अछाम जिला
अछाम जिला | |
|---|---|
| जिला | |
अछाम जिले का स्थान | |
| निर्देशांक: 29°6′40.95″N 81°17′55.78″E / 29.1113750°N 81.2988278°E | |
| देश | नेपाल |
| प्रदेश | सुदूरपश्चिम प्रदेश |
| मुख्यालय | मंगलसेन |
| शासन | |
| • प्रणाली | जिला समन्वय समिति |
| • सभा | जीविस, अछाम |
| क्षेत्रफल | |
| • कुल | 1,692 kमी2 (653 वर्ग मील) |
| जनसंख्या (2068) | |
| • कुल | २३१,२८५ |
| वेबसाइट | आधिकारिक वेबसाइट |
अछाम नेपाल के सुदूरपश्चिम प्रदेश में स्थित एक पर्वतीय जिला है। लगभग 1,680 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला अछाम नेपाल के दुर्गम जिलों में से एक माना जाता है। नेपाल के प्रशासनिक पुनर्संरचना के अनुसार यह जिला सुदूरपश्चिम प्रदेश के अंतर्गत आता है। अछाम जिले का मुख्यालय मंगलसेन है। वर्तमान में सेवा में नहीं रहने वाला साँफेबगर हवाई अड्डा जिला मुख्यालय मंगलसेन से लगभग आठ घंटे की पैदल दूरी पर स्थित है। भौगोलिक दृष्टि से दुर्गम होने के बावजूद अछाम जिला प्राकृतिक संपदा एवं पर्यटन स्थलों से समृद्ध है। रामारोशन क्षेत्र, खप्तड़ क्षेत्र, बरदा देवी मंदिर, वैजनाथ मंदिर, दर्ना दरबार, मंगलसेन दरबार, विनायक के पाँच देवल, दर्ना के देवल, बान्नीगढ़ी, जैगढ़ तथा बयलपाटा आदि इस जिले के प्रमुख धार्मिक एवं पर्यटन महत्त्व के स्थल हैं।
नेपाल का संविधान २०७२ के अनुसार नेपाल के पुनर्संरचना अभियान के दौरान संघीय मामलों एवं स्थानीय विकास मंत्रालय के निर्णयानुसार इस जिले को 4 नगरपालिका, 6 ग्रामपालिकाओं तथा 2 संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित किया गया है। रत्यौली, भुवा, न्याउले, पुतला, देउडा गीत तथा हुड्केली यहाँ की प्रमुख सांस्कृतिक परंपराएँ हैं। अपनी विशिष्ट रीति-रिवाजों और लोकाचारों के लिए प्रसिद्ध अछाम के निवासी अछामी भाषा का प्रयोग करते हैं। इस क्षेत्र के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि एवं पशुपालन है, जबकि रोजगार की खोज में अनेक लोग पड़ोसी देश भारत तथा अन्य देशों में भी जाते हैं।
अछाम जिला अनेक जातीय एवं पारिवारिक वंशों के उद्गम-स्थल के रूप में भी प्रसिद्ध है। उदाहरणस्वरूप, चाल्सा से चालिसे, ढाँकु से ढकाल, टिमिलसैन से तिम्सिना अथवा तिमल्सेना, घोडासैन से घोडासैनी, पुरासैन से पुडासैनी, धमाली से धमाला, रिमा से रिमाल, बारला से बराल, कुइका से कुईकेल तथा बजगाँव से बजगाईं जैसे कुल एवं वंशों की उत्पत्ति मानी जाती है। इस प्रकार अछाम जिला ऐतिहासिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।
नामकरण
[संपादित करें]अछाम नाम की उत्पत्ति के संबंध में विभिन्न मत एवं आधार प्रचलित हैं। इनमें से कुछ प्रमुख मत निम्नलिखित हैं—
- अछाम नामकरण के संबंध में अछामी राजा की प्रारम्भिक राजधानी सेरा बुढी धर्पू का उल्लेख किया जाता है। सेरा बुढी धर्पू से कुछ नीचे पास्तोली गाड़ से गिरने वाले तीन झरनों में से एक अपेक्षाकृत बड़ा एवं भयावह स्वरूप का है। इन तीनों झरनों को जल प्रदान करने वाले स्रोत को प्राचीन काल में अस्माम्बु कहा जाता था। इस स्थान पर प्रतिवर्ष माघ संक्रांति के अवसर पर विशाल मेले का आयोजन होता है। एक मत के अनुसार, इसी अस्माम्बु शब्द का कालान्तर में अपभ्रंश होकर अस्माम्बु–अछाम्म और अंततः अछाम रूप विकसित हुआ।
