सहभागी प्रबन्धन

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किसी कम्पनी के कर्मचारियों या किसी समुदाय के नागरिकों को संगठन के निर्णय लेने की प्रक्रिया में सहभागी बनाकर उनका सशक्तीकरण करना सहभागी प्रबन्धन ( Participatory management) कहलाता है। [1]

औद्योगिक संबंध के दो महत्वपूर्ण पहलू होते है, संघर्ष तथा सहयोग के पहलू। आधुनिक उद्योग प्रबन्ध और श्रम के सहयोग के कारण ही चलते रहते हैं। यह सहयोग नियोजन में अनौपचारिक रूप से स्वतः होता रहता है। उद्योगों का चलते रहना दोनों क हितों में आवश्यक है। साथ ही, प्रबन्धन और श्रमिकों के कुछ हितों में विरोध भी पाए जाते है। जिससे उनके बीच संघर्ष भी होता रहता है। प्रबन्धक और प्रबन्धितों के कई हितों में विरोध नहीं होते, जिससे वे परस्पर सहयोग करते रहते है। इन्ही उभय हितों को ध्यान में रखते हुए श्रम-प्रबन्ध सहयोग की कई औपचारिक संस्थाएँ स्थापित की गई हैं, जो नियमित रूप से उभय समस्याओं का समाधान करती है। इन संस्थाओ को कई नाम से पुकरा जाता है; जैसे-श्रम-प्रंबध सहयोग, संयुक्त परामर्श , सह-निर्धारण, संयुक्त निर्णयन , उद्योग में श्रमिकों की सहभागिता, या प्रबंध में श्रमिकों की सहभागिता। साधारणतः उपर्युक्त सभी शब्द-समूह का प्रयोग समान अर्थों मेंं किया जाता है, लेकिन उनमें कभी-कभी सहभागिता के विशिष्ट रूपों, स्तरों या उसकी मात्रा के आधार पर अंतर बताने का प्रयास किया जाता है।

प्रबन्ध में श्रमिकों की सहभागिता के उद्देश्य[संपादित करें]

प्रबन्ध में श्रमिकों की सहभागिता के कई उद्देश्य होते है, जिनमें निम्नलिखित मुख्य हैं-

उत्पादकता में वृद्धि[संपादित करें]

उत्पादकता में वृद्धि प्रबंध और श्रम के उभय हित में है। उत्पादकता के बढ़ने से श्रमिकों की अधिक मजदूरी और विभिन्न प्रकार की सुविधाआ की उपलब्धि की संभावना होती है तथा नियोजक को अधिक लाभ की प्राप्ति हो सकती है। श्रम-प्रबंध सहयोग से उत्पादकता या कौशल में वृद्धि की जा सकती है तथा उत्पादित वस्तुओं की गुणवत्ता में सुधार लाया जा सकता है। इससे बरबादी को रोकन तथा लागत कम करने में भी सहायता मिल सकती है। उत्पादकता में वृद्धि के फल क विभाजन के सिलसिले में श्रमिकों और प्रबंधकों या नियोजक के बीच मतभेद हो सकता है, लेकिन उसे बढ़ाने या उसमें सुधार लाने के सम्बन्ध में उनके बीच विरोध की बात नही उठती। जहाँ उत्पादकता-वृद्धि के फल के विभाजन की समुचित व्यवस्था है, वहाँ प्रबंध में श्रमिकों की सहभागिता की अधिकांश योजनओं में उत्पादकता-वृद्धि, यंत्रों और मशीनों या समुचित उपयोग, बरबादी की रोकथाम, उत्पादित वस्तुओं की गुणवत्ता बनाए रखने, उत्पादन-घंटो के अधिकाधिक उपयोग, विनिर्माण-प्रक्रिया तथा कार्य की भौतिक दशाआ में सुधार को विशेष रूप से सम्मिलित किया जाता है।

औद्योगिक प्रजातंत्र को प्रोत्साहन[संपादित करें]

