पुनरावृत्तिमूलक विधि

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संख्यात्मक गणित में पुनरावृत्‍तिमूलक विधि (iterative method) गणना की वह विधि है जिसमें किसी अनुमानित हल से शुरू करते हैं और एक ही सूत्र या कलनविधि का बारबार प्रयोग करते हुए अधिक शुद्ध हल प्राप्त करते हैं। यह हल पुनः उस सूत्र में प्रयुक्त होकर और भी अधिक शुद्ध हल देता है। उदाहरण के लिए किसी समीकरण का मूल निकालने के लिए या इष्टतमकरण के लिए इसका प्रयोग किया जाता है।

पुनरावृत्तिमूलक विधियों के विपरीत एक ही चरण में हल प्रदान करने वाली विधियों को प्रत्यक्ष विधि (डाइरेक्ट मेथड) कहते हैं। उदाहरण के लिए, रैखिक समीकरणों के निकाय Ax = b का हल प्रत्यक्ष विधि से निकालने के लिए A का इन्वर्स मैट्रिक्स निकाला जाता है।)

कम्प्यूटर प्रोग्रामों में इन पुनरावृत्‍तिमूलक विधियों का बहुत ही दक्षता से उपयोग करके गणितीय समस्याओं के हल निकाले जाते हैं। न्यूटन विधि, गाउस-साइडल विधि सहित अनेकों विधियाँ इस वर्ग में आती हैं।

पुनरावृत्तिमूलक विधियाँ कहाँ अधिक उपयोगी होती हैं?

  • जब प्रत्यक्ष विधियाँ ज्ञात न हों या दक्षतापूर्वक गणना न कर पाती हों,
  • समस्या ठीक से पारिभाषित या अनुकूलित नहीं है (ill-conditioned) तथा इसमें बहुत बड़ी संख्या में चर राशियाँ उपस्थित हैं।

किन्तु पुनरावृत्तिमूलक विधियों में अपसार (divergence) की समस्या हो सकती है या बहुत धीमी गति से अभिसार की समस्या आ सकती है। अतः किसी पुनरावृत्तिमूलक विधि के अभिसार की शर्तों का अध्ययन एक बहुत महत्वपूर्ण और विशाल क्षेत्र है।

कुछ पुनरावृत्तिमूलक विधियाँ[संपादित करें]

  • गाउस-न्यूटन कलनविधि का प्रयोग लीस्ट-स्क्वायर समस्या का हल निकालने के लिए किया जाता है जिसमें समीकरणों की संख्या अज्ञात चरों की संख्या से अधिक होती है।
  • समीकरण f (x) = 0 का हल
नियत-बिन्दु विधि (fixed point method)
न्यूटन विधि
छेदिका विधि (Secant method)
समानुपाती भागों की विधि (Method of proportional parts)
  • रैखिक समीकरणों का हल
गाउस-साइडल विधि
एसक्यूआर विधि (SOR method /successive over-relaxation)
पॉवर विधि
जैकोबी विधि

इन्हें भी देखें[संपादित करें]