- डोटी जिले के ब्राह्मण वंश के गोपाल खतिवड़ाभट्ट नामक व्यक्ति के चार पुत्र थे। उनके सबसे छोटे पुत्र प्रभाष के पुत्र देवेन्द्र का विवाह प्रसिद्ध जुम्ली राजा अशोक मल्ल की पुत्री हरमता मैया के साथ प्रेम-विवाह के रूप में हुआ। विवाह के पश्चात वे कुछ वर्षों तक जुम्ला में रहे। बाद में उन्हें नौखुवा राज्य प्राप्त हुआ और वे वहीं शासन करने लगे। उनके वंश में जन्म लेने वाले पुत्रों के राजा बनने तथा 'शाह' उपाधि धारण करने की परम्परा स्थापित हुई, जिसे लोगों ने अत्यन्त अचंभित करने वाली घटना माना। इसी अचम्म शब्द का कालान्तर में अपभ्रंश होकर अछाम नाम प्रचलित हुआ।
- प्राचीन काल में तत्कालीन मुगल साम्राज्य के कठोर दमन को सहन न कर पाने के कारण कुछ भारतीय हिन्दू नेपाल में प्रवेश करने के लिए विवश हुए। भ्रमण करते हुए वे नेपाल के पश्चिमी क्षेत्र स्थित नौखुवा, अर्थात वर्तमान अछाम, पहुँचे। उस समय नौखुवा क्षेत्र स्वादिष्ट आमों की प्रचुरता के लिए प्रसिद्ध था। अनुकूल जलवायु तथा बड़ी मात्रा में मीठे आम उपलब्ध होने के कारण वे भारतीय वहीं बस गए। एक लोकमान्यता के अनुसार, हिन्दी में मीठे आम को अच्छा आम कहा जाता था और यही शब्द कालान्तर में अपभ्रंश होकर अछाम के रूप में प्रचलित हो गया।[1]
इतिहास
[संपादित करें]अछाम जिले का इतिहास नेपाल के प्राचीन इतिहास से घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ है। नेपाल के सुदूरपश्चिम विकास क्षेत्र के अंतर्गत सेती अंचल में स्थित यह पर्वतीय जिला ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है। प्राचीन काल में वर्तमान अछाम को नौखुवा के नाम से जाना जाता था। नौखुवा का अर्थ नौ खण्डों वाला क्षेत्र माना जाता है। उस समय अछाम को नौ विभिन्न भागों में विभाजित कर छोटे-छोटे राज्यों के रूप में शासित किया जाता था। नेपाल के एकीकरण के समय अछाम बाइसी राज्यों के समूह का एक सदस्य राज्य था। कर्णाली प्रदेश में नागराजवंशी मल्ल शासकों के शासन से पूर्व अछाम पर पाल वंश का शासन था। बाद में मल्ल शासनकाल में यहाँ सभ्यता और संस्कृति का उल्लेखनीय विकास हुआ। तत्पश्चात मल्ल शक्ति के क्षीण होने पर कर्णाली और गण्डकी क्षेत्रों में अनेक छोटे राज्यों का उदय हुआ, जिनमें अछाम भी एक स्वतंत्र हिन्दू राज्य के रूप में स्थापित हुआ। अछाम क्षेत्र को मध्यकाल में विकसित हुई खस सभ्यता के प्रमुख उद्गम-स्थलों में से एक माना जाता है।[1]
