"अष्टावक्र (महाकाव्य)" के अवतरणों में अंतर

Jump to navigation Jump to search
छो
१९५०-
छो (अष्ट सर्ग)
छो (१९५०-)
| followed_by =
}}
'''''अष्टावक्र''''' ([[२०१०]]) हिन्दी भाषा का एक महाकाव्य है, जिसकी रचना २००९ ई में [[जगद्गुरु रामभद्राचार्य]] ([[१९५०]]–) ने की थी। यह महाकाव्य १०८-१०८ पदों वाले आठ सर्गों में विभक्त है, और इसमें कुल ८६४ पद हैं। महाकाव्य की विषयवस्तु [[ऋषि]] [[अष्टावक्र]] का चरित है, जोकि [[रामायण]] और [[महाभारत]] आदि [[हिन्दू]] ग्रंथों में उपलब्ध है। इस महाकाव्य की प्रति का प्रकाशन [[चित्रकूट]], [[उत्तर प्रदेश]] स्थित जगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय द्वारा किया गया है। पुस्तक का विमोचन जनवरी १४, २०१० ई के दिन कवि के षष्टिपूर्ति महोत्सव के दिन किया गया।<ref>रामभद्राचार्य २०१०।</ref>
 
इस काव्य के नायक अष्टावक्र अपने शरीर के आठों अंगों से विकलांग हैं। महाकाव्य अष्टावक्र ऋषि की संकट से लेकर सफलता से होते हुए धन्यता तक की यात्रा प्रस्तुत करता है। महाकवि स्वयं दो मास की अल्पायु से प्रज्ञाचक्षु हैं, और उनके अनुसार इस महाकाव्य में विकलांगों की समस्त समस्याओं के समाधान सूत्र इस महाकाव्य में प्रस्तुत हैं। उनके अनुसार महाकाव्य के आठ सर्गों में विकलांगों की आठ मनोवृत्तियों के विश्लेषण हैं।<ref name="ashtavakra_purovak">रामभद्राचार्य २०१०, पृष्ठ क-ग।</ref>
 
==कथावस्तु==
 
===आठ सर्ग===
 
# '''सम्भव'''
# '''संक्रान्ति'''
# '''समस्या'''
# '''संकट'''
# '''संकल्प'''
# '''साधना'''
# '''सम्भावना'''
# '''समाधान'''
 
==टिप्पणियाँ==
147

सम्पादन

दिक्चालन सूची