भारतीय नाम

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भारतीय पारिवारिक नाम अनेक प्रकार की प्रणालियों व नामकरण पद्धतियों पर आधारित होते हैं, जो एक से दूसरे क्षेत्र के अनुसार बदलतीं रहती हैं. नामों पर धर्म व जाति का प्रभाव भी होता है और वे धर्म या महाकाव्यों से लिये हुए हो सकते हैं. भारत के लोग विविध प्रकार की भाषाएं बोलते हैं और भारत में विश्व के लगभग प्रत्येक प्रमुख धर्म के अनुयायी मौजूद हैं. यह विविधता नामों व नामकरण की शैलियों में सूक्ष्म, अक्सर भ्रामक, अंतर उत्पन्न करती है. उदाहरण के लिये, पारिवारिक नाम की अवधारणा तमिलनाडु में व्यापक रूप से मौजूद नहीं थी.

कई भारतीयों के लिये, उनके जन्म का नाम, उनके औपचारिक नाम से भिन्न होता है; जन्म का नाम किसी ऐसे वर्ण से प्रारंभ होता है, जो उस व्यक्ति की जन्म-कुंडली के आधार पर उसके लिये शुभ हो. कुछ बच्चों को एक नाम दिया जाता है (दिया गया नाम). पारिवारिक नामों का प्रयोग न करने वाले समुदायों में, तीसरा नाम ईश्वर का नाम, या शिशु के लिंग के आधार पर दादा या दादी का नाम हो सकता है. कभी-कभी धार्मिक शिक्षाओं के एक भाग के रूप में अनेक शिशुओं को दो नाम दिये जाते हैं तथा “वेलंटी (Velanati)” और “तेलगण्य (Telaganya)” उनके मूल पैतृक स्थानों को सूचित करते हैं. इनका प्रयोग उप-जातियों की पहचान के लिये किया जाता है और इन्हें नियमित रूप से व्यक्ति के आधिकारिक नाम या दैनिक उपयोग के नाम के रूप में प्रयुक्त किया जाना आवश्यक नहीं है.

जाति-आधारित भेद-भाव के कारण या जाति के प्रति तटस्थ रहने के लिये, कई लोगों ने आनुवांशिक अंतिम नाम, जैसे कुमार, अपनाना शुरु कर दिया.[कृपया उद्धरण जोड़ें] राजकुमार (कन्नड़ फिल्मों के महानायक), दिलीप कुमार, मनोज कुमार और अधिक हालिया दौर में, अक्षय कुमार जैसे सिने अभिनेताओं ने मार्केटिंग कारणों से अपने अंतिम नाम के रूप में कुमार शब्द को अपनाया है. जब कुमार शब्द बहुत आम हो गया, तो लोगों ने अपने कुलनाम के रूप में रंजन और आनंद जैसे नाम अपना लिये.

अंग्रेज़ी भाषा की कुछ व्यावसायिक संज्ञाओं (occupational nouns) का प्रयोग भी कुलनाम के रूप में किया जाने लगा है, जैसे इंजीनियर. राजेश पायलट, भारत के एक पूर्व मंत्री, ने भारतीय वायु सेना में एक निश्चित अवधि बिताने के बाद इसे अपने कुलनाम के रूप में अपना लिया.

कुछ लोगों, कुछ सैकड़ा, ने अपने बच्चों के नाम अंतर्राष्ट्रीय ख्याति-प्राप्त व्यक्तियों के नाम पर रखने शुरु कर दिये हैं. अक्सर, कुलनाम का प्रयोग प्रथन नाम के रूप में किया जाता है, जैसे आइंस्टीन, चर्चिल, केनेडी, बीथोवन, शेक्सपियर आदि, और यह अभिभावकों के राजनैतिक रुझानों की ओर सूचित करता है. यह पद्धति विशिष्ट रूप से गोवा और तमिलनाडु में प्रचलित है. इस प्रकार के नामों के उदाहरणों में गोवा के चर्चिल बी. अलेमाओ और उनके भाई रूज़वेल्ट बी. अलेमाओ तथा केनेडी बी. अलेमाओ और तमिलनाडु के एम. के. स्टालिन और नेपोलियन आइन्सटाइन शामिल हैं. जैसा कि पश्चिमी समाजों में होता है, अब अभिभावक ऐसे नामों के साथ प्रयोग करने लगे हैं जो आम नाम नहीं हैं या वे ऐसे शब्दों का प्रयोग करने लगे हैं, जिन्हें सामान्यतः नाम नहीं समझा जाता, जैसे प्रोटॉन पद्मनाभन, अल्फा ज्योथिस और ओमेगा ज्योथिस व साथ ही नियोनआयोडीन. भारत में सैकड़ों लोग इन नामों का प्रयोग कर रहे हैं.

राज्य द्वारा नाम[संपादित करें]

मणिपुर मीटी, पैटे-कुकी, मिज़ो, हमार, ठदौ-कुकी, तंगखुल, कबुई, छोटे-कुकी, मिल्हीम निंगथौजम, राजकुमार, महाराजकुमार, युमनाम, थोकचोम, कोंसम, सेरम, अहंथेम, अतोम, पोटशंग्बम, चक्प्रम, नंदिबम, ओइनम, संजम, कोंजेंग्बम, अरिबम, नमीरक्पक, किथेललक्पम, लैश्रम, कोंथौजम, नोरेम, इरोम, थूनौजम, अहिबम, थंगजम, चिरोम, लोइतोंगबम, तोंग्ब्रम, येंदेमबम, लौरेमबम, सिनम, वंगखेम, मोइरंगथेम, सदोकपम, युमखैबम, यम्बेम, अथोकपम, फिरोईजम, सोइबम, गुरुमयम, लैशंगबम, लैरिक्येंगबम, फनजौबम, अयेकपम, खुद्रकपंम, ख्वैरमपम, लैरेंजम, कक्येंलक्पम, हीजम, नोंग्थोमबम, अकोईजम, इन्गुदम, कक्चिंगताबम, येंगखोम, हौबीजम, ओकरम, मैबम, इरेंग्बम, अयेक्पम, अहंथेम, कंगाबम, नोंगमैथेम, मयंगबम, खुमुकचम, थोईडिंगजम, इरुंगबम, क्षेत्रीमयुम, मक्कमयुम, हिद्रोम, नेप्रम, खुरैजम, सरंगथेम, थिन्गुजम, निन्गोमबम, तखेलम्बम, सपम, सगोलसेम, कोंग्रैलत्पम, वंग्मयम, अंगोम, वंग्खिमयम, किशम, वहेंग्बम, नौरोईबम, चंदम, चिंग्शुबम, खुलक्पम, लोंग्जम, सनासम, सरुन्गबम, नहाकपम, अरंबम, ख़रिबम, पुख्रम्बम, लिटनथेम, यमख़म, वैखोम, चबुंगबम, थौदम, नोंग्मिकापम, सालम, फुरैलकपम, फुरैलतपम, येखोम, लितम, मुदुम, लैफ्रकपम, ब्रह्मचारीमयम, थोंग्खोंगमयम, खैदम, खंग्जरकपम, थोकचोम, गुरुजरीबम, हिसनम, न्गंगोम, कोंजेंगबम, खोम्द्रम, रूपम, ताखेलमयम, न्गसेपम, मक्कमयम, खोंगबंत्बम, लुक्रम, लैथंगबम, ब्रम्हचारीमयम, युम्खईबम, मयेंगबम, मयनलम्बम, हेमा, खोईनैजम, खोइनम, खुमलमबम, कोंथोजम, संधम, किशम, चोंग्थम, हवैबम, लोइतोंगबम, करम, किशम, थियम, अबुजम, सोरम, खोइरोम, अखम, एलंग्बम, तोइजम, थौबल्मयम, सोइबम, लैथंगबम, उष्म, कोंगख़म, अचरजमयम, मयेंगबम, ख़रिबम, हिदंगमयम, खुमंथेम, मंधरमयम, मैनम, मीनम, इरुंगबम, सोरोखैबम, लैरेंलकपम, हिक्रुजम, खंगेमबम, युम्खम, संदम, मैरेमबम, लैरेंजम, वरेकपम, सुखम, लिशम, पंगम्बम, लैतोंजम, मैब्रम, लंबलमयम, कंगुजम, चबुन्ग्बम, चिंगकहम, न्गंगबम, सौगुरुमयम, हुइनिंगशुम्बम, मंधरामयम, थिन्गोम, थिंगनम, थोईडिंगजम, अंगोमजम्बम, अमकचम, यम्लेमबम, लैमयम, उक्मबम, लिफ्रकपम, खंगजरकपम, फुरित्साबम, मोइरंगमयम, लंग्पोक्लकपम, तौजम, कोंजेंगबम, तौरेम, सम्जेत्साबम, खुयेंथेम, येंसेंबम, कंगजम, हुइरेम, लिशंगथेम, तकेंजम, तखेलम्बम, हंग्लेम, थौरोईजम, अमोम, लंग्पोक्लकपम, सौबम, लैखुरम, लिशंगबम, खुल्लम, खुन्द्रक्पम, तोनम्बम, कोइजम, न्गैरंग्बम, खुन्दोंग्बम, होबम, सोयम, लौसिगम,

थौनाओजम, फुरेम, फिरेम, शरुंगबम, फरेमबम, कोंथोउजम, थोंगराम, तोरोंगबम, असेम, युम्रेमबम, खोइसनम, हजारीमयम, कोंग्बम, पंग्षताबम, खोंबलतबम, थोंगम, हिदम, येन्द्रम्बम, शैरेम, सोरैसम, अधिकारीमयम, फम्दोम, महारबम, चिन्ग्थं, फिजम, मैकम, हिग्रूजम, ब्रजबशीमयम, यूरेमबम, कायेनपैबम, चिन्गंगबम, मुर्तुम, शिजागुरुमयम, मैमोम, हिरोंगबम, अरुबम, मुटुम, लांगम, लिमपोकपम, वैरोकपम, लिमजम, पोनम, उरिक्सीबम, उरिखिंबम, वंग्जम, खुमुजम, चनाम्बम, समोम, मैथम, न्गासेकपम, सौग्रकपरम, चुंगख़म, मित्रम, लोक्टोंगबम, पेबम, लिहोरनोग्बम, शैखोम, हंजबम, युरेनजम, खुमबोंगमयम, लैकंगबम, थोंगबम, पीचीमयम, चिन्ग्सुबम, वथम, निंगथोखोंगजम, एलम, येंसेहेंबम, मंदिंगबम, सौगैजम, आदि अधिक जानकारी के लिए यम्नक देखें.

