कजली तीज

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कजली तीज/बडी तीज/सातुडी तीज मुख्यतः पूर्वी भारत में भादो कृष्ण तृतीया को मनाया जाने वाला व्रत-त्यौहार है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

कजरी तीज कैसे मनाते है?[संपादित करें]

कजरी तीज के दिन विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयू के लिए व्रत रखती है और अविवाहित लड़कियां इस पर्व पर अच्छा वर पाने के लिए व्रत रखती हैं। इस दिन जौ, चने, चावल और गेंहूं के सत्तू बनाये जाते है और उसमें घी और मेवा मिलाकर कई प्रकार के भोजन बनाते हैं। चंद्रमा की पूजा करने के बाद उपवास तोड़ते हैं।

इसके अलावा, कजरी तीज के दिन गायों की पूजा की जाती है। साथ ही इस दिन घर में झूले लगाते है और महिलाएं इकठ्ठा होकर नाचती है और गाने गाती हैं। कजरी गाने इस उत्सव का एक अभिन्न हिस्सा हैं। Kajri teej पर नीम की पूजा भी की जाती है। उसके बाद चाँद को बलिदान देने की परंपरा हैं।

कजरी तीज का महत्त्व[संपादित करें]

कड़ी गर्मी के बाद मानसून का स्वागत करने के लिए लोगों द्वारा कजरी तीज मनाई जाती है। कजरी तीज पूरे साल मनाए जाने वाले तीन तीज त्योहारों में से एक है। अखा और हरियाली तीज की तरह भक्त कजरी तीज के लिए विशेष तयारी करते हैं।

इस दिन देवी पारवती की पूजा करना शुभ माना जाता है। जो महिलाएं कजरी तीज पर देवी पार्वती की पूजा करती है उन्हें अपने पति के साथ सम्मानित संबंध होने से आशीर्वाद मिलता है।

किवंदती यह है की 108 जन्म लेने के बाद देवी पार्वती भगवान शिव से शादी करने में सफल हुई। इस दिन को निस्वार्थ प्रेम के सम्मान के रूप में मनाया जाता है। यह निस्वार्थ भक्ति थी जिसने भगवान् शिव को अंततः देवी पार्वती को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करने का नेतृत्व किया।

कजरी तीज क्यों मनाई जाती है?[संपादित करें]

कजरी तीज की कहानी:

कजरी तीज से जुड़ी कई कहानियां है जिन्हें कजरी तीज मनाने का कारण माना जाता हैं।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कजली मध्य भारत में स्थित एक घने जंगल का नाम था जंगल के आस-पास का क्षेत्र राजा दादूरई द्वारा शासित था। वहाँ रहने वाले लोग अपने स्थान कजली के नाम पर गाने गाते थे ताकि उनकी जगह का नाम लोकप्रिय हो सकें।

कुछ समय पश्चात् राजा दादूरई का निधन हो गया, उनकी पत्नी रानी नागमती ने खुद को सती प्रथा में अर्पित कर दिया। इसके दुःख में कजली नामक जगह के लोगों ने रानी नागमती को सम्मानित करने के लिए राग कजरी मनाना शुरू कर दिया।

इसके अलावा, इस दिन को देवी पार्वती को सम्मानित करने और उनकी पूजा करने के लिए मनाया जाता है क्योंकि यह तीज अपने पति के लिए एक महिला (देवी पार्वती) की भक्ति और समर्पण को दर्शाती हैं।

देवी पार्वती भगवान् शिव से शादी करने की इच्छुक थी। शिव ने पार्वती से उनकी भक्ति साबित करने के लिए कहा। पार्वती ने शिव द्वारा स्वीकार करने से पहले, 108 साल एक तपस्या करके अपनी भक्ति साबित की।

भगवन शिव और पार्वती का दिव्य संघ भाद्रपद महीने के कृष्णा पक्ष के दौरान हुआ था। यही दिन कजरी तीज के रूप में जाना जाने लगा। इसलिए बड़ी तीज या kajari teej के दिन देवी पार्वती की पूजा करने के लिए बहुत शुभ माना जाता हैं।

