शारदीय नवरात्रि
शारदीय नवरात्रि:-
शारदीय नवरात्रि हिन्दू कलेंडर के अनुसार हर वर्ष अश्विन मास के शुक्ल पक्ष के प्रतिपदा से नवमी तक और अंग्रेजी कलेंडर के अनुसार सितंबर से अक्टूबर के बीच में मनाया जाता है।
| नवरात्रि | |
|---|---|
| उत्सव | मां की मूर्ति की स्थापना और मां का पूजा पाठ |
| तिथि | अश्विन मास शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से नवमी तिथि तक |
शारदीय नवरात्रि के बारे में :-
आश्विन मास में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से प्रारंभ होकर 9 दिन तक चलने वाला नवरात्र 'शारदीय नवरात्र' कहलाता है। 'नव' का शाब्दिक अर्थ नौ है। इसके अतिरिक्त इसे नव अर्थात नया भी कहा जा सकता है।शारदीय नवरात्रों में दिन छोटे होने लगते हैं। मौसम में परिवर्तन प्रारंभ हो जाता है। प्रकृति सर्दी की चादर में सिकुड़ने लगती है। ऋतु के परिवर्तन का प्रभाव जनों को प्रभावित न करे इसलिए प्राचीनकाल से ही इस दिन से 9 दिनों के उपवास का विधान है। नवरात्रों में माता के 9 रूपों की आराधना की जाती है। माता के इन 9 रूपों को हम देवी के विभिन्न रूपों की उपासना, उनके तीर्थों के माध्यम समझ सकते हैं।वर्ष में दो बार नवरात्र रखने का विधान है। चैत्र मास में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से 9 दिन अर्थात नवमी तक और इसी प्रकार ठीक 6 मास बाद आश्विन मास, शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से विजयादशमी से एक दिन पूर्व तक माता की साधना और सिद्धि प्रारंभ होती है। दोनों नवरात्रों में शारदीय नवरात्रों को ज्यादा महत्व दिया जाता है। [1]
नव रूपो के बारे में :-
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति. चतुर्थकम्।।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति.महागौरीति चाष्टमम्।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना:।।
हिमालय का एक नाम शैलेंद्र या शैल भी है। शैल मतलब पहाड़, चट्टान। देवी दुर्गा ने पार्वती के रुप में हिमालय के घर जन्म लिया। उनकी मां का नाम था मैना। इसी कारण देवी का पहला नाम पड़ा शैलपुत्री यानी हिमालय की बेटी। मां शैलपुत्री की पूजा, धन, रोजगार और स्वास्थ्य के लिए की जाती है। शैलपुत्री सिखाती है कि जीवन में सफलता के लिए सबसे पहले इरादों में चट्टान की तरह मजबूती और अडिगता होनी चाहिए।
2.ब्रह्मचारिणी:-
ब्रह्मचारिणी का अर्थ है, जो ब्रह्मा के द्वारा बताए गए आचरण पर चले। जो ब्रह्म की प्राप्ति कराती हो। जो हमेशा संयम और नियम से रहे। जीवन में सफलता के लिए सिद्धांत और नियमों पर चलने की बहुत आवश्यकता होती है। इसके बिना कोई मंजिल नहीं पाई जा सकती। अनुशासन सबसे ज्यादा जरूरी है। ब्रह्मचारिणी की पूजा पराशक्तियों को पाने के लिए की जाती है। इनकी पूजा से कई सिद्धियां मिलती हैं।
3.चंद्रघंटा:-
ये देवी का तीसरा रूप है, जिसके माथे पर घंटे के आकार का चंद्रमा है, इसलिए इनका नाम चंद्रघंटा है। ये देवी संतुष्टि की देवी मानी जाती है। जीवन में सफलता के साथ शांति का अनुभव तब तक नहीं हो सकता है, जब तक कि मन में संतुष्टि का भाव ना हो। आत्म कल्याण और शांति की तलाश जिसे हो, उसे मां चंद्रघंटा की आराधना करनी चाहिए।
