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स्त्री शिक्षा

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सेन्ट पीतर्सबर्ग के बेस्टुझेव पाठ्यक्रम की एक छात्रा, १८८०

स्त्री शिक्षा स्त्री और शिक्षा को अनिवार्य रूप से जोड़ने वाली अवधारणा है। इसका एक रूप शिक्षा में स्त्रियों को पुरुषों की ही तरह शामिल करने से सम्बन्धित है। दूसरे रूप में यह स्त्रियों के लिए बनाई गई विशेष शिक्षा पद्धति को सन्दर्भित करता है। भारत में मध्य और पुनर्जागरण काल के दौरान स्त्रियों को पुरुषों से अलग तरह की शिक्षा देने की धारणा विकसित हुई थी। वर्तमान दौर में यह बात सर्वमान्य है कि स्त्री को भी उतना शिक्षित होना चाहिये जितना कि पुरुष हो। यह सिद्ध सत्य है कि यदि माता [1] शिक्षित न होगी तो देश की सन्तानो का कदापि कल्याण नहीं हो सकता।

नारी शिक्षा का स्वरूप और महत्व

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शिक्षा वयस्क जीवन के प्रति स्त्रियों के विकास के लिए एक आधार के रूप में विशेष रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।[2] शिक्षा अन्य अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए लड़कियों और महिलाओं को सक्षम करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। बहुत सी समस्याओं को पुरुषों से नहीं कह सकने के कारण महिलाएं कठिनाई का सामना करती रहती हैं। अगर महिलाएँ शिक्षित हों तो वे अपने घरों की सभी समस्याओं का समाधान कर सकती हैं। स्त्री शिक्षा राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय विकास में मदद करता है। आर्थिक विकास और एक राष्ट्र के सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि में मदद करता है। महिला शिक्षा एक अच्छे समाज के निर्माण में मदद करती है।

विश्व के विभिन्न भागों में इंजीनियरी और विनिर्माण आदि के पाठ्यक्रमों में स्त्रियों का नामांकन का प्रतिशत

समस्याएँ

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रूढ़िवादी सांस्कृतिक दृष्टिकोण के कारण लड़कियों को अक्सर पाठशाला जाने की अनुमति नहीं दी जाती है। इसका एक कारण गरीबी भी देखा जा सकता है क्योंकि घर की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण भी माता-पिता अपने सभी बच्चों को शिक्षा देने में असमर्थ होते हैं जिसके कारण वे अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेज पाते और लड़कियों को भी अपने साथ मजदूरी पर ले जाना पड़ता है।

भारत में स्त्री शिक्षा

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भारत की एक छात्रा
कलकत्ता का बंगाली कन्या विद्यालय (सन १८६९)

प्राचीन काल

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भारत में वैदिक काल से ही स्त्रियों के लिए शिक्षा का व्यापक प्रचार था। ऋग्वेद में बाईस वैदिक विदुषियों का उल्लेख किया गया है जिन्होंने श्लोक रचनायें भी की हैं – सूर्यासावित्री (47), घोषा काक्षीवती (28), सिकता निवावरी (20), इंद्राणी (17), यमी वैवस्वती (11), दक्षिणा प्रजापात्या (11), अदिति (10), वाक आम्मृणी (8), अपाला आत्रेयी (7), जुहू ब्रह्मजायो (7), अगस्त्यस्वसा (6), विश्ववारा आत्रेयी (6), उवर्वी (6), सरमा देवशुनी (6), देवजामय: इंद्रमातर: (5), श्रद्धा कामायनी (5), नदी (4), सर्पराज्ञी (3), गोधा (22), शस्वती आंगिरसी (23), वसुक्रपत्नी (24), रोमशा ब्रम्हवादिनी (5) तथा अथर्ववेद में पाँच श्लोक रचयिता विदूषियाँ उल्लेखित हैं – सूर्यासावित्री (139), मातृनामा (40), इंद्राणी (11), देवजामयः (5) तथा सर्पराज्ञी (3)। इसी तरह हमें उपनिषदों में भी मैत्रेयी एवं गार्गी जैसी विदुषियों का उल्लेख प्राप्त होता है। हारीत संहिता बताती है कि वैदिक समय में स्त्रीशिक्षा सहज प्रक्रिया थी एवं प्रमुखतः दो प्रकार की छात्रायें होती थीं – सद्योवधू (वे विवाह होने से पूर्व ज्ञान प्राप्त कर लेती थीं) तथा ब्रम्हवादिनी (ब्रह्मचर्य का पालन करने वाली ये छात्रायें जीवनपर्यन्त ज्ञानार्जन करती थीं)। शिक्षा ही नहीं अनेक विदुषियाँ शिक्षिकाओं के दायित्व का भी निर्वहन करती थीं। आश्वालायन गृह्यसूत्र में गार्गी, मैत्रेयी, वाचक्नवी, सुलभा, वडवा, प्रातिथेयी आदि शिक्षिकाओं के नामोल्लेख प्राप्त होते हैं। शिक्षिका का जीवन व्यतीत करने वाली स्त्रियों के लिये 'उपाध्याया' सम्बोधन प्राप्त होते हैं। इतना ही नहीं, पाणिनि ने विशेष रूप से शाला में छात्राओं के भी होने का उल्लेख किया है।

