नागार्जुन (रसायनशास्त्री)

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नागार्जुन भारत के धातुकर्मी एवं रसशास्त्री (alchemist) थे। ११वीं शताब्दी में अल बरुनी के द्वारा लिखे दस्तावेजों के अनुसार वे १०० वर्ष पहले गुजरात के निकट दैहक नामक ग्राम में जन्मे थे। अर्थात उनका जन्म १०वीं शताब्दी के आरम्भ में हुआ था। जबकि चीनी और तिब्बती साहित्य के अनुसार वे 'वैदेह देश' (विदर्भ) में जन्मे थे और पास के सतवाहन वंश द्वारा शासित क्षेत्र में चले गये थे। इसके अलावा इतिहास में महायान सम्प्रदाय के दार्शनिक नागार्जुन तथा रसशास्त्री नागार्जुन में भी भ्रम की स्थिति बनी रहती है। महाराष्ट्र के नागलवाडी ग्राम में उनकी प्रयोगशाला होने के प्रमाण मिले हैं। कुछ प्रमाणों के अनुसार वे 'अमरता' की प्राप्ति की खोज करने में लगे हुए थे और उन्हें पारा तथा लोहा के निष्कर्षण का ज्ञान था।

द्वितीयक साहित्य में भी रसशास्त्री नागार्जुन के बारे में बहुत ही भ्रम की स्थिति है। पहले माना जाता था कि रसरत्नाकर नामक प्रसिद्ध रसशास्त्रीय ग्रन्थ उनकी ही रचना है किन्तु १९८४ के एक अध्ययन में पता चला कि रसरत्नाकर की पाण्डुलिपि में एक अन्य रचनाकार (नित्यानन्द सिद्ध) का नाम आया है।[1]

परिचय[संपादित करें]

नागार्जुन का जन्म सन् ९३१ में गुजरात में सोमनाथ के निकट दैहक नामक किले में हुआ था। वह रसायनज्ञ आर्थत कीमियागर थे। लोग उनके बारे में ढ़ेर सारी कहानियां कहते थे। उससे उन्हें कभी व्याकुलता या परेशानी नहीं हुई थी। इस लोक-विश्वास को कि वह भगवान के संदेशवाहक हैं, रसरत्नाकर नामक पुस्तक लिख कर पुष्ट कर दिया। यह पुस्तक उनके और देवताओं के बीच बातचीत की शैली में लिखी गई थी। रसरत्नाकर में रस (पारे के यौगिक) बनाने के प्रयोग दिए गये हैं। इसमें देश में धातुकर्म और कीमियागरी के स्तर का सर्वेक्षण भी दिया गया था। इस पुस्तक में चांदी, सोना, टिन और तांबे की कच्ची धातु निकालने और उसे शुद्ध करने के तरीके भी बताये गए हैं।

पारे से संजीवनी और अन्य पदार्थ बनाने के लिए नागार्जुन ने पशुओं और वनस्पति तत्वों और अम्ल और खनिजों का भी इस्तेमाल किया। हीरे, धातु और मोती घोलने के लिए उन्होंने वनस्पति से बने तेजाबों का सुझाव दिया। उसमें खट्टा दलिया, पौधे और फलों के रस थे। उन्होंने और पहले के कीमियागरों ने जिन उपकरणों का इस्तेमाल किया था उसकी सूची भी पुस्तक में दी गई है। आसवन (डिस्टीलेशन), द्रवण (लिक्वीफेक्शन), उर्ध्वपातन (सबलीमेशन) और भूनने के बारे में भी पुस्तक मे वर्णन है। पुस्तक में विस्तारपूर्ण दिया गया है कि अन्य धातुएं सोने में कैसे बदल सकती हैं। यदि सोना न भी बने रसागम विशमन द्वारा ऐसी धातुएं बनाई जा सकती हैं जिनकी पीली चमक सोने जैसी ही होती थी। हिंगुल और टिन जैसे केलमाइन से पारे जैसी वस्तु बनाने का तरीका दिया गया है।

नागार्जुन ने सुश्रुत संहिता के पूरक के रूप में 'उत्तर तन्त्र' नामक पुस्तक भी लिखी। इसमें दवाइयां बनाने के तरीके दिये गये हैं। आयुर्वेद की एक पुस्तक `आरोग्यमंजरी' भी लिखी। उनकी अन्य पुस्तकें है- कक्षपूत तन्त्र, योगसर और योगाष्टक।

कृतियाँ[संपादित करें]

निम्नलिखित पाण्डुलिपियाँ किसी 'नागार्जुन' द्वारा रचित होना बतायी जाती हैं-

  • जीवसूत्र[2]
  • रसवैशेषिकसूत्र[3]
  • योगशतक[4]
  • कक्षपुट[5]
  • योगरत्नमाला[6]

यद्यपि 'रसरत्नाकर' नामक ग्रन्थ का रचयिता रसायनशास्त्री नागार्जुन को ही माना जाता रहा है किन्तु १९८४ में पाण्डुलिपियों एवं प्रिन्ट सामग्री के अध्ययन से यह बात सामने आयी कि रसरत्नाकर की पाण्डुलिपि में किसी नित्यनाथ सिद्ध का नाम बार-बार उसके रचनाकार के रूप में आया है। [7]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Wujastyk, Dominik (18 July 2013). "An Alchemical Ghost: The Rasaratnâkara by Nâgârjuna". Ambix. pp. 70–83. doi:10.1179/amb.1984.31.2.70.
  2. Meulenbeld, Gerrit Jan (1999). A history of Indian medical literature. IIA. Groningen: E. Forsten. p. 135. ISBN 9069801248.
  3. Meulenbeld, Gerrit Jan (1999). A history of Indian medical literature. IIA. Groningen: E. Forsten. p. 136. ISBN 9069801248.
  4. Meulenbeld, Gerrit Jan (1999). A history of Indian medical literature. IIA. Groningen: E. Forsten. p. 1395. ISBN 9069801248.
  5. Meulenbeld, Gerrit Jan (1999). A history of Indian medical literature. IIA. Groningen: E. Forsten. p. 192. ISBN 9069801248.
  6. Meulenbeld, Gerrit Jan (1999). A history of Indian medical literature. IIA. Groningen: E. Forsten. p. 193. ISBN 9069801248.
  7. Wujastyk, Dominik (18 July 2013). "An Alchemical Ghost: The Rasaratnâkara by Nâgârjuna". Ambix. pp. 70–83. doi:10.1179/amb.1984.31.2.70.

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]