अपस्मार

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अमृतम पत्रिका, GWALIOR से साभार.... अपस्मार किसे कहते हैं?... अपस्मार पूर्णतः मानसिक रोग-विकार है। उग्र अपस्मार तथा साधारण अपस्मार यह दो तरह का होता है। कहीं-कहीं अधिक दूषित दवाओं या अधिक गर्म अथवा अंग्रेजी दवाओं के कारण यह शिशुओं में भी पाया जाता है। अपस्मार को कुछ आधुनिक चिकित्सक मिर्गी रोग भी बताते हैं। अपस्मार के बहार भेद महर्षि चरक ने बताएं हैं- 【1】वातज 【2】पित्तज 【3】कफज 【4】सन्निपातज

इस अपस्मार शब्द में स्मृति का उल्लेख है और इस रोग में स्मरण शक्ति का सर्वथा लोप हो जाता है। अपगता स्मृति:यस्मिन रोज स: अपस्मार। अर्थात आप अर्थ नमश होना होता है। तथा स्मार स्मृति को कहते हैं। इन दो शब्दों से इसका नामकरण हुआ। अपस्मार रोग में मन तथा बुद्धि के विकृत हो जाने से नेत्रों के सामने अंधकार हो जाना, फंगस आना, कम दिखना, शरीर में कम्पन्न, मुख से फें निकलना, वीभत्स चेष्टा में आदि अपस्मार की स्वरूप वाचक है। 5000 वर्ष प्राचीन चरक सहिंता के मानसिक चिकित्सा अध्याय ९:८६, ८४ में कुछ श्लोकों का वर्णन है- कामशोक भय क्रोधहर्षेष्:र्था लोभसन्मवान! परस्पर प्रतिद्वंद्दैरेभिरेव शमं नयेत् !! चरक चिकित्सा: ९-८६ देह दु:खभयेभ्योहिप र प्राणभयं स्मृतम्। तेन याति शमं तस्य सर्वतो विप्लुतं मन:।। चरक चिकित्सा:-८४ अपस्मार रोग चिन्तया, शोक, काम-क्रोध, द्वेष-दुर्भावना, जलन-कुढ़न, बुराई, अधिक बोलने-बक बक करने तथा उद्वेग आदि भावों की उपस्थिति तथा मनुष्य द्वारा अपवित्र भोजन से, स्नान के पहले अन्न ग्रहण

इत्यादि ऐसी स्थितियों के दुष्परिणाम स्वरूप अपस्मार रोग उत्पन्न हो जाता है। 

करने के कारण धमनी यानि मनोवाही स्त्रोत में प्रसृत दोष ह्रदय को पीड़ित करते हैं, जिससे ज्ञानशून्यता उत्पन्न हो जाती है। इसके दुष्प्रभाव के चलते अनुपस्थित रूपों को देखना, बुरा सोचना, नकारात्मक विचार, चलते समय गजीर जाना, जिव्हा-नेत्र-भ्रू में स्फुरण, मुख से लालास्त्राव तथा हाथ-,पैर इधर-उधर फेंकना आदि पागलपन के लक्षण पैदा हो जाते है। इस रोग का साम्य इपिलेप्सी से करते हैं। यह ऐसी स्थिति है, जिसमें मस्तिष्क के उच्च केंद्रों के कार्य में सहसा विकृति उत्पन्न हो जाती है, जिसका प्रदर्शन वेगों या पागलपन के दौरों के स्वरूप में हुआ करता है। कभी-कभी मस्तिष्क तन्त्र एवं शरीर के अन्य अंगों में अपक्रान्ति भी हो जाती है। अपस्मार रोग के कारण प्रमुख हैं.... कुलज, प्रवृत्ति आयु अर्थात ७५ फीसदी युवावस्था में आक्रमण वयः भी नवयुवतियों में अधिक होता है। मस्तिष्क पर आघात, मानसिक व शारीरिक स्थितियों में अव्यवस्था यानि तालमेल का अभाव, बुद्धि के विविध विकार, शरीर गत एवं बाहरी विष, पुरानी एलर्जी, पाचनसंस्थानिय व्याधि, प्रदूषण, जलवायु (अति उष्णता तथा वायु प्रवाह में अवरोध) और प्रत्यावर्तक अवस्थायें जैसे-, दंतोदभेद, आंतो में कीड़े, कर्ण-नासा, शल्य आदि में बीमारियों का होना। चरक चिकित्सा सूत्र के अनुसार वमन, नस्य, विरेचन आदि प्राकृतिक व आयुर्वेदिक औषधियों द्वारा अपस्मार का उपचार सर्वश्रेष्ठ रहता है। आयुर्वेद में अपस्मार की चिकित्सा हेतु पंचगव्य घृत, वचादि घृत, amrutam ब्रेन की गोल्ड माल्ट, ब्रेन की गोल्ड टेबलेट, अमृतम टेबलेट, ब्राह्मी रसायन, सारस्वतारिष्ट, डिटॉक्स की क्वाथ आदि उपयोगी हैं। ■ प्रतिदिन धूप में बैठकर अभ्यङ्ग अवश्य करें।

