बेहरामजी मलाबारी

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बेहरामजी मेरवानजी मालाबारी (1853–1912) भारत के कवि, प्रकशक, लेखक तथा समाज सुधारक थे। वे स्त्रियों के अधिकारों की रक्षा के प्रबल पक्षधर थे।

परिचय[संपादित करें]

बेहराम जी ने स्त्री समाज को मुक्ति दिलाना अपने जीवन का सिद्धांत बना लिया था। भारतीयता के प्रति होते हुए अन्याय या अधर्म के विरुद्ध दादाभाई नौरोजी की लड़ाई में वह उनके दाहिने हाथ सदृश थे। वह दिनशॉ वाचा के पत्रकार-जीवन और सार्वजनिक जीवन के मार्गदर्शक थे, भारतीय राजाओं की कुशल चाहनेवाले तथा उनके ऐडवाकेट थे। भारतीय जनता में और ब्रिटिश शासकों में भी उन्हें सामयिक विषयों पर लेखनी उठानेवाले अपरिमित बुद्धिसंपन्न व्यक्ति की प्रतिष्ठा प्राप्त थी। इसके अतिरिक्त एक मेधावी कवि, लेखक, विद्वान् और दार्शनिक के रूप में भी उनकी प्रसिद्धि थी क्योंकि वे जनसमूह की अवस्था में सुधार लाने की भावना से प्रेरित थे। आप शासकों और शासितों के बीच तथा पूर्व और पश्चिम के बीच संबंध जोड़नेवाली कड़ी के सदृश थे, जिनके आदर्श उन्नत थे, जो देशभक्ति की तीव्र भावना से प्रेरित थे, जिनके प्रयास स्वार्थरहित थे और जो शांत तथा मौन तरीके से समाजसेवा में रत थे। वह अपने को कोलाहलपूर्ण राजनीति से प्राय: दूर रखते थे।

'इंडियन स्पेक्टेटर' नामक आपकी साप्ताहिक पत्रिका का काफी अच्छा प्रचार था। उसकी आवाज ब्रिटिश साम्राज्य की कौंसिल में और फ्रांस तथा अमरीका के पत्रकार संसार में भी प्रविष्ट होती थी। यद्यपि आर्थिक दृष्टि से उसे असफलता ही मिली, फिर भी मलाबारी इससे निराश नहीं हुए। उन्होंने पत्रकारिता को कभी आय का जरिए अथवा व्यापार के रूप में नहीं देखा। आपका हृदय सदैव गरीबों के साथ था और अपका लक्ष्य था उनका उद्धार और देश का पुनर्निर्माण। आप क्रियाशील राजीतिज्ञ नहीं थे किंतु आप परोपकारी नागरिक थे जिनके अपने पृथक और अविच्छिन्न नागरिक और राजनीतिक क्रियाकलाप थे। इस तरह की सर्वविदित घटनाओं में दादाभाई के (वायस ऑव इंडिया) 'भारत की आवाज़' के प्रकाशन के आत्मत्याग से भरे हुए कार्य में सहयोग देना महत्वपूर्ण है, यह भावना दादाभाई से ही उत्पन्न हुई थी। इंग्लैंड के आपके दीर्घकालीन निवास ने इस भावना से आपको प्रेरित किया कि भारत के कल्याण के प्रति और न्यायपूर्ण सुनवाई के लिए यह आवश्यक है कि 'पब्लिक ओपीनियन' के समकक्ष कोई एक मासिक पत्रिका इंग्लैंड में ही प्रकाशित करवाई जाए। यद्यपि दादाभाई स्वयं ही इंग्लैंड में भारत की आवाज बन गए थे तथापि आपने सोचा कि अपनी आवाज को बुलंद बनाने के लिए ब्रिटिश जनता को अपनी आवश्यकताओं की स्पष्ट रूपरेखा दिखाने के लिए और भारतीय जनता की भावनाओं और इच्छाओं को पूर्ण रूप से उन्हें विदित कराने के लिए ऐसे किसी पत्र का प्रकाशन आवश्यक है। इसलिए दादाभाई ने जब इसका प्रस्ताव किया तो मलाबारी ने उसे प्रसन्नापूर्वक स्वीकार कर लिया। 'वायस ऑव इंडिया' का पहला अंक पहली तारीख, सन् १८८३ को प्रकाशित हुआ। दादाभाई ने उसकी आर्थिक रूप से सहायता की तथा मलाबारी ने दादाभाई की अनुपस्थिति में उसे चलाने का उत्तरदायित्व स्वीकार किया। आर्थिक कठिनाई के कारण १८९० की पहली जनवरी से 'वायस' को 'इंडियन स्पेक्टेटर' के साथ मिला दिया गया।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सत्रारंभ के पश्चात् आपने राष्ट्रीय आंदोलन के लिए सहयोग प्राप्त करने में दादाभाई की सहायता की। आप कांग्रेस के सदस्य न थे और न हो सकते थे, क्योंकि आपने अपने को उस गोल में नहीं शामिल किया, यद्यपि कांग्रेस के दृष्टिकोण और क्रियाकलापों से आप पूर्ण रूप से सहमत थे। आप स्वयं अपने विषय में कहते हैं : मैं किसी एक गुट में प्रवेश नहीं कर सकता। 'इंडियन स्पेक्टैटर' में आपने कहा है:

