पद्मनाभदत्त

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आचार्य पद्मनाभदत्त एक वैयाकरण थे। पाणिनि के उत्तरवर्ती वैयाकरणों में उनका महत्त्वपूर्ण स्थान है। इनके द्वारा रचित 'सुपद्मव्याकरण' का व्याकरण ग्रन्थों में स्थान महत्त्वपूर्ण है। सुपद्मव्याकरण पाणिनीय अष्टाध्यायी के अनुकरण पर रचित एक लक्षण ग्रन्थ है। यह व्याकरण बंगाली वर्णमाला के अक्षरों में, विशेषकर बंगाल निवासियों के भाषाज्ञान के लिए लिखा है।

पद्मनाभदत्त ने बंग प्रान्तीयों के लिए संस्कृत व्याकरण की जटिलता को दूर करके, सुगम्य बनाने के लिए बंगाली लिपि में सुपद्मव्याकरण की रचना की। इन्हों ने केवल व्याकरणिक ग्रन्थों का ही प्रणयन नहीं किया बल्कि साहित्यिक ग्रन्थों की भी रचना की। पद्मनाभदत्त का प्रमुख उद्देश्य संस्कृत व्याकरण का स्पष्ट तथा सरलतम ढंग से ज्ञान कराना तथा भाषा के विकास में आए नए-नए शब्दों का संस्कृतिकरण करना था, जो आज भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है।

जीवन परिचय[संपादित करें]

पद्मनाभदत्त का जन्म मिथिला के एक ब्राह्मण वंश में 14वीं शताब्दी में हुआ। इनके पिता का नाम दामोदरदत्त और पितामह का नाम श्रीदत्त था। इनकी वंश परम्परा वररुचि से प्रारम्भ होती है, जो कालिदास के साथ विक्रमादित्य के राजकवि थे। वि॰सं॰ 1427 में पद्मनाभदत्त ने अपनी ‘पृषोदरादिवृत्ति’ नामक ग्रन्थ में ‘शाके शैले नवादित्ये’ में अपने वंश का परिचय दिया जो दुर्भाग्यवश वर्तमान में अनुपलब्ध है। पं. हरप्रसादशास्त्री ने लिखा है कि पद्मनाभदत्त ‘भोरग्राम’ के निवासी थे जो दरभंगा के कुछ मील दूरी पर स्थित था।

वंश परम्परा स्वयं पद्मनाभदत्त ने अपनी ‘पृषोदरादिवृत्ति’ रचना के प्रारम्भ में अपनी वंश परम्परा के विषय में पाँच पंक्तियों में लिखा था, जो वर्तमान में अनुपलब्ध है। पद्मनाभ द्वारा ही रचित परिभाषावृत्ति शक् 1714 के हस्तलेख, जो बंगाल की ‘एशियाटिक सोसाइटी’ में सुरक्षित है। पं. हरप्रसाद शास्त्रा ने Descriptive catalogs of Sanskrit manuscript के षष्ठ अध्याय में लिखा है-

राजा विक्रमादित्य के राज्य में कालिदास आदि अनेक कवि थे उनमें वररुचि सभी शास्त्रों में निपुण थे, उनके पुत्र का नाम न्यासदत्त था जो फणिभाष्य के अर्थतत्त्व को जानने वाले थे। उनसे दुर्घट उत्पन्न हुए वे पाणिनीय अर्थतत्त्व के ज्ञाता थे, दुर्घट के पुत्र का नाम जयादित्य था, जो मीमांसाशास्त्रा में पारंगत थे। उनके पुत्र सांख्यशास्त्र के ज्ञाता श्रीपति और श्रीपति के पुत्र गणेश्वर काव्यशास्त्रा में पारंगत थे, गणेश्वर के यहाँ भानुभट्ट नामक पुत्रा हुआ, जो ‘रसमंजरी’ के कर्त्ता कह लाये, भानुभट्ट के पुत्र हलायुध हुए जो मीमांसाशास्त्रा में पारंगत थे। हलायुध के पुत्र श्रीदत्त थे। जो स्मृतिशास्त्र के अर्थतत्त्ववित् माने जाते हैं। उनके पुत्र भवदत्त हुए जो वेदान्ती थे तथा कवियों में उत्तम कवि माने जाते थे। भवदत्त से काव्यालंकार के रचयिता दामोदर दत्त तथा दामोदरदत्त के पुत्र पद्मनाभदत्त हुए।