■ ध्यान, कसरत, परिश्रम की आदत डालें। कुछ विचित्र बातें... ¶ दुनिया बुरे वक्त में लोग ज्ञान तो देते हैं, पर ध्यान नहीं देते। ¶ चित्त को चित्त यानी मात देना हमारी सबसे बड़ी जबाबदारी है। ¶ एकाग्रचित्त होकर हम सब कुछ पा सकते हैं। ¶ किसी भी कम से गहराई से पूरे मनोयोग से ध्यान लगाएंगे, तो उन्नति निश्चित मिलती है। ¶ पढ़ते समय कुछ भी रोचक नहीं लगता। नियमित अध्ययन का अभ्यास करें ¶ यह वक्त भी गुजर जाएगा। यह शक्तिशाली शब्द है। ¶ जहाँ धैर्य है वही जीवन की धार है। ¶ शिरडी के साईंबाबा का मूल सूत्र है श्रद्धा और सबूरी बस इतना विचरते ही मन हल्का होने लगेगा। ¶ हमें मन पर अंकुश नहीं लगाना है, उसे खुला भी नहीं छोड़ना हैं। ¶ कई बार परिस्थितियां इसलिए भी विपरीत बनती हैं, ताकि आप कुछ जमाने को करके दिखाओ। ¶ कहते हैं-जिद्द करो, जोखिम उठाओ एवं धैर्य रखो और दुनिया बदलो। ¶ आपमें झुझारूपन, संघर्ष करने की बस ललक होनी चाहिए। आप हिले की सन्सार के गिले-शिकवे शुरू हो जाएंगे। ¶ सुबह को स्वास्थ्यवर्धक बनाएं ¶ साफ-सफाई पर ध्यान दें। ¶ नए-नए वस्त्र धारण करें। ¶ खाना स्वादिष्ट और हेल्दी हो। ¶ पखाना भी साफ हो। इस हेतु amrutam tablet रोज रात को साढ़े जल से लेवें। ¶ मन को प्रसन्न रखने के लिए पहले अच्छा स्वस्थ्य शरीर जरूरी है। शरीर से ही सब सध जाएगा। ¶ मन कि बन्दिशें खीज पैदा करती हैं। ¶ अनिश्चितता से चिड़चिड़ापन आता है। ¶ जीवन में जोखिम उठाने से न डरें। ¶ अपने मन को में थोड़ा अमन देकर आगे बढ़ने की कोशिश करो। शायद सफलता आपका इंतजार कर रही हो। ¶ लोग आपको नमन तभी करेंगे, जब आप कुछ नया करोगे। ¶ खाली बैठने से बचें। ¶ थाली से मोह भंग करें। ¶ नाली यानी निगेटिव भरी भरी सोच को साफ करें। ¶ लड़कियों के गाल ओर लोगों की गाली पर ध्यान न दें। ¶ कुछ भी नया करें। रचनात्मक पर जोर दें। ¶ अपनी जरूरतों पर भी ध्यान दें। ¶ शरीर को रोज 20 मिनिट दीजिए। ¶ भूख से आधा खाइए। ¶ जब रक्त शरीर में तेजी से बहेगा, तो बीमारियों को भी भगा देगा। ¶ जो विचार-सोच ही हमारे अंदर का कच्चा माल अर्थात रॉ मटेरियल है। ¶ दिमाग में कुछ पाने की चाह है, तो राह निकल आती है। ¶ स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि व्यक्ति का ज्ञानी होना इतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना उसकी परिकल्पना। ¶ बस, सपने ही अपने होते हैं। सपने देखने से विचारों में कुछ करने की ललक होने लगती है। ¶ देश के राष्ट्रपति श्री अब्दुल कलाम साहब ने अपनी ऑटोबायोग्राफी में लिखा है कि-सपने वे नहीं होते, जो सोने के बाद आते हैं। सपने इंसान को सोने नहीं देते। ¶ सन्सार के कुछ सिद्धान्त हैं। गीली लकड़ी को जलाना मुशिकल है। पहले उसे सुखाओ। ऐसे ही अपने अंदर के कच्चे माल को तरोताजा रखें। कोई न कोई आपकी मदद के लिए आगे आ ही जायेगा। ¶ जिद्दी आदमी ही दुनिया बदलने की क्षमता रखते हैं। समझौता वाला आज नहीं, तो कल रोता है और पता कुछ नहीं बस, खोता ही खोता है। ¶ आसान रास्ते हमें आगे नहीं बढने देते। ¶ दिमाग को तेज करने के लिए कुछ ऐसा करें, जो असहज हो, कठिन हो। मुश्किल हो। ¶ सरल मार्ग पर चलने से केवल अपस्मार, मानसिक कष्ट या डिप्रेशन उपजता है। ¶ जिद्दी लड़कियों ने कुश्ती, फुटबॉल, क्रिकेट आदि में बहुत नाम कमाया है। लेकिन इसके पीछे की दर्द भरी कहानी कम लोगों को पता है। ¶ सफलता मिलने तक रुको नहीं। केवल चलते रहो। एक दिन जब जीत मिलेगी, तो दुनिया आपसे प्रीत करने लगेगी। विजय पाने वाला ही बड़ा कहलाता है। ¶ 91 वर्ष के तेज धावक रहे मिल्खा सिंह के अनुसार फिटनेस से बड़ा इजिनेस कुछ नहीं!

