गढ़वाल में धर्म

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गढ़वाल में निवास करने वाले व्यक्तियों में से अधिकांश हिन्दू हैं। यहाँ निवास करने वाले अन्य व्यक्तियों में मुस्लिम, सिख, ईसाई एवं बौद्ध धर्म के लोग सम्मिलित हैं। गढ़वाल का अधिकांश भाग पवित्र भू-दृश्यों एवं प्रतिवेशों से परिपूर्ण है। उनकी पवित्रता देवताओं/पौराणिक व्यक्ति तत्वों, साधुओं एवं पौराणिक एतिहासिक घटनाओं से सम्बद्ध है। गढ़वाल के वातावरण एवं प्राकृतिक परिवेश का धर्म पर अत्याधिक प्रभाव पडा है। विष्णु एवं शिव के विभिन्न स्वरुपों की पूजा सम्पूर्ण क्षेत्र में किये जाने के साथ-2 इस पर्वतीय क्षेत्र में स्थानीय देवी एवं देवताओं की भी बहुत अधिक पूजा-अर्चना की जाती है। कठिन भू-भाग एवं जलवायु स्थितयों के कारण पहाडों पर जीवन कठिनाइयों एवं आपदाओं से परिपूर्ण है। भय को दूर करने के लिए यहाँ स्थानीय देवी देवताओं की पूजा लोकप्रिय है।

यहां सभी हिन्दू मत हैं: वैष्णव, शैव एवं शाक्त।

गढ़वाल में निवास करने वाले व्यक्तियों में से अधिकांश हिन्दू हैं। यहाँ निवास करने वाले अन्य व्यक्तियों में मुस्लिम, सिख, ईसाई एवं बौद्ध धर्म के लोग सम्मिलित हैं। धर्म के आधार पर गढ़वाल के निवासियों की जनसंख्या विभाजन निम्न है।

  • हिन्दू 92.0%
  • सिख 2.5%
  • मुस्लिम 2.0%
  • ईसाई 2.0%
  • अन्य 1.5%

पवित्र भू-दृश्य एवं प्रतिवेश[संपादित करें]

गढ़वाल का अधिकांश भाग पवित्र भू-दृश्यों एवं प्रतिवेशों से परिपूर्ण है। उनकी पवित्रता देवताओं/पौराणिक व्यक्ति तत्वों, साधुओं एवं पौराणिक एतिहासिक घटनाओं से सम्बद्ध है। इन भू-दृश्यों के कुछ उदाहरण निम्न प्रलेख में दर्शाये गये हैं।

  • गंगोत्री उस पौराणिक स्थल से सम्बद्ध है जहाँ से पवित्र गंगा पृथ्वी पर अवतरित हई।
  • जौनसार बाबर क्षेत्र में लखमण्डल नामक स्थान के बारे में यह विश्वास है कि यही वह स्थल है जहाँ दुर्योधन ने पान्डवों को लाख से बने मकान में जला कर मारने का प्रयास किया था।
  • अगस्त्य, कपिल, पाराशर, दत्तात्रेय एवं विश्वामित्र नामक साधू अगस्त मुनि, श्रीनगर, पार-कान्डी, देवलगढ एवं रुद्रप्रयाग नगरों से सम्बद्ध हैं।
  • सिखों के गुरू गोविन्द सिंह ने ऊपरी हिमालय में हेमकुण्ड नामक स्थल पर तपस्या की थी।
  • गढ़वाल के अनेकों स्थल जैसे [देवप्रयाग, लक्ष्मण झूला, ऋषिकेश,तपोवन, मुनि की रेती, कर्ण प्रयाग एवं पाण्डुकेश्वर पाण्डवों से सम्बद्ध हैं।
  • सम्पूर्ण विश्व में निवास करने वाले हिन्दुओं के लिए पूजनीय अनेकों मन्दिर गढ़वाल में स्थित हैं। इन मन्दिरों में बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग एवं वाकेश्वर इत्यादि प्रमुख हैं।
  • विभिन्न देवी देवताओं के सैकडों मन्दिर पर्वतीय क्षेत्रों के समस्त भागों में स्थित पहाडियों के शिखरों पर स्थापित है। उदाहरणतः सरकण्डा देवी, तुंगनाथ रुद्रनाथ, किनकेउलेश्वर एवं अनसूय्या माता इत्यादि
  • पवित्र गंगा नदी गढ़वाल से उदगमित होती है तथा मैदानी क्षेत्रों में प्रवेश करने से पूर्व गढ़वाल में प्रवाहित होती है। गंगा एवं इसकी सहायक नदियों के तट पर अनेकों पवित्र नगर जैसे ऋषिकेश, देवप्रयाग, गौमुख, उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग एवं बद्रीनाथ स्थापित है।