पहाड़ी आदिवासी कामेई, होकिप, किप्जेन, पोमेई, किम, पुरम, लुफो, लिंगमई, लूफेंग, चोठे, मिसाव, ताराव, कीशिंग, वैफेई, बीटे, मो, सिंग्सन, सिंग्सिट, सिट्किल, राल्टे, गाईट, डप्ज़र, बुक्पी, थोमटे, वोल्टे, वर्टे, खव्लहरिंग, सैलो, टूंगलुट, थीएक, दर्न्गाव्न, गान्गटे, श्रिथ्लौ, सिमटे, वैफेई, ज़ू, कॉलनी, खिंगटे, प्युडाईट, सिनेट, लुन्किम, अनल, जेमे, कोम, कोइरेंग, हंग्सिंग, ऐमोल, मोयोन, कबुई, मोंसंग, मेट, ल्हंघल, मुइवः, रोंग्मी, लेंथंग, मर्म, मरिंग, हुन्ग्यो, डौंगेल, चिरु, थोटहैंग, टुबोई, सुम्पी, सित्ल्होऊ, लम्कंग, रोंग्मी, सिंग्सन, खौटे, सैज़ा, शिम्रय, चोंग्लोई, खोंगसाई, चाखेसंग, खोइबू, मिल्हिएम, पोमेई, कोइराव, ल्हुन्ग्दिम, जेलिंग, ठन्ग्नेओ. आदि.

मिज़ोरम मिज़ो एलेट, अनु, आर्ट, बैरेक, बालेंग, बव्म, ब्वैट लंग, बव्न्गचर, बिअटे, बुन्ग्सुट, बुन्ग्सुट, चल्बौक चल्चिंग, चल्चंग, चल्सवैप, चल्तुम, छापी, चाव्न्छिं, छव्न्ग्तुअल, चाव्न्थंग, चावन्ग्त्हू, छाकव्म, छाक्छुअक, छंगते, छंजो, छिअर्चुंग, छिअर्किम, छिन्घ्लू, छुंहू, छुन्घ्लेह, छुन्थंग, चिंग्खई, चिंग्थिर, चिन्जाह, चुंगेंग, चुंगलौक, चुहंग, चुऔंगो, कॉलनी, दम्फुत, दप, दर्किम, दौबुल, एन्ग्कई, एन्ग्खुंग, फनाई, गांगते, गिते, हैजंग, हंग्देम, हौदिम, हौह्नर, हौह्निंग, हौफुत, हौसेल, हौथुअल, हौवंग, हौथाई, हेल्ह्लाह, हिल्थंग, लम्वेल, लवनछिंग, लोंचेऊ, मैमौक, मार्चपहंग, मुन्दीन, नामते, नॉटखेल, नॉटसूत, होलुत, रंगखौल, रंग्लंग, राछम, होल्खुंग, होलंगो, होलथंग, कैह्लेक, कैहपेंग, कविलम, कौलवी, कॉलनी, कौल्तंग, कौल्वौम, कौरबौंग, केउलुक, खौल्हरिंग, खेल्हाउ, खेलते, खेंग्लौत, खेंगते, खोंघौर, खुंग्साई, खुमचिएंग, खुम्तुंग, किपौम, कुल्सेप, लंग्कैह, लंग्रौंग, लौटू, लविसुत, लौन्घाउ, लह्वुंग, लिहंग, लेल्छुं, लुहफुंग, लुत्मंग, मंग्लुत, मौल्सौम, मिरम, मुलथुयम, मिरेम, पछुआ, पंग , पौतू, पविह, रल्ते, रंगते, रेंघंग, रेंगो, रेंग्सी ,रेंथ्ली, सैहमर, सैलो, सकेचेप, सफाव, सविथंग, सेल्दम, सेल्पेंग, सेंथंग, सिअकेंग, सिअखंग, सिम, थांगचेप, थंगबंग, थंगबुर, थंगकॉप, थन्गसियम, थासुम, थाछिंग, थौम्लो, तिपौम, त्लंग्लाऊ, तलाऊ, तलोसई, तुअल्थंग, तुखुम, तुन्गली, उइखौल, वंछौंग, वंगचुअल, वंकेउ, वरते, वौंगसुअल, वोहंग, वोह्लू, विती, ज़हाउ, ज़ाहली, ज़ंगिअत, ज़थंग, जौचा, जोंगाई, जोंगते, ज़ोफी, ज़िहनो
उड़ीसा उड़िया आचार्य,बिस्वाल, चंद्रात्रे, चंद्रात्रेय, दलाई, दकुआ, पात्रो, पटनाएक, सामंत्रे, सुबुद्धि, सामल,सस्मल, सत्पाठी, दत्ता, दास, मोहंती, साहू, साहु, पति,दश, मिश्रा, सारंगी,कर,महंती, रौत, राय, पानी, रथ, त्रिपाठी, नैक, नायक, पात्र, मोहंता, सिंह देव, सेनापति, संध, बाघ, हाती, पस्चिमकबत, उत्तराकबत, दक्शिनाकबता, गोछायता, सिंह, राज, खंदयता, देहुरी, बसंतारय, बेहरा, कैबर्ता, सदंगी, पांडा, महापात्र, मोहराना, मिश्रा, महाकुदा, माली, जानी, खोरा, खोसला, कुलदीप, नाग, बाग, मुदुली,चौधुरी, अमंत्य, समर्थ, पुजारी, दलपति, बल्बंतरे, छोट्रे, पैकरे, पल्तासिंग, बलिअर्सिंग, सुंदर, ओझा, चौधरी, सामंतसिंघर, प्रधानी, महापात्र, परीजा, परिदा, जेना, साबत,सामंत,बहिनिपती,पालो, सेठी, मलिक, प्रधान, गुरु, पधि, पानीग्रही,डोरा,दंगायत, दंद्पट, गढ़नायक,भांजा, भांजादेव, देव, नंदा, स्वाइन, जगात्रय,

(जनजातीय लोग)- कांताबली, नंदीबली, अलंग, गुंथा, धन्गदामझी, तदिंग, बजिंग,खल्पदिया, मदिंग, बदनायक, दिसारी,भूमिया,गदबा,सौर, बलिपुटिया, अर्लब, पेटिया, बदपुटिया, मस्तिपुटिया, पेंथिया, गरहंदिया, रंधारी, बग्देरिया, कुल्सिका, चालन, मिन्याका, वादक, मंदिंगा, पिदिका, बिदिका, पुसिका, मेलका, हिक्का, सिरिका,निसिकिया, बदतसिया, किसानी, सीसा, पांगी, इन्जेल, बंदा, हलंग, पदम, गोलारी, बदाम, करलिया, घोसर्लिया, केंदु, गतम, मत्तम, मारी, बिटु, तंगली, हरिजन, गौड़ा, सीसा, सोराबू, गांडा, कोमर, पेनटाना, खेमुंदु, कद्रका, मंगरिया, मंगराज, गेमेल, कदमगुड़िया, मुर्जा, सिर्कर्लिया, पुकिया, सिया, स्वेन, हन्ताला, बिसोई, छाती, चपाड़ी , कन्दुल्फुल, घिउरिया, उदल्बदिया, तुडू, हेम्ब्रम, बेसरा, ओरम, कुलु, करकेटा, एक्का, लकड़ा,

