"भक्ति": अवतरणों में अंतर

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(→‎भक्ति करना क्यों जरूरी है?: जानकरी का विस्तार)
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पवित्र सद्ग्रन्थों में लिखा है कि प्राणी अपनी भक्ति तथा पुण्यों के बल से स्वर्ग-महास्वर्ग में जाता है, वहाँ इसे सर्व सुख प्राप्त होता है। जिसके समय भक्ति तथा पुण्य क्षीण (समाप्त) हो जाते हैं तो वह प्राणी पृथ्वी पर भिन्न-भिन्न प्राणियों के शरीरों में कष्ट उठाता है। वर्तमान में जितने भी प्राणी पृथ्वी पर हैं, इनको यहाँ कोई सुख नहीं है। अन्य प्राणी केवल अपना कर्म भोग ही भोगते हैं।  श्रीमद् भगवत गीता अध्याय 5 श्लोक 12 में कहा है कि युक्तः अर्थात् जो परमात्मा की भक्ति में लगा है, उसके कर्म फल छूट जाते हैं। उनको त्यागकर भक्त भगवान प्राप्ति वाली अर्थात् परमात्मा प्राप्त होने के पश्चात् जो शान्ति अर्थात् सुख होता है, उस शान्ति को प्राप्त होता है और अयुक्तः अर्थात् जो परमात्मा की भक्ति में नहीं लगा। वह सामान्य व्यक्ति, कर्मों के कारण संसार बन्धन में फँसा रहता है। उसको कर्मानुसार अन्य प्राणियों के शरीरों में कष्ट प्राप्त होता रहता है। जैसे ट्रक या कार, बस आदि गाड़ी के पहिए की ट्यूब की हवा निकल जाती है तो वह गाड़ी खड़ी रहती है। जब उसकी ट्यूब में हवा भर दी जाती है तो वह कई क्विंटल वजन को उठाकर ले जाती है। इसी प्रकार जीव की भक्ति तथा पुण्य समाप्त हो जाते हैं तो वह हवारहित ट्यूब के समान होता है। उसके लिए भक्ति रूपी हवा भर देने के पश्चात् वही आत्मा भक्ति की शक्ति से संसार सागर से तर जाती है। भक्ति करने से परमात्मा आप के साथ होते हैं तथा आप जी की पल पल रक्षा करते हैं तथा साधक को सर्व सुख भी मिलता है।
 
== भक्ति न करने से हानि ==
स्वामी तथा पिता दोनों को हम श्रद्धा की दृष्टि से अधिक देखते हैं। मातृभावना में प्रेम बढ़ जाता है, पर दाम्पत्य भावना में श्रद्धा का स्थान ही प्रेम ले लेता है। प्रेम दूरी नहीं नैकट्य चाहता है और दाम्पत्यभावना में यह उसे प्राप्त हो जाता है। शृंगार, मधुर अथवा उज्जवल रस भक्ति के क्षेत्र में इसी कारण अधिक अपनाया भी गया है। वेदकाल के ऋषियों से लेकर मध्यकालीन भक्त संतों की हृदयभूमि को पवित्र करता हुआ यह अद्यावधि अपनी व्यापकता एवं प्रभविष्णुता को प्रकट कर रहा है।
जीव का शरीर एक वस्त्र माना जाता है। जब कोई साधक मृत्यु को प्राप्त हो जाता है तो सन्त तथा भक्तजन कहा करते हैं कि अमुक सन्त या साधु चोला छोड़ गया। गीता अध्याय 2 श्लोक 22 में कहा है कि जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रा ग्रहण करता है। वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर अन्य नए शरीरों को प्राप्त होती है। (गीता अध्याय 2 श्लोक 22) इसलिए प्रत्येक प्राणी अपने-अपने शरीर अर्थात् पोषाक पहने हुए है। जैसे कोई गधे, कुत्ते, सूअर, अन्य पशु-पक्षियों व कीटों रूपी वस्त्रा धारण किए है, मनुष्य का शरीर भी एक पोषाक है। जो बच्चे विद्यालय में प्रवेश प्राप्त कर लेते हैं, उनके 6 लिए एक विशेष प्रकार की पोषाक (क्तमेे) अनिवार्य होती है। इसी प्रकार पृथ्वी पर जितने भी स्त्राी-पुरूष हैं, ये सबके सब अन्य प्राणियों से भिन्न पोषाक अर्थात् शरीर धारण किए हैं, सर्व मानव को ऐसे जानें जैसे विद्यार्थी होते हैं। उनकी पोषाक विशेष होती है। विद्यार्थियों से माता-पिता कोई विशेष कार्य नहीं लेते। उनको सुविधाऐं भी परिवार के अन्य सदस्यों से भिन्न देते हैं। यदि वे विद्यार्थी अपना उद्देश्य त्यागकर अन्य बच्चों की तरह ही खेलकूद में लगे रहें जो बच्चे विद्यालय में नहीं जाते (उनकी पोषाक भी भिन्न होती है) तो वे विद्यार्थी अपने विद्याकाल को समाप्त करके बहुत पश्चाताप् करेंगे, बहुत कष्ट उठाऐंगे। जैसे सन्तानोत्पत्ति, सन्तान का पालन पोषण सर्व प्राणी करते हैं। यदि मनुष्य भी यही कार्य करके अपना जीवन अन्त कर जाता है तो उसमें और अन्य पशु-पक्षियों में कोई अन्तर नही रहा। उसको मानव शरीर प्राप्त हुआ था भक्ति करने के लिए, वह भक्ति न करके फिर पशु व अन्य प्राणी के शरीर को प्राप्त करके बहुत कष्ट उठाएगा।
 
भक्ति क्षेत्र की चरम साधना सख्यभाव में समवसित होती है। जीव ईश्वर का शाश्वत सखा है। प्रकृति रूपी वृक्ष पर दोनों बैठे हैं। जीव इस वृक्ष के फल चखने लगता है और परिणामत: ईश्वर के सखाभाव से पृथक् हो जाता है। जब साधना, करता हुआ भक्ति के द्वारा वह प्रभु की ओर उन्मुख होता है तो दास्य, वात्सल्य, दाम्पत्य आदि सीढ़ियों को पार करके पुनः सखाभाव को प्राप्त कर लेता है।<ref>Allport, Gordon W.; Swami Akhilananda (1999). "Its meaning for the West". Hindu Psychology. Routledge. p. 180.</ref> इस भाव में न दास का दूरत्व है, न पुत्र का संकोच है और न पत्नी का अधीन भाव है। ईश्वर का सखा जीव स्वाधीन है, मर्यादाओं से ऊपर है और उसका वरेण्य बंधु है। आचार्य वल्लभ ने प्रवाह, मर्यादा, शुद्ध अथवा पुष्ट नाम के जो चार भेद पुष्टिमार्गीय भक्तों के किए हैं, उनमें पुष्टि का वर्णन करते हुए वे लिखते हैं : कृष्णधीनातु मर्यादा स्वाधीन पुष्टिरुच्यते। सख्य भाव की यह स्वाधीनता उसे भक्ति क्षेत्र में ऊर्ध्व स्थान पर स्थित कर देती है।

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