KAJALI TEEJ KA ITIHASH

मेले की बात भी निराली है। है और इसका इतिहास रहा है।

बूंदी में तीज मेला प्रारम्भ होने की भी एक आकर्षक घटना है। बूंदी रियासत में गोठडा के ठाकुर बलवंत सिंह पसेस इरादे वाले जांबाज सैनिक भावना से ओतप्रोत थे। एक बार अपने किसी मित्र के कहने पर की जयपुर में तीज भव्य सवारी निकलती है, अगर अपने यहाँ भी निकले तो शान की बात रही। कहने वाले साथी ने तो यह बात सहज में कह दी पर ठाकुर बलवंत सिंह के दिल में टीस-सी लग गई। उन्होंने जयपुर की उसी तीज को जीत कर लाने का मन बना लिया। ठाकुर अपनेवेन विश्वनीय जांबाज सैनिक को लेकर सावन की तीज पर जयपुराइडिंग स्थल पहुंच गए।

निश्चित कार्यक्रम के अनुसार जयपुर के चहल-पहल वाले मैदान से तीज की सवारी, शाही तौर-तरीकों से निकल रही थी। ठाकुर बलवंत सिंह हाडा अपने जांबाज साथियों के पराक्रम से जयपुर की तीज को गोठडा ले आए और तभी से तीज माता की सवारी गोठडा में निकलने लगी। ठाकुर बलवंत सिंह की मृत्यु के बाद बूंदी के राव राजा रामसिंह उसे बूंदी ले आए और केवल से उनके शासन काल में तीज की सवारी भव्य रूप से निकलने लगी। इस सवारी को भव्यता प्रदान करने के लिए शाही सवारी भी निकलती थी। इसमें बूंदी रियासत के जागीरदार, ठाकुर व धनाढय लोग अपनी परम्परागत पोशाक पहनकर पूरी शानो-शौकत के साथ भाग लिया करते थे। सैनिकों द्वारा शौर्य का प्रदर्शन किया गया था।

सुहागिनें सजी-धजी व लहरिया पहन कर तीज महोत्सव में चार चाँद लगाती थीं। इक्कीस तोपों की सलामी के बाद नवल सागर झील के सुंदरघाट से तीजाइड प्रमुख रेस्तरां से होती हुई रानी जी की बावड़ी तक जाती थी। वहाँ पर सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे। नृत्यांगनाएँ अपने नृत्य से दर्शकों का मनोरंजन करती थीं। करतब दिखाने वाले कलाकारों को सम्मानित किया जाता था और प्रशिक्षण का आत्मीय स्वागत किया जाता था। मान-सम्मान और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बाद तीज सवारी वापिस राजमहल में लौटती थी।

दो दिवसीय तीज सवारी के अवसर पर विभिन्न प्रकार के जन मनोरंजन कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते थे, जिनमें दो मदमस्त हाथियों का युद्ध होता था, जिसे देखने वालों की भीड़ उमड़ती थी।

स्वतन्त्रता के बाद भी तीज की सवारी निकालने की परम्परा बनी हुई है। अब दो दिव्य तीज सवारी निकालने का दायित्व नगर परिषद उठा रहा है। राजघराने द्वारा तीज की प्रतिमा को नगरपालिका को नहीं दिए जाने से तीज की दूसरी प्रतिमा निर्मित करा कर प्रतिवर्ष भाद्रपद माह की तृतीया को तीज सवारी निकालने की स्वस्थ सांस्कृतिक परम्परा बनी हुई है।

यघपि कुछ समय तक राजघराने की तीज भी राजमहलों के अंदर ही निकलती रही है लेकिन कालांतर में सीमित दायरे में तीज की सवारी का निकलना बंद हो गया है। केवल नगर परिषद द्वारा निकाली जा रही तीज माता की सवारी ही आम जनता के दर्शनार्थ निकली जा रही है। पिछले कुछ वर्षों से जिला प्रशासन के विशेष अनुरोध और आश्वासन के बाद राजघराने की तीज भी अब तीजड़ों में निकाली जा रही है।

सभी को पार्वतीजी स्वरूप कजली तीज माता का आशीर्वाद मिलता रहा।

श्रेणियाँ: संस्कृति , फोटो , टोंक विशेष , न्यूज़

टैग्स: राजस्थान , राजस्थान में इतिहास KAJLI TEEJ

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की बात भी निराली है। है और इसका इतिहास रहा है।

