बन्दिनी (1963 फ़िल्म)

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बन्दिनी
बन्दिनी.jpg
बन्दिनी का पोस्टर
निर्देशक बिमल रॉय
निर्माता बिमल रॉय
लेखक नबेन्दु घोष (पटकथा)
पॉल महेन्द्र (संवाद)
पर आधारित चारु चन्द्र चक्रबर्ती (जरासन्ध) के बंगाली उपन्यास तमसी
अभिनेता अशोक कुमार
धर्मेन्द्र
नूतन
संगीतकार सचिन देव बर्मन (संगीतकार)
शैलेन्द्र तथा गुलज़ार (गीतकार)
छायाकार कमल बोस
संपादक मधु प्रभावलकर
स्टूडियो मोहन स्टूडियोज़, मुंबई
वितरक यश राज फ़िल्म्स
प्रदर्शन तिथि(याँ) 1963
कार्यावधि १५७ मि.
देश भारत
भाषा हिन्दी

बन्दिनी १९६३ में बनी हिन्दी भाषा की फिल्म है जिसके निर्माता और निर्देशक बिमल रॉय थे जिन्होंने दो बीघा ज़मीन और मधुमती जैसी प्रतिष्ठित फ़िल्में बनायीं थीं। इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे अशोक कुमार, धर्मेन्द्र और नूतन। बॉक्स ऑफ़िस में इस फ़िल्म ने ठीक ठाक ही प्रदर्शन किया था। फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कारों में इसे उस वर्ष छ: पुरस्कारों से नवाज़ा गया था जिसमें फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म पुरस्कार भी शामिल था।
यह फ़िल्म एक नारी प्रधान फ़िल्म है, जो कि हिन्दी फ़िल्मों में कम ही देखने को मिलता है। सुजाता के बाद बिमल रॉय की यह दूसरी नारी प्रधान फ़िल्म थी। बंदिनी की कहानी कल्यानी (नूतन) के इर्द-गिर्द घूमती है। यह शायद अकेली ऐसी फ़िल्म है जिसमें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में गांव की साधारण महिलाओं का योगदान दर्शाया गया हो।

संक्षेप[संपादित करें]

