गंधशास्त्र

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गंधशास्त्र, देवताओं के षोडशोपचार में एक आवश्यक उपचार माना गया है। आज भी नित्य देवपूजन में सुवासित अगरबत्ती और कपूर का उपयोग होता है। यही नहीं, भारत के निवासी अपने प्रसाधन में सुगंधित वस्तुओं और विविध वस्तुओं के मिश्रण से बने हुए सुगंध का प्रयोग अति प्राचीन काल से करते आ रहे हैं। सुगंधि की चर्चा से प्राचीन भारतीय साहित्य भरा हुआ है। इन सुगंधियों के तैयार करने की एक कला थी और उसका अपना एक शास्त्र था। किंतु एतत्संबंधित जो ग्रंथ 12वीं-13वीं शती के पूर्व लिखे गए थे वे आज अपने मूल रूप में उपलब्ध नहीं हैं। वैद्यक ग्रंथों में यत्रतत्र सुगंधित तेलों का उल्लेख मिलता है।

इतिहास[संपादित करें]

चरक संहिता में अमृतादि तैल, सुकुमारक तैल, महापद्म तैल आदि अनेक तेलों की चर्चा हैं। इनके बनाने के लिए चंदन, उशीर (खश), केसर, तगर, मंजिष्ठ (मंजीठ), अगुरु आदि सुगंधित वस्तुओं का प्रयोग होता था। इससे प्रकट होता है कि ईसा की आरंभिक शती में सुगंधियों का प्रचुर प्रचार था। उस समय उनके तैयार करने की कला समुन्नत थी। वात्स्यायन ने, जिनका समय गुप्त काल (चौथी-पाँचवीं शती ई.) आँका जाता है, अपने कामसूत्र में नागरिको के जानने योग्य जिन चौसठ कलाओं का उल्लेख किया है। उसमें सुगंधयुक्त तेल एवं उबटन तैयार करना भी है। वराहमिहिर के बृहत्संहिता में, जो इसी काल की रचना है, गंधयुक्ति नामक एक प्रकरण हैं। इसी प्रकार अग्निपुराण के 224वें अध्याय में गंध की चर्चा है। उसमें सुगंध तैयार करने की आठ प्रक्रियाओं का उल्लेख है। वे हैं-

(1) शोधन; (2) आचमन; (3) विरेचन; (4) भावन; (5) पाक; (6) बोधन; (7) धूपन और (8) वासन।

जिन वस्तुओं के धूम से सुगंध प्राप्त हो सकती है, ऐसी इक्कीस वस्तुओं के नाम इस पुराण में गिनाए गए हैं। इसी प्रकार स्नान के लिए भी सुगंधित वस्तुओं का उसमें उल्लेख है। मुख को सुगंधित बनाने के लिए मुखवासक चूर्ण के अनेक नुस्खे उसमें उपलब्ध हैं। फूलों के वास से सुगंधित तेल तैयार करने की बात भी उसमें कही गई है। इसी प्रकार विष्णुधर्मोत्तर पुराण में गंधयुक्ति प्रकरण है। कालिका पुराण में देवपूजन के निमित्त पाँच प्रकार के सुगंध की चर्चा है-

(1) चूर्ण करने से प्राप्त सुगंध;

(2) घास के समान उगनेवाली सुगंध;

(3) जल से निकलनेवाली सुगंध;

(4) प्राणियों के अंग से उत्पन्न होनेवाली सुगंध तथा

(5) कृत्रिम रूप से तैयार की जाने वाली सुगंध।

बारहवीं शती में सोमेश्वर ने मानसोल्लास की रचना की थी। उसमें गंधभोग नामक एक प्रकरण है। इसमें तिल को केतकी, पुन्नाग और चंपा के फूलों से सुवासित करने तथा उन्हें पेरकर तेल निकालने की प्रक्रिया का उल्लेख है। इसी प्रकार शरीर पर लगाए जानेवाले सुगंधित उपटनों का भी विस्तृत उल्लेख है। इसी तरह सुगंधित जल तैयार करने की विधि भी उसमें दी हुई है। मानसोल्लास के इन प्रकरणों के आधार पर नित्यनाथ ने तेरहवीं शती में अपने रसरत्नाकर नामक ग्रंथ में गंधवाद नामक प्रकरण लिखा है जिसमें सुगंधि तैयार करने की विस्तृत चर्चा है।

गंध शास्त्र पर चौदहवीं शती के लिखे दो ग्रंथों की हस्तलिपि पुणे के भण्डारकर प्राच्य शोध संस्थान में हैं। एक का नाम है गंधवाद। इसके लेखक का नाम अज्ञात है। इसपर 16वीं शती के पूर्वार्ध की लिखी हुई एक टीका भी है। दूसरा ग्रंथ गंगाधर नायक कृत गंधसार है। इसमें उन्होंने सुगंधि को आठ वर्गों में विभाजित किया है। यथा-

(1) पत्र, (2) पुष्प, (3) फल (जायफल आदि); (4) लौंग आदि झाड़ियों से उत्पन्न डंठल;

(5) लकड़ी (चंदन आदि); (6) मूल (जड़); (7) वनस्पति स्राव (यथा-कपूर) और (8) प्राणिज पदार्थ (यथा-कस्तूरी)।

उन्होंने सुगंध तैयार करने की छह प्रकियाएँ बताई हैं और उनकी विस्तृत चर्चा की है।

मुस्लिम काल, विशेषत: मुगल काल में सुगंध का महत्व काफी बढ़ गया था और उसने एक समुन्नत उद्योग का रूप धारण कर लिया था। सुगंधित जल और सुगंधित तेलों का प्रचुर उल्लेख इस काल में मिलता है। किंतु इस विषय पर रचे गए इस काल के किसी ग्रंथ की जानकारी नहीं प्राप्त होती।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]