अमृतचन्द्रसूरि

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अमृतचन्द्रसूरि

अमृतचन्द्रसूरि (१०वीं शताब्दी) एक दिगम्बर जैन आचार्य और संस्कृत आध्यात्मिक कवि थे । उन्होने समयसार पर आत्मख्याति और समयसारकलश नामक, प्रवचनसार पर तात्पर्यवृत्ति नामक, तथा पञ्चास्तिकाय पर समयव्याख्या नामक टीकाएँ लिखीं। उन्होने पुरुषार्थसिद्ध्युपाय तथा तत्त्वार्थसार नामक स्वतंत्र ग्रन्थों की भी रचना की। प्रवचनसार का तात्पर्यवृत्ति सहित अंग्रेज़ी अनुवाद केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से सन १९३४ में प्रकाशित हुआ है ।

उनका यह श्लोक बहुत प्रचलित है:

आत्मा ज्ञानं स्वयं ज्ञानं ज्ञानात् अन्यत करोति किम् ।
पर भावस्य कर्तात्मा मोहोयं व्यवहारिणाम् ।।

सन्दर्भ[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]