कई लोगों के मत में आधुनिक उद्योगों में उन विषयों के निर्धारण में श्रमिकों को सहभागिता के अवसर प्रदान करना आवश्यक है, जिनसे वे प्रत्यक्ष रूप से सबंद्ध रहते हैं। सामूहिक सौदेबाजी (कलेक्टिव बार्गेनिंग) में श्रमिक नियोजक पर दबाव डालकर बहुत कुछ ले लेते हैं, लेकिन इससे उन्हें प्रतिदिन के प्रबंध में भाग लेन का नियमित अवसर नहीं मिलता। सामूहिक सौदेबाजी के विकास, श्रमसंघों की शक्ति में वृद्धि तथा नियोजकों की प्रवृत्ति में परिवर्तन के कारण ऐसी संस्थाओं के गठन पर जोर दिया जाने लगा हैं, जिसमें श्रमिकों के प्रतिनिधि प्रबंधकों के साथ नियमित रूप स बैठकर संयुक्त निर्णय ले सकें। इससे श्रमिकों के बीच प्रतिष्ठान के प्रति अस्था मजबूत होती है और उन्हें प्रबंध में भाग लेते रहने की संतुष्टि प्राप्त होती रहती है। सामजवादी देशों में तो प्रबंध के कई क्षेत्रों में श्रमिकों की सहभागिता को प्रोत्साहित करने पर विशेष रूप से जोर दिया जाता है। ऐसे कुछ देशों में श्रमिक उद्योग के विभिन्न स्तरों पर कई महत्वपूर्ण विषयों पर प्रबंधकों के साथ संयुक्त निर्णय लेते है। इस तरह, प्रबंध में श्रमिकों की सहभागिता से औद्योगिक प्रजातंत्र की स्थापना को प्रोत्साहन मिलता है।

संघर्ष की रोकथाम[संपादित करें]

श्रम और प्रबंध के बीच सहयोग से दोनों एक-दूसरे की समस्याओं और स्थितियों से अच्छी तरह अवगत होते हैं और वे उनके समाधान के लिए मैत्री के वातावरण में प्रयास करते हैं। इस तरह, श्रम-प्रबंध सहयोग से उद्योग में अच्छ नियोजक-नियोजित सबंध की स्थापना होती है। संयुक्त निर्णयों द्वारा समस्याओं के समाधान के अनुभव से दोनों पक्षकार विवादास्पद विषयों के भी हल निकालने में सफल होते हैं। कोई भी पक्ष संयुक्त निर्णयों से असंतुष्ट होने पर उनका विरोध नहीं करता, क्योंकि उनमें वह भी सक्रिय पक्षकार रहा है। इस तरह, प्रबंध में श्रमिकों की सहभागिता से औद्योगिक शांति बनाए रखने में प्रचुर सहायता मिलती है।

श्रमिकों के विकास एवं कार्यतोष में सहायक[संपादित करें]

प्रबंध में श्रमिकों की सहभागिता की योजनाओं से श्रमिकों को आत्माभिव्यक्ति और विचारों के आदान-प्रदान का प्रचुर अवसर मिलता है। उनके विचारों एवं सुझावों से संगठन के उद्देश्यों की पूर्ति में सहायता मिलती है तथा प्रबंध भी श्रमिकों के विकास के लिए सामुचित अवसर प्रदान करता रहता है। प्रबंध की सहानुभूतिपूर्ण प्रवृत्ति एवं संगठन में व्याप्त सहयोग के वातावरण से श्रमिकों के कार्यतोष में भी वृद्धि होती रहती है। साथ ही, श्रमिक समझते है कि इन योजनाओं के माध्यम से कार्य-स्थल पर उनके मानवीय अधिकारों पर ध्यान दिया जा रहा हैं और वे सक्रिय भागीदार के रूप में संगठन के उद्देश्यों की प्राप्ति में अपना योगदान देते रहते हैं।

प्रबंधकीय कौशल में वृद्धि[संपादित करें]