धर्म पर वातावरण का प्रभाव[संपादित करें]

गढ़वाल के वातावरण एवं प्राकृतिक परिवेश का धर्म पर अत्याधिक प्रभाव पडा है। विष्णु एवं शिव के विभिन्न स्वरुपों की पूजा सम्पूर्ण क्षेत्र में किये जाने के साथ-2 इस पर्वतीय क्षेत्र में स्थानीय देवी एवं देवताओं की भी बहुत अधिक पूजा-अर्चना की जाती है। कठिन भू-भाग एवं जलवायु स्थितयों के कारण पहाडों पर जीवन कठिनाइयों एवं आपदाओं से परिपूर्ण है। भय को दूर करने के लिए यहाँ स्थानीय देवी देवताओं की पूजा लोकप्रिय है। यहाँ के लोगों में यह विश्वास है कि देवता लोगों की विभिन्न खतरों (जैसे खडी पहाडी से गिरना, या तीव्र बाढ में बह जाना) से रक्षा कर सकते हैं। गढ़वाल में स्थापित शिक्षित एवं अशिक्षित दोनो प्रकार के अधिकांश व्यक्ति शिव, विष्णु एवं शक्ति के साथ-2 स्थानीय देवताओं की पूजा करते हैं। बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री एवं यमुनोत्री के मन्दिरों के लिए पवित्र मार्गों के अन्वेषण एवं विकास करने वाले हमारे पूर्वजों ने गढ़वाल के पर्वतीय वातावरण के प्रति लोगों में सम्मान, भय एवं श्रद्धा को विकसित किया।

विश्वास है कि स्थानीय देवी देवता निम्न सांस्कृतिक प्रतिवेश में निवास करते हैं।

  • उच्च पर्वतीय दर्रों पर्वत श्रेणियों के शिखरों पर
  • गर्जन करते जल प्रपातों पर
  • हिमाच्छित पर्वत शिखरों पर जिनके शिखर आसमान को छूते प्रतीत होते हैं।
  • नदियाँ, झरने एवं धाराएं नदियों एवं धाराओं के उदगम
  • नदियों एवं धाराओं के उदगम स्थल
  • स्थल, जहाँ पूर्व में साधू महात्माओं ने तपस्या की थी।

प्रवसन एवं धर्म[संपादित करें]

मानव जातियों के विभिन्न समूहों के प्रवसन ने गढ़वाल की धार्मिक श्रद्धा एवं क्रिया कलापों को प्रभावित किया है। इस प्रभाव को निम्न बिन्दुओं में विस्तृत रूप में समझाया गया है।

  • अधिक ऊँचाई वाले क्षेत्रों एवं दुष्कर घाटियों में निवास करने वाले लोग आज भी धर्म के अपने विशिष्ट एवं मूल स्वरुप का निर्वाह कर रहे हैं।
  • गढ़वाल के ऊपरी भागों में बुद्ध धर्म का गहरा प्रभाव पडा है क्योंकि इन क्षेत्रों के निवासियों का प्रवसन तिब्बत से हुआ है। इन व्यक्तियों का तिब्बत से सम्बन्ध है जहाँ पर बौद्ध धर्म के एक विशिष्ट स्वरुप प्रचलित है।
  • सर्प पूजा में विश्वास रखने वाले लोग गढ़वाल की अनेकों आन्तरिक घाटियों में बस गये हैं। वर्तमान में अनेकों लोग इस धर्म से जुड गये हैं।
  • महासू देवता की पूजा करने वाले पश्चिम के अनेकों प्रवासी लोग गढ़वाल में यमुना एवं टौन्स नदियों की घाटियों में बस गये हैं। इन लोगों ने अपनी एक स्वतन्त्र पहचान स्थापित कर ली है।
  • शैव मत एवं शक्तिस्म गढ़वाल में धर्म के प्राचीन आधार है। इस पर्वतीय क्षेत्र के/से प्रवासी लोगों को इन धर्मों ने अत्यधिक प्रभावित किया है।