राणा शासनकाल में अछाम का कैलाश नदी के पूर्व का भूभाग दैलेख जिला तथा पश्चिम का भूभाग डोटी जिला के अंतर्गत आता था। उस समय अछाम, डोटी के लिए खाद्यान्न आपूर्ति का प्रमुख केंद्र था। विक्रम संवत् २०१४ में अछाम के दोनों भागों को मिलाकर डोटी जिले में सम्मिलित किया गया। बाद में विक्रम संवत् २०१८ के वैशाख १ गते (1 वैशाख 2018 वि.सं.) को नेपाल को 14 अंचलों और 75 जिलों में विभाजित किए जाने पर अछाम एक पृथक जिले के रूप में स्थापित हुआ। उस समय जिले को 39 ग्राम पंचायतों में विभाजित किया गया था, जबकि बाद में इसे 75 ग्राम विकास समितियों (गा.वि.स.) में विभाजित किया गया।
अछामी राजाओं का मूल निवास बड्ढी (बुढो) अछाम, अर्थात वर्तमान सेरा गा.वि.स. के कवालेख नामक स्थान में माना जाता है। इसके पश्चात राजधानी क्रमशः बान्नीगढ़ी, पुनः कवालेख तथा बाद में मंगलसैन स्थानांतरित हुई। मंगलसैन में निर्मित भव्य मंगलसेन दरबार वर्ष 2058 वि.सं. में हुए सशस्त्र संघर्ष के दौरान नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के आक्रमण में ध्वस्त हो गया और वर्तमान में उसके अवशेष भी लगभग समाप्त हो चुके हैं।
अछाम का इतिहास प्राचीन काल से ही संघर्षों और युद्धों से प्रभावित रहा है। यद्यपि विक्रम संवत् 1847 में नेपाल एकीकरण के दौरान अछाम राज्य विशाल नेपाल में सम्मिलित हो गया था, तथापि 1848 वि.सं. की चैते दशैं की रात्रि में देवचन्द्र शाह (द्वितीय) ने विद्रोह कर पुनः बान्नीगढ़ी पर अधिकार स्थापित किया और अछाम राज्य के अस्तित्व को बनाए रखा। इसके बाद मध्यकाल में भी अछाम को अनेक युद्धों का सामना करना पड़ा। इन्हीं संघर्षों की स्मृति से जुड़े जयगढ़ क्षेत्र में महामण्डलेश्वर यशोव्रह्म द्वारा उत्कीर्ण शिलालेख शांति और सद्भाव का संदेश देने वाले प्राचीन अभिलेखों में से एक माना जाता है। उस शिलालेख में निम्नलिखित पंक्तियाँ अंकित हैं—
ॐ मपिद्मे हुँ। महामण्डलेश्वर
बुद्ध कुलावतार यशोव्रहमचिरंजयतु।। श्री श्वादे १२७६।।
लोकसाहित्य की दृष्टि से अछाम जिला अत्यंत समृद्ध माना जाता है। यहाँ प्राप्त प्राचीन अभिलेख, प्राचीन ग्रंथ तथा देवलों पर उत्कीर्ण शिलालेख इस क्षेत्र की ऐतिहासिक पहचान को स्पष्ट करते हैं। जिले की साहित्यिक परंपरा अत्यंत प्राचीन है। अछाम नरेश श्रीभोर शाह के कनिष्ठ पुत्र बाकाबीर के नेतृत्व में सुदूरपश्चिम क्षेत्र में हुए विद्रोह के दौरान जंग बहादुर राणा के आदेश पर विक्रम संवत् 1906 में बाँकावीर (बलदेव शाही) को मृत्युदंड दिया गया था।
इसी राजवंश की काजी परंपरा से सम्बद्ध पहलमानसिंह स्वाँर ने नेपाली भाषा का प्रथम दुःखांत नाटक अटल बहादुर रचकर न केवल साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया, बल्कि साहित्यिक चेतना और नवजागरण को भी प्रोत्साहित किया। इस प्रकार अछाम केवल मौखिक साहित्य की परंपरा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि लिखित साहित्य का भी एक प्राचीन और समृद्ध केंद्र रहा है।
