नहीं था।

साहित्यिक वैशिष्ट्य[संपादित करें]

शमशेर सौंदर्य के अनूठे चित्रों के स्रष्टा के रूप में हिंदी में सर्वमान्य हैं। वे स्वयं पर इलियट-एजरा पाउंड-उर्दू दरबारी कविता का रुग्ण प्रभाव होना स्वीकार करते हैं। लेकिन उनका स्वस्थ सौंदर्यबोध इस प्रभाव से ग्रस्त नहीं है।

1. मोटी धुली लॉन की दूब,

साफ मखमल-सी कालीन।

ठंडी धुली सुनहली धूप।

2. बादलों के मौन गेरू-पंख, संन्यासी, खुले है/ श्याम पथ पर/ स्थिर हुए-से, चल।

'टूटी हुई, बिखरी हुई' प्रतिनिधि कविताएँ नहीं मानी जाती। उनमें शमशेर ने लिखा है-

'दोपहर बाद की धूप-छांह

में खड़ी इंतजार की ठेलेगाड़ियां/ जैसे मेरी पसलियां../

खाली बोरे सूजों से रफू किये जा रहे हैं।.

जो/ मेरी आंखों का सूनापन है।'

शमशेर के लिए मा‌र्क्सवाद की क्रांतिकारी आस्था और भारत की सुदीर्घ सांस्कृतिक परंपरा में विरोध नहीं था। उषा शीर्षक कविता में उन्होंने भोर के नभ को नीले शंख की तरह देखा है।

'प्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसे'-

वैदिक कवियों की तरह वे प्रकृति की लीला को पूरी तन्मयता से अपनाते है-

1. जागरण की चेतना से मैं नहा उट्ठा।

सूर्य मेरी पुतलियों में स्नान करता।

2. सूर्य मेरी पुतलियों में स्नान करता

केश-तन में झिलमिला कर डूब जाता..

वे सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में सांप्रदायिकता के विरोधी और समाहारता के समर्थक थे। उन्होंने स्वयं को 'हिंदी और उर्दू का दोआब' कहा है। रूढि़वाद-जातिवाद का उपहास करते हुए वे कहते हैं-

'क्या गुरुजी मनु ऽ जी को ले आयेंगे?

हो गये जिनको लाखों जनम गुम हुए।'

पुरस्कार व सम्मान[संपादित करें]

प्रतिनिधि पंक्तियाँ[संपादित करें]

हाँ, तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मछलियाँ लहरों से करती हैं

     ...जिनमें वह फँसने नहीं आतीं,

जैसे हवाएँ मेरे सीने से करती हैं

     जिसको वह गहराई तक दबा नहीं पातीं,

तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मैं तुमसे करता हूँ।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]