प्रबंध में श्रमिकों की भागीदारी से प्रबंध को उत्पादक तथा संगठन के अन्य उद्देश्यों की प्राप्ति में श्रमिकों के उपयोगी सुझाव मिलते रहते है। इन सुझावों को ध्यान में रखते हुए प्रबंधक अपनी कार्य-प्रणाली एवं उत्पादन-प्रक्रियाओं में सुधार करते रहते हैं। सहभागिता की योजनाओं के लागू होने के फलस्वरूप दोषपूर्ण प्रबंधकीय क्रियाकलाप एवं तरीकों को त्यागे जाने एवं सही मार्गो के अपनाए जाने क कई उदाहरण मिलते हैं। इस तरह, प्रबंधकीय कौशल में वृद्धि होती है और संगठन क उद्देश्य सहजता से प्राप्त होते है।

सहभागिता का स्तर या मात्रा[संपादित करें]

प्रबंध में श्रमिकों की सहभागिता का स्तर या उसकी मात्रा एक समान नहीं होती। कहीं सहभागिता बहुत ही सीमित होती हैं, तो कहीं श्रमिक कई प्रबंधकीय क्षेत्रों में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं। विभिन्न देशों के प्रबंध में श्रमिकों की भागीदारी की योजनाओं के अध्ययन के आधार पर विद्धानों ने सहभागिता के विभिन्न स्तरों का उल्लेख किया है। इन विद्वानों में अलेक्जेंडर, मेहत्राज, राघवन, दत्ता, टानिक और एडम सम्मिलित हैं। भागीदारी की योजनाओं के क्रियान्वयन को ध्यान में रखते हुए प्रबंध में श्रमिकों की सहभागिता के अग्रलिखित स्तरों या मात्रा का उल्लेख किया जा सकता है-

सूचनात्मक सहभागिता[संपादित करें]

सहभागिता के इस स्तर पर नियोजक उद्यम से सबंद्ध कुछ विशेष क्षेत्रों जैसे- व्यवसाय की दशाओं, उद्यम के भविष्य, उत्पादन-प्रणाली में परिवर्तन आदि के संबंध में सूचनाएँ उपलब्ध कराने के लिए सहमत हो जाते हैं। सहभागिता का यह स्तर न्यूनतम होता है। सूचनात्मक सहभागिता से कर्मचारी नियोजक की स्थिति से अवगत हो जाते है तथा उन्हें ध्यान में रखते हुए अपनी माँगों और सुझावों को प्रस्तुत करते हैं। इससे श्रमसंघ को अपनी नीतियों एवं कार्यक्रमों में संशोधन करने तथा कर्मचारियों की प्रवृत्तिमें परिवर्तन लाने में सहायता मिलती है। भारत में प्रबंध में श्रमिका की भागीदारी की योजनाओं के अंतर्गत जिन क्षेत्रों में कर्मचारियों को सूचनाएँ उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है, उनमे मुख्य है- उद्यम की सामान्य आर्थिक स्थिति, उद्यम का संगठन और सामान्य संचालन, बाजार, विक्रय एवं उत्पादन की स्थिति, कार्य एवं विनिर्माण के तरीके, वार्षिक तुलन-पत्र तथा विस्तार एवं परिनियोजन-योजनाएँ।

समस्या-सहभागिता[संपादित करें]

सहभागिता के इस स्तर पर नियोजक उत्पादन या उद्यम से संबद्ध विशेष समस्याओं के समाधान के लिए कर्मचारियों या श्रमसंघ से परामर्श करता है और इस संबंध में उनका सहयोग प्राप्त करता है। इस स्तर की सहभागिता सामान्यतः आवश्यकता पड़ने पर विशेष समस्याओं के समाधान के लिए अस्थायी रूप से होती है। अनुभव के आधार पर इसे व्यापक और स्थायी रूप दिया जा सकता है। संयुक्त राज्य अमेरिका के वस्त्र-उद्योग में इस तरह की सहभागिता के कई उदाहरण मिलते है।

परामर्शी सहभागिता[संपादित करें]