अछाम जिले में लोकगीत, लोकगाथाएँ, लोककथाएँ, लोकनाटक तथा लोकोक्तियाँ जैसी अमूल्य लोकसाहित्यिक धरोहरें प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। इन्हें साहित्य की अमूल्य निधि माना जाता है। इन लोकपरंपराओं ने अछाम के लिखित साहित्य की आधारशिला तैयार करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके अतिरिक्त यहाँ के देउडा, रतेउड़ी, हुड्केनाचा, पुतला, होरी, भूओ, पञ्चेबाजा, लोकगीत तथा विभिन्न लोकलयों से युक्त सांस्कृतिक मौखिक रचनाओं ने अछाम की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक परंपरा को समृद्ध और जीवंत बनाए रखा है। यह समस्त योगदान अछाम जिले की विशिष्ट साहित्यिक एवं सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण आधार है।
प्रशासनिक विभाजन
[संपादित करें]जिले में कुल 10 स्थानीय निकाय (स्थानीय तह) हैं, जिनमें 4 नगरपालिकाएँ तथा 6 ग्रामपालिकाएँ शामिल हैं।[2]

जिले के प्रमुख क्षेत्र
[संपादित करें]अछाम जिला खस राज्यकाल में विभिन्न राज्यों में कभी विभाजित और कभी एकीकृत होता रहा तथा अनेक राजाओं द्वारा शासित क्षेत्र होने के कारण यहाँ प्रचुर मात्रा में पुरातात्त्विक धरोहरें पाई जाती हैं। इसके अतिरिक्त यह जिला जल संसाधनों और वन सम्पदा की दृष्टि से भी अत्यन्त समृद्ध है। जिले की प्रमुख सम्पदाएँ निम्नलिखित हैं:-
जल सम्पदाएँ
[संपादित करें]कर्णाली, सेती, बुढीगंगा, कैलाश खोला, भानाकोट गाड़, रामारोशन ताल, चाईरहो गाड़, कुईका गाड़, विनायक गाड़, कुवाली गाड़, लुंग्रेली गाड़, सोकट गाड़, जिज्यारी गाड़, पायली गाड़, छिपे खोला, चिसी खोला, तालागाड़ खोला, चिल्ताडा गाड़ खोला आदि।
प्रमुख पर्यटन स्थल एवं पुरातात्त्विक धरोहरें
[संपादित करें]धार्मिक एवं पर्यटन की दृष्टि से विशिष्ट महत्त्व रखने वाले अछाम जिले में अनेक पर्यटन स्थल तथा प्राकृतिक एवं पुरातात्त्विक धरोहरें स्थित हैं। इनमें से कुछ प्रमुख स्थल निम्नलिखित हैं।
दर्ना के पञ्चदेवल
[संपादित करें]दर्ना के राजा के दरबार के पश्चिमी भाग में एक लंबी पहाड़ी श्रृंखला पर पत्थरों से निर्मित पञ्चदेवल स्थित हैं। पञ्चदेवल के निकट एक शिलालेख भी प्राप्त हुआ है। किन्तु उस शिलालेख पर स्थानीय ग्वालों एवं पशुपालकों द्वारा बार-बार आँसी (हँसिया) तेज करने के कारण उसका अधिकांश भाग घिस गया है और अब उसे स्पष्ट रूप से पढ़ पाना कठिन हो गया है। फिर भी साहित्यिक इतिहास के अध्ययन में इस शिलालेख का महत्त्वपूर्ण योगदान माना जाता है।
विनायक के पञ्चदेवल
[संपादित करें]विनायक गा.वि.स. अछाम के प्रमुख ऐतिहासिक स्थलों में से एक है। यह स्थान धार्मिक, ऐतिहासिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना जाता है। यहाँ स्थित पञ्चदेवल किसी राजा-महाराजा द्वारा नहीं, बल्कि राजकुमार अक्षय मल्ल द्वारा शाके 1202 (संवत् 1337) में निर्मित कराए गए थे। तृतीय देवल के प्रवेशद्वार की तोरणशिला पर उत्कीर्ण अभिलेख में निम्नलिखित पंक्तियाँ अंकित हैं—
- ॐ स्वस्श्रिमतः अक्षयमल्ल देवस्थल सपरिवारा
- चिरंजयंतु आत्मन्निभिन्ताधै एकतारसा
- पुरुषा निभिनानजैराज प्रासाद करायो शाके
- १२०२ सुत्रधार नागदेव नाम कमायो।
कुच्चीकोट का अभिलेख
[संपादित करें]अछाम जिले के कालिकास्थान गा.वि.स. के वार्ड संख्या 8 में स्थित नाउलो (जलस्रोत अथवा कुएँ) के भीतर स्थापित एक पत्थर पर निम्नलिखित अभिलेख प्राप्त हुआ है—
