तारापीठ

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तारापीठ
Tarapith
তারাপীঠ
नगर व तीर्थ
तारापीठ मंदिर
तारापीठ मंदिर
तारापीठ is located in पश्चिम बंगाल
तारापीठ
तारापीठ
पश्चिम बंगाल में स्थिति
निर्देशांक: 24°07′N 87°48′E / 24.11°N 87.80°E / 24.11; 87.80निर्देशांक: 24°07′N 87°48′E / 24.11°N 87.80°E / 24.11; 87.80
ज़िलाबीरभूम ज़िला
प्रान्तपश्चिम बंगाल
देश भारत
जनसंख्या (2011)
 • कुल7,125
भाषाएँ
 • प्रचलितबंगाली
निकटतम शहररामपुरहाट
वेबसाइटbirbhum.nic.in

तारापीठ (তারাপীঠ) भारत के पश्चिम बंगाल राज्य के बीरभूम ज़िले में स्थित एक छोटा शहर है।[1][2]

विवरण[संपादित करें]

पूर्वी रेलवे के रामपुर हाल्ट स्टेशन से चार मील दूरी पर स्थित है तारा पीठ। बंगाल क्षेत्र की प्रसिद्द देवी तारा की पूजा का प्रमुख केन्द्र होने के कारण ही इसका नाम तारापीठ है।[3][4][5][6]

रामकृष्ण के समकालीन ही वामाक्षेपा, तारा पीठ के सिद्ध अघोरी परम भक्त थे।[7] तारा पीठ (महापीठपुराण के अनुसार) ५२ शक्तिपीठों के अन्तर्गत माना गया है।[4][5][8]

मिथक[संपादित करें]

यहाँ आसपास के क्षेत्रों को सम्मिलित कर लिया जाय तो तारापीठ तीन हैं। कथा के अनुसार दक्षयज्ञ में ना बुलाये जाने से और स्वयं पहुँचने के बाद उपेक्षा के कारण अपमानित होने बाद सती ने यज्ञकुण्ड में कूद कर आत्मदाह कर लिया था। शिव ने दुःख और क्रोध में वहाँ पहुँचकर यज्ञभंग कर दिया और सती के शव को लेकर दुःखमें डूबे इधर-उधर घूमते फिर रहे थे जिससे उबारने के लिये विष्णु ने सती के शव को अपने चक्र से टुकड़ों में काट कर छितरा दिया। यह माना जाता है कि शक्तिपीठों की स्थापना उन्हीं स्थानों पर हुई है जहाँ जहाँ सती के अंग पृथ्वी पर गिरे थे।[4]

इस कथा के मुताबिक सती के देवी के तीनों नेत्रों के तारक बतीस योजन के त्रिकोण का निर्माण करते हुए तीन विभिन्न स्थानों पर गिरे थे। जहाँ, वैद्यनाथ धाम के पूर्व दिशा में उत्तर वाहिनी, द्वारका नदी के पूर्वी तट पर महाश्मशान में श्वेत शिमूल के वृक्ष के मूलस्थान में सती का तीसरा (ऊर्ध्व) नेत्र गिरा था, उसी जगह यह उग्रतारा पीठ स्थित है।[9] इसके आलावा अन्य दो तारापीठ भी हैं। मिथिला के पूर्व दक्षिणी कोने में, भागीरथी के उत्तर दिशा में, त्रियुगी नदी के पूर्व दिशा में "सती" देवी के बाँये नेत्र की मणि गिरी, तो यह स्थान "नील सरस्वती" तारा पीठ के नाम से प्रसिद्ध हैं। बगुड़ा जिले के अन्तर्गत "करतोया नदी के पश्चिम में दाँईं मणि गिरी, तो यह स्थान "एक जटा तारा" और भवानी तारा पीठ के नाम से विख्यात हैं।

एक अन्य कथा इसे गौतम बुद्ध के बुद्धावतार से भी जोड़ती है। तारा की उपासना तिब्बती बौद्ध समुदाय में काफ़ी प्रचलित है।

वामाक्षेपा[संपादित करें]

वामाक्षेपा, या बंगला भाषा में, बामाखेपा उन्नीसवी सदी के एक संत थे जो तारापीठ के उपासक और साधक के रूप में जाने जाते हैं।[10]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "Lonely Planet West Bengal: Chapter from India Travel Guide," Lonely Planet Publications, 2012, ISBN 9781743212202
  2. "Kolkata and West Bengal Rough Guides Snapshot India," Rough Guides, Penguin, 2012, ISBN 9781409362074
  3. "Tarapith". Birbhum District: Government of West Bengal. मूल से 4 जुलाई 2010 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 2010-06-24.
  4. "Bakreshwar, Tarapith". राष्ट्रीय सूचना-विज्ञान केन्द्र: Government of India. मूल से 16 फ़रवरी 2010 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 2010-06-24.
  5. "Personalised Puja at the Holy Tarapith Temple". Kalighat.net. मूल से 27 मई 2010 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 2010-06-26.
  6. Kinsley p. 61
  7. Harding, Elizabeth U. (1998). Kali: the black goddess of Dakshineswar. Motilal Banarsidass Publ. पपृ॰ 275–279. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 81-208-1450-9. मूल से 26 अक्तूबर 2012 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 2010-06-26.
  8. Kinsley p. 61
  9. गुप्ता, गोपालजी. वेद और पुराणों में वर्णित महाशक्तियाँ और उनके ५१ शक्तिपीठ. मूल से 4 मार्च 2016 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 1 जून 2015.
  10. "भारतीय संस्कृति कोश में". मूल से 5 मार्च 2016 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 1 जून 2015.