शतपथ ब्राह्मण में उल्लेखित है कि स्त्रियाँ वेद, दर्शन, मीमांसा आदि के अतिरिक्त नृत्य, संगीत, चित्रकला आदि की शिक्षा भी ग्रहण करती थीं।

महाभारत में काशकृत्स्नी नाम की के विदुषी का उल्लेख है जिन्होंने मीमांसा दर्शन पर काशकृत्स्नी नाम के ग्रंथ की रचना की। वात्स्यायन के कामसूत्र में उल्लेख है कि स्त्रियों को चौसठ कलाओं की शिक्षा दी जाती थी। यही नहीं, जैन ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि स्त्रियों को व्यावहारिक एवं लिखित रूप से शिक्षा प्रदान की जाती थी।

मध्यकाल

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समय बदलता रहा, बिगड़ता भी रहा लेकिन मध्यकाल के कुछ पहले तक स्त्री शिक्षा के बहुत ही रुचिकर और उल्लेखनीय उदाहरण मिलते रहते हैं। आठवीं सदी में लेखिका चिकित्सक – रूशी की एक कृति प्राप्त हुई थी (अरबी में अनूदित) जिसमें जिसमें धातृकर्म (midwifery) पर विवरण मिलते हैं। बारहवी सदी में भास्कर द्वितीय ने अपनी पुत्री लीलावती को गणित का अध्ययन कराने के लिये लीलावती ग्रंथ की रचना की थी। परमार शासक उदयादित्य के झरापाटन अभिलेख में भी हर्षुका नाम की विदुषी का उल्लेख मिलता है। आज अति पिछड़ा कहे जाने वाले बस्तर क्षेत्र में नागशासकों के एक अभिलेख में विदुषी राजकुमारी मासकदेवी की जानकारी प्राप्त होती है जो किसानों के हित के लिये राज्यनियम परिवर्तित करवाती हैं। पृथ्वीराज रासो बताता है कि राजकुमारी संयोगिता न केवल विदुषी थीं अपितु उन्होंने मदना नाम की शिक्षिका द्वारा संचालित कन्यागुरुकुल में शिक्षा प्राप्त की। उल्लेख यह भी मिलता है कि उनकी लगभग पाँचसौ सहपाठिनें विभिन्न राज्यों से आयी राजकुमारियाँ थीं।[3]

आधुनिक काल

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भारतीय पुनर्जागरण काल में भारत में स्त्री शिक्षा को नए सिरे से महत्व मिलने लगा। ईस्ट इंडिया कंपनी के द्वार सन 1854 में स्त्री शिक्षा को स्वीकार किया गया था। विभिन्न सरकारी और गैर सरकारी प्रयासों के कारण साक्षरता के दर 0.2% से बढ़कर 6% तक पहुँच गया था। कोलकाता विश्वविद्यालय महिलाओं को शिक्षा के लिए स्वीकार करने वाला पहला विश्वविद्यालय था।