कोरोना की किच-किच... कोरोना समस्या नहीं, प्रकृति का समाधान है। आज हाथी, हिरन, शेर ओर जंगल में रहने वाले अनेक जीवों का सफाया कर दिया। कभी जानवर भी मनुष्यों से बचने की वेक्सीन खोज रहे होंगे। जैसे आज हम कोरोना से बचने के लिए ढूंढ रहे हैं! यह कहना है प्रसिद्ध इंजीनियर सोनम वांगचुक का!

अमृतम बुद्धि की क्वाथ.... Amrutam budhhikey kwath एक आयुर्वेदिक औषधि है इसके मुख्य घटक द्रव्य ब्राह्मी, शंखपुष्पी, सर्पगन्धा, मालकांगनी है।बुद्धि की क्वाथ औषधि के नाम से ही ज्ञात होता है कि-यह औषधि अपस्मार आदि अनेक मस्तिष्क विकारों को दूर कर डिप्रेशन को जड़ से मिटा देती है।

यह औषधि अवसाद आदि मानसिक रोगों के लिए एक सर्वोत्तम रसायन है, जो स्मृति भ्रम, याददाश्त और दिमाग की कमजोरी, मानसिक तनाव एवं बच्चों की आवाज को सुधारने के लिए कारगर है। मन में अमन लेन के लिए भक्त रैदास का सूत्र अपनाओ....

!!मन चंगा तो कठौती में गंगा!! अर्थात- जिस व्यक्ति का मन पवित्र होता है, उसके बुलाने पर मां गंगा भी एक कठौती (चमड़ा भिगोने के लिए पानी से भरे पात्र) में भी आ जाती हैं। आयुर्वेद और औषधि विज्ञान में कहा जाता है कि खोपड़ी के प्रत्येक ऑपरेशन के बाद मस्तिष्क पाया गया। वास्तव में यह सही है क्या? यह सोचने की बात है। वैज्ञानिकों ने मस्तिष्क पा लिया होता, तो ह्रदय की तरह मस्तिष्क भी भी आरोपित या प्रत्यारोपण किया जाता। मस्तिष्क आरोपित नहीं हो सकता, यह हमें इस बात काअहसास कराता है कि - मस्तिष्क नाम की आज तक कोई इकाई विज्ञानवासियों को मिली ही नहीं। फिर सत्य का आधार क्या है? आधार की खोज सहज नहीं है। हम जो स्वीकारते हैं, वही सत्य बन जाता है।

हमारी नींद को आसान बना दे-एक आयुर्वेदिक औषधि... हार्वर्ड मेडिकल स्कुल की एक शोध के अनुसार कोरोना/कोविड-19 के दौरान 37 फीसदी युवाओं को नींद न आने की समस्या यानी अनिद्रा के कारण भरी परेशानी हो रही है। इनमें 33 प्रतिशत लोग ऐसे हैं, जिन्हें कोरोना संक्रमण का भय बना रहा। वहीं 29% युवाओं को नोकरी जाने का डर, पैसे की तंगी की चिंता होने से भरपूर नींद नहीं आई। 27 फीसदी युवा ऐसे भी थे, जो प्यार में धोका, ब्रेकअप या नये-नये प्यार में डूबे होने के कारण समय पर सो नहीं सके। कुछ युवा भविष्य को लेकर तथा अकेलेपन के कारण भी परेशान रहे। यह सब अपस्मार सभी चिंता, तनाव मिटाकर भरपूर नींद लाने के लिए आयुर्वेद में पुख्ता ओर शर्तिया कारगर इलाज है। ब्राह्मी, शंखपुष्पी आदि।

'अपस्मार'
वर्गीकरण एवं बाह्य साधन
Muu.jpg
आईसीडी-१० G40.-G41.
आईसीडी- 345
डिज़ीज़-डीबी 4366
मेडलाइन प्लस 000694
ईमेडिसिन neuro/415 
एम.ईएसएच D004827

