सलाउद्दीन

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सलाउद्दीन अय्यूब
/Salahddin Ayyub
मिस्त्र तथा सीरिया के
सूल्तान
शासनावधि1174 - 4 मार्च 1193
राज्याभिषेककाहिरा
पूर्ववर्तीनया शासन
उत्तरवर्तीअता अजीज उस्मान, (मिस्त्र)
जन्म1137 ईस्वी
तिकरीत उच्च मेसोपोटामिया, अब्बासी ख़िलाफ़त
निधन4 मार्च 1193 ईस्वी
दमिश्क, सीरिया
इश्मतद्दीन खातून
पूरा नाम
अल नासिर सलाउद्दीन यूसूफ इब्ने अय्यूब
पितानजमउद्दीन अय्यूब
धर्मइस्लाम

सलाउद्दीन: अंग्रेजी An-Nasir Salah ad-Din Yusuf ibn Ayyub (अरबी सलाउद्दीन युसुफ इब्न अय्युब) जन्म: 1138, निधन [[४ मार्च|4 मार्च मध्यकाल में पूरी दुनिया ने इस्लामिक अत्याचारों का दौर देखा.

जहां एक ओर साम्राज्यवाद का माहौल था तो वहीं, दूसरी तरफ मुस्लिम वास्तुकला ने नई इमारतों को शक्ल दी.

अपने साम्राज्य को बढ़ाने के साथ ही कुछ इस्लामी शासकों ने दरियादिली, बहादुरी की मिसालें भी पेश कीं.

उन्हीं में से एक था 12वीं सदी का मुस्लिम शासक सलाउद्दीन अय्यूबी, जिसने ईसाईयों से जेरुशलम छीना और वहां अय्यूबी साम्राज्य की स्थापना की. 1193 बारहवीं शताब्दी का एक कुर्द मुस्लिम योद्धा थे, जो समकालीन उत्तरी इराक के रहने वाले थे।उस समय के देश (शाम) सीरिया और मिस्त्र के शासक थे सीरिया और मिस्त्र के सुल्तान नुरुद्दीन जंगी की मृत्यु के बाद उसके दो भाई शासन करने लगे ,लेकिन जब एक के बाद एक दोनों भाइयो की मृत्यु हो गई तो अब नुरुद्दीन जंगी का सबसे वफ़ादार और करीबी सलाउद्दीन को शासक बनाया गया। सलाउद्दीन ने ११८७ में जब येरुशलम पर विजय प्राप्त करी तो पोप के आह्वान पर इंग्लैंड का बादशाह रिचर्ड दा लाइन हार्ट (Richard the Lionheart) फ्रांस का बादशाह और जर्मनी का बादशाह फ्रेडरिक (Frederick Barbarossa) की सेना ने हमला किया लेकिन सलुद्दीन ने अलग अलग युद्धों में फ्रेडरिक की सेनाओ को पराजित किया। वह जितना बड़ा योद्धा थे, उतना ही बड़ा और कुशल शासक थे।इसके साथ ही न्यायप्रिय और रहम दिल भी थे।यही कारण है कि यूरोप के इतिहासकार भी उनके सम्मान और महानता में प्रशंसा करते है।एक बार जब इंग्लैंड के शासक रिचर्ड ने मुसलमानों से अकरा का किला जीत लिया और मुस्लिम सेना ने किले को घेर लिया और युद्ध आरंभ हो गया ,उसी समय रिचर्ड बीमार पड़ गया और कोई अच्छा हकीम (वैद्य)नहीं मिल रहा था ,तब सलाउद्दीन ने अपना हकीम को दवाइयों के साथ रिचर्ड के पास भेजा और उसका इलाज करवाया। इस्लामी इतिहासकार तो यह तक कह देते हैं कि इस्लामी रशीदुन खलीफाओँ के बाद इतना कुशल शासक चरित्रवान और योद्धा कोई नहीं हुआ। बारहवीं सदी के अंत में उनके अभियानों के बाद ईसाई-मुस्लिम द्वंद्व में एक निर्णायक मोड़ आया और जेरुशलम के आसपास कब्जा करने आए यूरोपी ईसाईयों का सफाया हो गया। क्रूसेड युध्दो में ईसाईयों को हराने के बावजूद उनकी यूरोप में छवि एक कुशल योद्धा तथा विनम्र सैनिक की तरह है। सन् १८९८ में जर्मनी के राजा विलहेल्म द्वितीय ने सलाउद्दीन की कब्र को सजाने के लिए पैसे भी दिए थे। उनकी मृत्यु के समय उनके पास कुछ दिरहम मात्र ही थे ,क्योंकि वह अपनी आय को लोगो की भलाई के लिए खर्च कर देते थे। उनकी मृत्यु के समय क्रिया-कर्म भी उनके मित्रो ने मिलके करवाया। सलाउद्दीन की प्रसिद्धी इस बात से की जा सकती है कि फिलिस्तीन में बच्चे उनके शोर्य का गान करते हूए कहते हैं -