पंजाब पंजाबी अग्निहोत्री, अहूजा, आनंद, सेठी, सुहन, बंगर्म, बैंस, बेह्ल, बेदी, बाजवा, भासिन, बाली, बरार,बच्चन, बग्गा, बत्रा, चाहल, चावला,धालीवल धालीवल , धुरे, देओल, दत्त, दत्ता, ढिल्लों, धिन्द्सा, ग्रेवाल, गोस्वामी, गरचा, भनोट, आर्य, छाबरा, कौशल, रककर, सिहरा, मन, सेहगल, सूरी, सिंह, कौर, खालसा, खोसला, बैंस, बवेजा, बंगा, माहिल, गब्बी, चना, दादरा, धोंसी, धंद, सिधु, संधू, शहलिया, सहोता, बाल, झज्ज, जसवाल जसवाल, भेरों पोद्दार, दुल्लो, शेरगिल, वालिया, अहलुवालिया, खन्ना, चीमा, चिश्ती, बोपराई, बादल, गिल,गार्ग, ग्रोवर,नैन, गुलाटी, सराई, धिन्द्सा, ढिल्लों, बेनीपाल, गौतम, पद्दा, पराशर, सेखों, दुले, मुल्तानी, जुनेजा, जौली, हसिजा,हंस, खुराना, खन्ना, कपूर, कपुर, कपू, खंडूजा, कोचर, अरोड़ा, लेहल, लूथरा, मल्होत्रा, मेहरा, सैगल, सूरी, प्रसाद, पूरी, पूर्वः, सोनी, तुली, गहुनिया,गुप्ता, अगर्वाल, मलिक, मुंजल, सहानी, सैनी, सरपाल, तलवार, ठाकुर, चोपड़ा, बजाज, पाठक,घेरा, संगर, शर्मा, वर्मा, भरद्वाज, वशिष्ट, सूद, भाटिया, दवार, धवन,भगत,हुंदल,आन्तल,सुतिंदर,लस्सी,हैपी,गुलू,वैद,वाधवा
महाराष्ट्र मराठी, कोंकणी अधिकारी , आडवे , अग्निहोत्री , आपटे , आडेकर , आंबेकर , आगरकर , आजगावकर, अंकलीकर , आठवले , अकोलकर , आरोंदेकर, आगलावे, अवचट , बाळफाटक, बारटक्के, बर्वे , बागवे , बोरसे, बामणे, बागगावकर, भोते, भोगले, भोले, भुजबळ , बापट , बोबडे , बोरकर ,बेलसरे , बेंद्रे , बोरगावकर, देसले, बेर्डे , भट, भोसले , भाटवडेकर , भोमकर , चांदेकर , चेउलकर, चांदोलकर, चंद्रात्रे , चंद्रात्रेय , चव्हाण,चरपे,चापेकर , चौरे , चिटणीस , चिकणे, चित्रे , छत्रे, चिंदरकर , चिपळूणकर , चितळे , चौधरी , चौगुले, दगडे , दहिभाते , दामले , दांडे , देहाद्राय , देहाडे , दाते , देसाई , देवघर , देवकर, देवळेकर , देऊलकर, देव , दळवी , धारप , ढमढेरे , धामणे , दिवाडकर , दिवाळे, देसाई, दिवेकर ,डोंगरे , डोईफोडे , डोके . देशमुख , देशपांडे , देशमाने , दांडेकर , दीक्षित, दंडवते , ढमाले , धनावडे , दाभेकर , ढोबळे , दुर्गुडे, एकबोटे, फुले , फुलझेले , फुलपगारे , फुलमाळी , फुलसुंदर , गबाळे , गडकरी , गडकर, गावसकर , गव्हाणे , गाढे , गांजावाला , गोंदकर , गावणकर, गवाणकर, गोडसे , गोखले , गोरे , गोवित्रीकर , घाडगे , गायतोंडे, घाटगे, गोवेकर, गोवारीकर, गद्रे , गावडे , गवळी, गोसावी , गोरुले, गवस,, गुप्ते , घुरये, गुरव, घेवडे, हगवणे , हरदास , हर्दीकर, जाधव , जगताप , जवळकर , जयकर , जोशी , जगदाळे , जिचकर, जांभळे , जावकर, कडू , कदम , कानडे , काजळे , काळे , कालगुडे (जाधव), कल्याणी , कामेरकर , कानफाडे , कपाळे, करडे , कापसे , करकरे , करमरकर , कर्वे , काशीकर , केकडे, खर्चे, खाटमोडे, खोचरे , कोळे , कोळेकर, कोरगावकर, कुलकर्णी, करवंदे, कामत, कारखानीस, कारेकर, कारुळकर, कातोते, केसकर, केरकर, केळकर, खानवकर, खानविलकर, खुतारकार, खानोलकर, खोटे, कोठारे, खड्ये, कोतवाल, कोहोजकर, कामाने, कांबळे, कानविंदे, कानिटकर, खरे, किर्तीकर, कोकाटे, कोळी, क्षीरसागर, कुलकर्णी, कुर्लेकर, लऊळकर, लाले, लागू, लाखे, लाड, लेले, लोखंडे, लिमये, लोटलीकर, मडके, मेस्त्री, महाडिक, माडीवाल, महामुनी, महेंद्रकर, मांजरेकर, गाडगीळ , मालवणकर, मयेकर, माने, मराठे, मातुरे, महागावकर, मेहेंदळे, मेश्राम, मोडक, मोहरीर, मुंडे, मुझुमदार, मुरकुटे, म्हात्रे, मोने, मुळे, मोरे, मोहिते, माहिमकर, मसुरकर, निकम, नाले, नांदरे, नावकर, नाईक, नाडकर्णी, नगरनाईक, सरनाईक, नखरे ,नासरे , नेमाने , नेणे , निमकर , निंभोरकर, निंबाळकर, नेरुरकर, ओगळे, पडवळ, पारकर, परब, पाटील, पाताडे, पवार,पाटकर , परांजपे , पंडित, पावगी, पेडणेकर , फुटाणे, पिळगावकर, पितळे , पोटदुखे , पोवार , प्रभू , पुजारी , पुळेकर , पालेकर , फुले , पिसाळ , पेंडसे , पेठे , फडके , फाकले , फाटक , पाठक, परते , पाटणकर , पेंढारकर , पोतदार , पोतनीस , पुडके , राणे , रेगे , राजे , राहते , रतनाळीकर, रत्नपारखी, रांगणेकर, रसम, राव , रानडे , राचमले, रेवणकर, रिसबूड, सहस्रबुद्धे, सकारकर, साळवी, सामंत, सरवदे, सरोदे, साटम, सावंत, सावर्डेकर, शहाणे, साने, सोनावणे, शंभरकर, सुखटणकर, सातपुते, शेट्ये, शिर्के, शेळके, शिवडे, सोनारकर, सोपारकर, सुर्वे, शिंदे, टकले, तळपदे, ताकसांडे, तांबे, ताटे, तळेले, तावडे, टेंबे, तन्नू, तेंडूलकर, टिळक, वडाभात,वर्तक, विचारे , विद्वांस, वंजारे, वझे , वेंगुर्लेकर , विंझे , वाटवे , वाळवे, वाघ , वांयगणकर , झरे, झरेकर, झोपे, झेंडे, झारापकर
सिक्किम नेपाली, तिब्बत भूटिया, छेत्री, डोलमा, दोरजी, संगते, ल्हामो, डोलकर, गेफेल, छोड़ों, यांग्जोम.
तमिलनाडु तमिल अचारी, चेत्तिअर, फर्नान्डेस, गौंदर, आइयेंगर,अइयर, उदायर, मूपानर, कुयावर, कुदुम्बन, लेब्बाई, मरैकायर, मुदालिअर, नादर, नैकर, पिल्लई, प्रबाकर, पूबलारायर, रौठेर, थेवर, वेल्लालर, विश्वकर्मा, अम्बलाकरार, थोंडैमन, अदिगमन, मलायामन, पलुवेत्तारैयर वल्लवारैयर, सेठुरायर, थन्जारायर, कुरुसर, पल्लवारायर, वन्दायर, एत्रंदार, वानवारायर, सेर्वाई, थेवर, सोमा नैक्कर, मुनियारायर, कलाथिल वेंरर, नत्तर, मंरायर, चोलागड़, चोज़ंगारायर, कन्दियर, मज्हवरायर, श्रीनिवासन, सुब्रमण्यम, रामचंद्रन, चारी, वेंकटरमण, चंद्रसेकर, वेंकटरामानन , रमन, कृष्णामूर्ति, राजा.
उत्तर प्रदेश हिंदी चंद्रात्रे, चंद्रात्रेय, वार्ष्णेय, अग्रवाल, दुकाले, त्रिपाठी, कुदेशिया, श्रीवास्तव, जैन, कपूर, मिश्रा, पांडे, पिल्खवाल, दीक्षित, भटनागर, द्विवेदी, त्रिवेदी, चतुर्वेदी, टंडन, गुप्ता, गोयल गर्ग, मल्होत्रा, वर्मा, कुशवाहा , मौर्य/मौर्य, निगम, वाजपई, शर्मा, जौहरी, सक्सेना, सिंघल, सिन्हा, चोपड़ा, मेहरा, मेहरोत्रा, मित्तल, माथुर, जलोटा, अवस्थी, सिंह, शाक्य, श्रीवास्तव, राय, संकृत्यायन.
पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा बंगाली आचार्य, अधिकारी, आईच, आइन, ऐश, बाग़, बागची, बैद्य, बक्शी, बंद्योपाध्याय/बनर्जी, बनिक, बसाक, बर्मन / बर्मन, बरुआ, बप्परी, भद्र, भंज, भर, भट्ट, भट्टाचार्य/भट्टाचार्जी, भट्टानारायण-बिद, भौमिक, भुइयां, बिस्वास, बोस/बासु, ब्रह्मा, ब्रह्मचारी, चक्लादर, चक्रबोर्ती, चंदा, चन्द्र, चंद्रात्रे, चंद्रात्रेय, चांद, चट्टोपाध्याय/चैटर्जी, चौधुरी/चौधुरी/चौधुरी, दाम, दाहा, दास, दासगुप्ता, दसबिस्वास, दस्तीदार, देब/देव, देबनाथ, देय/दे, धर, दत्ता/दत्ता, दत्ता-गुप्ता, दत्ता-राय, दुआरी, गंगोपाध्याय/गांगुली, गौर, घटक, घोष, घोष-दस्तीदार, घोषाल, गोस्वामी, गुहा, गुहा नियोगी, गुहा रॉय, गुहाठाकुरता, गुनीन, गुप्त, हालदार, हाज़रा, होर, हुई, जाना, कबिराज, कर, कर्माकर, कोलापात्रा, कुमार, कुम्होर, कुंडू, लाहा, लाहिरी, मैत्रा, मैटी, मजुमदार, माल, मल्ला, माझी, मालाकार, मलिक, मंडल, मान्ना, मौलिक, मिश्र, मित्र, मुखोपाध्याय/मुख़र्जी, मुंशी, नाग, नंदन, नंदी, नस्कर, नियोगी, पकराशी, पाल, पालित, परुई, पाठक, पटवारी, पोद्दार, पोरिया, पोरेल, प्रधान, प्रमाणिक, रक्षित राय, रॉय/राय, रायचौधुरी/राय चौधुरी, रूद्र, साधुखान, साहा, समाद्दार, सामंत, साना, सांत्रा, सान्याल, सरभान , सरकार, सेन, सेनगुप्ता, सेनशर्मा, शर्मा, शास्त्री, शिकदार, सिन्हा/शिंघ, सोम, सुर, स्वर, तालुकदार, तलापात्र, ठाकुर/टेगोर, तिवारी