अपस्मार या मिर्गी (वैकल्पिक वर्तनी: मिरगी, अंग्रेजी: Epilepsy) एक तंत्रिकातंत्रीय विकार (न्यूरोलॉजिकल डिसॉर्डर) है जिसमें रोगी को बार-बार दौरे पड़ते है। मस्तिष्क में किसी गड़बड़ी के कारण बार-बार दौरे पड़ने की समस्या हो जाती है।[1] दौरे के समय व्यक्ति का दिमागी संतुलन पूरी तरह से गड़बड़ा जाता है और उसका शरीर लड़खड़ाने लगता है। इसका प्रभाव शरीर के किसी एक हिस्से पर देखने को मिल सकता है, जैसे चेहरे, हाथ या पैर पर। इन दौरों में तरह-तरह के लक्षण होते हैं, जैसे कि बेहोशी आना, गिर पड़ना, हाथ-पांव में झटके आना। मिर्गी किसी एक बीमारी का नाम नहीं है। अनेक बीमारियों में मिर्गी जैसे दौरे आ सकते हैं। मिर्गी के सभी मरीज एक जैसे भी नहीं होते। किसी की बीमारी मध्यम होती है, किसी की तेज। यह एक आम बीमारी है जो लगभग सौ लोगों में से एक को होती है।[2] इनमें से आधों के दौरे रूके होते हैं और शेष आधों में दौरे आते हैं, उपचार जारी रहता है। अधिकतर लोगों में भ्रम होता है कि ये रोग आनुवांशिक होता है पर सिर्फ एक प्रतिशत लोगों में ही ये रोग आनुवांशिक होता है। विश्व में पाँच करोड़ लोग और भारत में लगभग एक करोड़ लोग मिर्गी के रोगी हैं। विश्व की कुल जनसँख्या के ८-१० प्रतिशत लोगों को अपने जीवनकाल में एक बार इसका दौरा पड़ने की संभावना रहती है।[3] १७ नवम्बर को विश्व भर में विश्व मिरगी दिवस का आयोजन होता है। इस दिन तरह-तरह के जागरुकता अभियान और उपचार कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।[4][5][6] उचित उपचार के साथ, मिर्गी से प्रभावित कई व्यक्ति स्वस्थ जीवन जी सकते हैं। उनकी उपस्थिति के बावजूद, वे अच्छे स्वास्थ्य का आनंद ले सकते हैं। [7]

इतिहास[संपादित करें]

मिरगी मानव सभ्यता की ज्ञात सबसे पुरानी बीमारियों में गिनी जाती है। इस रोग के अभिन्न लक्षणों और इनसे जुड़ी अनिश्चितता के कारण इसका रहस्य सदा से ही बना आया है। अधिकांशतः आत्मनियंत्रण का ह्रास आंशिक होता है, व दौरे के समय चेतनता का कुछ अंश बना रहता है। किंतु इस समय होने वाली हरकतें व अनुभूतियाँ किसी अलौकिक सत्ता के होने का इशारा करती रही हैं। रोग को वैज्ञानिक दृष्टिकोण मात्र एक शताब्दी से मिला है। लिखित भाषा में मिर्गी शब्द का उल्लेख सर्वप्रथम प्राचीन मिस्र देश के भोज पत्रों में मिलता है। इन्हें पत्रों को पैपाइरस कहते हैं। चित्रलिपि के इस रूप का रोमन लिपि में रूपान्तरण है। इसमें बनी मानवकृत्ति से यह संदेश मिलता है कि एक प्रेतात्मा मिर्गी से पीड़ित व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर ऐसा मुछ करती है।[8]

प्राचीन[संपादित करें]

इस रोग को अनेक ऊपरी शक्तियों से जोड़कर भी देखा जाता रहा है। ये शक्तियां अच्छी और बुरी दोनों हो सकती हैं और यही तय करता है रोगी के साथ समाज का बर्ताव। उसे किसी स्थानीय देवता के प्रतिनिधि रूप में भी देखा जाता रहा है व कई बार उससे घृणा की जा सकती है, दुत्कारा जा सकता है। भारत में आज भी अनेक स्त्रियों या पुरुषों में देवी आती है जिस समय उसकी कुछ हरकतें मिर्गी से मेल खाती हैं, किन्तु वास्तव में उसका मिर्गी से कोई सम्बन्ध नहीं ज्ञात हुआ है। लोग उसके आगे श्रद्धा से सिर झुकाते हैं, पूजा करते हैं। व्यक्ति के मन की अतृप्त भावनाएंपोषित होती हैं। समाज में प्रतिष्ठा व मान्यता मिलती है। ऐसा मात्र एशिया या अफ्रीका के पिछड़े समझे जाने वाले क्षेत्रों ही नहीं देखा जाता बल्कि आधुनिक यूरोप, अमेरिका आदि महाद्वीपों में भी पुरातन काल से यही धारणा रही है कि ये अवस्था शरीर के भीतर से अपने आप नहीं आती बल्कि कोई है जो बाहर से कठपुतली की भांति नियंत्रित करता है।

२००२ में अपस्मार का प्रति १,००,००० व्यक्ति फैलाव
██ आंकड़े नहीं ██ ५० से कम ██ 50-72.5 ██ 72.5-95 ██ 95-117.5 ██ 117.5-140 ██ 140-162.5 ██ 162.5-185 ██ 185-207.5 ██ 207.5-230 ██ 230-252.5 ██ 252.5-275 ██ २७५ से अधिक

