वार्ता:सरयूपारीण ब्राह्मण

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सिर्फ़ तीन नदियो का उल्लेख ही ऋग्वेद मे है ! इनमे सरस्वती, सिंधु और सरयू नदी का ज़िक्र है ! सरयूपारीण ब्राह्मण उन्ही मूल कान्य्कुब्ज ब्राह्मणों का दल है जिन्होने भारतीय सभ्यता की नीव पूर्वी उत्तर प्रदेश और उत्तरी बिहार मे रखी ! ये शुद्ध आर्यवंशी षट्कर्मा वेदपाठी आदिकालिक समूह है जो की आदिकाल से ही ब्राह्मण धर्म का अधिष्ठाता रहा है ! ये ब्राह्मण तिवारी,त्रिपाठी,त्रिवेदी,मिश्र,शुक्ल,द्विवेदी,दुबे,चतुर्वेदी,चौबे,उपाध्याय,पाठक,दीक्षित,वाजपेयी,पांडे,ओझा उपनाम लगाता है ! इन सरयूपारीण ब्राह्मणों के कई घरानो मे पंक्ति की परंपरा चलती है अर्थात ये अपने घराने वाले का बनाया हुआ और अपने घराने वाले के ही साथ भोजन ग्रहण कर सकते हैं जैसे उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री पंडित कमलापति त्रिपाठी पंक्तिपावन सरयूपारीण ब्राह्मण हैं जो पिंडी के तिवारी हैं ! ''''सरयूपारीण से भूमिहार'''' भूमिहार समाज मे भी सरयूपारीण ब्राह्मण ही बहुसंख्यक है ! काशी नरेश का ख़ानदान भी कित्ठू मिश्र गौतम गोत्री सरयूपारीण कुल का है ! भूमि, सत्ता एवं धन के लोभ मे ब्राह्मणत्व को त्याग देने से ही इन सरयूपारीण ब्राह्मणों को कर्म से च्युत मानकर इनको अलग कर दिया गया ! ऐसे सरयूपारीण लोगो ने कुछ अन्य ज़मींदारों से रोटी बेटी का रिश्ता स्थापित कर लिए ! ऐसे लोग कालांतर मे भूमिहार कहलाए ! भूमिहार बने इन सरयूपारीण ब्राह्मणों को सरयूपारीण अब रोटी बेटी के रिश्ते लायक नही समझते क्योंकि भूमिहार हो जाने से इनके ब्राह्मणत्व खंडित हो गया !

सरयूपारीण ब्राह्मण के घर

1) गर्ग (शुक्ल- वंश) गर्ग ऋषि के तेरह लडके बताये जाते है जिन्हें गर्ग गोत्रीय, पंच प्रवरीय, शुक्ल वंशज कहा जाता है जो तेरह गांवों में बिभक्त हों गये थे| गांवों के नाम कुछ इस प्रकार है| (१) मामखोर (२) खखाइज खोर (३) भेंडी (४) बकरूआं (५) सरांव (६ ) अकोलियाँ (६) भरवलियाँ (७) कनइल (८) मोढीफेकरा (९) मल्हीयन (१०) महसों (११) महुलियार (१२) बुद्धहट (१३) इसमे चार गाँव का नाम आता है लखनौरा, मुंजीयड, भांदी, और नौवागाँव| ये सारे गाँव लगभग गोरखपुर, देवरियां और बस्ती में आज भी पाए जाते हैं| उपगर्ग (शुक्ल-वंश) उपगर्ग के ८ गांव ऋषि के अनुकरणीय थे कुछ इस प्रकार से हैं| बरवां (२) चांदां (३) पिछौरां (४) कड़जहीं (५) सेदापार (६) दिक्षापार (७)जलहरिया (८) उन्छ्हरिया