- (१) ऊँ मणिपदमे हु
- (२) श्री शोक १२७६.......महाराजधिराज
- पृथ्वीमल्लपश्चिरंजयतु।
- शुष्टेत वर्षक्ष अपूण्ये नमः वेसात्वासुधिभरभाव कृता।।
घोडासैन का शिलालेख
[संपादित करें]अछाम जिले के घोडासैन क्षेत्र में स्थित “ॐ मणिपद्मे हुँ” उत्कीर्ण शिलालेख भी अछाम के साहित्यिक एवं ऐतिहासिक विकास का महत्वपूर्ण प्रमाण माना जाता है।
इस प्रकार अछाम जिले में साहित्यिक परम्परा की पृष्ठभूमि इन प्राचीन अभिलेखों से निर्मित होती दिखाई देती है। इन अभिलेखों में तत्कालीन शिल्पकला के उत्कृष्ट उदाहरण भी देखने को मिलते हैं। कुछ स्थानों पर भूमिदान सम्बन्धी ताम्रपत्र भी प्राप्त हुए हैं, किन्तु आज उनमें से अधिकांश सुरक्षित नहीं रह सके हैं। जो अभिलेख एवं दस्तावेज उपलब्ध हैं, उनके माध्यम से न केवल नेपाली भाषा और साहित्य, बल्कि नेपाली संस्कृति एवं इतिहास की भी महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। नेपाली भाषा को उसके वर्तमान स्वरूप तक पहुँचाने में भी इन अभिलेखों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
अन्य पर्यटन स्थल
[संपादित करें]उपरोक्त स्थलों के अतिरिक्त अछाम जिला अनेक प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक धरोहरों से समृद्ध है। उदाहरणस्वरूप, रामारोशन ताल, नेपाल के चारधामों में से एक माने जाने वाले बैद्यनाथ क्षेत्र (बैजनाथ एवं कालिमाटी), तितौडा लेख, साँफेबगर आदि प्रमुख स्थल यहाँ स्थित हैं। इसके अतिरिक्त सुदूरपश्चिम क्षेत्र में प्रसिद्ध नौ-मुँही गाय (नौ मुठे गाई) भी इसी जिले में देखने को मिलती है।
अछाम में प्राप्त ताम्रपत्र अभिलेख
[संपादित करें]अछाम तथा इसके आसपास के क्षेत्रों से प्राप्त ताम्रपत्रों की सूची निम्नलिखित है :-
- वि. सं. 1488 का सुमति वर्मा का ताम्रपत्र
- वि. सं. 1485 का इन्द्रवर्मा एवं चन्द्रवर्मा का ताम्रपत्र
- वि. सं. 1527 का कीर्ति मल्ल का ताम्रपत्र
- वि. सं. 1701 का पहाड़ी शाही का ताम्रपत्र
- वि. सं. 1704 का बहादुर शाही का ताम्रपत्र
संस्कृति
[संपादित करें]सुदूरपश्चिम के प्रसिद्ध जिलों में गिने जाने वाले अछाम जिले की अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान है। जिले के अनेक गाविसों को छाउपड़ी-मुक्त गाविस घोषित किया जा चुका है। यहाँ की लोकसंस्कृति अत्यन्त समृद्ध और विविधतापूर्ण है। इसकी प्रमुख सांस्कृतिक विशेषताओं का वर्णन निम्न प्रकार किया जा सकता है।
लोकगीत
[संपादित करें]लोकगीत लोकसाहित्य की अत्यन्त लोकप्रिय और जनप्रिय विधा है। इसे लोकसाहित्य की सबसे प्राचीन विधाओं में से एक माना जाता है। लोकगीत का क्षेत्र अन्य साहित्यिक विधाओं की अपेक्षा अधिक व्यापक है। लोकगीत जनजीवन के हर्ष-विषाद, अनुभवों, जीवन-शैली, संस्कृति, धर्म तथा परम्पराओं से निर्मित होते हैं।