प्राचीन महान भारतीय चिकित्साशास्त्र चरक संहिता में अपस्मार विस्तृत वर्णन मिलता है। इस रोग को शारीरिक रोगों के समान ही मानकर इसके अनेक कारणों की सूची भी दी गई है व औषधियों द्वारा उपचार भी सुझाया। गया है। कुछ शताब्दी ईसा पूर्व, यूनान के महान चिकित्सक हिप्पोक्रेटीज ने भी मिर्गी को दैवीय प्रकोप नहीं समझा है बल्कि अन्य रोगों के समान उसके भी शारीरिक कारण ढूंढने का उल्लेख किया हैं। यूनानी पुराण कथाओं में डेल्फी का मंदिर प्रसिद्ध जहां पुजारिन आसन पर बैठकर तंद्रा में कुछ बोलती रहती थी, जिसे भविष्यवाणी समझा जाता था। ओल्डन्यू टेस्टामेण्ट में भी कई स्थानों पर मिर्गी का उल्लेख आता है जहां उसे पवित्र रोग कहा गया क्योंकि वह ईश्वर प्रदत्त है। बाईबिल में उद्धरण आते हैं कि ईसा मसीह ने मिर्गी-रोगियों का उद्धार किया।[8] [क]सेन्टपॉल का का जन्म ईसा बाद की पहली शताब्दी में हुआ था। वे यहूदी थे व ईसाईयों के कट्टर विरोधी। बाईबल में प्राप्त अनेक उद्धरणों के आधार पर अनुमान लगाया जाता है कि उन्हें यदा-कदा मिर्गी के दौरे आते थे। [ख]

मध्यकाल[संपादित करें]

मध्यकाल के फ्रांस मे जोन ऑफ आर्क नामक महानायिका को अजीब कुछ आवाजें सुनाई देने व दृश्य दिखाई देने का उल्लेख है। वैज्ञानिक शब्दावली में ये विभ्रम (हैल्यूसीनेशन) कहलाता है और मस्तिष्क के रोगों के कारण होता है।[8] संभवतः उसके मस्तिष्क के बायें गोलार्ध व टेम्पोरलआस्सीपिटल खण्ड में विकृति रही होगी।[ग] प्राचीन संस्कृत साहित्य में महाकवि माघ ने मिर्गी की तुलना सागर से की है।[घ] शेक्सपीयर साहित्य में भी कई बार अनेक स्थलों पर मिर्गी का उल्लेख आता है। उनकी ऑथेलो नामक रचना के नायक को मिर्गी का दौरा पडता है तथा दो अन्य पात्र कैसियो व इयागो उसकी हंसी उडाते हैं।[च] उन्नीसवीं शताब्दी के महानतम लेखक फेदोर मिखाईलोविच दास्तोएवस्की को २७ वर्ष की आयु में साईबेरिया में कारावास की सजा भुगतते समय दौरे में बढ़ोत्तरी की शिकायत आयी।[छ] दास्तोएवस्ककी ने उपन्यास द ईडियट में अपनी बीमारी को नायक प्रिस मिखिन पर आरोपित कर दिया है। [ज]टेम्पोरल खण्ड से उठने वाले आंशिक जटिल (सायकोमोटर) दौरों में यह अधिकता से होता है। इसे फ्रेंच भाषा में देजा-वू कहते हैं। प्रसिद्ध अंग्रेजी कवि लार्ड टेनीसन व गद्यकार चार्ल्स डिकेन्सन ने भी देजा-वू को भावनाओं में व्यक्त किया है।[झ][ट] हालैण्ड के विश्वविख्यात चित्रकार विन्सेन्ट वान गाग को भी मिर्गी रोग था उसके बावजूद वे श्रेष्ठ कोटि के कलाकार थे।

कारण[संपादित करें]

मानव मस्तिष्क कई खरब तंत्रिका कोशिकाओं से निर्मित होता है। इन कोशिकाओं की क्रियाशीलता कार्य-कलापों को नियंत्रित करती है। मस्तिष्क के समस्त कोषों में एक विद्युतीय प्रवाह होता है जो नाड़ियों द्वारा प्रवाहित होता है। ये सारे कोष विद्युतीय नाड़ियों के माध्यम से आपस में संपर्क बनाये रखते हैं, लेकिन कभी मस्तिष्क में असामान्य रूप से विद्युत का संचार होने से व्यक्ति को एक विशेष प्रकार के झटके लगते हैं और वह मूर्छित हो जाता है। ये मूर्छा कुछ सेकिंड से लेकर ४-५ मिनट तक चल सकती है।[3] मिर्गी रोग दो प्रकार का हो सकता है आंशिक तथा पूर्ण। आंशिक मिर्गी में मस्तिष्क का एक भाग अधिक प्रभावित होता है। पूर्ण मिर्गी में मस्तिष्क के दोनों भाग प्रभावित होते हैं। इसी प्रकार अनेक रोगियों में इसके लक्षण भी भिन्न-भिन्न होते हैं। प्रायः रोगी व्यक्ति कुछ समय के लिए चेतना खो देता है। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार सूअर की आंतों में मिलने वाले फीताकृमि के संक्रमण से भी मिर्गी की संभावना रहती है। इस कृमि का सिस्ट यदि किसी प्रकार मस्तिष्क में पहुँच जाए तो उसके क्रियाकलापों को प्रभावित कर सकता है, जिससे मिर्गी की आशंका बढ़ जाती है।