एक गोलाई में कार्य करो। कांग्रेस आंदोलन अपने स्थूल रूप में मेरे जीवन के स्वप्नों में से एक हैं।..लेकिन तुम यदि मुझे उसके बाहरी प्रतीकों पर गिरने और उसकी पूजा करने के लिए कहो...उसका भारी मंच और वार्षिक दृश्य, उसके प्रस्ताव और बहुसंख्यक मत...इन सबके गौरव अस्वीकार करता हूँ। मैं ऐसा नहीं कर सकता, परंतु ऐसा करने के लिए आपसे झगड़ा नहीं करूँगा। यदि एक शब्द में कहा जाए, यद्यपि मैं प्रकृति से कांग्रेस को प्रयोग में लाने के लिए अयोग्य हूँ, सदैव उसके द्वारा अपने को प्रयोग में लाने के लिए तैयार रहूँगा।

स्वतंत्रता के लिए राष्ट्रीय संघर्ष में सहायता प्रदान करने के लिए जो लोग आगे आए उनमें दक्षिण अफ्रीका के पारसियों में रुस्तम प्रमुख हैं जिनके क्रियाशील सहयोग और उत्साह का गांधी जी ने उदाहरण दिया था। भारत में एस. आर. बोमनजी, जहाँगीर बोमनजी पेटिट, बी. पी. वाडिया, बरजोरजी बरूचा और नारीमन, गांधी जी के असहयोग आंदोलन प्रारंभ करने के पूर्व होम रूल लीग के प्रमुख समर्थकों में थे। गांधी युग की पारसी आकृतियों में प्रमुख और रुचिपूर्ण थीं, वे कुछ पारसी स्त्रियाँ, जो उनके सिद्धांतों के अनुकूल अपने को निरूपित करके दिखलाती थीं। असहयोग और सत्याग्रह की उन समर्थक स्त्रियों में दादाभाई की चार पोतियाँ प्रमुख थीं जिनका नाम क्रमश: गोसप बहन, नरगिस, पेरिन और खुरशीद था। अन्य लोगों में जैजी पेटिट, मित्थू बहन पेटिट और मैडम बिचैजी काया प्रमुख और उल्लेखनीय हैं।

बरजोर जी बरुचा प्रमुख व्यक्ति थे जिन्होंने पारसी राजकीय सभा की स्थापना की और जिन्होंने नवयुवक और नवयुवतियों के मित्र, दार्शनिक और पथप्रदर्शक के रूप में कार्य किया और स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए जिसने राष्ट्रीय स्तर पर प्रयास किया। उन नवयुवकों में, जिन्होंने नागपुर झंडा सत्याग्रह में बरजोरजी का अनुसरण किया, नारीमन, प्रो॰ रुस्तम चौंकसी थे।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]