जोन इलियोट ने सन् 1849 में पहला महिला विश्वविद्यालय खोला था और उस विश्वविद्यालय का नाम बेथुन कॉलेज था। समाज की उन्नति का विचार करते हुए स्वामी दयानन्द सरस्वती का ध्यान स्त्रियों की स्थिति की ओर भी आकर्षित हुआ। स्वामी जी की तीक्ष्ण दृष्टि ने शीघ्र ही इस बात को देख लिय था कि हिंदू समाज के पतन का एक बडा़ कारण यह स्त्रियों का पिछडा़पन भी है। जब माताएँ सुयोग्य न होंगी तब तक उनकी संतान काअन्नतिशील और कर्तव्यपरायण हो सकना कठिन है। इस दृष्टि से स्वामी जी ने आरंभ से ही स्त्री-शिक्षा पर भी बल देना आरंभ किया था और आर्य-समाजों की स्थापना के साथ ही पुत्री-पाठशालाओं के खोलने का आदेश दिया गया था। इसका ही परिणाम था कि महात्मा मुंशीराम (बाद में स्वामी श्रद्धानन्द) और लाला देवराज जैसे आर्य-पुरुषों ने सन् १८९० में जालंधर में कन्या पाठशाला की स्थापना कर दी, जो आज कन्या महाविद्यालय के रूप में भारत ही नहीं विदेशों तक में प्रसिद्ध है।

स्वतन्त्रता के पश्चात

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स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात सन 1947 से लेकर भारत सरकार पाठशाला में अधिक लड़कियों को पढ़ने का मौका देने के लिये, अधिक लड़कियों को पाठशाला में दाखिला करने के लिये और उनकी स्कूल में उपस्थिति बढ़ाने की कोशिश में अनेक योजनाएँ बनाए हैं जैसे कि निःशुल्क पुस्तकें, दोपहर का भोजन आदि। भारत की स्वतंत्रता के बाद सन् 1947 में विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग को बनाया गया। आयोग ने सिफारिश किया कि महिलाओं कि शिक्षा में गुणवता में सुधार लिया जाए। भारत सरकार ने तुरन्त ही महिला साक्षारता की लिये साक्षर भारत मिशन की शुरूआत किया था। इस मिशन में महिलाओं की अशिक्षा की दर को नीचे लाने की कोशिश की गई है। बुनियादी शिक्षा उन्हें अनिवार्य है और अपने स्वयं के जीवन और शरीर पर फैसला करने का अधिकार देने, बुनियादी स्वास्थ्य, पोषण और परिवार नियोजन की समझ के साथ लड़कियों और महिलाओं को शिक्षा प्रदान हो रही है।

सन् 1986 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति को पुनर्गठन देने को सरकार ने फैसला किया। सरकार ने राज्य कि उन्नति की लिये, लोकतंत्र की लिये और महिलाओं का स्थिति को सुधारने की लिये महिलाओं को शिक्षा देना ज़रूरी समझा था।

लड़कियों और महिलाओं की शिक्षा गरीबी पर काबू पाने में एक महत्वपूर्ण कदम है। कुछ परिवारों का काम कर रहे पुरुष दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटनाओं में विकलांग हो जाते हैं। उस स्थिति में, परिवार का पूरा बोझ परिवारों की महिलाओं पर टिका रहता है। महिलाओं की ऐसी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए उन्हे शिक्षित किया जाना चाहिए। वे विभिन्न क्षेत्रों में प्रवेश कर सकती हैं। महिलाएँ शिक्षकों, डॉक्टरों, वकीलों और प्रशासक के रूप में काम कर रही हैं। शिक्षित महिलाएँ अच्छी माँ बन सकती हैं। महिलाओं की शिक्षा से दहेज समस्या, बेरोज़गारी की समस्या, आदि सामाजिक शांति से जुड़े मामलों को आसानी से हल किया जा सकता है।

स्त्री शिक्षा की भूमिका

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1926 में मैडहोफ़ के रीफ़ेंस्टीन स्कूलों में से एक में रसायन विज्ञान की कक्षा