कैंब्रिज विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं की एक टीम के नायक माईक एडवर्डसन के अनुसार ग्राही तंत्रों से मिलने वाले संकेतों में गड़बड़ी के कारण ही मिर्गी और पी.एम.टी.की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। नए अध्ययन में यह भी पाया कि मस्तिष्क में ग्राही तंत्रों की संख्या बहुत कम होती है लेकिन ये मानवीय चेतना के नियंत्रण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनके अनुसार ग्राही तंत्रों की रचना के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त कर ली गई है, अतः इसमें गड़बड़ी के कारण होने वाली बीमारियों के इलाज के लिए दवाएं तैयार करना अब आसान हो गया है।[9]

दौरे के समय[संपादित करें]

दौरों की अवधि कुछ सेकेंड से लेकर दो-तीन मिनट तक होती है। और यदि यह दौरे लंबी अवधि तक के हों तो चिकित्सक से तत्काल परामर्श लेना चाहिये। कई मामलों में मिरगी की स्थिति पुरुषों की तुलना में महिलाओं में अलग होती है। दोनों की स्थिति में अंतर का प्रमुख कारण महिलाओं और पुरुषों में शारीरिक और सामाजिक अंतर का होना होता है। जब रोगी को दौरे आ रहे हों, या बेहोश पडा हो, झटके आ रहे हों तो उसे साफ, नरम जगह पर करवट से लिटाकर सिर के नीचे तकिया लगाकर कपडे ढीले करके उसके मुंह में जमा लार या थूक को साफ रुमाल से पोंछ देना चाहिये। दौरे का काल और अंतराल समय ध्यान रखना चाहिये। ये दौरे दिखने में भले ही भयानक होते हों, पर असल में खतरनाक नहीं होते। दौरे के समय इसके अलावा कुछ और नहीं करना होता है, व दौरा अपने आप कुछ मिनटों में समाप्त हो जाता है। उसमें जितना समय लगना है, वह लगेगा ही।[2] ये ध्यान-योग्य है कि रोगी को जूते या प्याज नहीं सुंघाना चाहिये। ये गन्दे अंधविश्वास हैं व बदबू व कीटाणु फैलाते हैं। इस समय हाथ पांव नहीं दबाने चाहिये न ही हथेली व पंजे की मालिश करें क्योंकि दबाने से दौरा नहीं रुकता बल्कि चोट व रगड़ लगने का डर रहता है। रोगी के मुंह में कुछ नहीं फंसाना चाहिये। यदि दांतों के बीच जीभ फंसी हो तो उसे अंगुली से अंदर कर दें अन्यथा दांतों के बीच कटने का डर रहता है।

मिरगी के रोगी सामान्य खाना खा सकते हैं अतएव उन्हें भोजन का परहेज नहीं रखना चाहिये। इस अवस्था में व्रत, उपवास, रोजे आदि रखने से कुछ रोगियों में दौरे बड़ सकते हैं अतः इनसे बचना चाहिये। यदि अन्न न लेना हो तो दूध या फलाहार द्वारा पेट आवश्यक रूप से भरा रखना चाहिये। मिर्गी रोगी का विवाह हो सकता है एवं वे प्रजनन भी कर सकते हैं। उनके बच्चे स्वस्थ होंगे या उन्हें मिर्गी होने की अधिक संभावना नहीं होती। गर्भवती होने पर महिला को दौरे रोकने की गोलियाँ नियमित लेते रहना चाहिये[10] क्योंकि इन गोलियों से अधिकतर मामलों में बुरा असर नहीं पडता। गोलियाँ खाने वाली महिला स्तनपान भी करा सकती है।

रोग की संभावना[संपादित करें]

मिर्गी किसी को भी हो सकती है, बालक, वयस्क, वृद्ध, पुरुष, स्त्री, सब को। दिमाग पर जोर पडने से मिर्गी नहीं होती। कई लोग खूब दिमागी काम करते हैं परन्तु स्वस्थ रहते हैं। मानसिक तनाव या अवसाद से मिर्गी नहीं होती है। अच्छे भले, हंसते-गाते इंसान को भी मिर्गी हो सकती है। मेहनत करने और थकने से भी मिर्गी नहीं होती, वरन ये आराम करने वाले को भी हो सकती है। कमजोरी या दुबलेपन से मिर्गी नहीं होती बल्कि खाते पीते पहलवान को भी हो सकती है, न ही मांसाहार करने से मिर्गी होती है, बल्कि शाकाहारी लोगों को भी उतनी ही संभावना से मिर्गी हो सकती है।[2] मिर्गी का एक कारण सिर की चोट भी है। सामान्यत: महिलाओं में इसका प्रभाव प्रजनन शक्ति में देखने में आता है। हालांकि, इसका ये अर्थ नहीं होता है कि मिरगी से पीड़ित महिला रोगियों को बच्चा नहीं होता, ऐसा बिल्कुल नहीं है।[10] मिरगी से पीड़ित महिला रोगियों के बच्चे सामान्य होते हैं। चिकित्सकों के अनुसार जन्म के दौरान चोट लगना भी मिरगी रोग का एक कारण होता है। मिर्गी खानदानी रोग नहीं है और बहुत कम मामलों में इसका खानदानी प्रभाव देखा जाता है जो कि एक संयोग हो सकता है। ९० प्रतिशत मामलों में खानदानी असर नहीं होता। मिर्गी के अधिकांश रोगियों का दिमाग अच्छा होता है व अनेक रोगी बुद्धिमान व चतुर होते हैं। लगभग सभी रोगी समझदार होते हैं। पागलपन व दिमागी गड़बड़ियां बहुत कम मामलों में देखी जाती हैं।[2] मनोचिकित्सकों के अनुसार इस रोग से ग्रसित व्यक्ति आम लोगों की तरह अपना जीवन व्यतीत कर सकते हैं।

