मधुवन

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मधुवन वृन्दावन स्थित यमुना नदी के दुसरे किनारे पर वृन्दावन माँट मार्ग पर यमुना एक्सप्रेसवे और यमुना के मध्य वृन्दावन यमुना पुल से लगभग 3 किलोमीटर उत्तर पूर्व स्थित एक छोटा सा अर्ध चन्द्राकार वन है जिसमें अति प्राचीन सिद्धपीठ राधारानी मंदिर एवं मानसरोवर नामक पवित्र जलाशय स्थित है। मूलतः यह वही स्थान है जहाँ राधा कृष्ण गाय चराने के लिए वृन्दावन से यमुना पार करके प्रायः आया करते थे। इस सघन वन में मधु मक्खियाँ प्रचुर मात्रा में निवास करतीं थीं। इसलिये इस सघन वन का नाम मधुवन पड़ा। कृष्ण इस वन में गौचारण के साथ साथ मधु(शहद) खाने का आनंद लेते थे। राधा ने इसी स्थान पर कृष्ण वियोग में रोते रोते अपने प्राण त्यागे थे। राधा इस कुण्ड में बैठकर कृष्ण वियोग में स्नान के बहाने रोती थीं। उन्हें रोते हुए कोई देख न ले इसलिए मुख पर पानी डालती जातीं थीं। इस अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान के मथुरा वृन्दावन बरसाना गोकुल गोवर्धन दाऊजी (बलदेव) की भाँति किसी भी मुख्य मार्ग से जुड़ा न होने के कारण ये सामान्य जनमानस की पहुँच से दूर ही रहा जिसके परिणाम स्वरूप आज तक यह दिव्य स्थान सरकार एवं समाज की दृष्टि में पूर्णतः उपेक्षित रह गया। मधुवन स्थित राधारानी मंदिर में प्रत्येक पूर्णिमा को मेला लगता है जिसमें केवल स्थानीय ब्रजवासी ही आते हैं। यहीं पर राजा उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव ने 6 मास तक तपस्या करके भगवान विष्णु का दर्शन और वरदान प्राप्त किया था। इस स्थान की दिव्यता का अनुमान इसी तथ्य से लगाया जा सकता है की वृन्दावन में यमुना के एक किनारे पर निधिवन स्थित है जिसमें मधुवन की ओर देखते हुए अकेले बांके बिहारी जी विद्यमान हैं( आज निधिवन शहरीकरण के फलस्वरूप उत्पन्न हुए अतिक्रमण की मार से सिकुड़ गया है। जिसके फलस्वरूप बांके बिहारी मंदिर और निधिवन अलग अलग दिखते हैं जबकि बांके बिहारी मंदिर मूलतः विशाल निधिवन का ही अंग था) और यमुना के दूसरे किनारे पर मधुवन में अकेली राधारानी निधिवन की ओर देखती हुईं विद्यमान हैं। कृषि भूमि के प्रसार हेतु वनों के अवैध कटान एवं अतिक्रमण की मार से आज मधुवन भी निधिवन की ही भांति सांकेतिक वन मात्र रह गया है। कटु सत्य तो यह है कि आज मथुरा वृन्दावन के अधिकांश निवासियों तो निवासियों यहाँ तक कि अधिकांश विद्वानों तक को भी मधुवन और राधारानी के इस दिव्य स्थान के बारे में कुछ अधिक ज्ञान नहीं है। वे तो बस इतना जानते हैं की यहाँ राधा कृष्ण से रुष्ट होकर छिप जाती थी फिर कृष्ण राधा को मनाकर ले जाते थे। मधुवन तो वे वृन्दावन से लगभग 15 किलोमीटर दूर स्थित महौली नामक गाँव को बताते हैं।जिसकी कथा वे सतयुग त्रेतायुग तक से जोड़ डालते हैं। क्योंकि उन गाँवों में आवागमन आसान है जबकि आज भी इस राधारानी नामक दिव्य स्थान पर जाने के लिए यातायात का न तो कोई सार्वजानिक साधन उपलब्ध है और ना ही इसके आस पास कोई बस्ती है। जबकि वृन्दावन स्थित बांके बिहारी मंदिर से सीधे जुगलकिशोर मंदिर होकर देवराहा समाधी यमुना पार के रास्ते अधिकतम दूरी 3 किलोमीटर है। वृन्दावन से इस स्थान पर जाने के लिए "पल्ली पार राधारानी मंदिर" बोलना पड़ता है।