संस्कृत में यह उक्ति प्रसिद्ध है- ‘नास्ति विद्यासमं चक्षुर्नास्ति मातृ समोगुरु:’. इसका मतलब यह है कि इस दुनिया में विद्या के समान नेत्र नहीं है और माता के समान गुरु नहीं है।’ यह बात पूरी तरह सच है। बालक के विकास पर प्रथम और सबसे अधिक प्रभाव उसकी माता का ही पड़ता है। माता ही अपने बच्चे को पाठ पढ़ाती है। बालक का यह प्रारंभिक ज्ञान पत्थर पर बनी अमिट लकीर के समान जीवन का स्थायी आधार बन जाता है। लेकिन आज पूरे भारतवर्ष में इतने असामाजिक तत्व उभर आए हैं, जिन्होंने मां-बहनों का रिश्ता खत्म कर दिया है और जो भोग-विलास की जिंदगी जीना अधिक उपयोगी समझने लगे हैं। यही कारण है कि कस्बों से लेकर शहरों की मां-बहनें असुरक्षित हैं।

असुरक्षा के कारण ही बलात्कार और सामूहिक बलात्कार जैसी अनेक घटनाओं के जाल में फँसकर महिलाओं का जीवन नर्क बन चुका है। वास्तव में कहा जाता है कि महिलाओं की शिक्षा, किसी भी पुरुष की शिक्षा से कम महत्वपूर्ण नहीं है। समाज की नई रूपरेखा तैयार करने में महिलाओं की शिक्षा पुरुषों से सौ गुना अधिक उपयोगी है। इसलिए स्त्री शिक्षा के लिए सरकार को प्रयासरत होना चाहिए। तभी अत्याचार जैसी घटनाओं पर काबू पाया जा सकता है।

शिक्षा प्राप्त करके आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने का अर्थ यह नहीं है कि नारी शिक्षित होकर पुरुष को अपना प्रतिद्वन्द्वी मानते हुए उसके सामने ही मोर्चा लेकर खड़ी हो जाए। बल्कि वह आर्थिक क्षेत्र में भी पुरुष के बराबर समानता का अधिकार प्राप्त करके उसके साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध के समीकर्ण बनाने में सक्षम बने। जिस प्रकार शरीर को भोजन की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार मानसिक विकास के लिए शिक्षा आवश्यक है। अगर नारी ही शिक्षित नहीं होगी तो वह न तो सफल गृहिणी बन सकेगी और न कुशल माता। समाज में बाल-अपराध बढ़ने का कारण बालक का मानसिक रूप से विकसित न होना है। अगर एक माँ ही अशिक्षित होगी तो वह अपने बच्चों का सही मार्गदर्शन करके उनका मानसिक विकास कैसे कर पाएगी और एक स्वस्थ समाज का निर्माण एवं विकास सम्भव नहीं हो सकेगा। अतः यह कहा जा सकता है कि शिक्षित नारी ही भविष्य में निराशा एवं शोषण के अन्धकार से निकलकर परिवार को सही राह दिखा सकती है। इसका एक रूप शिक्षा में स्त्रियों को पुरुषों की ही तरह शामिल करने से संबंधित है। दूसरे रूप में यह स्त्रियों के लिए बनाई गई विशेष शिक्षा पद्धति को संदर्भित करता है। भारत में मध्य और पुनर्जागरण काल के दौरान स्त्रियों को पुरुषों से अलग तरह की शिक्षा देने की धारणा विकसित हुई थी। वर्तमान दौर में यह बात सर्व मान्य है कि स्त्री को भी उतना शिक्षित होना चाहिये जितना कि पुरुष हो। यह सिद्ध सत्य है कि यदि माता शिक्षित न होगी तो देश की सन्तानो का कदापि कल्याण नहीं हो सकता।