उपचार[संपादित करें]

मिरगी का उपचार दवाओं और शल्य-क्रिया के द्वारा किया जा सकता है, पर इस रोग का उपचार लगातार कराने की ap रहती है। कभी-कभी इस रोग का उपचार तीन से पांच वर्ष तक चलता है। सामान्यतया मिर्गी का रोगी ३-५ वर्ष तक औषधि लेने के बाद स्वस्थ हो जाता है, परंतु यह सिर्फ ७० प्रतिशत रोगियों में ही संभव हो पाता है। अन्य ३० प्रतिशत रोगियों के लिए ऑपरेशन आवश्यक होता है। मिर्गी रोगियों में आवाज बदल जाने, चक्कर आने, जबान लड़खड़ाने की समस्या पाई जाती है। ऐसे रोगियों को सिर्फ ऑपरेशन से ही ठीक किया जा सकता है।[11] इस ऑपरेशन से पूर्व रोगी के मस्तिष्क का एम आर आई परीक्षण किया जाता है, जिसके द्वारा यह ज्ञात होता है कि मस्तिष्क का कौन-सा भाग प्रभावित है। उसके बाद शल्य-क्रिया द्वारा प्रभावित भाग को निकाल दिया जाता है। इसके बाद रोगी एक-दो साल औषधि लेने के बाद पूर्णतया स्वस्थ हो जाता है।

आधुनिक चिकित्सा-शास्त्र में ये ऑपरेशन गामा नाइफ रेडियो सर्जरी के प्रयोग से लेज़र किरण द्वारा किया जाता है, जिसमें बिना चीर-फाड़ के ही लेज़र के उपयोग से विकृत भाग को हटा दिया जाता है।[11]

टीका टिप्पणी[संपादित करें]

क.    ^ प्रभु मेरे बालक पर कृपा करो। उसे मिर्गी है। वह बहुत पीडा भोगता है। कभी वह आग में गिर जाता है तो कभी पानी में (मेथ्यू १७ः१५) एक मसीहा ने लिखा मैंने ईश्वर के रहने की तमाम जगहों को इतनी सी देर में देख लिया। जितनी देर में एक घडा पानी भी खाली नहीं किया जा सकता।
ख.    ^ एक पत्र में उन्होंने लिखा कि उन्हें एक अजीब असामान्य से दौरे में आध्यात्मिक अनुभूतियाँ हुई थीं - मैं नहीं जानता कि मैं शरीर के अन्दर था या बाहर। मुझे ईश्वर ने कुछ पवित्र रहस्य बताये कि जिन्हें होंठ दुहरा नहीं सकते। सेन्टपाल के जीवन की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना थी उनका धर्मान्तरण। लगभग ३० वर्ष की उम्र में वे येरूशलम से दमिश्क पैदल जा रहे थे। उद्देश्य था दमिश्क के ईसाईयों को सजा देना। मार्ग में अजीब घटा। एक तीव्र प्रकाश हुआ। वे जमीन पर गिर पडे। उन्हें कुछ आवाजें सुनाई दीं जो ईसा मसीह के समान थी। वे उठे परन्तु अन्धे हो चुके थे। दमिश्क पहुंचने के तीन दिन बाद उनकी रोशनी फिर लौटी। उनका मन बदल चुका था। ईसाई धर्म अंगीकार कर लिया। अनेक न्यूरालाजिस्ट ने सेन्टपाल के जीवन पर उपलब्ध ईसाई धर्म साहित्य का गहराई से अध्ययन किया है तथा वे मत के हैं कि सेन्टपाल को एपिलेप्सी का दौरा आया होगा। उनके धर्मान्तरण में मिर्गी का कुछ प्रभाव जरूर था।
ग.    ^ जोन ऑफ़ आर्क में एक बार लिखा मुझे दायीं होर से, गिरजाघर की तरफ से आवाज आयी। ईश्वर का आदेश था। आवाज के साथ सदैव प्रकाश भी आता है। प्रकाश की दिशा भी वहीं होती है जो ध्वनि की। अनुमान लगा सकते हैं कि उसके मस्तिष्क के बायें गोलार्ध व टेम्पोरल व आस्सीपिटल खण्ड में विकृति रही होगी।
घ.    ^ दोनों भूमि पर पडे हैं, गरजते हैं, भुजाएं हिलाते हैं व फेन पैदा करते हैं। (शिशुपाल वध - ७वीं शताब्दी ईसा पश्चात्)। : महाकवि माघ
च.    ^ जूलियस सीजर का एक अंश उद्धृत है -