पद्मनाभदत्त के वंश परम्परा का वंशवृक्ष इस प्रकार बनाया जा सकता है।

वररुचि (कालिदास के समकालीन) --> न्यासदत्त (फणिभाष्यार्थ तत्त्ववित् ) --> जयादित्य (मीमांसक) --> श्रीपति (सांख्यशास्त्री) --> गणेश्वर (काव्यशास्त्री)
--> भानुभट्ट (रसमंजरीकर्त्ता) --> हलायुध (मीमांसाशास्त्र) --> श्रीदत्त (स्मृतिशास्त्र) --> भवदत्त (वेदान्ती-कवि) --> दामोदरदत्त (काव्यालंकार-कर्ता) --> पद्मनाभदत्त

इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि पद्मनाभदत्त दामोदर के पुत्र तथा भवदत्त के पौत्र थे उनके प्रपितामह श्रीदत्त थे।

स्थिति काल[संपादित करें]

12वीं शताब्दी के प्रारम्भ में कर्नाटकीय राज्य का अन्त हो जाने पर उस समय मिथिला पर ब्राह्मण राजवंशीय नान्यादेव का शासन था। पद्मनाभदत्त का जन्म 14वीं शताब्दी में मिथिला में हुआ था। इसके अतिरिक्त पद्मनाभदत्त ने अपनी ‘पृषोदरादिवृत्ति’ रचना में अपने जन्मकाल के विषय में लिखा है- ‘शाके शैले नवादित्ये’ (शक सं. 1297-1375) उन्होंने अपनी पृषोदरादिवृत्ति की रचना (वि॰सं॰ 1427) में की थी। अतः इन कारणों से उनका जन्मकाल 14वीं शताब्दी माना जाता है।

रचनाएँ[संपादित करें]

पद्मनाभदत्त ने व्याकरणिक और सा हित्यिक ग्रन्थों की रचना की थी।

व्याकरणिक ग्रन्थ
सुपद्मव्याकरण, प्रयोगदीपिका, उणादिवृत्ति, धातुकौमुदी, यङलुगादिवृत्ति, परिभाषावृत्ति।
साहित्यिक ग्रन्थ
गोपालचरितम्, छन्दोरत्न, आचारचन्द्रिका, आनन्दलहरी भूरिप्रयोगकोश।

प्रयोगदीपिका[संपादित करें]

पद्मनाभदत्त ने अपनी प्रसिद्ध रचना सुपद्मव्याकरण पर प्रयोगदीपिका नामक टीका की रचना की है। इसमें छात्रों की सुगमता के लिए कारक, सन्धि, समास, कृत तथा तद्धित प्रकरणों को उदाहरण-सहित स्पष्ट किया है, यह वृत्ति इन शब्दों के साथ प्रारम्भ होती है-

वरदं माध्वं नत्वा बालबोधय दीपिका
एषा सुपद्मकारेण प्रयोगानां विनिर्मिता।
कारकाणां च सन्धीनां समासानां समुच्चयः
कृतां च तद्धितानां च समासेनात्रकीर्तितः॥

उणादिवृत्ति[संपादित करें]

पद्मनाभदत्त ने उणादिसूत्रों पर ‘उणादिवृत्ति’ की रचना की। यह वृत्ति दो अध्यायों में स्वर प्रकरण तथा व्यंजन प्रकरण में समाहित है। उन्होंने यद्यपि उणादियों पर ‘पृषोदरादिवृत्ति’ की रचना स्वतन्त्रा रूप से की है। उणादिवृत्ति की रचना पद्मनाभदत्त ने शक् 1432 में की थी। इस रचना में उनकी वंश-परम्परा के विषय में भी वर्णन उपलब्ध होता है।

यंलुगादिवृत्ति[संपादित करें]

पद्मनाभदत्त ने अपनी ‘यङलुगादिवृत्ति’ रचना में ‘यं’ प्रत्यय का धातुओं के साथ विधान को स्पष्ट किया गया है। इस वृत्ति में 240 श्लोक हैं जो उन्नीसवीं शताब्दी के बंगाली हस्तलेखों में सुरक्षित उपलब्ध होते हैं।यंलुगादिवृत्ति का प्रारम्भ निम्न शब्दों से होता है जिससे इसकी रचना के उद्देश्य का पता चलता है-

प्रणम्य बालगोपालं पिबन्तं नवनीतकम्।
द्विजश्रीपद्मनाभेन यंलुको वृत्तिरूच्यते।।

पद्मनाभदत्त ने अपनी यंलुगादिवृत्त रचना के पूर्ण हो जाने पर उसके अन्त में संक्षेप में लिखा है कि उन्होंने इसमें किस-किस भाग को उद्धृत किया है-