उत्तर भारतीय नाम[संपादित करें]

असमिया नाम[संपादित करें]

अहोम समुदाय में एक नामकरण प्रणाली है, जो मोटे तौर पर अहोम राजाओं के शासनकाल के दौरान उनके पूर्वजों द्वारा किये जाने वाले व्यवसाय पर आधारित है. सामान्यतः अधिकांश नामों में प्रथम-नाम, मध्य-नाम और अंतिम-नाम वाले प्रारूप का पालन किया जाता है. अंतिम नाम सैकिया 100 से अधिक सैनिकों के सेनापति (सै=100) को सूचित करता है. हज़ारिका 1000 से अधिक सैनिकों का सेनापति (हज़ार=1000) होता था. अन्य अंतिम नाम बोरा और बोरबोरा, बरुआ और बोरबरुआ, गोहैन, बोर्गोहैन, बुरागोहैन आदि हैं, जहां बोर=बड़ा, बुरा=बूढ़ा होता है. अन्य समुदायों में प्रयुक्त अंतिम नाम उत्तर भारत के अन्य भागों में प्रयुक्त अंतिम नामों के समान हो सकते हैं, जैसे दास, सर्मा, चक्रवर्ती, अली, अहमद आदि.

बंगाली नाम[संपादित करें]

अपने पारिवारिक नाम के अलावा, अनेक बंगालियों (पश्चिम बंगालबांग्लादेश दोनों में) को दो नाम दिये जाते हैं: एक भालो नाम (शाब्दिक अर्थ “भला नाम”), जिसका प्रयोग सभी क़ानूनी दस्तावेजों में किया जाता है, और एक डाक नाम (“उपनाम”), जिसका प्रयोग पारिवारिक सदस्यों व निकट मित्रों द्वारा किया जाता है. इन दो नामों के बीच कोई संबंध हो भी सकता है या वे एक-दूसरे से पूरी तरह असंबद्ध भी हो सकते हैं; उदाहरणार्थ, अनूप साहा नाम वाले किसी व्यक्ति को घर पर उसके डाक नाम (उदा. बबलू) से तथा अन्य सभी स्थानों पर उसके भालो नाम (अनूप) से पुकारा जा सकता है. कई लोग अपने पूरे भालो नाम और डाक नाम के साथ भालो नाम के संक्षिप्त रूप का प्रयोग भी करते हैं (उदा. दीपक के लिये दीपू, फ़रहाना के लिये फ़ारु आदि). हाल ही में, अनेक बांग्लादेशी बंगाली अपने पूरे आधिकारिक नाम के अंत में अपना डाक नाम भी जोड़ने लगे हैं, जिसके परिणामस्वरूप सैफुद्दीन चौधरी कांचोन जैसे नाम बनते हैं, जिनमें “सैफुद्दीन” व्यक्ति का भालो नाम होगा, “चौधरी” उसका पारिवारिक नाम होगा और “कांचोन” उसका डाक नाम होगा. इन परिस्थितियों में, उस व्यक्ति को “श्री चौधरी” कहना उसे संबोधित करने का सही तरीका होगा, न कि “श्री कांचोन”.

उड़िया नाम[संपादित करें]

उड़िया (उड़ीसा राज्य के) लोगों के लिये सभी क़ानूनी दस्तावेजों में “भला ना” (शाब्दिक अर्थ-अच्छा नाम) का प्रयोग किया जाता है और “डाका ना” परिवारजनों व मित्रों द्वारा प्रयोग किया जाने वाला उपनाम होता है. अनेक अन्य उड़िया कुलनाम लोगों के व्यवसाय पर आधारित जाति-प्रथा से आये हैं. उदाहरणार्थ, आम अंतिम नाम मोहापात्रा और दाश (दास के विपरीत) ब्राह्मणों के कुलनाम हैं. इसी प्रकार मिश्रा, नंदा, रथा, सत्पथी, पाणिग्रही, त्रिपाठी आदि सभी ब्राह्मण कुलनाम हैं. दास और साहू कराण (Karanas) हैं, जबकि समतासिंघर, सुंदरय, जागदेव, बलियारसिंग, हरिचंदन, मांगराज, मरदाराज, सेनापति, श्रीचंदन, प्रतिहारी, छोटरे, पातसानी, परिदा, समल, नायक, मुदुली आदि खांदायेत हैं. कुछ कुलनाम पश्चिम बंगाल और उड़ीसा दोनों राज्यों में पाये जाते हैं और दो राज्यों के बीच आप्रवास इसका कारण हो सकता है.

गुजरती व मराठी नाम[संपादित करें]

गुजरातमहाराष्ट्र में, नामकरण की प्रणाली पितृसत्तात्मक होती है. उदाहरण के लिये, क्रिकेटर सुनील मनोहर गावस्कर का पहला नाम “सुनील” है; “मनोहर” उनके पिता का नाम है और “गावस्कर” उनका पारिवारिक नाम है.

पारंपरिक रूप से, विवाहित महिलाएं अपने मध्य नाम के रूप में अपने पति के दिये हुए नाम का प्रयोग करती हैं और उसके पारिवारिक नाम को अपनाती हैं. महाराष्ट्र में, कभी-कभी एक नवजात नर शिशु का नाम उसके दादा के नाम पर रखा जाता है.

गुजरात में, लोग अपने लिंग के आधार पर नामों के साथ प्रत्यय भी जोड़ते हैं. पुरुषों के लिये "भाई/कुमार/लाल" (भाई) और महिलाओं के लिये "बेन/बहन" (बहन). उदाहरणार्थ, सुनील को सुनीलभाई और लता को लताबेन या लताबहन कहा जाता है. इसी प्रकार महाराष्ट्रीयन लोग भी पुरुषों को “राव” कहकर संबोधित करते हैं. (सुनील को सुनीलराव कहा जाएगा). सामान्यतः यह अनौपचारिक पद्धति है, जिसका प्रयोग मित्रों के बीच किया जाता है, आधिकारिक दस्तावेजों में नहीं.

आम गुजराती पारिवारिक नामों में पटेल (गुजरात का एक बहुत ही आम कुलनाम), सोनी, मेहता, शाह, देसाई, पारेख और चूड़ासमा शामिल हैं. अक्सर प्रयोग किये जाने वाले मराठी पारिवारिक नामों में कुलकर्णी, जोशी, देशपांडे, देशमुख, चौधरी, कोलते, मोदी और पाटिल शामिल हैं. महाराष्ट्रीयन ब्राह्मणों के लिये पारिवारिक नाम “भट” का प्रयोग किया जाता है, जबकि गुजरातियों के मामले में इसमें एक अतिरिक्त जोड़ा जाता है.

अनेक मराठी पारिवारिक नाम ‘कर’ के साथ समाप्त होते हैं, उदा. गावस्कर, तेंदुलकर, सावरकर, माडगुलकर, मायेकर, लऊळकर, आचरेकर, नवलकर, जोगलेकर, जुहेकर, देउस्कर, मांगलोकर, चिंदरकर और कभी-कभी वे उस परिवार या उसके पूर्वजों के मूल ग्राम से जुड़े होते हैं. उदा., चिंदरकर शब्द का मूल महाराष्ट्र-कोंकण क्षेत्र के सिंधुदुर्ग जिले में स्थित चिंदर कस्बे के नाम के कारण हो सकता है.

