कजली तीज

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कजली तीज/बडी तीज/सातुडी तीज मुख्यतः पूर्वी भारत में भादो कृष्ण तृतीया को मनाया जाने वाला व्रत-त्यौहार है।

भारत में तीज और त्यौहारों का बड़ा ही महत्व हैं. महिलाओं के जीवन में तीज पर्व का बड़ा ही महत्व हैं. भारत में मुख्य रूप से चार तीज मनाई जाती हैं.

अखा तीज

हरियाली तीज

हरतालिका तीज

कजली तीज (या कजली, सातुड़ी तीज)

इन चारों को मुख्य रूप से हिंदी भाषी राज्यों में एक पर्व के रूप में मनाया जाता हैं.

कजरी तीज का महत्व (Kajari Teej Ka Mahatav)

कजरी तीज, जिसे कजली तीज और सातूड़ी तीज भी कहा जाता हैं. यह मुख्यतः सुहागन महिलाओं और लड़कियों का पर्व हैं. पूरे वर्ष हरतालिका तीज की तरह ही इस तीज का भी महिलाऐं इंतज़ार करती हैं. वैवाहिक जीवन की सुख समृद्धि के लिए सुहागन महिलाएँ यह व्रत करती हैं और कुंवारी लड़कियां अच्छे वर की कामना के लिए यह व्रत करती है.

कजरी तीज तिथि (Kajari Teej Tithi)

हिन्दू पंचांग के अनुसार यह तीज पर्व भादो मास में कृष्ण पक्ष की तृतीय तिथि को मनाई जाती हैं. अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह तिथि जुलाई या अगस्त के महीने में आती है.

कजरी तीज की परंपरा और नियम(Kajari Teej Tradition and Rules)

इस तीज के त्यौहार के दिन घरो में झुला लगाया जाता हैं. इस दिन झूला झूलने की भी परंपरा हैं.

इस दिन सुहागन महिलाएं और कुवारी लड़कियां निर्जला उपवास रखती हैं. परन्तु गर्भवती महिलाएं फलाहार कर सकती है.

इस दिन महिलाएं रात भर जागरण और भजन करती है.

इस दिन गेहूँ, चना और जौ के सत्तू के लड्डू बनाने की परंपरा हैं.

जब महिलाएं रात्रि में चंद्रमा को अर्ध्य देकर अपना उपवास खोलती हैं. तो सत्तू के लड्डू खाकर ही व्रत खोला जाता हैं.

यदि चंद्रमा उदय होता हुआ नहीं दिख रहा हो तो रात्रि में लगभग 11:30 बजे आसमान की ओर अर्ध्य देकर उपवास को खोला जा सकता हैं.


कजरी तीज की कथा (Kajari Teej Katha)

एक गाँव में किसान के चार बेटे थे. उनमे से तीन बेटों की पत्नियों के परिवार आर्थिक रूप से संपन्न थे. परन्तु सबसे छोटे बेटे की पत्नी का परिवार गरीब था. भादो के मास में सातूडी तीज के पर्व पर ससुराल से सत्तू आने की परंपरा हैं. परंपरा के अनुसार तीनो बड़ी बहुओं के मायके से सत्तू आया लेकिन छोटी बहु के यहाँ से नहीं आया. जिसके कारण छोटी बहुत का मन उदास हो गया. पति ने उससे उदासी का कारण पुछा तो उसने सारी बात बताई और पति को सत्तू लाने के लिए कहा. उसका पति सत्तू लेने के लिए बाजार में गया परन्तु उसे कही भी सत्तू नहीं मिला. वह अपनी पत्नी को नाराज नहीं देखना चाहता था. इसी उद्देश्य से रात के समय एक किराने की दुकान में गया और चने, गेहूँ और जौ लेकर पिसने लगा. तभी दुकान का मालिक आ गया और उसने पुछा क्या कर रहे हो. तब उसने पूरी कहानी सुनाई और कहा कि मेरे लिए यह सत्तू घर लेकर जाना बहुत जरूरी हैं. यह सुनकर दुकान मालिक ने कहा कि अब आप घर चले जाएँ. आज से आपकी पत्नी मेरी बेटी हैं और उसका मायका मेरा घर है.

अगले दिन वह दुकान मालिक ने अपने कहे अनुसार विभिन्न प्रकार के सत्तू और पूजा का सामान उस व्यक्ति के यहाँ भेज दिया. जिसे देखकर छोटी बहु बहुत खुश हो गयी. उसके पति ने उसे बताया की यह उसके धर्म पिता ने भेजा हैं. कजरी तीज का व्रत रखने से सौभाग्यवती स्त्री के परिवार में सुख-समृद्धि और खुशहाली आती है और भगवान किसी न किसी रूप में उनकी अवश्य मदद करता है.

कजरी तीज पूजन विधि (Kajari Teej Puja Vidhi)

कजरी तीज के दिन पूजन के स्थान पर मिट्टी और गोबर की सहायता से एक छोटी सी तालब जैसे आकृति का निर्माण करना चाहिए. नीम की एक डगाल को उसमे लगा दे. फिर उस पर पूजा के लाल कपडे की ओदनी लगा थे. उस तालाब में कच्चा दूध और ताजा जल डाले. कलश में आम के पत्ते लगाकर उसे चावल के धान पर स्थापित करे.

उसके बाद गणेश जी और माता जी की मूर्ती विराजमान करे.

सर्वप्रथम भगवान की प्रतिमाओं का दूध और गंगा जल से अभिषेक करे और नई पोशाक पहनाएं.

कलश पर मेहँदी, रोली, कुमकुम, अबीर, गुलाल, चावल और नाडा चढ़ाकर पूजन प्रारंभ करे.

उसके बाद गणेश जी और माताजी को भी मेहँदी, रोली, कुमकुम, अबीर, गुलाल, चावल और नाडा चढ़ाएं.

मंदिर की दीवार या पूजा स्थल की दीवार पर कुमकुम, हल्दी और काजल की 13-13 बिंदिया लगाएं.

पूजा के स्थान पर बनाए गए तालाब के पास में दीपक जलाएं. विधिवत पूजन करने के बाद व्रत की कथा का वाचन करना चाहिए.

कथा के बाद चंद्रमा को अर्ध्य देने की परंपरा हैं. चन्द्रमा को जल के छीटे देकर कुमकुम और चावल चढ़ाएं.

चांदी की अंगूठी और धान के दाने लेकर जल चन्द्रमा की ओर समर्पित करे और अपने नियत स्थान पर खड़े होकर चार बार परिक्रमा करे.

इन्हें भी देखें[संपादित करें]