4.कूष्माण्डा:-
कुष्मांडा देवी का चौथा स्वरूप है। ग्रंथों के अनुसार इन्हीं देवी की मंद मुस्कार से अंड यानी ब्रह्मांड की रचना हुई थी। इसी कारण इनका नाम कूष्मांडा पड़ा। ये देवी भय दूर करती हैं। भय यानी डर ही सफलता की राह में सबसे बड़ी मुश्किल होती है। जिसे जीवन में सभी तरह के भय से मुक्त होकर सुख से जीवन बिताना हो, उसे देवी कुष्मांडा की पूजा करनी चाहिए।
5.स्कंदमाता:-
भगवान शिव और पार्वती के पहले पुत्र हैं कार्तिकेय, उनका ही एक नाम है स्कंद। कार्तिकेय यानी स्कंद की माता होने के कारण देवी के पांचवें रुप का नाम स्कंद माता है। उसके अलावा ये शक्ति की भी दाता हैं। सफलता के लिए शक्ति का संचय और सृजन की क्षमता दोनों का होना जरूरी है। माता का ये रूप यही सिखाता है और प्रदान भी करता है।
6.कात्यायिनी:-
कात्यायिनी ऋषि कात्यायन की पुत्री हैं। कात्यायन ऋषि ने देवी दुर्गा की बहुत तपस्या की थी और जब दुर्गा प्रसन्न हुई तो ऋषि ने वरदान में मांग लिया कि देवी दुर्गा उनके घर पुत्री के रुप में जन्म लें। कात्यायन की बेटी होने के कारण ही नाम पड़ा कात्यायिनी। ये स्वास्थ्य की देवी हैं। रोग और कमजोर शरीर के साथ कभी सफलता हासिल नहीं की जा सकती। मंजिल पाने के लिए शरीर का निरोगी रहना जरूरी है। जिन्हें भी रोग, शोक, संताप से मुक्ति चाहिए उन्हें देवी कात्यायिनी को मनाना चाहिए।
7.कालरात्रि:-
काल यानी समय और रात्रि मतलब रात। जो सिद्धियां रात के समय साधना से मिलती हैं उन सब सिद्धियों को देने वाली माता कालरात्रि हैं। आलौकिक शक्तियों, तंत्र सिद्धि, मंत्र सिद्धि के लिए इन देवी की उपासना की जाती है। ये रूप सिखाता है कि सफलता के लिए दिन-रात के भेद को भूला दीजिए। जो बिना रुके और थके, लगातार आगे बढ़ना चाहता है वो ही सफलता के शिखर पर पहुंच सकता है।
8.महागौरी:-
देवी का आठवा स्वरूप है महागौरी। गौरी यानी पार्वती, महागौरी यानी पार्वती का सबसे उत्कृष्ट स्वरूप। अपने पाप कर्मों के काले आवरण से मुक्ति पाने और आत्मा को फिर से पवित्र और स्वच्छ बनाने के लिए महागौरी की पूजा और तप किया जाता है। ये चरित्र की पवित्रता की प्रतीक देवी हैं, सफलता अगर कलंकित चरित्र के साथ मिलती है तो वो किसी काम की नहीं, चरित्र उज्जवल हो तो ही सफलता का सुख मिलता है।
9.सिद्धिदात्री:-
ये देवी सारी सिद्धियों का मूल (Origin) हैं। देवी पुराण कहता है भगवान शिव ने देवी के इसी स्वरूप से कई सिद्धियां प्राप्त की। शिव के अर्द्धनारीश्वर स्वरूप में जो आधी देवी हैं वो ये सिद्धिदात्री माता ही हैं। हर तरह की सफलता के लिए इन देवी की आराधना की जाती है। सिद्धि के अर्थ है कुशलता, कार्य में कुशलता और सलीका हो तो सफलता आसान हो जाती है।[2]
कहां-कहां मनाई जाती है नवरात्रि:-
वैसे तो संपूर्ण देश-विदेश में मनाई जाती है नवरात्रि परंतु कुछ श्रेष्ठ जगह जहां भव्य तरीके से मनाई जाती है नवरात्रि ,
