सरयूपारीण ब्राह्मण

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  1. श्री_सरयूपारीण_ब्राह्मणजनों_का_उद्गम‼️
  1. गूगल_विकीपीडिया_के_प्रभावादि से बहुत से लोग इस दिग्भ्रमित कथन का समर्थन करते हैं कि,"सरयूपारीणों का उद्गम कान्यकुब्जादि से हुआ है!"

वास्तव में श्री कान्यकुब्ज ब्राह्मणजनों में से किसी एक बंधु ने यह दिगभ्रमित लेख विकीपीडिया पर अपलोड की थी,कि, सरयूपारीण कान्यकुब्जों से निकले हैं!

किंतु वह सर्वथा भ्रामक है! कहने को कुछ भी कह दिए किंतु प्रामाणिक तथ्य नहीं थे!

जबकि वास्तविकता यह है:-

पुराणों से पता चलता हैं कि देवगण हिमालय पर्वत (पामीर का पठार) के आस-पास रहा करते थे तथा उसी के निकट ही महानतम ऋषियों के आश्रम हुआ करते थे। चुकि पुराणों में हिमालय पर्वत श्रृंखला को बहुत ही पवित्र माना गया हैं अतः ऋषियों का वहाँ रहना सम्भव लगता हैं। यदि पौराणिक संदर्भो की ओर देख जाए तो जब देवराज इंद्र का आतिथ्य स्वीकार कर अपने राजधानी को लौटते हुए राजा दुष्यंत ने ऋषियों के परम क्षेत्र हेमकूट पर्वत की ओर देखा था जिसका वर्णन श्री पद्म पुराण में आया हैं :

दक्षिणे भारतम् वर्षः उत्तरे लवणोदधेः। कुलादेव महाभागः तस्य सीमा हिमालयः।। ततः किंपुरूषम् हेमकूटादध: स्थितम्।

हरि वर्षः ततो ज्ञेयं निवधोवधिरुच्यते।।

इसी प्रकार श्री वाराह पुराण के एक प्रसंग में महर्षि पुलस्त्य, धर्मराज युधिष्ठिर से यात्रा के सन्दर्भ में बताते हैं की:

ततो गच्छेत राजेंद्र देविकाम् लोक विश्रुताम। प्रसूतिर्यत्र विप्राणां श्रूयते भारतषर्भ।। देविकायास्तटे वीरनगरं नाम वैपुरम। समृदध्यातिरम्यान्च पुल्सत्येन निवेशितम।।

अर्थात- हे राजेन्द्र लोक विश्रुत देविका नदी को जाना चाहिए जहा ब्राम्हणों कि उत्पत्ति सुनी जाती है। देविका नदी के तट पर वीरनगर नामक सुन्दर पुरी है जो समृद्ध और सुन्दर हैं।

एक अन्य पुराण के सन्दर्भ से निश्चित होता हैं कि देविका नदी के किनारे हेमकूट नामक किम्पुरुष क्षेत्र में ऋषि-मुनि रहा करते थे।

श्री अमरकोश में:-

"देविकायां सरय्वाचं भवेदाविकसरवौ"

अर्थात- देविका और सरयू क्षेत्र के रहने वाले आविक और सारव कहे जाते हैं। अनुमान हैं, की सारव और अवार (तट) के संयोग से सारववार बना होगा, और फिर समय के साथ उच्चारण में सरवार बन गया होगा। इसी सरवार क्षेत्र के रहने वाले सरवरिया कहे जाने लगे होंगे।

इस सम्बन्ध में श्री मत्स्य पुराण में निम्न सन्दर्भ मिलता हैं:

अयोध्यायाः दक्षिणे यस्याः सरयूतटाः पुनः। सारवावार देशोऽयं तथा गौड़ः प्रकीर्तितः।।

अर्थात- अयोध्या के दक्षिण में सरयू नदी के तट पर सरवावार देश हैं उसी प्रकार गोण्डा देश भी मानना चाहिए।

सरयू नदी कैलाश पर्वत से निकल कर विहार प्रदेश में छपरा नगर के समीप नारायणी नदी में मिल जाती हैं। देविका नदी गोरखपुर से ६० मील दूर हिमालय से निकल कर ब्रम्हपुत्र के साथ गण्डकी में मिलती हैं। गण्डकी नदी नेपाल की तराई से निकल कर सरवार क्षेत्र होता हुआ सरयू नदी में समाहित होता हैं। सरयू, घाघरा, देविका (देवहा) ये तीनो नदियाँ एक ही में मिल कर कही-कही प्रवाहित होती हैं। महाभारत में इसका उल्लेख हैं कि सरयू, घाघरा और देविका नदी हिमालय से निकलती हैं, तीनो नदियों का संगम पहाड़ में ही हो गया था। इसीलिए सरयू को कही घाघरा तो कही देविका कहा जाता हैं।

पुराणों के अनुसार यही ब्रम्ह क्षेत्र हैं, जहाँ पर ब्राम्हणों की उत्पत्ति हुई थी यथासमय ब्रम्ह देश से जो ब्राम्हण अन्य देश में गए, वे उस देश के नाम से अभिहित हुए। जो विंध्य के दक्षिण क्षेत्र में गए वे महाराष्ट्रीय, द्रविड़, कर्नाटक और गुर्जर ब्राम्हण के रूप में प्रतिष्ठित हुए। और जो विंध्य के उत्तर देशों में बसे, वे सारस्वत, कान्यकुब्ज, गोंड़, उत्कल, मैथिल ब्राम्हण के रूप में प्रतिष्ठित हुए। इस तरह दशविध ब्राम्हणों के प्रतिष्ठित हो जाने पर ब्रम्हदेश के निवासी ब्राम्हणों की पहचान के लिए उनकी सर्वार्य संज्ञा हो गई। वही आगे चल कर सर्वार्य, सरवरिया, सरयूपारीण आदि कहे जाने लगे।

अतैविति सिद्धं यत्, "श्री विंध्याचल महातीर्थस्य पूर्वोत्तर दिशायां❗ श्री अयोध्या पुरीः।श्री सरयू नद्याः तटे श्री सरयूपारीण ब्राह्मणकुलायस्याहामोद्भवः‼️

अतः जो लोग सरयूपारीण ब्राम्हणों को कान्यकुब्ज की ही एक शाखा कहते हैं, यह एक भ्रांति मात्र हैं।

स्मृतियों में पंक्ति पावन ब्राम्हणों का उल्लेख मिलता हैं। पंक्ति पावन ब्राम्हण सरयूपारीणों में ही होते हैं। जो आज भी पंतिहा या पंक्तिपावन के रूप में विद्यमान हैं।

Source:-【श्री सरयूपारीण ब्राह्मण वंशावली! "तथा" श्री जातिभास्कर!】