गढ़वाल का धार्मिक विश्वास[संपादित करें]

गढ़वाल में निवास करने वाले प्रमुख हिन्दू जनमानस के मूल धार्मिक विश्वास की चर्चा निम्न प्रलेखों में की गई है।

शैव मत[संपादित करें]

भगवान शिव की पूजा को गढ़वाल के लोगों के मूल धार्मिक विश्वास में से एक माना जाता है। गढ़वाल के विभिन्न भागों में लगभग 350 शिव मन्दिर स्थापित हैं।

गढ़वाल की उत्तरी पर्वतीय दीवार में सींग के आकार के शिखरों के स्वरुप के आधार पर शिवलिंग के प्रतीक चिन्ह स्थापित किये गये हैं। नित्यानन्द एवं कुमार (1989) ने वर्णित किया है कि अत्याधिक जटिल हिन्दू धर्म में इन समस्त स्थानीय धर्मों के स्वांगीकरण में सुधार एवं विस्तार द्वारा पर्वतीय क्षेत्रों के लोगों के समस्त लोकप्रिय देवताओं को शैव मत की विशाल छाया के अन्तर्गत लाया गया जिसके परिणामस्वरुप पूर्व वैदिक, वैदिक एवं बुद्धिस्ट वर्ग के लोगों का असाधारण सम्मिश्रण हुआ। भगवान शिव समस्त बेतालों, दैत्यों, पिशाचों एवं आत्माओं से सम्बद्ध होने के साथ-2 इन समस्त व्यक्तियों से भी सम्बद्ध है जो आदिवासी धर्मों से जुडे हैं। भगवान शिव से सम्बद्ध देवताओं को धर्म के संरक्षक के रूप में भी जाना जाता है। ये देवता भगवान शिव के मन्दिरों के द्वारपाल हैं। भैरो भगवान शिव के अधिकांश मन्दिरों के रक्षक हैं। इसके अतिरिक्त तुंगनाथ मन्दिर बद्रीनाथ एवं केदारनाथ नामक प्रमुख मन्दिरों के रक्षक क्रमशः काल भैरव, धन-तकारना एवं भैरव हैं। गढ़वाल में स्थापित प्रमुख शिव मन्दिर केदारनाथ, भद-महेश्वर, तुंगनाथ, रुद्रनाथ, कालपेश्वर, उत्तरकाशी, गोपेश्वर, यमुनोत्री, श्रीनगर, पौडी, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, सोनप्रयाग एवं देवप्रयाग नामक स्थलों पर स्थित है।

शाक्त मत[संपादित करें]

देवी दुर्गा एवं उसके विभिन्न स्वरुपों की पूजा शक्तिस्म के रूप में की जाती है। देवी को गढ़वाल की पहाडियों के विभिन्न भागों में विस्तृत रूप में पूजा जाता है। नित्यानन्द एवं प्रसाद (1989) के अनुसार दुर्गा एवं इसके विभिन्न स्वरुपों के लगभग 150 मन्दिर गढ़वाल में स्थित है।

गढ़वाल के विभिन्न स्थानों पर स्थापित दुर्गा एवं उसके विभिन्न स्वरुपों के महत्वपूर्ण मन्दिर निम्न हैं।
  • मन्दाकिनी घाटी में कालीमठ नामक स्थल पर स्थित महाकाली, महासरस्वती, महालक्ष्मी एवं हरगौरी मन्दिर
  • धनौल्टी (मसूरी) के निकट स्थित सरकन्डा देवी मन्दिर
  • हिन्डोलाखाल-टिहरी मार्ग पर स्थित चन्द्रवदनी देवी मन्दिर
  • कालीफट में फांगू का दुर्गा मन्दिर
  • बिचाला नागौर में स्थित दुर्गा मन्दिर
  • तल्ला उदयपुर में स्थित भवानी मन्दिर
  • कल्बंगवारा दुर्गा मन्दिर जहाँ देवी ने रक्तबीज का वध किया था
  • बिरौन, बिचला नागपुर एवं उदयपुर पट्टी (खेरा) में स्थित चामुन्डा देवी मन्दिर
  • श्रीनगर में स्थित ज्वालपा देवी मन्दिर
  • तपोवन में स्थित गौरी मन्दिर
  • जोशीमठ में स्थापित नवदुर्गा मन्दिर
  • श्रीनगर एवं अजबपुर (देहरादून) में स्थित शीतला देवी मन्दिर
  • बसन्त ऋतु में एवं दशहरे से ठीक पहले शरद ऋतु में नौ दिनो तक देवी दुर्गा की पूजा पूर्ण श्रृद्धा के साथ की जाती है। इन नौ दिनो को नवदुर्गा के नाम से जाना जाता है एवं इन दिनो को विवाह एवं अन्य मांगलिक कार्यों के लिए अत्याधिक शुभ माना जाता है।