कैसियस: धीरे बोलो, फिर से कहो, क्या सच ही सीजर मूच्र्छित हो गये थे ?
कास्का: हां ! रोम के सम्राट ऐन ताजपोशी के समय चक्करघिन्नी के समान घूमे और गिर पडे। मुंह से झाग निकल रहा था। बोल बन्द था।
व्रूटस: यह ठीक उसी बीमारी के समान लगता है जिसे मिर्गी कहते हैं। होश में आने के बाद जूलियस ने क्या कहा ?
कास्का: बोले यदि मैंने कोई ऐसी वैसी बात कही हो तो ... उसे मेरी कमजोरी व बीमारी माना जाए। और इसी बेहोशी के दौरे के कारण वह बाद में बडी देर तक उदास बना रहा।


छ.    ^ डायरी में उन्हें अजीब, भयावह, रोचक पूर्वाभास होता है, हर्षातिरेक का। देखो हवा में कैसा शोर भर गया है। स्वर्ग मानों धरती पर गिरा आ रहा है और उसने मुझे समाहित कर लिया है। मैंने ईश्वर को छू लिया है। पैगम्बर साहब को होने वाले रुहानी इलहाम की भी ऐसी ही अवस्था थी।
ज.    ^ वह मास्को की सडकों पर बेमतलब घूमता रहता है और बताता है कभी-कभी सिर्फ पांच-छः सेकण्ड के लिये मुझे शाश्वत संगीत की अनुभूति होती है। सब कुछ निरपेक्ष और निर्विवाद लगता है भयावह रूप से पारदर्शी लगता है। कभी दिमाग में अचानक आग लग उठती है। बादलों की सी तेजी से जीवन की चैतन्यता का प्रभाव दस गुना बढ जाता है। फिर पता नहीं क्या होता है।
झ.    ^ प्रसिद्ध अंग्रेजी कवि लार्ड टेनीसन व गद्यकार चार्ल्स लिखित निम्न अंश देजा वू की भावना को अभिव्यक्‍त करते हैं -

कुछ-कुछ है या कि लगता है, रहस्यमयी रोशनी सा मुझे छूता है।
जैसे कि भूले हूए सपनों की झलकें हों, कुछ यहाँ की हों, कुछ वहां की हों,
कुछ किया था, न जाने कहाँ की हों, सीमा उनकी भाषा से परे की हो।
- लार्ड टेनीसन


ट.    ^ हम सब लोगों के दिल दिमाग पर कभी-कभी एक अजीब सी अनुभूति हावी होती है कि जो कुछ कहा जा रहा है या किया जा रहा है वह सब किसी अनजाने सुदूर अतीत में पहले भी कहा जा चुका है या किया जा चुका है तथा यह भी कि चारों ओर जो वस्तुएें परिस्थितियाँ चेहरे विद्यमान हैं वे किसी धुंधले भूतकाल में पहले भी घटित हो चुकी हैं तथा यह भी यकायक याद हो आता है कि अब आगे क्या कहा जाएगा।

- चार्ल्स डिकन्सन

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. मिरगी Archived 2015-06-01 at the Wayback Machine, हिन्दुस्तान लाइव, १८ नवम्बर २००९
  2. मिर्गी के बारे में खास-खास और सच्ची बातें Archived 2013-02-13 at the Wayback Machine, वेब दुनिया, १६ मई २००८, अपूर्व पुराणिक
  3. मिर्गी से डरें नहीं, उसे समझें Archived 2012-01-25 at the Wayback Machine, वेब दुनिया, डॉ॰ वोनोद गुप्ता।
  4. एपिलेप्सी फैक्ट्स Archived 2014-12-06 at the Wayback Machine(अंग्रेज़ी)
  5. वर्ल्ड एपिलेप्सी डे सिलिब्रेटेड ऍट जहांगीर हॉस्पिटल। द टाइम्स ऑफ इंडिया।(अंग्रेज़ी)
  6. मिरगी रोग हो सकता है जानलेवा Archived 2012-01-19 at the Wayback Machine, याहू जागरण, १७ नवम्बर २००९
  7. "हाँ, मैं कर सकता हूँ: मिर्गी के साथ जीवन". अभिगमन तिथि 2021-01-15.
  8. इतिहास, धर्म व कला के आईने में मिर्गी[मृत कड़ियाँ], माई वेब दुनिया, अपूर्व पुराणिक, १६ मई २००८
  9. ग्राही तंत्रों की बनावट मिर्गी का कारण Archived 2008-03-13 at the Wayback Machine, दैनिक भास्कर, ११ मार्च २००८
  10. गर्भावस्था एवं मिर्गी रोग Archived 2009-08-23 at the Wayback Machine, वेबदुनिया, डॉ॰टी॰एन॰ दूबे
  11. मिर्गी का इलाज ऑपरेशन से Archived 2009-09-27 at the Wayback Machine, वेबदुनिया।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]