सिद्ध (बौद्ध-धर्म)

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सिद्ध बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा से सम्बंधित हैं। सिद्धों ने बौद्ध-धर्म के वज्रयान तत्व का प्रचार करने के लिए जन भाषा में जो साहित्य लिखा वह हिन्दी के सिद्ध साहित्य के अन्तर्गत आता है। राहुल सांकृत्यायन ने चौरासी सिद्धों के नामो का उल्लेख किया है। सिद्ध साहित्य का आरम्भ सिद्ध सरहपा से होता है। सरहपा को प्रथम सिद्ध माना जाता है। इन सिद्धों में सरहपा, शबरपा, लुइपा, डोम्भिपा, कण्हपा तथा कुक्कुरिपा हिन्दी के प्रमुख सिद्ध कवि हैं।[1]

दर्शन[संपादित करें]

सिद्ध धार्मिक कर्मकाण्ड, बाह्याचार, तीर्थाटन आदि के विरोधी थे। इन्होंने अपनी रचनाओं में नैरात्म्य भावना, कायायोग, सहज, शून्य तथा समाधि की भिन्न-भिन्न अवस्थाओं का वर्णन किया है। पहले सिद्ध सरहपा ने सहजयान का प्रवर्तन किया था। उन्होंने सहज जीवन और सहज साधना पर जोर दिया था।

साहित्य[संपादित करें]

सिद्ध दर्शन को सिद्ध साहित्य में अभिव्यक्ति मिली है। इसकी भाषा अपभ्रंश एवं पुरानी हिंदी है। अपनी अनुभूतियों को व्यक्त करने के लिए इन्होंने संधा भाषा का प्रयोग किया है। यह अंतस्साधनात्मक अनुभूतियों का संकेत करनेवाली प्रतीक-भाषा है। इसका तात्पर्य प्रतीकार्थ खुलने पर ही प्रकट होता है।

स्थान[संपादित करें]

सिद्धों का स्थान पूर्वी भारत माना जाता है। बिहार, बंगाल, ओड़िसा, असम आदि क्षेत्र सिद्ध साधकों के प्रभाव वाले माने जाते हैं। इनके गढ़ तत्कालीन शिक्षा के केंद्र के रूप में विख्यात नालंदा के आसपास के क्षेत्र में थे।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. हिन्दी साहित्य का इतिहास, सम्पादक-डा॰ नगेन्द्र, संस्करण १९८५, प्रकाशक- नेशनल पब्लिशिंग हाउस, २३ दरियागंज, नयी दिल्ली-११००२, पृष्ठ- ७९

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]