सिद्ध

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सिद्ध बौद्ध धर्म की ब्रजयान शाखा से संबंधित हैं। इनकी संख्या ८४ है। सरहप्पा को प्रथम सिद्ध माना जाता है।

दर्शन[संपादित करें]

सिद्ध धार्मिक कर्मकांड, बाह्याचार, तीर्थाटन आदि के विरोधी थे। इन्होंने अपनी रचनाओं में नैरात्म्य भावना, कायायोग, सहज, शून्य तथा समाधि की भिन्न-भिन्न अवस्थाओं का वर्णण किया है। पहले सिद्ध सरहप्पा ने सहजयान का प्रवर्तन किया था। उन्होंने सहज जीवन और सहज साधना पर जोर दिया था।

साहित्य[संपादित करें]

सिद्ध दर्शन को सिद्ध साहित्य में अभिव्यक्ति मिली है। इसकी भाषा अपभ्रंश एवं पुरानी हिंदी है। अपनी अनुभूतियों को व्यक्त करने के लिए इन्होंने संधा भाषा का प्रयोग किया है। यह अंतस्साधनात्मक अनुभूतियों का संकेत करनेवाली प्रतीक-भाषा है । इसका तात्पर्य प्रतीकार्थ खुलने पर ही प्रकट होता है।

स्थान[संपादित करें]

सिद्धों का स्थान पूर्वी भारत माना जाता है। बिहार, बंगाल, ओड़िसा, असम आदि क्षेत्र सिद्ध साधकों के प्रभाव वाले माने जाते हैं। इनके गढ़ तत्कालीन शिक्षा का केंद्र के रूप में विख्यात नालंदा के आसपास के क्षेत्र थे।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]