बूंदी में तीज मेला प्रारम्भ होने की भी एक आकर्षक घटना है। बूंदी रियासत में गोठडा के ठाकुर बलवंत सिंह पसेस इरादे वाले जांबाज सैनिक भावना से ओतप्रोत थे। एक बार अपने किसी मित्र के कहने पर की जयपुर में तीज भव्य सवारी निकलती है, अगर अपने यहाँ भी निकले तो शान की बात रही। कहने वाले साथी ने तो यह बात सहज में कह दी पर ठाकुर बलवंत सिंह के दिल में टीस-सी लग गई। उन्होंने जयपुर की उसी तीज को जीत कर लाने का मन बना लिया। ठाकुर अपनेवेन विश्वनीय जांबाज सैनिक को लेकर सावन की तीज पर जयपुराइडिंग स्थल पहुंच गए।

निश्चित कार्यक्रम के अनुसार जयपुर के चहल-पहल वाले मैदान से तीज की सवारी, शाही तौर-तरीकों से निकल रही थी। ठाकुर बलवंत सिंह हाडा अपने जांबाज साथियों के पराक्रम से जयपुर की तीज को गोठडा ले आए और तभी से तीज माता की सवारी गोठडा में निकलने लगी। ठाकुर बलवंत सिंह की मृत्यु के बाद बूंदी के राव राजा रामसिंह उसे बूंदी ले आए और केवल से उनके शासन काल में तीज की सवारी भव्य रूप से निकलने लगी। इस सवारी को भव्यता प्रदान करने के लिए शाही सवारी भी निकलती थी। इसमें बूंदी रियासत के जागीरदार, ठाकुर व धनाढय लोग अपनी परम्परागत पोशाक पहनकर पूरी शानो-शौकत के साथ भाग लिया करते थे। सैनिकों द्वारा शौर्य का प्रदर्शन किया गया था।

सुहागिनें सजी-धजी व लहरिया पहन कर तीज महोत्सव में चार चाँद लगाती थीं। इक्कीस तोपों की सलामी के बाद नवल सागर झील के सुंदरघाट से तीजाइड प्रमुख रेस्तरां से होती हुई रानी जी की बावड़ी तक जाती थी। वहाँ पर सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे। नृत्यांगनाएँ अपने नृत्य से दर्शकों का मनोरंजन करती थीं। करतब दिखाने वाले कलाकारों को सम्मानित किया जाता था और प्रशिक्षण का आत्मीय स्वागत किया जाता था। मान-सम्मान और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बाद तीज सवारी वापिस राजमहल में लौटती थी।

दो दिवसीय तीज सवारी के अवसर पर विभिन्न प्रकार के जन मनोरंजन कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते थे, जिनमें दो मदमस्त हाथियों का युद्ध होता था, जिसे देखने वालों की भीड़ उमड़ती थी।

स्वतन्त्रता के बाद भी तीज की सवारी निकालने की परम्परा बनी हुई है। अब दो दिव्य तीज सवारी निकालने का दायित्व नगर परिषद उठा रहा है। राजघराने द्वारा तीज की प्रतिमा को नगरपालिका को नहीं दिए जाने से तीज की दूसरी प्रतिमा निर्मित करा कर प्रतिवर्ष भाद्रपद माह की तृतीया को तीज सवारी निकालने की स्वस्थ सांस्कृतिक परम्परा बनी हुई है।

यघपि कुछ समय तक राजघराने की तीज भी राजमहलों के अंदर ही निकलती रही है लेकिन कालांतर में सीमित दायरे में तीज की सवारी का निकलना बंद हो गया है। केवल नगर परिषद द्वारा निकाली जा रही तीज माता की सवारी ही आम जनता के दर्शनार्थ निकली जा रही है। पिछले कुछ वर्षों से जिला प्रशासन के विशेष अनुरोध और आश्वासन के बाद राजघराने की तीज भी अब तीजड़ों में निकाली जा रही है।

सभी को पार्वतीजी स्वरूप कजली तीज माता का आशीर्वाद मिलता रहा।

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