भारत की प्रथम महिलायें

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भारत की पहली महिला मुख्यमंत्री - सुचेता कृपलानी (उत्तर प्रदेश - १९६३ )
सईदा अनवर तैमूर (असम ) १९८० में भारत की पहली मुस्लिम महिला मुख्यमंत्री थी।
लगातार तीन बार मुख्यमंत्री बनने का गौरव शीला दीक्षित (दिल्ली ) को है।
भारत की पहली महिला राज्यपाल - सरोजिनी नायडू (उत्तर प्रदेश )
भारत की पहली महिला स्नातक -- कादम्बिनी गांगुली थीं।
भारत की पहली महिला किसी उच्च न्यायालय की जज - अन्ना चांडी (केरल )
भारत की पहली महिला किसी उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश - लीला सेठ ( हिमाचल प्रदेश )
भारत की पहली महिला किसी देश में नियुक्त राजदूत - विजय लक्ष्मी पंडित
भारत की पहली महिला विश्व एथलेटिक्स में पदक पाने वाली - अंजू बोबी जार्ज
भारत की पहली महिला एवरेस्ट पर चढ़ने वाली - बछेंद्री पाल
भारत की पहली महिला एवरेस्ट पर दो बार चढ़ने वाली - संतोष यादव
भारत की पहली महिला इंग्लिश चैनल पर करने वाली - आरती साहा
भारत की पहली महिला मिस यूनिवर्स बनने वाली - सुष्मिता सेन
भारत की पहली महिला मिस वर्ल्ड बनने वाली - रीता फारिया
भारत की पहली महिला पायलट - प्रेमा माथुर
भारत की पहली महिला अशोक चक्र से सम्मानित होने वाली - कमलेश कुमारी
भारत की पहली महिला लोकसभा सभा अध्यक्ष - मीरा कुमार
भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री - इंदिरा गाँधी
भारत की पहली महिला ओलम्पिक में पदक जीतने वाली - कर्णम मल्लेश्वरी ( भारोत्तोलन में कांस्य , सिडनी २००० )
भारत की पहली महिला अन्तरिक्ष यात्री - कल्पना चावला
भारत की पहली महिला विदेश सचिव - चोकिला अय्यर
भारत की पहली महिला राज्यसभा उपसभापति - नजमा हेपतुल्ला
भारत की पहली महिला लोकसभा प्रतिपक्ष नेता - सुषमा स्वराज
भारत की पहली महिला आई . पी. एस . अधिकारी - किरण वेदी
भारत की पहली महिला आई०ए०एस० अधिकारी - अन्ना जार्ज
भारत की पहली महिला सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश - फातिमा बीबी
भारत की पहली महिला केंद्रीय मंत्री - राजकुमारी अमृत कौर ( स्वास्थ्य मंत्री )
भारत की पहली महिला नोबल पुरस्कार सम्मानित - मदर टेरेसा ( शांति के क्षेत्र में )
भारत की पहली महिला सांसद - राधाबाई सुबरायण
भारत की पहली महिला साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता - अमृता प्रीतम
भारत की पहली महिला ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता - आशापूर्णा देवी
भारत की पहली महिला उत्तरी ध्रुव पर पहुचने वाली - प्रीति सेनगुप्त
भारत की पहली महिला अन्टार्क्टिका पर पहुचने वाली - मेहर मूसा
भारत की पहली महिला संयुक्त राष्ट्र साधारण सभा की अध्यक्ष - विजय लक्ष्मी पंडित
भारत की पहली महिला बुकर पुरस्कार विजेता - अरुंधती राय ('द गोड ऑफ़ स्माल थिंग्स' पुस्तक के लिए )
भारत की पहली महिला चिकित्सक - कादम्बिनी गांगुली
भारत की पहली महिला सिनेमा अभिनेत्री - देविका रानी
भारत की पहली महिला फोटो जर्नलिस्ट - होमी व्यरावाला
भारत की पहली महिला ओलम्पिक में भाग लेने वाली - मेरी लीला रो (१९५२ )
भारत की पहली महिला एशियाई खेलो में पदक विजेता - कमलजीत संधू ( ४०० मी. दौड़ , 1970 में )
भारत की पहली महिला अर्जुन पुरस्कार विजेता - एन० लमस्दें (१९६१- हाकी )
भारत की पहली महिला रेमन मेगसेसे पुरस्कार विजेता - किरण बेदी

सन्दर्भ

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  1. "संग्रहीत प्रति" (PDF). मूल से (PDF) से 24 अगस्त 2015 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 14 दिसंबर 2015.
  2. स्त्री-शिक्षा की अनिवार्य आवश्यकता
  3. स्त्री शिक्षा के पुराने पन्ने

उद्धरण योग्य अन्य पुस्तकीय संदर्भ स्रोत

इन्हें भी देखें

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बाहरी कड़ियाँ

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