वैष्णव मत[संपादित करें]

भगवान विष्णु को वैष्णव मत के रूप में जाना जाता है। बद्रीनाथ को भगवान विष्णु का मुख्य धाम माना जाता है। यह विश्वास है। कि ईसा सम्वत के प्रारम्भ से पूर्व से ही बद्रीनाथ पवित्र तीर्थयात्रा का एक प्रमुख स्थल था। अनेकों पवित्र ग्रन्थों जैसे महाभारत में भी बद्रीनाथ का वर्णन किया गया है। पाणिनी ने बद्रीनाथ एवं केदारनाथ दोनो तीर्थ स्थलों को पूर्ण विकसित तीर्थ स्थलों के रूप में सन्दर्भित किया है।

जब आदिगुरु शंकराचार्य बद्रीनाथ आये थे तब वहाँ भगवान विष्णु (बद्री विशाल) की प्रतिमा अविद्यमान पाई गई। उत्तर में तिब्बतियों के पुनः आक्रमण की निरन्तर धमकियों के कारण मन्दिर के पुजारियों ने प्रतिमा को नारद कुण्ड में फेंक दिया था। प्रतिमा को पुनः प्राप्त करके शंकराचार्य के द्वारा मन्दिर में स्थापित कर दिया गया। भगवान विष्णु के बायी एवं दायी ओर नर एवं नारायण की प्रतिमाएं विराजमान हैं। बद्रीनाथ मन्दिर के सामने गरुण की प्रतिमा स्थापित है।

गढ़वाल के विभिन्न भागों में लगभग 61 मुख्य विष्णु मन्दिर स्थापित हैं। इनमें से कुछ को नीचे सूचीबद्ध किया गया है।

पूजा के अन्य स्वरुप[संपादित करें]

गढ़वाल में पूजित देवी देवताओं के अन्य स्वरुप निम्न हैं।

सर्प पूजा[संपादित करें]

प्राचीन समय में गढ़वाल में रहने वाले नागाओं के वंशज आज भी सर्प का पूजा करते हैं। इस क्षेत्र में अनेकों सर्प मन्दिर स्थापित हैं। उदाहरणार्थ कुछ सर्प मन्दिर निम्न हैं।

  • पान्डुकेश्वर का शेष नाग मन्दिर
  • रतगाँव का भेकल नाग मन्दिर
  • तालोर का सांगल नाग मन्दिर
  • भरगाँव का बम्पा नाग मन्दिर
  • निति घाटी में जेलम का लोहन देव नाग मन्दिर
  • देहरादून घाटी नाग सिद्ध का बामन नाग मन्दिर

कर्ण पूजा[संपादित करें]

पश्चिमी गढ़वाल के जौनसार बाबर क्षेत्र में कर्ण पूजा की जाती है।

सामेश्वर या दुर्योधन पूजा[संपादित करें]

टौन्स, यमुना, भागीरथी, बलंगाना एवं भीलंगान की ऊपरी घाटियों में दुर्योधन की पूजा की जाती है।

महासू पूजा[संपादित करें]

पश्चिमी गढ़वाल की यमुना एवं भागीरथी घाटियों में यह पूजा प्रचलित है।

बौद्ध धर्म[संपादित करें]

ऊपरी गढ़वाल में रहने वाली अनेकों जनजातियाँ जैसे भूटिया इत्यादि बोद्ध धर्म के अनुयायी हैं। क्योंकि उनका सम्बन्ध पूर्व में तिब्बती लोगों के साथ बहुत अधिक रहा है।