मराठी अंतिम नाम और उनके मूल बहुत ही अच्छी तरह लेखबद्ध किये हुए होते हैं और सैकड़ों वर्षों पीछे तक की जड़ों तथा वंश को ढूंढा जा सकता है. मुख्य आलेख मराठा वंश प्रणाली देखें

गुजरात में, किसी वैवाहिक निमंत्रण (कंकोत्री) पर नाम लिखते समय, परिवार के सदस्यों की सूची बनाते समय लिखे गये ‘वाला’ या ‘वाल्ला’ प्रत्यय के साथ समाप्त होने वाले पारिवारिक नाम किसी ऐसे व्यक्ति के रहने के स्थान को सूचित कर सकते हैं, जो स्थानीय व्यक्ति न हो, उदाहरणार्थ, लंदन से आये किसी व्यक्ति का कुलनाम ‘लंदनवाला’ लिखा जा सकता है, जिससे यह पता चले कि वह व्यक्ति वहां रहता है, जबकि उसका वास्तविक कुलनाम कोई आम पारिवारिक नाम हो सकता है. वास्तविक कुलनाम के रूप में प्रयोग किये जाने पर यह परिवार के पैतृक ग्राम के बारे में भी बता सकता है. हालिया समय में, तंडेल परिवार के कुछ लोगों का मेह से पास के मोगोड डुंगरी (वलसाड जिला) में स्थानांतरण इसका एक उदाहरण है, जिसके बाद उन्होंने अपना कुलनाम बदलकर मेहवाला कर लिया, ताकि यह पता चले कि वे मेह ग्राम से आये हैं. इसका प्रयोग किसी व्यवसाय या पारिवारिक व्यापार को सूचित करने के लिये भी किया जाता है, जैसे लकड़ावाला , जो यह सूचित करता है कि उस व्यक्ति का पारिवारिक व्यापार लकड़ियों की खरीदी व बिक्री से संबंधित है.

कोंकणी नाम[संपादित करें]

कोंकणी लोग वर्तमान में गोवा, महाराष्ट्र, कर्नाटक तथा केरल के कुछ भागों में बसे हुए हैं. ये लोग मूलतः हिंदू हैं और बाद में उन्हें इस्लाम या ईसाईयत में धर्मांतरित किया गया. वे अत्यधिक पितृसत्तात्मक होते हैं, और इसलिये उनके प्रथम नाम के साथ हमेशा पिता का नाम आता है. हालांकि, इस पद्धति का सख़्ती से पालन अब केवल हिंदुओं द्वारा ही किया जाता है. पुर्तगालियों के आगमन के पूर्व हिंदू भट्ट , शेणॉय , कामाटी , शेट्ट , पार्पती , महाले , नाइक , कोयन्दे आदि जैसे शीर्षकों या जाति की पहचान बताने वाले नामों (जो कि तथाकथित निम्नतर-जातियों के लोगों के बीच आम था), जैसे गौडे , वेलिप , मुल्ली आदि का प्रयोग करते थे. गांवों के नामों का प्रयोग केवल तभी किया जाता था, जब वे अपने पैतृक गांव से आप्रवास करते थे. प्रत्यय कार या ‘का निवासी ’ को गांव के नामों के साथ जोड़ा जाता था उदा: रायकर , बोरकर , वर्णेकर , केरकर आदि, जो कि इस बात को सूचित करते थे कि वे किस गांव से आये हैं. यह पद्धति आज भी प्रयोग की जाती है और गोवा के लगभग सभी और कुछ कोंकणी लोग, जो अन्य राज्यों में बसे हुए हैं, अभी भी अपने मूल गांवों के नामों का प्रयोग करते हैं, जहां परीक्षण काल और उसके बाद गोवा और अन्य राज्यों में उनके सामूहिक आप्रवास से पूर्व किसी समय उनके पूर्वज रहा करते थे. व्यवसाय को सूचित करने वाले कुलनाम भी आम हैं, उदा: अभिषेकी , तेली , कसार , वैद्य आदि भी आम हैं.

लगभग सभी कोंकणी कैथलिक लोग पुर्तगाली कुलनाम का प्रयोग करते हैं, जैसे डी’सूज़ा, डी’मेलो, फर्नांडीज़, नाज़ारेथ आदि. हालांकि कुनबी समुदाय के कुछ परिवार आज भी अपने मूल अंतिम नामों, जैसे गावकार , तारी आदि का ही प्रयोग करते हैं. इसी प्रकार की रोमन कैथलिक ब्राह्मण (बामन) जाति के कई कैथलिक परिवार आज भी अपने मूल हिंदू कुलनाम, जैसे प्रभु, शेणॉय, नाइक, पै, शेट, भट आदि का ही प्रयोग करते हैं. कर्नाटक में कोंकणी बोलने वाले अनेक प्रकार के लोग बसे हुए हैं, जो कि कई छोटे-छोटे संप्रदायों में विभक्त हैं.

दक्षिण भारतीय नाम[संपादित करें]

एक लंबे समय से, दक्षिण भारतीय लोगों में एक सरल नामकरण प्रणाली रही है. ऐतिहासिक रूप से, प्रत्येक व्यक्ति को एक ही नाम दिया जाता था, जो कि तीन संभावित तरीकों में से किसी एक के आधार पर चुना जाता था:

  • उनके गांव/नगर का नाम, उदा. सिंग्री (सिंगिरी), बंगलोर, उद्यवारा, चिट्टी, कुलार, चावली, इंकोल्लु, हट्टिंगडी, जनस्वामी, हुबली, कोकर्डी, मैंगलोर आदि.
  • उनके परिवार/वंश का नाम, उदा. पुलिथेवर, सहोंता
  • जाति का नाम, उदा. अय्यर, राव, नायर

कर्नाटक[संपादित करें]

कर्नाटक में, नामकरण की पद्धति में दिया गया नाम, पिता का नाम (मध्य नाम), अंतिम नाम (जो कि कुलनाम, पारिवारिक नाम, स्थान, व्यवसाय आदि को सूचित कर सकता है) लिखा जाता है. मंजूनाथ, मुरलीधर, वेंकटेश, राघव, राधा कृष्ण मूर्ति, राघवेन्द्र, रमेश, बी. जयप्पा, शैली मल्लप्पा, के मल्लप्पा, कांथराजप्पा विश्वनाथ पुरुषों के प्रचलित नामों में से कुछ हैं. महिलाओं के लिये भाग्या, भाग्यलक्ष्मी, लक्ष्मी, शैलजा, मानसा, मीरा, शांथला, सीता, उमा, गायत्री, चित्रा आदि नाम प्रचलित हैं. पारंपरिक रूप से महिलाएं अपने पति के कुलनाम या अंतिम नाम को अपना लेती हैं, जो कि उनके द्वारा अपने पिता के घर से निकलने और पति के घर को अपनाने के बाद उनमें हुए सांकेतिक परिवर्तन को प्रतिबिम्बित करता है. पुरुष घर का मुखिया होता है.

गांवों में और शहरों से दूर कभी-कभी किसी नाम के पहले आद्याक्षर भी लिखे जाते हैं. उदाहरण के लिये, कागोडु बैरप्पा तिम्मप्पा (K agodu B airappa Timmappa) (ग्राम, पिता, स्वयं का नाम). कभी-कभी नाम के पहले केवल व्यक्ति का नाम लिखा जाता है. कुछ नाम स्पष्ट रूप से किसी परिवार से संबंध का उल्लेख करते हैं. उदाहरण के लिये पशारा कोल्ली, (पशारा परिवार का कोल्ली), नायगोदरा कण्णी (नायगोद परिवार का कण्णी).

केरल[संपादित करें]

केरल में, मानक विधि के अनुसार परिवार का नाम-व्यक्ति का नाम-जाति/शीर्षक नाम (यदि लागू हो) लिखा जाता था. अतः कैनथ करुणाकरण मारार, की व्याख्या कैनथ परिवार से मारार जाति का करुणाकरण, के रूप में की जा सकती है. चूंकि 20वीं सदी के मध्य-काल से पहले तक केरल एक सामन्ती समाज था, अतः दक्षिण भारत के अन्य भागों के विपरीत अधिकांश केरलवासी किसी वंश के वंशज हुआ करते थे. जो लोग किसी भी जाति से संबंधित नहीं थे, उन्हें कोई शीर्षक दिया जाता था, जैसे मछुआरे व मजदूर केवल अपने पारिवारिक नम के बाद अपना नाम लिखते थे, उदा. वायिलपरंबु मनोहरन. आज, नामकरण का पारंपरिक प्रारूप बदलने लगा है और अन्य दक्षिण भारतीय समुदायों के अनुरुप कभी-कभी अंतिम नाम के रूप में पिता के नाम का प्रयोग किया जाता है. केरल के ईसाइयों में, एक द्वितीय नाम (मध्य नाम) होना एक आम पद्धति है, जो कि उनका बपतिस्मा द्वारा प्राप्त नाम होता है, सामान्यतः प्रथम नाम दादा का या कुलदेवता का नाम होता है, जैसे रोशनी मैरी जॉर्ज और अनूप एंटनी फिलिप.

तमिल[संपादित करें]

अनेक दक्षिण भारतीय लोग अपने अंतिम नाम या पारिवारिक नाम के रूप में अपने पैतृक ग्राम के नाम का या परिवारिक व्यवसाय का प्रयोग करते हैं. इस मामले में, कभी-कभी व्यक्ति के नाम से पूर्व उसका कुलनाम लिखा जाता है. कुछ तमिल व्यक्ति अपने नाम के भाग के रूप में अपने गांव का नाम और जाति का नाम दोनों लिखते हैं, उदाहरण के लिये, मदुरै मणि अय्यर . यहां मदुरै शहर का नाम और अय्यर जाति है. अनेक केरलवासी विशेषतः सीरियाई ईसाई “थरवाड” के रूप में, अपने पैतृक घर के वर्णन करते हैं. प्रमोद पेरुपरांबिल और पॉल चेम्मनूर इस श्रेणी में आते हैं.