" नाह नू उल मुसलमीन ,कुल्लू नस सलाउद्दीन" इसका अर्थ है कि हम मुसलमानों के बेटे है और हममे सब सलाउद्दीन है।

दास्तान ईमान फ़रोशों की-फ़ातेह बैतुल

मुक़द्दस सुल्तान सलाहुद्दीन अय्यूबी

सलाहउद्दीन अय्यूबी पर उनके मुहाफ़िज़ों की मोजूदगी

में उस पर हमला न किया जा सकता था। दो हमले 

नाकाम हो चुके थे, अब जबके सलाहुद्दीन अय्यूबी को ये तवक़्क़ो (उम्मीद) थी के उनका चचा ज़ाद भाई अल सालेह, अमीर सैफुद्दीन शिकस्त खाकर तौबा कर चुके होंगे उन्होने इन्तक़ाम की एक और ज़ैर ए ज़मीन कोशिश की।

सलाहुद्दीन अय्यूबी ने इस फ़तह का जश्न मनाने की बजाय

हमले जारी रखे और तीन क़स्बों को क़ब्ज़े में ले लिया,
इनमें ग़ज़ा का मशहूर क़स्बा भी था।

उसी क़स्बे के गिर्द ओ निवाह (आस पास)में एक रोज़ सलाहुद्दीन अय्यूबी अमीर जावा अल असदी के खेमें में दोपहर के वक़्त ग़ुनूदगी के आलम में सुस्ता रहे थे। उन्होंने अपनी वो पगड़ी नहीं उतारी थी जो मैदान ए जंग में उनके सर को सहरा के सूरज और दुश्मन की तलवार से महफ़ूज़ रखती थी।

खेमें के बाहर उनके मुहाफ़िज़ों का दस्ता मौजूद और चौकस था। बाडी गार्ड्स के इस दस्ते का कमांडर ज़रा सी देर के लिए वहां से चला गया। एक मुहाफ़िज़ ने सलाहुद्दीन अय्यूबी के खेमें के गिरे हुए पर्दों में से झांका। इस्लाम की अज़मत के पासबान की आंखें बंद थीं, वो पीठ के बल लेटा हुआ था। उस मुहाफ़िज़ ने बाडी गार्ड्स की तरफ देखा, उनमें से तीन चार बाडी गार्ड्स

ने उसकी तरफ देखा। मुहाफ़िज़ ने अपनी आंखें बंद करके खोलीं।
तीन चार मुहाफ़िज़ उठे और दूसरों को बातों में लगा लिया। 

मुहाफ़िज़ खेमें में चला गया, कमर बंद से खंजर निकाला दबे पाँव चला और फिर चीते की तरह सोए हुए सलाहुद्दीन अय्यूबी पर जस्त (छलांग) लगाई।

