मुर्ग़ी का खेल

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खिलाड़ी १ हटा खिलाड़ी १ डरा
खिलाड़ी २ हटा न जीत, न हार खिलाड़ी २ की जीत
खिलाड़ी १ डटा खिलाड़ी १ की जीत भयंकर टकराव - दोनों की मृत्यु
मुर्ग़ी के खेल में दो प्रतिद्वंदियों के नतीजे

मुर्ग़ी का खेल (chicken), जिसे बाज़-बटेर खेल (hawk-dove game) या बर्फ़ के टीले का खेल (snow-drift game) भी कहा जाता है, खेल सिद्धांत में दो प्रतिद्वंदियों के बीच होने वाला एक प्रकार का संघर्ष है। इसमें दोनों के बीच में एक ऐसी प्रतियोगिता शुरू हो जाती है जिसमें दोनों में से कोई भी पीछे नहीं हटना चाहता लेकिन किसी के भी न हटने पर दोनों को भारी हानि होती है।

इसमें 'मुर्ग़ी' का नाम उस खेल से आया है जिसमें दो वाहन-चालक तेज़ी से अपने-अपने वाहन एक-दूसरे की तरफ़ दौड़ते हैं। दोनों में से एक को हार मानकर अलग मुड़ना होगा, वरना टकराव में दोनों की मौत भी हो सकती है। लेकिन जो भी पहले हट गया वह 'मुर्ग़ी', यानि बुज़दिल या डरपोक, माना जाएगा। यह 'मुर्ग़ी का खेल' वाला नाम राजनीति और अर्थशास्त्र में अधिक प्रयोग होता है। मसलन अक्टूबर १९६२ में हुए क्यूबाई मिसाइल संकट में सोवियत संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच तनाव लगातार बढ़ता गया और अगर कोई पीछे न हटता हो परमाणु प्रलय हो सकता था, लेकिन उसमें सोवियत संघ ने पीछे पाँव खींच लिए।[1] जीवविज्ञान में इसे 'बाज़-बटेर का खेल' बुलाया जाता है और उन परिस्थितियों में देखा जाता है जब किसी एक सांझे साधन (जैसे कि जल या अन्न) के प्रयोग के लिए या तो प्रतिद्वंदी सहयोग कर सकते हैं या फिर मुक़ाबला।[2]

इस खेल में अक्सर दोनों खिलाड़ियों के मन में दुविधा बनी होती है। अगर लगे कि दूसरा डरकर हट जाएगा तो डटे रहना चाहिए। जो हट जाता है उसे हुई हानि में दूसरे का अपमान भी शामिल होता है, क्योंकि दूसरा बहादुर लगता है जबकि हटने वाला डरपोक लगता है। लेकिन अगर दोनों यही सोचकर अंत तक डटे रहें तो दोनों का ही भारी नुकसान हो सकता है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Russell (1959) p. 30.
  2. Osborne and Rubenstein (1994) p. 30.