सहभागिता के इस स्तर या मात्रा में नियोजक और कर्मचारिया या श्रमसंघ के बीच कई पूर्व-निर्धारित उभय विषयों पर औपचारिक एवं नियमित परामर्श की व्यवस्था की जाती है। इसके अंतर्गत नियोजक उद्यम से संबद्ध महत्वपूर्ण विषयों पर निर्णय लेने के पहले कर्मचारियों या श्रमसंघों से परामर्श कर लेता है और उनक दृष्टिकोणों को ध्यान में रखकर निर्णय लेने के पहले कर्मचारियों या श्रमसंघों नियोजक को अपने विचारों से अवगत कराते हैं और अपने सुझाव भी देते है, लेकिन उन्हें स्वीकार करने के लिए नियोजक को बाध्य नहीं करते। परामर्शी सहभागिता में संयुक्त-निर्णयन नहीं होता। इस स्तर की सहभागिता से कर्मचारियों और श्रमसंघ की परिस्थिति का निश्चित मान्यता मिलती है।

प्रशासकीय सहभागिता[संपादित करें]

इस स्तर की सहभागिता में उद्यम से संबद्ध कुछ क्षेत्रों में प्रशासन का भार कर्मचारियों और प्रबंधकों की संयुक्त समितियों को सौंप दिया जाता है। सहभागिता के इस स्तर में कर्मचारियों को अपेक्षाकृत अधिक जिम्मेदारी और अधिकार प्राप्त होते हैं तथा उन्हें प्रशासन और निरीक्षण-संबंधी कार्यों में अधिक स्वायत्तता प्राप्त होती है।

निर्णयात्मक सहभागिता[संपादित करें]

यह प्रबंध में श्रमिकों की सहभागिता का उच्चतम स्तर है। इस स्तर में निर्णय की प्रक्रिया वास्तव में संयुक्त होती है। इसमें प्रबंध और श्रमसंघ या श्रमिकों के प्रतिनिधि दोनों को संयुक्त रूप से निर्णय लेने के अवसर मिलते हैं और निर्णयों के परिणामों का दायित्व दोनों पर संयुक्त रूप से रहता है। अधिकांश योजनाओं में संयुक्त-निर्णयन के क्षेत्र पूर्व-निर्धारित रहते हैं, लेकिन इन क्षेत्रों की व्यापकता या विषयों में अंतर पाया जाता है। निदेशक बोर्ड में श्रमिकों का प्रतिनिधित्व भी इस स्तर की सहभागिता का उदाहरण या विषयों में अंतर पाया जाता है। निदेशक बोर्ड म श्रमिकों का प्रतिनिधित्व भी इस स्तर की सहभागिता का उदाहरण है। भारत में संयुक्त-निर्णयन के क्षेत्र सीमित हैं, लेकिन जर्मनी, स्वेडेन, इटली, युगोस्लाविया, पोलैंड और जापान में ये व्यापक हैं।

कुछ लोग सामूहिक सौदेबाजी को भी निर्णयात्मक सहभागिता के रूप में देखतें हैं। लेकिन, प्रबंध में श्रमिकों की सहभागिता और सामूहिक सौदेबाजी में केवल विषयवस्तु के आधार पर ही अंतर नहीं होता, बल्कि दोनों के स्वरूप में भी अंतर होता है। सहभागिता मुख्यतः उभय हितों के विषयों पर ही होती है, जबकि सामूहिक सौदेबाजी मुख्यतःविरोधी हितों पर। प्रबंध में श्रमिकों की सहभागिता में सद्भावना एवं पारस्परिक विश्वास के आधार पर उभय हितों के विषयों पर सहयोग करना तथा उत्पादन-वृद्धि या कार्यकुशलता के सुधार करना आवश्यक तत्व होते हैं, लेकिन सामूहिक सौदेबाजी दोना पक्षकारों को उत्पीड़क शक्ति से उत्पन्न हो सकने वाले परिणामों पर आधृत रहता है।

सन्दर्भ[संपादित करें]