ख़ंजर वाला हाथ ऊपर उठा, ठीक उसी वक़्त सलाहुद्दीन अय्यूबी ने करवट बदली। ये नहीं बताया जा सकता कि मुहाफ़िज़ खंजर कहां मारना चाहता था, दिल में या सीने में मगर हुआ यूं के खंजर सलाहुद्दीन अय्यूबी की पगड़ी के बालाई हिस्से में उतर गया और सर से बाल बराबर दूर रहा। पगड़ी सर से उतर गई। सलाहुद्दीन अय्यूबी बिजली की तेज़ी से उठा। उसे ये समझने में देर न लगी के ये सब क्या है। उस पर इस से पहले ऐसे दो हमले हो चुके थे।

उसने इस पर भी हैरत का इज़हार न किया के हमलावर उसके
अपने बाडी गार्ड्स के लिबास में था जिसे उसने ख़ुद अपने बाडी
गार्ड्स के लिये मुन्तख़ब किया (चुना) था। उसने साँस जितना 

अरसा (समय) भी ज़ाया न किया। हमलावर उसकी पगड़ी से

खंजर खींच रहा था।

अय्यूबी सर से नंगा था, उसने हमलावर की थुड्डी पर पूरी ताक़त से घूंसा मारा,

हड्डी टूटने की आवाज़ सुनाई दी। हमलावर का जबड़ा टूट गया था। 

वो पीछे को गिरा और उसके मुँह से हैबतनाक आवाज़ निकली। उसका खंजर सलाहुद्दीन अय्यूबी की पगड़ी में रह गया था। सलाहुद्दीन अय्यूबी ने अपना खंजर निकाल लिया।

इतने में दो मुहाफ़िज़ दौड़ते अंदर आये। उनके हाथों में तलवारें थीं।

सलाहुद्दीन अय्यूबी ने उन्हें कहा के इसे ज़िन्दा पकड़ लो मगर ये दोनों मुहाफ़िज़ सलाहुद्दीन अय्यूबी पर टूट पड़े। सलाहुद्दीन अय्यूबी ने खंजर से दो तलवारों का

मुक़ाबला किया मगर ये मुक़ाबला एक दो मिनट का था 

क्योंकि तमाम बाडी गार्ड्स अंदर आ गये थे।

अय्यूबी ये देख कर हैरान रह गया के उसके बाडी गार्ड्स

दो हिस्सो में तक़सीम होकर एक दूसरे को लहु लुहान कर रहे थे। 

इसे क्योकि मालूम नहीं था कि इनमें इसका दुश्मन कौन और दोस्त कौन है, वो इस मोरके (लड़ाई) में शरीक न हो सका। कुछ देर बाद जब बाडी गार्ड्स में से चंद एक मारे गये, कुछ भाग गये और बाज़

ज़ख़्मी होकर बेहाल हो गये तो इन्केशाफ़ हुआ (राज़ खुला),
के इस दस्ते में जो सलाहुद्दीन अय्यूबी की हिफ़ाज़त पर मामूर था, 

सात मुहाफ़िज़ फ़िदाई थे जो सलाहुद्दीन अय्यूबी को खत्म करना चाहते थे।

उन्होंने इस काम के लिये सिर्फ एक फ़िदाई खैमें में भेजा था, अंदर सूरत ए हाल बदल गयी चुनाचे बाक़ी भी अंदर चले गये। छ: असल मुहाफ़िज़ भी अंदर गये। वो सूरत ए हाल समझ गये और सलाहुद्दीन अय्यूबी बच गया। उसने अपने पहले हमलावर की शह रग पर तलवार की नोंक रख कर पूछा के वो कौन है और उसे किसने भेजा है। सच बोलने के बदले सलाहुद्दीन अय्यूबी ने उसे जान बक़्शी

का वादा दिया। उसने बता दिया कि वो फ़िदाई है और उसे कैमेश्तकिन
जिसे बाज़ मोअर्रिख़ों (इतिहासकारों) ने गोमश्तगीन लिखा है 

