शबरी

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श्रीराम को फल अर्पण करते हुए शबरी की मूर्ति

शबरी एक भिलनी थी[1].[2]। उसका स्थान प्रमुख रामभक्तों में है। वनवास के समय राम-लक्ष्मण ने शबरी का आतिथ्य स्वीकार किया था और उसके द्वारा प्रेम पूर्वक दिए हुए कन्दमूल फ़ल खाये (कुछ लोग जूठे बेरो का वर्णन करते हैं लेकिन जब मैने रामायण और राम चरित मानस में देखा तो जूठे बेर का वर्णन कही ना था) .. शबरी से प्रसन्न होकर उसे परमधाम जाने का वरदान दिया।

शबरी की कथा रामायण, भागवत, रामचरितमानस, सूरसागर, साकेत आदि ग्रंथों में मिलती है। भक्त कवियों ने स्फुट रूप से शबरी की भक्ति निष्ठा का उल्लेख किया है।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Keshavadas 1988, पृष्ठ 121
  2. Dodiya 2001, पृष्ठ 148

इन्हें भी देखें[संपादित करें]