गोत्र का प्रयोग भी व्यापक पैमाने पर किया जाता है: द्वितीय नाम के रूप में पिता के नाम का प्रयोग. इसका अर्थ यह है कि एक पीढ़ी का दिया गया नाम अगली पीढ़ी का द्वितीय नाम बन जाता है. अनेक मामलों में, दूसरे नाम का प्रयोग आद्याक्षर के रूप में किया जाता है और व्यक्ति का नाम उसके द्वितीय नाम जैसा प्रतीत हो सकता है. उदाहरणार्थ, “अजीथ अब्राहम” जैसे किसी नाम का अर्थ होगा “अब्राहम का पुत्र अजीथ”. यदि इसके बाद अजीथ का कोई अश्विन नामक पुत्र हो, तो उसका नाम अश्विन अजीथ होगा.

किसी तमिल महिला द्वारा अपने पति के नाम को अपने द्वितीय नाम के रूप में अपना लिया जाना आम है. सुनिथा गोपालन (गोपालन की पुत्री सुनिथा) शादी के बाद अपना नाम बदलकर सुनिथा राजीव (राजीव की पत्नी सुनिथा) कर सकती है. कुछ दक्षिण भारतीय लोग एक विलोमित गोत्र का प्रयोग करते हैं. उदाहरणार्थ, चित्रा विश्वेश्वरन एक नृत्यांगना हैं, जिनका अंतिम नाम या तो उनका गोत्र है या उनके पति का नाम है. महिलाओं में अधिक प्रचलित विलोमित गोत्र का प्रयोग पश्चिमी देशों में आप्रवास करने वाले उन लोगों द्वारा भी अपनाया जाता है, जो भारतीय नामकरण पद्धति की व्याख्या करने की आवश्यकता के बिना अपने नाम से पुकारे जाना चाहते हों. उनके पिता या पतियों के नाम उनके पारिवारिक नाम बन जाते हैं.

आद्याक्षर[संपादित करें]

पश्चिमी अंग्रेज़ी-भाषी समाजों में, जब किसी प्राथमिक विद्यालय में एक ही नाम वाले दो लोग हों, उदाहरणार्थ, रॉबर्ट जोन्स और रॉबर्ट स्मिथ, तो अस्पष्टता से बचने के उनका उल्लेख क्रमशः रॉबर्ट जे. और रॉबर्ट एस. के रूप में किया जा सकता है. लेकिन दक्षिण भारत में यदि दो रमन हों, तो उनमें से प्रत्येक का केवल एक ही नाम होता है. अतः कुलनाम के बजाय उनके आद्याक्षरों के रूप में उनके पिता के नामों का प्रयोग किया जाता है. गोपाल का पुत्र रमन, जी. रमन तथा दिनेश का पुत्र रमन डी. रमन कहलाएगा. इसके परिणामस्वरूप आद्याक्षरों की एक प्रणाली विकसित हुई है, जिसका अधिकांशतः दक्षिण भारत में पालन किया जाता है. अधिकतर विद्यालय प्रवेश के समय स्वतः ही आद्याक्षर जोड़ लेते हैं.

तमिलनाडु के कुछ भागों में, आजकल पारंपरिक पारिवारिक नामों के स्थान पर पिता/पति के नाम का प्रयोग पारिवारिक नाम के रूप में किया जाने लगा है. पारिवारिक नाम के रूप में पिता/पति के नाम का प्रयोग प्रचलन में है. इन नामों का प्रयोग आद्याक्षरों के रूप में भी किया जाता है. स्कूलों व कालेजों के रिकॉर्ड में उनके आद्याक्षर इस प्रकार दिये जाएंगे.

  • "एस. जानकी" – आद्याक्षर के रूप में पारिवारिक नाम और इसके बाद व्यक्ति का नाम.
  • "एस. जानकी" को क़ानूनी दस्तावेजों में "जानकी श्रीधर " भी लिखा जा सकता है.

पासपोर्ट जैसे क़ानूनी दस्तावेज में आद्याक्षरों के स्थान पर पूर्णतः विस्तारित अंतिम नाम लिखा जाएगा. संपत्ति के सौदों जैसे अन्य क़ानूनी दस्तावेजों में इनमें से किसी भी प्रारूप का प्रयोग किया जाएगा और साथ ही पिता/दादा/पति के नाम तथा/या गांव/कस्बे/शहर के नाम का उल्लेख किया जाएगा. पासपोर्ट तथा पश्चिमी मानकों से प्रभावित बहुराष्ट्रीय कम्पनियों में आद्याक्षरों के विस्तार को अनिवार्य किया जाना दक्षिण भारत में उलझन का एक बड़ा स्रोत है. उदाहरणार्थ, कृष्ण कुमार के पुत्र राजा गोपाल वर्मा, जिन्हें सामान्यतः “के. राजा गोपाल” के नाम से जाना जाता हो, के नाम लिखा कोई पत्र गलती से “कृष्ण कुमार राजा गोपाल वर्मा” के पते पर भेजा जा सकता है.

सामान्यतः पुरुषों के नाम पूर्व में वर्णित आद्याक्षरों के साथ प्रारंभ होते हैं. कुछ पुरुष अपने आद्याक्षरों को हटा देते थे और अंत में अपने पिता का नाम जोड़ते थे. हालांकि, यह कोई क़ानूनी नाम नहीं है और इससे आधिकारिक रिकार्डों में उनके नाम परिवर्तित नहीं होंगे. उदाहरणार्थ, पी. चिदम्बरम और चिदम्बरम पलानियप्पन दोनों ही नाम वैध हैं; हालांकि दूसरे रूप का प्रयोग क़ानूनी रूप से नहीं किया जाता. सामान्यतः आद्याक्षरों को हटा दिया जाता है और नाम को छोटा करने के लिये पिता का नाम अंत में जोड़ा जाता है, जैसे एम. गोपाल कृष्णन के पुत्र जी. राजा रवि वर्मा का नाम राजा गोपाल बन जाता है.

महिलाओं के लिये, आद्याक्षरों की प्रणाली कुछ भिन्न है. विवाह से पूर्व, एक कन्या अपने पिता के आद्याक्षरों का प्रयोग करती है, लेकिन विवाह के बाद वह अपने पति के आद्याक्षर का प्रयोग करने का विकल्प चुन सकती है. हालिया दिनों में यह चलन बदल गया है और अनेक महिलायें, विशेषतः कामकाजी महिलायें, अपने आद्याक्षर नहीं बदलतीं, बल्कि अपने पिता के आद्याक्षरों का प्रयोग करना जारी रखतीं हैं. ऐसा मुख्यतः सुविधा की दृष्टि से किया जाता है क्योंकि स्कूल की डिग्री व कॅरियर के दस्तावेजों में महिला के पिता के आद्याक्षर ही लिखे होते हैं. क़ानूनी रूप से कोई नाम बदलना बहुत जटिल प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत प्रस्तावित परिवर्तन की घोषणा समाचार-पत्रों के माध्यम से करना और परिवर्तन एक आधिकारिक गजट में प्रकाशित करवाना शामिल होता है. अतः आधुनिक चलन के अनुसार अपने पति का नाम अंत में जोड़ लिया जाता है, जैसे कुछ पश्चिमी महिलायें करतीं हैं, जो एक समासचिह्न के साथ अपने पति का नाम जोड़ लेती हैं.

जो लोग नामकरण की दक्षिण भारतीय पद्धति को नहीं समझ पाते, वे कभी-कभी गलत तरीके से आद्याक्षरों का विस्तार करते हैं. उदाहरणार्थ, पी. चिदम्बरम नाम को विस्तारित करके पलानियप्पन चिदम्बरम कर दिया जाता है, जो इस अर्थ में गलत है कि इससे ऐसा लगता है कि उस व्यक्ति का नाम “पलानियप्पन” है, और उसके परिवार का नाम “चिदम्बरम” है. वास्तव में, व्यक्ति का नाम केवल “चिदम्बरम” है और उसके पूर्व आद्याक्षर “पी” जोड़ा गया है. साथ ही, यदि नाम सृष्टि वेंकट शेष फणीन्द्र है, तो इसे तीन आद्याक्षरों के साथ एस. वी. एस. फणीन्द्र लिखा जा सकता है.ऐसी ही अन्य प्रसिद्ध गलत व्याख्याओं में शतरंज के ग्रैंड मास्टर वी. आनंद (जिसे गलत तरीके से विश्वनाथन आनंद के रूप में विस्तारित किया जाता है); क्रिकेटर, एल. शिवरामकृष्णन (लक्ष्मण उनके पिता का नाम है); तथा स्वतंत्रता सेनानी व राजनेता, सी. राजगोपालाचारी (जिन्हें अक्सर चक्रवर्ती राजगोपालाचारी कहा जाता है) शामिल हैं. दूसरी ओर उत्तर भारतीय मीडिया डॉ. अंबुमणि रामदॉस (डॉ. रामदॉस) का उल्लेख अक्सर केवल डॉ रामदॉस के रूप में करता है, जो कि पुनः गलत है क्योंकि रामदॉस उनके पिता का नाम है, उनका नहीं.