ने इस काम के लिए भेजा था। कैमेश्तकिन अल सालेह के एक क़िले का गवर्नर था। चाचा से लिया था सैन्य प्रशिक्षण 1137 ई. को इराक के टिकरित शहर के एक कुर्द सुन्नी सैन्य परिवार में पैदा हुए सलाउद्दीन अय्यूबी का पूरा नाम सुल्तान अल नासिर सलाहुद्दीन अय्यूबी यूसुफ इब्न अय्यूब था. इन्होंने बचपन में ही काफी महत्वपूर्ण धर्मशास्त्रों की पढ़ाई कर ली थी. इन्होंने कुरान के साथ-साथ खगोल विज्ञान, गणित और कानून की शिक्षा भी हासिल की.

अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद वह एक युवा सैनिक के तौर पर राज्य सेना में शामिल हो गए.

सलाउद्दीन ने अपने चाचा असद अल दिन शिकखोह के अधीन अपना सैन्य परिक्षण आरंभ कर दिया. उस समय वह असद ज़ेगिद साम्राज्य की सैन्य टुकड़ी के सेनापति थे. अपना परिक्षण पूरा करने के बाद सलाउद्दीन को छोटी मोटी लड़ाईयों में अपना जौहर दिखाने का अवसर मिला, जिसे उसने दोनों हाथों से कबूला.

लड़ाई के दौरान सलाउद्दीन का प्रदर्शन काबिले तारीफ रहा, जिसकी बदौलत आगे चलकर उसे सेना के अभियानों में बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई. काबिलियत ने शहंशाह बनाया सलाउद्दीन की बहादुरी और युद्ध की समझ को देखते हुए साल 1169 में उन्हें सेनापति नियुक्त कर दिया गया. और सलाउद्दीन के चाचा शिकखोह की 1169 ई. में मौत के बाद सलाउद्दीन को काहिरा में फातिमिद राजवंश के खलीफा ने अपना वजीर नियुक्त कर लिया.

उन्होंने वजीर बनते ही फातिमिद साम्राज्य को कमजोर किया, और फातिमिद की पैदल सेना को खत्म कर अपनी स्थिति को सुदृढ़ कर लिया और आखिरकार 1171 ई. में फातिमिद खलीफा को खत्म कर सलाउद्दीन ने बगदाद में सुन्नी खलीफा को मान्यता दे दी.

सन 1174 ई में सीरिया के उत्तरी मेसोपोटामिया के सैन्य नेता नूर अल-दीन की मौत के साथ ही वहां सलाउद्दीन का एकछत्र राज कायम हो गया.

इस समय सीरिया पर जेनगिदस का शासन था, मगर राजा की अचानक मौत के बाद गद्दी की जिम्मेदारी जेनगिद के नाबालिग उम्मीदवार के कंधों पर आ गई.

यह सलाउद्दीन के लिए एक सुनहरा मौका था, और उसने इस मौके का पूरा फायदा उठाते हुए सीरिया पर अपनी हुकुमत जमा ली.

सलाउद्दीन ने सीरिया पर विजय प्राप्त करने के लिए मिस्र की संपत्ति का उपयोग किया, फिर उत्तरी मेसोपोटामिया जीतने के लिए सीरिया की, और उत्तरी मेसोपोटामिया की संपत्ति को लेवांत तट के ईसाई राज्यों को जीतने में झौंक दिया.

युद्ध में जीती गई संपति का उपयोग कर सलाउद्दीन ने बहुत से स्कूलों, अस्पतालों और संस्थाओं का निर्माण भी करवाया. साथ ही उन्होंने सामाजिक न्याय की भी उचित व्यस्था की.

साल 1174 से लेकर 1187 तक लड़े गए अनेकों युद्धों में एक के बाद एक जीत हासिल करने के बाद सलाउद्दीन का शासन अब अलेप्पो, दमिश्क और मोसुल समेत कई अन्य क्षेत्रों में फैल गया था.

