सदस्य:Riddhiman11/ताल और उसके १० भाग

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ताल और ताल वादन

ताल क्या होता है? जब लय को समय के साथ मापा जाता है तोह उसे ताल केहते है। संगीत में ताल अथ्वा "तालम" बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। ताल हिन्दुस्तानी और कर्नाटक, इन दोनो प्रकार के शास्त्रीय संगीतों का एक आवश्यक भाग है। शास्त्रीय संगीत के अलावा लोक संगीत से लेकर फिल्मी संगीत तक, ताल हर प्रकार के संगीत में पाया जाता है। इसी ताल के १० भाग होते है जिन्हे "दशप्राण" अथ्वा "तल दश-प्राण" भी कहा जाता है। यह दश-प्राण, ताल के विश्लेषणात्मक अध्ययन से संबंधित है।

दश-प्राण[संपादित करें]

ताल के १० भाग होते है जिन्के मेल और क्रमापरिवर्तन से अलग-अलग प्रकार के ताल बनते है। 'दश' का मतलब है १० और 'प्राण' का मतलब है निहित गतिशील बल। "ताल दश-प्राण" ताल में निहित गतिशील बल के १० चरणों को दर्शाते है। दूसरे शब्दों में, वह ताल के १० तत्व हैं। यह १० भाग है:

काल(समय)      ६ जाति
२ मार्ग(पथ)        ७ कलै(इकाइ)
३ क्रिया           ८ लय
४ अंग            ९ यती(संरचना)
५ ग्रह(स्थान)      १० प्रस्थार(फैलाना)

इन में से पेहले पांच प्राणों को "महाप्राण" कहा जाता है जो ताल के मुख्य भाग है और बाकि प्राणों को "उपप्राण" कहा जाता है जो माध्यमिक होते है।

महाप्राण[संपादित करें]

इस लेख में हम केवल महाप्राणों की ही चर्चा करेंगे।

कर्नाटक शास्त्रीय स्ंगीत में ताल बनाए रखने का वादन यन्त्र,मृदंग

काल[संपादित करें]

यह प्राण हमे किसि भी संगीत रचना को प्रस्तुत करने की निर्धारित गतिअवधी का विचार देती है।

एक काल में- एक काल के अक्षर पर एक ही स्वर बैठता है।
द्वी-काल में- एक काल के अक्षर पर चार स्वर बैठते है।
त्रि-काल में- एक काल अक्षर पर आठं स्वर बैठते है।

मार्ग[संपादित करें]

यह तत्व संगीत रचना के तालबद्ध निर्माण के संबंध रखता है और एक कलाकार को सहि धंग से ताल को पकडने मे मदद करता है। ताल को मानने के ६ अलग मार्ग है। इन्हे 'षणमार्ग' कहा जाता है। मार्ग के ६ प्रकार है-

१ दक्षिण मार्ग 
२ वर्तिक मार्ग
३ चित्र मार्ग
४ चित्रतर मार्ग
५ चित्रतम मार्ग 
६ अतीचित्रतम मार्ग 

इन मार्गों में संगीत के अक्षर के एक काल पर 'मत्तीर' और 'स्वर' बिठाकर परिवर्तन लाया जाता है।

क्रिया[संपादित करें]

क्रिया का मतलब है कोइ भी कार्य। जब ताल के अलग भागों को हाथ के विभिन्न इशारों से(जैसे कि ताली बजाना या फिर हाथ का लेहराना) दर्शाया जाता है तो उसे क्रिया केहते है। क्रिया के दो प्रकार होते है, सशब्द क्रिया और निशब्द क्रिया।

सशब्द क्रिया

जब ताल के भाग को किसी शब्द के साथ दर्शाया जाय तो उसे सशब्द कहा जाता है जैसे की सम और ताली। यह ताल का शब्द के साथ क्रियान्वयन है।

निशब्द क्रिया

जब ताल के भाग को किसि भी शब्द के बिना दर्शाया जाता है तो उसे निशब्द क्रिया केहते है जैसे कि ताल को उंगलियों से गिनना। यह ताल का बिना किसी शब्द के साथ क्रियान्वयन है।

अंग[संपादित करें]

ताल के कुछ अंग होते है, यह गिनती में ६ है। इन अंगों को 'षडांग' कहते है।

षडांग

१ अनुधृत - एय काल अक्षर- एक ताली
२ धृत - दो काल अक्षर- एक ताली और एक लेहर
३ लघु - काल अक्षर:३,४,५,७,९ - एक ताली और उंगलियों से गिनती
४ गुरु - आंठ काल अक्षर 
५ प्लुत - १२ काल अक्षर
६ काकपाद: - १६ काल अक्षर

पेहले तीन अंग,अनुधृत, धृत और लघु, स्ंगीत के सप्त तालों में पाये जाते है। बाकि के तीन अंग १०८ तालों की प्र्णाली का हिस्सा है जो एक प्राचीन प्रणाली है और आज के समय में इनक इस्तमाल नहि होता है।

ग्रह[संपादित करें]

ग्रह ताल का वह भाग है जो संगीत रचना के आरंभ स्थान का विवरण करता है। यह ताल के एक आवर्तन में संगीत का आरंभ स्थान दर्शाता है। ग्रह के दो प्रकार होते है, सम ग्रह और विशम ग्रह।

सम ग्रह

जब संगीत के स्वर ताल के साथ ही साथ आरंभ होतए है तोह उसे सम ग्रह कहा जाता है।
उदाहरण- रचना:सबापतिक्कु-राग:मोहनाम-गोपलकृष्ण भारती

विशम ग्रह

जब ताल और स्वर एक साथ आरंभ ना हो तो उसे विशम ग्रह केहते है। विशम ग्रह के भी अधिक दो प्रकार होते है:
  अतीत ग्रह- जब स्ंगीत स्वर ताल से पेहले आरंभ होते है।
  उदाहरण- रचना:शिवगामसुंदरी-राग:मुखरि-पापनाशन शिवं
 
 अनागत ग्रह- जब संगीत स्वर ताल आवर्तन के आरंभ के बाद शुरु होते है।
 उदाहरण- रचना:मायावितै- राग:खरहरप्रिया-मुत्तुतांडवर

संदर्भ[संपादित करें]

[1] [2] [3]

[4]

  1. https://layaloka.com/thalam/theory/
  2. http://www.mridangams.com/2007/08/saptha-tala-35-tala-175-tala.html
  3. www.shadjamadhyam.com/ten_elements_of_taal
  4. https://www.scribd.com/document/309259423/Evolution-of-Tala-Dasa-Prana-Concept