स्वतंत्र भारत के प्रारंभ में जस्टिस पार्टी (1926 के बाद से) और अन्य द्रविड़ दलों ने इस भ्रम को बढ़ाने में बहुत योगदान दिया है. उदाहरणार्थ, राजाराम अय्यर नामक एक व्यक्ति को अय्यर जाति का होने के कारण स्कूलों, कालेजों, नौकरी आदि में लाभ मिला करता था. दूसरी ओर, संभव है कि पहचाने जाने से बचने के लिये कोई व्यक्ति अपनी जाति का नाम घोषित न करे. "किसी व्यक्ति को केवल अपनी जाति की घोषणा करने मात्र से कोई लाभ या हानि क्यों प्राप्त होनी चाहिये?" यह द्रविड़ विचारधारा द्वारा उठाया गया मुख्य प्रश्न था. उदाहरणार्थ, संभव है कि किसी सार्वजनिक कार्यालय में राजाराम मुदलियार नामक एक व्यक्ति के साथ वैसा ही व्यवहार न किया जाए, जैसा राजाराम नादार नामक व्यक्ति के साथ किया जाता हो. इसके अलावा, बिना कुलनाम/जाति के नाम वाला कोई राजाराम लोगों को भ्रम में डाल देगा. इसके परिणामस्वरूप आद्याक्षर के रूप में पिता के नाम को शामिल किया जाने लगा. कुछ अभद्र शब्दावली में, तमिलनाडु के कुछ भागों में इसका उल्लेख इस प्रकार किया जाता था. "हमारा जन्म पिता से हुआ है, जातियों से नहीं". इतना सब-कुछ कहने और होने के बावजूद भी यह स्थिति बनी हुई है कि तमिलनाडु में एक शक्तिशाली जाति-प्रथा और जातिगत भावना मौजूद है, लेकिन उसे केवल नाम के द्वारा उजागर नहीं किया जा सकता.

कुलनाम या पारिवारिक नाम[संपादित करें]

अनेक दक्षिण भारतीय व्यक्ति एक पारिवारिक नाम का प्रयोग भी करते हैं.

पारिवारिक नाम तमिलनाडु में आम नहीं हैं, लेकिन शेष भारत में अधिकांश लोग एक पारिवारिक नाम का प्रयोग करते हैं.

  1. आविष्कार किये गये पारिवारिक नाम, जैसे राजेश पायलट.
  2. ब्रिटिश व भारतीय अभिभावकों के एंग्लो-इंडियन वंश के लोगों के अंग्रेज़ी अंतिम नाम.
  3. पुर्तगाली-गोवावासियों के अंतिम नाम, जैसे फर्नांडीज़.
  4. उन मुसलमानों, जिनके पूर्वजों को अरब के लोगों द्वारा इस्लाम में धर्मांतरित किया गया था, और अरब तथा भारतीय मूल के मिश्रित मुसलमानों के अरबी कुलनाम.

कन्नड़ नाम[संपादित करें]

कन्नड़ नामों में व्यक्ति के नाम के साथ स्थानों के नाम, वंश/शीर्षक/जाति के नाम, पिता के नाम शामिल हो सकते हैं. नामों का संयोजनों का प्रयोग करते समय पालन किये जाने वाले नियम; कभी-कभी वे कुलनाम को उपसर्ग या प्रत्यय की तरह लिखते हैं और मध्य नाम के स्थान पर व्यक्ति का नाम लिखा जाता है.

  • स्थान का नाम सदैव ही सबसे पहले आना चाहिये.

उदा. कडिडल मंजप्पा, जहां कडिडल स्थान का नाम है और मंजप्पा व्यक्ति का नाम है.

  • पिता का नाम हमेशा दूसरे स्थान पर आना चाहिये.

उदा. कुप्पल्ली वेंकटप्पा पुट्टप्पा, जहां कुप्पल्ली स्थान का नाम है, वेंकटप्पा पिता का नाम है और पुट्टप्पा व्यक्ति का नाम है.

  • पिता के नाम व स्थान के नाम के आद्याक्षर

उदा. अडनूर भीमाप्पा नरेन्द्र, जहां अडनूर स्थान का नाम है, भीमाप्पा पिता का नाम है और नरेन्द्र व्यक्ति का नाम है. अडनूर व भीमाप्पा को संक्षिप्त आद्याक्षरों के रूप में लिखा जा सकता है, जिससे नाम "ए. बी. नरेन्द्र" बन जायेगा.

  • वंश/शीर्षक/जाति का नाम (जिन्हें सामान्यतः कुलनाम कहा जाता है) सदैव अंत में आना चाहिये.

उदा. कुंदापुर वरुण शेणॉय, कुंदापुर स्थान का नाम है, वरुण व्यक्ति का नाम है और शेणॉय कुलनाम है. उदा. सतीश रामनाथ हेगडे, सतीश व्यक्ति का नाम है, रामनाथ पिता का नाम है और हेगडे शीर्षक है. उदा. सतीश गौड़ा

  • कुलनाम के रूप में दो उपसर्ग व प्रत्यय तथा मध्य नाम के रूप में व्यक्ति का नाम. उदाहरणार्थ डोड्डेमाने रामकृष्ण हेगड़े .
  • दुर्लभ मामलों में पैतृक घरों के नाम भी मिलते हैं, और वे स्थान के नामों के नियमों का पालन करते हैं.

हालांकि, यदि कोई व्यक्ति केवल अपने नाम का प्रयोग करना चाहता हो, तो आधिकारिक समूहों में जबरन अतिरिक्त नामों (सामान्यतः स्थान के नामों) को जोड़ने की प्रवृत्ति दिखाई देती है. कभी-कभी कुलनाम व्यक्ति द्वारा किये जाने वाले कार्य पर निर्भर होता है.

मलयाली (केरल) नाम[संपादित करें]

अधिकांश केरलवासियों का एक पारिवारिक नाम होता है. अधिकांश पारिवारिक नामों का मूल अस्पष्ट होता है, लेकिन उनका मूल भौगोलिक हो सकता है – उदा., वडक्केडथ (Vadakkedath) (उत्तर से), पुथेनवीतिल (Puthenveetil) (नये घर से) आदि. पारंपरिक रूप से पूर्ण नाम निम्नलिखित तीन में से किसी एक पद्धति का पालन करते हैं:

1. पारिवारिक नाम के बाद व्यक्ति का नाम और उसके बाद सामान्यतः जाति का नाम या शीर्षक लिखा जाता है. यह पद्धति उच्च-वर्णीय हिंदुओं (पुरुषों व महिलाओं दोनों के लिये) के बीच आम थी, विशेषतः मालाबार और कोचीन में. कुछ उदाहरण: मणि माधव चकियार (मणि पारिवारिक नाम या थारावाड नाम है, माधव(न) व्यक्ति का नाम है और चकियार जाति का नाम है), वल्लाथल नारायण मेनन (वल्लाथल पारिवारिक नाम या थारावाड नाम है, नारायण(न) व्यक्ति का नाम और मेनन जाति का नाम है), ओलप्पमण्णा सुब्रमणियन नंबूदिरी, एरंबला कृष्णन नायनार, आदि. कभी-कभी जाति का नाम/शीर्षक हटा दिया जाता है, उदा., कैनथ करुणाकरण (जहां जाति का नाम मरार हटा दिया गया है). महिलाओं के मामले में, जाति का नाम/शीर्षक, पारंपरिक रूप से, सामान्यतः भिन्न हुआ करता था, उदाहरणार्थ "नायर" के लिये "अम्मा" का प्रयोग किया जाता था, "नंबूदिरी" के लिये "अंदरज्जणम" का प्रयोग किया जाता था, "वारयार" के लिये "वारियसार", "नांबियार" के लिये "नांग्यार" "वलियाथन/उन्निथन/कर्था" के लिये "कुंजम्मा" आदि. (पंजाब की सिंह/कौर पद्धति को देखें), उदा., नालप्पट बालमणि अम्मा, जिनके भाई नालप्पट नारयण मेनन तथा सावित्री अंदरज्जणम (एक प्रसिद्ध लेखिका). अक्सर पारिवारिक नाम एक से अधिक भागों से मिलकर बना होगा, उदा., एलंकुलम मणक्कल शंकरन नंबूदिरीपाद, मदथिल थेक्केरपट्टु वासुदेवन नायर, आदि. सामान्यतः पारिवारिक नाम को आद्याक्षरित कर दिया जाता है, कभी-कभी व्यक्ति का नाम भी आद्याक्षरित किया जाता है (लेकिन जब इसके बाद जाति का नाम आ रहा हो, तो ऐसा कभी नहीं किया जाता) और जाति का नाम (यदि मौजूद हो) को कभी आद्याक्षरित नहीं किया जाता. यह पूरी तरह स्वैच्छिक है. अतः हमारे पास आम रूपों में वैलाथल नारायण मेनन, सी. अच्युत मेनन, ई के नायनार और पी. भास्करन (यहां भास्करन व्यक्ति का नाम है; जाति का नाम, इस उदाहरण में नायर, हटा दिया गया है) मौजूद हैं. नायर जाति में, शुरुआत में माता के पारिवारिक नाम का प्रयोग भी आम है. उदा. मैथिली राधाकृष्णन, जो अपने पारिवारिक नाम मैथिली के द्वारा ज्यादा जानी जाती हैं.

2. पारिवारिक नाम के बाद पिता का नाम और उसके बाद व्यक्ति का नाम लिखा जाता है. यह शेष जनसंख्या के बीच आम है. उदाहरणार्थ अधिकांश पारंपरिक ईसाई नाम इसी पद्धति का पालन करते हैं. सामान्यतः पारिवारिक नाम और पिता के नाम को आद्याक्षरित किया जाता था. महिलाओं (हिंदू) के मामले में, “अम्मा” का प्रयोग अक्सर किया जाता था (जैसा कि पिछले मामले में हुआ). उदाहरणों में के एम मणि, के जी जॉर्ज, वी एस अच्युतानंदन, के आर गोवरी अम्मा. पलक्कड़ के अनेक अय्यर (केरल के अय्यर) इस पद्धति के एक अनुकूलित रूप का प्रयोग करते हैं, जिसमें पारिवारिक नाम के स्थान पर "ग्रामम्" (गांव) का नाम लिखा जाता था. उदाहरण: तिरुनेलै नारायणैयर शेषन (टी एन शेषन), जहां तिरुनेलै गांव का नाम है, नारायणैयर पिता का नाम और शेषन व्यक्ति का नाम है; या गुरुवायूर शंकरनारायणन ललिथा को जी. एस. ललिथा के रूप में संक्षेपित किया जाता है.