इन सभी जगहों पर सलाउद्दीन ने अपने रिश्तेदारों को सरकारी पदों पर बहाल कर दिया और यहां अय्यूबी साम्राज्य की स्थापना की.

मगर सलाउद्दीन का यह शांत शासन अधिक समय तक चल नहीं पाया, क्योंकि इस दौरान ईसाईयों की क्रूसेडर सेना मुस्लिम साम्राज्य को खत्म करने के लिए सलाउद्दीन के समक्ष आ खड़ी हुई.

क्रूसेडर सेना यूरोप के उन ईसाईयों की फौज थी, जो दुनिया से मुस्लिमों को खत्म कर देना चाहते थे. लेकिन उनके इस सपने को खाक में मिलाने के लिए सलाउद्दीन सामने खड़ा हुआ था.

इस दौरान साल 1187 में इस्लामिक और क्रूसेडर फौजों के मध्य हतिन का युद्ध हुआ. इस युद्ध में सलाउद्दीन ने अपनी युद्ध नीति का बखूबी प्रयोग किया और क्रूसेडर सेना को धूल चटाई.

हतिन का युद्ध जीतने के बाद सलाउद्दीन के लिए क्रुसेडर शहर जेरुशलम के दरवाजे खुल गए थे. अपनी इस जीत के बाद सलाउद्दीन ने न सिर्फ जेरुशलम बल्कि उसके आसपास के अन्य शहरों को भी अपने कब्जे में ले लिया.

हालांकि अपनी हार के बाद भी क्रूसेडर सेना पीछे नहीं हटी और वह लगातार सलाउद्दीन के खिलाफ युद्ध करती रही.

तीसरे युद्ध में क्रूसेडर सेना का नेतृत्व करने इंग्लैंड के राजा रिचर्ड प्रथम खुद आए. जिसके चलते आखिरकार क्रूसेडर सेना ने सलाउद्दीन की फौज को मात दे दी.

युद्ध में हार के बाद सलाउद्दीन ने राजा रिचर्ड के साथ समझौता कर लिया, जिसके तहत वह राजा को इस बात पर मनाने में कामयाब रहा कि जेरुशलम में मुस्लिम समुदाय का प्रभुत्व बरकरार रहे. https://assets.roar.media/Hindi/2018/05/Salahuddin-Ayyubi.jpg इतिहास सलाउद्दीन अय्यूबी: जिसने ईसाईयों से जेरुशलम छीना, लेकिन…

Varun Kumar 12 May 2018 Share



https://roar.media/hindi/main/history/salahuddin-ayyubi-great-warrior-of-islam-who-defeated-the-crusaders-and-won-jerusalem/ Copy Link 11.7K Views Share Save for later मध्यकाल में पूरी दुनिया ने इस्लामिक अत्याचारों का दौर देखा.

जहां एक ओर साम्राज्यवाद का माहौल था तो वहीं, दूसरी तरफ मुस्लिम वास्तुकला ने नई इमारतों को शक्ल दी.

अपने साम्राज्य को बढ़ाने के साथ ही कुछ इस्लामी शासकों ने दरियादिली, बहादुरी की मिसालें भी पेश कीं.

उन्हीं में से एक था 12वीं सदी का मुस्लिम शासक सलाउद्दीन अय्यूबी, जिसने ईसाईयों से जेरुशलम छीना और वहां अय्यूबी साम्राज्य की स्थापना की.

तो चलिए जानते हैं सलाउद्दीन अय्यूबी के बारे में –

चाचा से लिया था सैन्य प्रशिक्षण 1137 ई. को इराक के टिकरित शहर के एक कुर्द सुन्नी सैन्य परिवार में पैदा हुए सलाउद्दीन अय्यूबी का पूरा नाम सुल्तान अल नासिर सलाहुद्दीन अय्यूबी यूसुफ इब्न अय्यूब था. इन्होंने बचपन में ही काफी महत्वपूर्ण धर्मशास्त्रों की पढ़ाई कर ली थी. इन्होंने कुरान के साथ-साथ खगोल विज्ञान, गणित और कानून की शिक्षा भी हासिल की.

अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद वह एक युवा सैनिक के तौर पर राज्य सेना में शामिल हो गए.

सलाउद्दीन ने अपने चाचा असद अल दिन शिकखोह के अधीन अपना सैन्य परिक्षण आरंभ कर दिया. उस समय वह असद ज़ेगिद साम्राज्य की सैन्य टुकड़ी के सेनापति थे. अपना परिक्षण पूरा करने के बाद सलाउद्दीन को छोटी मोटी लड़ाईयों में अपना जौहर दिखाने का अवसर मिला, जिसे उसने दोनों हाथों से कबूला.

लड़ाई के दौरान सलाउद्दीन का प्रदर्शन काबिले तारीफ रहा, जिसकी बदौलत आगे चलकर उसे सेना के अभियानों में बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई.


Saladin Ayyubi Participate so many war against Crusaders. (Pic: Pinterest)

काबिलियत ने शहंशाह बनाया सलाउद्दीन की बहादुरी और युद्ध की समझ को देखते हुए साल 1169 में उन्हें सेनापति नियुक्त कर दिया गया. और सलाउद्दीन के चाचा शिकखोह की 1169 ई. में मौत के बाद सलाउद्दीन को काहिरा में फातिमिद राजवंश के खलीफा ने अपना वजीर नियुक्त कर लिया.

उन्होंने वजीर बनते ही फातिमिद साम्राज्य को कमजोर किया, और फातिमिद की पैदल सेना को खत्म कर अपनी स्थिति को सुदृढ़ कर लिया और आखिरकार 1171 ई. में फातिमिद खलीफा को खत्म कर सलाउद्दीन ने बगदाद में सुन्नी खलीफा को मान्यता दे दी.

सन 1174 ई में सीरिया के उत्तरी मेसोपोटामिया के सैन्य नेता नूर अल-दीन की मौत के साथ ही वहां सलाउद्दीन का एकछत्र राज कायम हो गया.

इस समय सीरिया पर जेनगिदस का शासन था, मगर राजा की अचानक मौत के बाद गद्दी की जिम्मेदारी जेनगिद के नाबालिग उम्मीदवार के कंधों पर आ गई.

यह सलाउद्दीन के लिए एक सुनहरा मौका था, और उसने इस मौके का पूरा फायदा उठाते हुए सीरिया पर अपनी हुकुमत जमा ली.

सलाउद्दीन ने सीरिया पर विजय प्राप्त करने के लिए मिस्र की संपत्ति का उपयोग किया, फिर उत्तरी मेसोपोटामिया जीतने के लिए सीरिया की, और उत्तरी मेसोपोटामिया की संपत्ति को लेवांत तट के ईसाई राज्यों को जीतने में झौंक दिया.


Finally Salahuddin Ayyubi become a King. (Representative Pic: KN-OW)

स्थापित किया मुस्लिम प्रभुत्व युद्ध में जीती गई संपति का उपयोग कर सलाउद्दीन ने बहुत से स्कूलों, अस्पतालों और संस्थाओं का निर्माण भी करवाया. साथ ही उन्होंने सामाजिक न्याय की भी उचित व्यस्था की.

साल 1174 से लेकर 1187 तक लड़े गए अनेकों युद्धों में एक के बाद एक जीत हासिल करने के बाद सलाउद्दीन का शासन अब अलेप्पो, दमिश्क और मोसुल समेत कई अन्य क्षेत्रों में फैल गया था.

इन सभी जगहों पर सलाउद्दीन ने अपने रिश्तेदारों को सरकारी पदों पर बहाल कर दिया और यहां अय्यूबी साम्राज्य की स्थापना की.

