संधा भाषा

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संधा भाषा सिद्धों द्वारा अपनी अंतःसाधनात्मक अनुभूतियों को व्यक्त करने के लिए प्रयुक्त भाषा है। इसमें प्रतीकों के सहारे अंतस्साधनात्मक अनुभूतियों को व्यक्त किया जाता है। इसलिए इसका तात्पर्य प्रतीकों के खुलने पर ही प्रकट होता है। सिद्धों ने अपनी रचनाएँ मुख्यतः अपभ्रंश और पुरानी हिंदी में की है। संधा भाषा वास्तव में इन रचनाओं में प्रयुक्त भाषा शैली है। यह कोई नितांत पृथक भाषा नहीं है। नाथों ने भी संधा भाषा का प्रयोग अपनी रचनाओं में किया है। कबीर की ऐसी ही भाषा को 'उलटबाँसी' कहा जाता है।