अहमदाबाद में नवरात्रि सिर्फ़ एक त्योहार नहीं है—यह एक ऐसा अनुभव है जो पूरे शहर में धड़कन की तरह दौड़ता है। देवी दुर्गा और उनके दिव्य अवतारों का यह नौ रातों का उत्सव जहाँ दुनिया भर में मनाया जाता है, वहीं अहमदाबाद इसे बेजोड़ रंग, लय और उत्साह के साथ जीवंत करता है।
सांस्कृतिक समृद्धि से सराबोर, वडोदरा भारत के सबसे प्रतिष्ठित नवरात्रि स्थलों में से एक है। इन नौ रोमांचक रातों के दौरान, यह शहर रोशनी, भक्ति और लय के एक चकाचौंध भरे नज़ारे में बदल जाता है।
दिल्ली में, नवरात्रि भक्ति और उत्सव का एक जीवंत संगम है। शहर के मंदिर प्रार्थनाओं, भजनों और आध्यात्मिक चिंतन में लीन भक्तों की निरंतर भीड़ से जीवंत हो उठते हैं। इस मौसम का एक प्रमुख आकर्षण भव्य रामलीला प्रदर्शन हैं - रामायण का नाटकीय पुनर्कथन जो राजधानी भर के दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता है।
कोलकाता पारंपरिक नवरात्रि से ज़्यादा दुर्गा पूजा के लिए जाना जाता है, लेकिन इसके उत्सव का जोश और भव्यता बेजोड़ है। पाँच दिनों तक, यह शहर एक जीवंत कला दीर्घा बन जाता है — ऊँची-ऊँची, जटिल नक्काशीदार दुर्गा प्रतिमाओं, लुभावने थीम वाले पंडालों और संगीत, रोशनी और जुलूसों से गुलज़ार सड़कों के साथ।
भारत की आध्यात्मिक आत्मा कही जाने वाली वाराणसी, नवरात्रि को गहरी भक्ति और शांत भव्यता के साथ मनाती है। अन्य जगहों पर होने वाले ऊर्जावान नृत्यों के विपरीत, यहाँ उत्सव एक अधिक पवित्र मार्ग पर चलता है—घाट दीयों की कोमल रोशनी से जगमगाते हैं, भावपूर्ण आरती, शास्त्रीय संगीत प्रस्तुतियों और देवी दुर्गा के सम्मान में होने वाले अनुष्ठानों से गूंजते हैं।
बस्तर में, नवरात्रि केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है - यह इस क्षेत्र की गहरी सांस्कृतिक पहचान की जीवंत अभिव्यक्ति है। इस उत्सव का मुख्य स्थल पूजनीय दंतेश्वरी मंदिर है, जहाँ देवी दंतेश्वरी के सम्मान में किए जाने वाले अनुष्ठान सदियों पुरानी आदिवासी परंपराओं को दर्शाते हैं।
कुल्लू में नवरात्रि का उत्सव एक विशेष और अनोखे अंदाज़ में मनाया जाता है, जो इसे इस त्यौहार का आनंद लेने के लिए सबसे बेहतरीन जगहों में से एक बनाता है। मुख्य उत्सव कुल्लू दशहरा है, जो सात दिनों तक चलता है और भगवान राम की राक्षस रावण पर विजय का प्रतीक है। इस दौरान, आस-पास के गाँवों से लगभग 200 देवी-देवताओं को रंग-बिरंगे जुलूसों में कुल्लू के रघुनाथजी मंदिर में उत्सव में भाग लेने के लिए लाया जाता है।
महाराष्ट्र का मुंबई एक ऐसा शहर बन गया है जहाँ कई अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोग एक साथ रहते हैं। जैसे-जैसे आप शहर में घूमेंगे, आपको कई तरह के नवरात्रि उत्सव देखने को मिलेंगे, जो मुंबई को इस त्योहार का आनंद लेने के लिए सबसे अच्छी जगहों में से एक बनाता है। पारंपरिक गरबा नृत्य से लेकर दुर्गा पूजा तक, यहाँ सब कुछ मनाया जाता है।