3. व्यक्ति के नाम के बाद शीर्षक. यह विशिष्ट रूप से केंद्रीय त्रावणकोर क्षेत्र के सीरियाई ईसाइयों के बीच आम है, जहां राजा (महाराजा) या स्थानीय शासक (राजा या थंपुरन) चुनिंदा परिवारों को कोई उपाधियां प्रदान किया करते थे. उदाहरणों में वर्गीस वैद्यन (वैद्यन), फ्र. गेवर्गीस पणिक्कर (पणिक्कर), चाको मुथलली (मुथलली), अविरा थारकन (थारकन), वार्की वलिकप्पन (वलिकप्पन) आदि शामिल हैं.

4. व्यक्ति के नाम के बाद कुलनाम के रूप में पिता का नाम तथा माता के नाम से लिये गये आद्याक्षर. यह चलन अब आम है, जबकि व्यक्ति के नाम के साथ माता व पिता दोनों के नाम मिलते हैं. उदाहरणार्थ, एल. अथिरा कृष्ण. यहां माता के नाम ‘लीला’ का उल्लेख अद्याक्षर के रूप में मिलता है और पिता का नाम ‘कृष्ण’ कुलनाम के रूप में लिया गया है.

5. इन पारंपरिक नामकरण पद्धतियों में से अधिकांश का प्रयोग अब नहीं मिलता. सामान्यतः आजकल पारिवारिक नाम शामिल नहीं किये जाते (ऐसा संभवतः संयुक्त परिवारों या थारावाडों में आई कमी के कारण हुआ है). व्यक्ति के नाम, उसके बाद पिता के नाम (पितृसत्तात्मक, उदा. सुनील नारायणन या अनिल वर्गीस) अथवा जाति का नाम (उदा. अनूप नायर) लिखना वर्तमान में प्रचलित सबसे आम पद्धति है. पारिवारिक नाम के साथ मूल ग्राम का नाम लिखना भी असामान्य नहीं है, विशेषतः दक्षिणी केरल में, उदा. कावलम नारायण पणिक्कर, जहां कावलम अलप्पुज़ा जिले में एक गांव है.

इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिये कि अनेक ईसाई नाम, जैसे वर्गीस (गेवर्गीस) एरेमिक/सीरियाई मूल के हैं.

तमिल नाम[संपादित करें]

दक्षिणी राज्यों तमिलनाडु व केरल के कई लोग औपचारिक कुलनाम का प्रयोग नहीं करते, हालांकि इनमें से अधिकांश का कोई कुलनाम हो सकता है. ऐसा इसलिये है क्योंकि पारंपरिक रूप से कुलनाम उनकी जाति का उल्लेख करता है और इस बात को सुनिश्चित करने के लिये कि उनके नाम जाति-निरपेक्ष हों, उनके कुलनाम पूरी तरह त्याग दिये जाते हैं. अतः व्यवहार में, लोग कुलनाम के स्थान पर या तो अपने पिता के नाम का या आद्याक्षरों का प्रयोग करते हैं. जब आद्याक्षरों का प्रयोग किया जा रहा हो, तो उन्हें व्यक्ति के नाम के पहले या बाद में रखा जा सकता है. उदाहरणार्थ; जी. वेंकटेशन, वेंकटेशन जी, या वेंकटेशन गोविंदराजन, ये सभी वे विभिन्न तरीके हैं, जिनका प्रयोग वेंकटेशन नामक कोई व्यक्ति, जिसके पिता का नाम गोविंदराजन हो, स्वयं का उल्लेख करने के लिये कर सकता है.

मलेशियाई भारतीय (तमिल) नाम[संपादित करें]

मलेशिया में रहने वाले भारतीय मूल के अधिकांश लोगों (अधिकांशतः तमिल) का पैतृक मूल दक्षिण भारत में है. मलेशिया में, भारतीयों के लिये नामकरण का सामान्य प्रारूप वाय (Y) का पुत्र एक्स (X) या वाय (Y) की पुत्री एक्स (X) है. शब्दावली ‘का पुत्र’ मलय भाषा में आनक लेलकी (ANAK LELAKI) है, (जिसे पहचान के दस्तावेजों में संक्षिप्त रूप से A/L लिखा जाता है) और शब्दावली 'की पुत्री' आनक पेरेम्पुअन (ANAK PEREMPUAN) है, (जिसे पहचान के दस्तावेजों में संक्षिप्त रूप से A/P लिखा जाता है).

उदाहरण के लिये, मलयेशियाई पहचान पत्र (मायकाड) (MyKad) के नाम वाले भाग में तथा मलयेशियाई पासपोर्ट में वेलुपिल्लै (VELLUPILLAI) के पुत्र मुरुगन (MURUGAN) का नाम MURUGAN A/L VELLUPILLAI लिखा जाएगा.

उपरोक्त उदाहरण का प्रयोग करते हुये, MURUGAN A/L VELLUPILLAI अपने नाम को इस प्रकार भी व्यवस्थित करेगा कि उसके पिता का नाम उसका आद्याक्षर बन जाये औअर उसका नाम उसका कुलनाम/अंतिम नाम प्रतीत हो: वी. मुरुगन. यह पद्धति प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय लेखक आर. के. नारायण (आर – मूल स्थान: राशिपुरम,के – पिता का नाम: कृष्णस्वामी) के नाम के प्रारूप के समान है. चूंकि वर्तमान में मलेशिया में निवासरत अधिकांश भारतीयों का जन्म मलेशिया में ही हुआ था, अतः उनके नाम में आद्याक्षरों के रूप में केवल पिता का नाम ही दिखाई देता है.

हालांकि, पश्चिमी देशों में बसने वाले मलेशियाई भारतीयों की संख्या बढ़ती जा रही है और अस्पष्टता से बचने के लिये उन्होंने अपने अंतिम नाम के रूप में पिता के नाम का प्रयोग करना प्रारंभ कर दिया है. अतः, वेलुपिल्लै का पुत्र मुरुगन पश्चिम में अपना नाम केवल मुरुगन वेलुपिल्लै या एम. वेलुपिल्लै लिखेगा.

सिंगापुर के भारतीय (तमिल) नाम[संपादित करें]

ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में, भारतीय पुरुषों ( अधिकांश तमिल ) के नाम में क्रमशः संबधात्मक शब्दावली S/O (का पुत्र) और भारतीय महिलाओं के नाम में D/O (की पुत्री) का प्रयोग किया जाता था, और ये शब्दावलियां सिंगापुर में आज भी प्रचलित हैं.

तेलुगु नाम[संपादित करें]

तेलुगु लोगों के पारिवारिक नामों के पहले व्यक्ति का नाम लिखा जाता है और अक्सर यह अपने संक्षिप्त रूप में होता है. उदाहरणार्थ, कंभम नागार्जुन रेड्डी नाम को संक्षिप्त रूप से के.एन.रेड्डी लिखा जायेगा. इस नाम में, नागार्जुन रेड्डी व्यक्ति का नाम है, और कंभम उसका पारिवारिक नाम (कुलनाम) होगा. विशिष्ट रेड्डी जाति के कुछ लोग अपने नामों के साथ जाति का नाम भी जोड़ते हैं, विशेषतः “नायडू”, चौधरी, शेट्टी, गौड़ या मुद्राज. उदाहरणार्थ, विजय रेड्डी, हरि चौधरी, देवेंद्र गौड़. सामान्यतः, यदि पश्चिमी प्रारूप में व्यक्ति का नाम विजय रेड्डी कंडी (व्यक्ति का नाम, द्वितीय नाम और पारिवारिक नाम) था, तो तेलुगु-भाषी क्षेत्रों में इस नाम को के. विजय रेड्डी लिखा जायेगा. आंध्र प्रदेश में अनेक जातियों में एक समान कुलनाम, जैसे “लंकला” भी होते हैं, यादव जाति में लंकला वीरैया, रेड्डी जाति में लंकला दीपक रेड्डी आदि.

तेलुगु लोगों के पारिवारिक नाम उन गांवों या क्षेत्रों के नाम होते हैं, जहां से उनके पूर्वज आये थे. कभी-कभी विभिन्न जातियों के लोगों के पारिवारिक नाम एक समान भी हो सकते हैं. उदहरणार्थ, नंदुमुरी तारका रामाराव को एन.टी.रामाराव के रूप में संक्षेपित किया जा सकता है. तारकारामाराव नाम और नंदुमुरु (कृष्णा जिले में एक ग्राम) संभवतः एन.टी.आर. पैतृक ग्राम है.

कभी-कभी पारिवारिक नाम मानवीय शरीर के अंगों के समान भी हो सकते हैं, जैसे बोड्डु (नाभि), लिंगम (पुरुष जननेंद्रिय) आदि. हालांकि उन नामों के साथ सदैव ही कोई आध्यात्मिक अर्थ जुड़ा होता है. आध्यात्मिक अर्थ में, बोड्डु का अर्थ ब्रह्माण्ड का मूल तथा लिंगम का अर्थ भगवान शिव होता है.

संदर्भ[संपादित करें]

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