“लोक” से आशय उन सभी लोगों से है जो नगरों और गाँवों में निवास करते हैं तथा जिनके व्यावहारिक ज्ञान का आधार पुस्तकीय शिक्षा नहीं, बल्कि जीवनानुभव होता है। पाश्चात्य विचारधारा में “लोक” शब्द का प्रयोग सामान्य अथवा अशिक्षित जनसमुदाय के लिए किया गया है। इसी आधार पर “फोक” (Folk) शब्द की उत्पत्ति मानी जाती है। यह ऐंग्लो-सेक्सन मूल का शब्द है, जिसे जर्मन भाषा में “Volk” कहा जाता है। अंग्रेज़ी प्रयोग में “फोक” शब्द कभी-कभी असंस्कृत अथवा साधारण समाज का बोधक माना गया है, किन्तु आलोचनात्मक दृष्टि से यह अवधारणा संकीर्ण और एकपक्षीय मानी जाती है।
अंग्रेज़ी विश्वकोश में “फोक” शब्द के संबंध में कहा गया है—
- “आदिम अथवा मूल समाज के वे सभी व्यक्ति, जिनके सम्मिलन से समाज का निर्माण हुआ है, लोक कहलाते हैं।”
योगी नरहरिनाथ के अनुसार—
- “लोकसाहित्य इतिहास के कटु सत्य का यथार्थ प्रतिबिम्ब प्रस्तुत करता है।”
अछाम में भी लोकगीत अत्यन्त प्राचीन काल से गाए जाते रहे हैं। इन्हें केवल पुराने समय से प्रचलित कहना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि ये परम्पराएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तान्तरित होती हुई आज तक जीवित रही हैं। जिस प्रकार मानव जीवन के लिए वायु और जल आवश्यक हैं, उसी प्रकार मानवीय विकास के लिए सामाजिकता और संवेदनशीलता भी आवश्यक है। इसी संदर्भ में डोटेली लोकसाहित्य के अध्येता जयराज पन्त ने संवेदनशीलता को मानव जीवन का अनिवार्य तत्व बताया है।
लोकगीत वह गीत या संगीत है जो मानव समाज में मातृभाषा के माध्यम से सुख-दुःख, दया, ममता, प्रेम और भावनाओं की स्वाभाविक अभिव्यक्ति के रूप में स्वतः उत्पन्न होता है तथा लयात्मक और काव्यात्मक शैली में व्यक्त किया जाता है।
अछाम जिला भी लोकगीतों की समृद्ध परम्परा के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ की पहचान अनेक अवसरों पर लोकगीतों और लोकधुनों के माध्यम से प्रस्तुत की जाती है। इसके कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं—
- डोटी राम्रो डडेल्धुरा अछाम राम्रो साँफे
- मलाई पनि उडाइलैजा हिउँचुलिका डाँफे
- हुम्लो जाँच्या जुम्लो जाँच्या अछाम जाँचियान
- धन साँचिया मन साँचिया जोवन साँचियान
- बान्नी राम्रा बरदा देबी कोटघर कालिका
- अछाम त बैकुण्ठ रैछ धन्य होमालिका।
इस प्रकार अछाम जिले की पहचान वहाँ के लोकगीतों, लोकधुनों और लोकभाकाओं से निर्मित होती है। वहीं दूसरी ओर, अछाम ने अपनी समृद्ध लोकसाहित्यिक परम्परा के माध्यम से न केवल स्थानीय साहित्य को समृद्ध किया है, बल्कि नेपाली साहित्य की उन्नति और विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
अछाम जिले का प्रशासनिक विभाजन
[संपादित करें]अछाम जिले को दो संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित किया गया है। नेपाल सरकार ने आर्थिक वर्ष बि.स 2067/68 में मंगलसेन तथा साँफेबगर को दो अलग-अलग नगरपालिकाओं के रूप में घोषित किया था।
सन्दर्भ
[संपादित करें]- 1 2 डा. राजाराम सुवेदी, अछामको इतिहास
- ↑ "स्थानीय तह" (नेपाली भाषा में). संघीय मामिला तथा सामान्य प्रशासन मन्त्रालय. अभिगमन तिथि: 20 आश्विन 2082.
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