कल्यानी (नूतन) जेल में एक क़ैदी है जिसपर खून का इल्ज़ाम है। जेल में एक बुढ़िया कैदी को तपेदिक का रोग लग जाता और कल्यानी स्वेच्छा से उसकी देखभाल करने को राज़ी हो जाती है। बुढ़िया का इलाज करते करते जेल के डॉक्टर देवेन्द्र (धर्मेन्द्र) को कल्यानी से प्यार हो जाता है लेकिन कल्यानी अपने अतीत के कारण उसके प्यार को ठुकरा देती है। देवेन्द्र जेल की नौकरी से इस्तिफ़ा देकर अपने घर वापस चला जाता है। उस जेल के जेलर महेश (तरुन बोस) और देवेन्द्र के घरेलू सम्बन्ध होने के कारण देवेन्द्र जेलर को अपने प्यार के बारे में बता देता है। देवेन्द्र के जाने के बाद जेलर कल्यानी को बुला भेजता है और कल्यानी से अपनी आप बीती सुनाने को कहता है। जब कल्यानी यह कहती है कि उसका अतीत इतना दु:ख भरा है कि वह बोल नहीं पायेगी तो जेलर उससे अपनी कहानी लिख कर देने को कहता है।
अब फ़िल्म अतीत में चली जाती है और कल्यानी यह बताती है कि उसके पिता एक गांव में पोस्टमास्टर के ओहदे में कार्यरत थे और वह अपनी माँ और बड़े भाई को खो चुकी थी। उनके गांव में एक स्वतंत्रता सेनानी बिकाश घोष (अशोक कुमार) नज़रबन्द होता है और दोनों को आपस में प्यार हो जाता है। बिकाश कल्यानी से लौटकर आने पर विवाह करने का वादा करके चला जाता है लेकिन फिर कभी वापस नहीं आता है। गांव वालों के अपने पिता को दिये जाने वाले तानों से तंग आकर एक दिन कल्यानी गांव छोड़कर शहर आ जाती है जहाँ उसे एक अस्पताल में नौकरानी की नौकरी मिल जाती है। उसे एक अध-पगली महिला की देखभाल का ज़िम्मा सौंपा जाता है जो उसे काफ़ी बुरा भला कहती रहती है। एक दिन उसकी उसी शहर में रहने वाली सखी आकर बताती है कि कल्यानी के पिता उसे खोजते हुये उसके घर आये थे और फिर जब अस्पताल आने के लिए निकले तो एक मोटर से टकरा गये हैं लेकिन जब तक वे दोनों कल्यानी के पिता को देखने के लिए दूसरे अस्पताल पहुँचती हैं तब तक वे दम तोड़ चुके होते हैं। कल्यानी जब वापस अपने अस्पताल आती है तो देखती है कि उस अध-पगली महिला का पति बिकाश ही है। क्रोध में आकर वह उस महिला को चाय में ज़हर मिलाकर पिला देती है जिससे उसकी मौत हो जाती है और कल्यानी अपना जुर्म क़बूल कर लेती है।
फ़िल्म फिर वर्तमान में आती है और जेलर की कोशिशों से कल्यानी की रिहाई हो जाती है। जब कल्यानी जेलर से मिलने पहुँचती है तो जेलर उसको देवेन्द्र की माँ का ख़त पकड़ाता है जिसमें लिखा होता है कि देवेन्द्र की माँ ने कल्यानी को अपनी बहू के रूप में स्वीकार कर लिया है। जेलर कल्यानी को देवेन्द्र के घर भेजने का इन्तज़ाम करता है और उसे जेल की वार्डन के साथ रेलवे स्टेशन (जो कि स्टीमर के स्टेशन के साथ ही है) के लिए रवाना कर देता है। वहाँ उसकी मुलाक़ात बहुत बीमार बिकाश से होती है और बिकाश का साथी उसे बताता है कि जब पार्टी का हुक़्म मिला कि उसे एक पुलिस अफ़सर के रिश्तेदार से मजबूरन शादी करनी पड़ेगी तो बिकाश ने देशप्रेम की ख़ातिर अपने प्रेम की आहूति दे दी। अंत में कल्यानी स्टीमर में बैठकर बिकाश के साथ हो लेती है।

चरित्र[संपादित करें]

मुख्य कलाकार[संपादित करें]

दल[संपादित करें]

संगीत[संपादित करें]

इस फ़िल्म के संगीतकार सचिन देव बर्मन हैं तथा गीतकार शैलेन्द्र और गुलज़ार हैं।

बन्दिनी के गीत
गीत गायक/गायिका
मोरा गोरा रंग लई ले लता मंगेशकर
जोगी जब से तू आया लता मंगेशकर
मत रो माता मन्ना डे
ओ पंछी प्यारे आशा भोंसले
अब के बरस भेजी आशा भोंसले
मेरे साजन हैं उस पार सचिन देव बर्मन
ओ जाने वाले हो सके तो मुकेश

रोचक तथ्य[संपादित करें]

  • यह फ़िल्म बिमल रॉय द्वारा निर्देशित अंतिम फ़िल्म थी।
  • गीतकार के रूप में यह गुलज़ार की पहली फ़िल्म थी। उन्होंने इस फ़िल्म के लिए मोरा गोरा रंग लई ले लिखा है।

परिणाम[संपादित करें]

बौक्स ऑफिस[संपादित करें]

समीक्षाएँ[संपादित करें]

नामांकन और पुरस्कार[संपादित करें]

फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार[संपादित करें]

राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार[संपादित करें]

  • श्रेष्ठ फ़ीचर फ़िल्म

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]