यदेवं व्याख्याते। दशगणपरिपठितः, शब्विकरणा भूवादयः,
अशब्विकरणा अदादयः। एवं क्रयादयः, सनाद्यन्ताश्चेति।
चकारान्नामधतोर्ग्रहणम्। तेन पुत्राकाम्यतीत्यादि।

धातुकौमुदी[संपादित करें]

पद्मनाभदत्त की रचनाओं के क्रम में धातुकौमुदी पर दृष्टि डालने से ज्ञात होता है कि यह सुपद्म व्याकरण का एक सहायक ग्रन्थ है। इस पर ‘धतु-निर्णय’ नाम्नी टीका लिखी गई है। यह रचना ‘गणपंक्तिका’ के नाम से भी जानी जाती है, धातुकौमुदी में पद्मनाभ ने अनेक आचार्यों का नाम लिया है- हलायुध, गोविन्दभट्ट, भट्टि, दुर्ग, त्रिलोचना, मैत्रेयी-रक्षिता तथा बोपदेव।

परिभाषावृत्ति[संपादित करें]

परिभाषावृत्ति में सुपद्म व्याकरण के सूत्रों की व्याख्या की गई है। इस वृत्ति में 750 से 800 परिभाषाएँ है जिनकी व्याख्या उन्होंने स्वयं साथ-साथ की है। इस वृत्ति के प्रारम्भिक हस्तलेख ‘रॉयल एशियाटिक सोसाइटी’ में सुरक्षित है, जिनका संकलन शक् 1641, 1698, 1714 और 1722 में किया गया है। इन सभी हस्तलेखों से पद्भनाभदत्त की वंश-परम्परा के साथ-साथ उनकी कृतियों के विषय में भी जानकारी मिलती है।

पृषोदरादिवृत्ति[संपादित करें]

पाणिनि ने अपनी अष्टाध्यायी में ‘पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम्’ सूत्र से शब्दों के ऐसे समूह के विषय में बताया गया है जिसके लोप, आगम, वर्ण तथा विकास का शास्त्र निर्देश नहीं किया गया है, वे शब्द पाणिनि द्वारा उपदिष्ट होने पर साधु दिखाई पड़ते हैं। यथा- पृषोदरम्, बलाहकः, जीमूतः, पिशाचः इत्यादि

सुबन्तप्रक्रिया[संपादित करें]

सुबन्तप्रक्रिया भी पद्मनाभदत्त द्वारा रचित संस्कृत व्याकरण की एक रचना है इसकी रचना 500 श्लोकों में की गई है। सुबन्त-प्रक्रिया के प्रारम्भ में देवी सरस्वती की उपासना की गई है। तथा इसमें किस-किस विषय का प्रतिपादन किया गया है- इसके विषय में भी सूक्ष्म जानकारी मिलती है।

ॐ नमः सरस्वत्यै ये धावतः सन्ति गणान्तरेषु वर्णार्थनिर्देश पदैरभिन्नाः विभिन्नशब्दप्रतिपादनार्थं रूपाणि तेषां समुदाहरिण्ये।

सुपद्मव्याकरण[संपादित करें]

सुपद्मव्याकरण संस्कृत व्याकरण पाणिनीयेतर परम्परा में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। पद्मनाभदत्त ने सुपद्म नामक एक संक्षिप्त व्याकरण लिखा था। इसकी उणादिवृत्ति में सुपद्मनाभ नाम मिलता है-

सुपद्मनाभेन सुपद्म सम्मतं, विधिः समग्रः सुगमं समस्यते।

उपलब्ध प्रमाणों के अनुसार उन्हों ने इस पाणिनीयेतर व्याकरण को बंगाल प्रान्त में बंगाली वर्णमाला के अक्षरों में और विशेषकर बंगप्रान्तीय निवासियों के लाभ के लिए लिखा। सुपद्मव्याकरण में 2800 सूत्र मिलते हैं। पद्मनाभदत्त ने वैदिक संस्कृत से सम्बन्धित सूत्रों का उल्लेख अपने व्याकरण में नहीं किया है। सुपद्मव्याकरण में प्रकरणानुसार सूत्रों को अध्यायों एवं पादों में नियोजित किया गया है। इसके पाँच अध्यायों में कुल 2800 सूत्र हैं जो प्रत्येक अध्याय में चार पाद की व्यवस्था से बीस पादों में विभक्त है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]