मगर सलाउद्दीन का यह शांत शासन अधिक समय तक चल नहीं पाया, क्योंकि इस दौरान ईसाईयों की क्रूसेडर सेना मुस्लिम साम्राज्य को खत्म करने के लिए सलाउद्दीन के समक्ष आ खड़ी हुई.

क्रूसेडर सेना यूरोप के उन ईसाईयों की फौज थी, जो दुनिया से मुस्लिमों को खत्म कर देना चाहते थे. लेकिन उनके इस सपने को खाक में मिलाने के लिए सलाउद्दीन सामने खड़ा हुआ था.

इस दौरान साल 1187 में इस्लामिक और क्रूसेडर फौजों के मध्य हतिन का युद्ध हुआ. इस युद्ध में सलाउद्दीन ने अपनी युद्ध नीति का बखूबी प्रयोग किया और क्रूसेडर सेना को धूल चटाई.

हतिन का युद्ध जीतने के बाद सलाउद्दीन के लिए क्रुसेडर शहर जेरुशलम के दरवाजे खुल गए थे. अपनी इस जीत के बाद सलाउद्दीन ने न सिर्फ जेरुशलम बल्कि उसके आसपास के अन्य शहरों को भी अपने कब्जे में ले लिया.

हालांकि अपनी हार के बाद भी क्रूसेडर सेना पीछे नहीं हटी और वह लगातार सलाउद्दीन के खिलाफ युद्ध करती रही.

तीसरे युद्ध में क्रूसेडर सेना का नेतृत्व करने इंग्लैंड के राजा रिचर्ड प्रथम खुद आए. जिसके चलते आखिरकार क्रूसेडर सेना ने सलाउद्दीन की फौज को मात दे दी.

युद्ध में हार के बाद सलाउद्दीन ने राजा रिचर्ड के साथ समझौता कर लिया, जिसके तहत वह राजा को इस बात पर मनाने में कामयाब रहा कि जेरुशलम में मुस्लिम समुदाय का प्रभुत्व बरकरार रहे.


Salahuddin Ayyubi defeated the Crusaders, and recaptured Jerusalem. (Pic: Wikimedia Commons)

ईसाईयों के प्रति दिखाई उदारता जेरुशलम में जब सलाउद्दीन का राज आया, तो वहां रहने वाले ईसाईयों को अपनी मौत का खौफ सताने लगा. उन्हें डर था कि कहीं सलाउद्दीन की फौज उन लोगों की हत्या न कर दे.

हालांकि ऐसा कुछ नहीं हुआ और सलाउद्दीन ने अपनी उदारता और एक सच्चा मुस्लिम होने का सबूत देते हुए एक मिसाल कायम की और उसने न सिर्फ ईसाईयों को खुल कर जीने का हक दिया, बल्कि उन्हें समान हम भी दिए.

सलाउद्दीन की यह उदारता केवल जेरुशलम में रह रहे ईसाइयों तक ही सीमित नहीं थी. साल 1192 में सम्राट रिचर्ड के बीमार होने पर भी उन्होंने आपसी भावना का सम्मान करते हुए खुद के चिकित्सक को राजा का इलाज करने के लिए भेजा.

इतना ही नहीं जब युद्ध के दौरान रिचर्ड का घोड़ा मर गया, तो सलाउद्दीन व उनकी फौज ने सम्मान पूर्वक रिचर्ड को युद्ध भूमि से बाहर जाने दिया और बाद में उन्हें दो घोड़ों की पेशगी भी दी. सलाउद्दीन के इस उदार व्यक्तित्व ने क्रूसेडर और मुस्लिम समुदाय के आपसी संबंधों को भी सुधारा. साल 1193 में महज 57 साल की उम्र में सलाउद्दीन इस दुनिया से रुखसत हो गया.

हालांकि मरने से पहले उन्होंने मुस्लिम साम्राज्य का काफी हद तक विस्तार कर दिया था.

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