यही मूलत: गाँव है जहाँ से शुक्ल वंश का उदय माना जाता है यहीं से लोग अन्यत्र भी जाकर शुक्ल वंश का उत्थान कर रहें हैं यें सभी सरयूपारीण ब्राह्मण हैं| 2) गौतम (मिश्र-वंश) गौतम ऋषि के छ: पुत्र बताये जातें हैं जो इन छ: गांवों के वासी थे| (१) चंचाई (२) मधुबनी (३) चंपा (४) चंपारण (५) विडरा (६) भटीयारी इन्ही छ: गांवों से गौतम गोत्रीय, त्रिप्रवरीय मिश्र वंश का उदय हुआ है, यहीं से अन्यत्र भी पलायन हुआ है ये सभी सरयूपारीण ब्राह्मण हैं| उप गौतम (मिश्र-वंश) उप गौतम यानि गौतम के अनुकारक सात गाँव इस प्रकार से हैं| (१) कालीडीहा (२) बहुडीह (३) वालेडीहा (४) भभयां (५) पतनाड़े (६) कपीसा (७) खदरा इन गांवों से उप गौतम की उत्पत्ति मानी जाती है। वत्स गोत्र ( मिश्र- वंश) वत्स ऋषि के नौ पुत्र माने जाते हैं जो इन नौ गांवों में निवास करते थे| (१) गाना (२) पयासी (३) हरियैया (४) नगहरा (५) अघइला (६) सेखुई (७) पीडहरा (८) राढ़ी (९) मकहडा बताया जाता है। इनके यहाँ पांति का प्रचलन था। अतएव इनको तीन के समकक्ष माना जाता है| गोरखपुर, देवरिया व बस्ती के जनपदों में यह गाँव आज भी मौजूद हैं। 3) कौशिक गोत्र (मिश्र-वंश) तीन गांवों से इनकी उत्पत्ति बताई जाती है जो निम्न है| (१) धर्मपुरा (२) सोगावरी (३) देशी वशिष्ट गोत्र (मिश्र-वंश) इनका निवास भी इन तीन गांवों में बताई जाती है| (१) बट्टूपुर मार्जनी (२) बढ़निया (३) खउसी 4) शांडिल्य एवं वशिष्ट गोत्र ( तिवारी,त्रिपाठी -वंश) शांडिल्य ऋषि के तेरह पुत्र बताये जाते हैं जो इन तेरह गांवों से प्रभुत्व रखते हैं| (१) सांडी (२) सोहगौरा (३) संरयाँ (४) श्रीजन (५) धतुरा (६) भगराइच (७) बलुआ(८) हरदी (९) झूडीयाँ (१०) उनवलियाँ (११) लोनापार (१२) कटियारी (१३) पिंडी लोनापार में लोनाखार, कानापार, छपरा भी समाहित है इन्ही तेरह गांवों से आज चारों तरफ इनका विकास हुआ है, यें सरयूपारीण ब्राह्मण हैं| इनका गोत्र श्री मुख शांडिल्य- त्रि -प्रवर है ! श्री मुख शांडिल्य में घरानों का प्रचलन है जिसमे राम घराना, कृष्ण घराना, नाथ घराना, मणी घराना है, इन चारों का उदय, सोहगौरा- गोरखपुर से है जहाँ आज भी इन चारों का अस्तित्व कायम है| उप शांडिल्य ( तिवारी- त्रिपाठी, वंश) इनके छ: गाँव बताये जाते हैं जी निम्नवत हैं| (१) शीशवाँ (२) चौरीहाँ (३) चनरवटा (४) जोजिया (५) ढकरा (६) क़जरवटा 5) भार्गव गोत्र (तिवारी या त्रिपाठी वंश) भार्गव ऋषि के चार पुत्र बताये जाते हैं जिसमें चार गांवों का उल्लेख मिलता है जो इस प्रकार है| (१) सिंघनजोड़ी (२) सोताचक (३) चेतियाँ (४) मदनपुर 6) भारद्वाज गोत्र (दुबे वंश) भारद्वाज ऋषि के चार पुत्र बाये जाते हैं जिनकी उत्पत्ति इन चार गांवों से बताई जाती है| (१) बड़गईयाँ (२) सरार (३) परहूँआ (४) गरयापार। कन्चनियाँ और लाठीयारी इन दो गांवों में दुबे घराना बताया जाता है जो वास्तव में गौतम मिश्र हैं लेकिन इनके पिता क्रमश: उठातमनी और शंखमनी गौतम मिश्र थे परन्तु वासी (बस्ती) के राजा बोधमल ने एक पोखरा खुदवाया जिसमे लट्ठा न चल पाया, राजा के कहने पर दोनों भाई मिल कर लट्ठे को चलाया जिसमे एक ने लट्ठे सोने वाला भाग पकड़ा तो दूसरें ने लाठी वाला भाग पकड़ा जिसमे कन्चनियाँ व लाठियारी का नाम पड़ा, दुबे की गादी होने से ये लोग दुबे कहलाने लगें| सरार के दुबे के वहां पांति का प्रचलन रहा है अतएव इनको तीन के समकक्ष माना जाता है| 7) सावरण गोत्र ( पाण्डेय वंश) सावरण ऋषि के तीन पुत्र बताये जाते हैं इनके वहां भी पांति का प्रचलन रहा है जिन्हें तीन के समकक्ष माना जाता है जिनके तीन गाँव निम्न हैं| (१) इन्द्रपुर (२) दिलीपपुर (३) रकहट (चमरूपट्टी) 8) सांकेत गोत्र (मलांव के पाण्डेय वंश) सांकेत ऋषि के तीन पुत्र इन तीन गांवों से सम्बन्धित बाते जाते हैं| (१) मलांव (२) नचइयाँ (३) चकसनियाँ 9) कश्यप गोत्र (त्रिफला के पाण्डेय वंश) इन तीन गांवों से बताये जाते हैं| (१) त्रिफला (२) मढ़रियाँ (३) ढडमढीयाँ ओझा वंश इन तीन गांवों से बताये जाते हैं| (१) करइली (२) खैरी (३) निपनियां चौबे -चतुर्वेदी, वंश (कश्यप गोत्र) इनके लिए तीन गांवों का उल्लेख मिलता है| (१) वंदनडीह (२) बलूआ (३) बेलउजां एक गाँव कुसहाँ का उल्लेख बताते है जो शायद उपाध्याय वंश का मालूम पड़ता है| नोट:- खास कर लड़कियों की शादी- ब्याह में तीन तेरह का बोध किया और कराया जाता है| पूर्वजों द्वारा लड़कियों की शादीयाँ गर्ग, गौतम, और श्री मुख शांडिल्य गोत्र में अपने गाँव को छोड़ कर की जाती रहीं हैं| इटार के पाण्डेय व सरार के दुबे के वहां भी यही क्रम रहा है इन पाँचों में लड़कियों की शादी का आदान-प्रदान होता रहा है, इतर गोत्रो में लड़को की शादियाँ होती रहीं हैं| आज- कल यह अपवाद साबित होने लग पड़ा है| ये सारे गाँव जो बताये गये हैं वें गोरखपुर, देवरियां, बस्ती जनपद में खास कर पाए जातें हैं या तो आस-पास के जिले भी हों सकतें हैं ! ये ब्राह्मण बिहार प्रांत के गोपालगंज,सिवान ,छपरा, चंपारण, बक्सर एवं उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर,मऊ,बनारस, इलाहाबाद , प्रतापगढ़ , जौनपुर,अवध और कन्नौज तक मे भीषण संख्या मे और मध्य .प्रदेश ,गुजरात,बंगाल और झारखंड मे आंशिक संख्या मे है ! समृद्ध समाज होने से सरयूपारीण ब्राह्मण पूरी दुनिया मे फैले हैं और आपस मे बंधुत्व और भाईचारा का रिश्ता रखते हैं और अपनी सनातन साझी विरासत पे गर्व भी करते हैं ! ...

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