नवरात्रि के दौरान कर्नाटक घूमने का एक प्रमुख कारण मैसूर राजमहल को हज़ारों दीपों से जगमगाते देखना है। दशहरा, जिसे नदहब्बा उत्सव भी कहा जाता है, दस दिनों तक चलने वाला एक सांस्कृतिक उत्सव है, जिसमें मैसूर के विभिन्न स्थानों पर संगीत और नृत्य प्रदर्शन शामिल हैं।
कर्नाटक में, दुर्गा पूजा रंगों और ऊर्जा से भरपूर एक भव्य उत्सव की तरह मनाई जाती है। इस जीवंत उत्सव को मरियम्मा उत्सव के नाम से भी जाना जाता है। पांडवों की पत्नी द्रौपदी के सम्मान में पारंपरिक नृत्य प्रस्तुत किए जाते हैं। एक विशेष परेड भी निकाली जाती है, जहाँ लोग नाट्य प्रदर्शनों में देवी-देवताओं और राक्षसों के दृश्यों का अभिनय करते हैं।
जम्मू और कश्मीर में माता वैष्णो देवी का मंदिर एक प्रमुख आध्यात्मिक स्थल है। नवरात्रि के दौरान, हज़ारों भक्त पूजा-अर्चना और व्रत रखने के लिए इस मंदिर में आते हैं। एक अन्य महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल शारदा मंदिर है, जो उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा ज़िले के तीतवाल क्षेत्र में, नियंत्रण रेखा के पास स्थित है। यहाँ 'शरद नवरात्रि पूजा' आयोजित की जाती है, जो इस त्यौहार के दौरान इस क्षेत्र के आध्यात्मिक महत्व को और बढ़ा देती है।
जयपुर में नवरात्रि एक रंगीन और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध उत्सव है जिसमें पारंपरिक हिंदू रीति-रिवाजों के साथ ऊर्जावान गरबा और डांडिया नृत्य का समावेश होता है। शहर खूबसूरती से सजाए गए मंदिरों, जीवंत बाजारों और विभिन्न कार्यक्रमों से जगमगा उठता है जिनमें लाइव संगीत, डीजे नाइट्स और विभिन्न प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन शामिल होते हैं।[3]
कैसे मनाया जाता है नवरात्रि:-
देवी दुर्गा ने आश्विन के महीने में महिषासुर पर आक्रमण कर उससे नौ दिनों तक युद्ध किया और दसवें दिन उसका वध किया। इसलिए इन नौ दिनों को शक्ति की आराधना के लिए समर्पित कर दिया गया, चूंकि आश्विन मास में शरद ऋतु का प्रारंभ हो जाता है, इसलिए इसे शारदीय नवरात्रि कहा जाता है। शारदीय नवरात्रि के दसवें दिन को विजयदशमी के रूप में मनाया जाता है।[4]
नवरात्रि से हमें क्या संदेश मिलता है: -
नवरात्र से हमें मातृ शक्ति का सम्मान करने, आंतरिक शुद्धि अपनाने, एकता में शक्ति मानने, और अंधकार (बुराई) पर प्रकाश (अच्छाई) की विजय का संदेश मिलता है। यह त्योहार बुराइयों पर विजय, आत्म-नियंत्रण, और दिव्य ऊर्जा से जुड़ने का प्रतीक है, जो हमें धैर्य, साहस, और करुणा जैसे गुणों को अपनाने के लिए प्रेरित करता है।
- ↑ "शारदीय नवरात्रि क्यों है खास..." m-hindi.webdunia.com. अभिगमन तिथि: 2025-09-04.
- ↑ "What are the nine forms of Durga? Know Here!". Jagranjosh.com (अंग्रेज़ी भाषा में). 2024-10-07. अभिगमन तिथि: 2025-09-04.
- ↑ "The 12 Best Destinations to celebrate Navratri in INDIA". www.expressindiajourney.com. अभिगमन तिथि: 2025-09-04.
- ↑ Singh, Madhu (2025-09-04). "सीएए की नयी डेडलाइन : बदल सकते हैं सियासी समीकरण". Sanmarg Hindi daily. अभिगमन तिथि: 2025-09-04.