लोकगीत

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लोकनृत्य के साथ लोकगीत

लोकगीत लोक के गीत हैं। जिन्हें कोई एक व्यक्ति नहीं बल्कि पूरा लोक समाज अपनाता है। सामान्यतः लोक में प्रचलित, लोक द्वारा रचित एवं लोक के लिए लिखे गए गीतों को लोकगीत कहा जा सकता है। लोकगीतों का रचनाकार अपने व्यक्तित्व को लोक समर्पित कर देता है। शास्त्रीय नियमों की विशेष परवाह न करके सामान्य लोकव्यवहार के उपयोग में लाने के लिए मानव अपने आनन्द की तरंग में जो छन्दोबद्ध वाणी सहज उद्भूत करता हॅ, वही लोकगीत है।[1]
इस प्रकार लोकगीत शब्द का अर्थ हॅ-
१- लोक में प्रचलित गीत
२- लोक-रचित गीत
३- लोक-विषयक गीत

कजरी, सोहर, चैती, लंगुरिया आदि लोकगीतों की प्रसिद्ध शैलियाँ हैं।

परिचय[संपादित करें]

संस्कार गीत[संपादित करें]

बालक-बालिकाओं के जन्मोत्सव, मुण्डन, पूजन, जनेऊ, विवाह, आदि अवसरों पर गाये जाने वाले संस्कार गीत हैं - सोहर, खेलौनो, कोहबर, समुझ बनी, आदि।

गाथा-गीत/ लोकगाथा[संपादित करें]

विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित विविध लोकगाथाओं पर आधारित इन गाथा-गीतों को निम्न श्रेणियों में श्रेणीबद्ध किया जा सकता है -

आल्हा-

ढोला-

भरथरी-

नरसी भगत-

घन्नइया-

लोरिकायन - वीर रस से परिपूर्ण इस लोकगाथा में गायक लोरिक के जीवन-प्रसंगों का जिस भाव से वर्णन करता है, वह देखते-सुनते ही बनता है।

नयका बंजारा - विभिन्न क्षेत्रों में गाये जाने वाले लोक गीतों में प्रायः विषय-वस्तु तो एक ही होती है, किन्तु स्थान, पात्र तथा चरित्रों में विविघता के दर्शन होते हैं।

विजमैल - राजा विजयमल की वीरता का बखान करने वाली इस लोकगाथा में बढ़ा-चढ़ाकर प्रचलित गाथा का वर्णन किया जाता है।

सलहेस - एक लोककथा के अनुसार, सलहेस, दौना नामक एक मालिन का प्रेमी था। उसके एक शत्रु ने ईर्ष्यावश सलहेस को चोरी के झूठे आरोप में बन्द बनवा दिया। दौना मालिन ने अपने प्रेमी सलहेस को किस प्रकार मुक्त कराया। बस इसी प्रकरण को इस लोक-गीत में भाव-विभोर होकर गया जाता है।

दीना भदरी - इस लोक-गीत में दीना तथा भदरी नामक दो भाइयों के वीरता का वर्णन मार्मिकता से गाया जाता है। इसके साथ ही राज्य के विभिन्न अंचलों में आल्हा-उफदल, राजा ढोलन सिंह, छतरी चौहान, नूनाचार, लुकेसरी देवी, कालिदास, मनसाराम, छेछनमल, लाल महाराज, गरबी दयाल सिंह, मीरायन, हिरनी-बिरनी, कुंअर बृजभार, राजा विक्रमादित्य, बिहुला, गोपीचन्द, अमर सिंह, बरिया, राजा हरिश्चन्द्र, कारू खिर हैर, मैनावती आदि के जीवन एवं उनकी वीरता भरी गाथाओं को राज्य के गाथा-गीतों के रूप में गाया जाता है।

पर्वगीत[संपादित करें]

राज्य में विशेष पर्वों एवं त्योहारों पर गाये जाने वाले मांगलिक-गीतों को 'पर्वगीत' कहा जाता है। होली, दीपावली, छठ, तीज, जिउतिया, बहुरा, पीडि़या, गो-घन, रामनवमी, जन्मा?ष्टमी, तथा अन्य शुभअवसरों पर गाये जाने वाले गीतों में प्रमुखतः शब्द, लय एवं गीतों में भारी समानता होती है।

बारहमासा

प्रथम मास असाढि सखि हो, गरज गरज के सुनाय। सामी के अईसन कठिन जियरा, मास असाढ नहि आय॥ सावन रिमझिम बुनवा बरिसे, पियवा भिजेला परदेस। पिया पिया कहि रटेले कामिनि, जंगल बोलेला मोर॥ भादो रइनी भयावन सखि हो, चारु ओर बरसेला धार। चकवी त चारु ओर मोर बोले दादुर सबद सुनाई॥ कुवार ए सखि कुँवर बिदेश गईले, तीनि निसान। सीर सेनुर, नयन काजर, जोबन जी के काल॥ कातिक ए सखी कतकि लगतु है, सब सखि गंगा नहाय। सब सखी पहिने पाट पीतम्बर, हम धनि लुगरी पुरान॥ अगहन ए सखी गवना करवले, तब सामी गईले परदेस। जब से गईले सखि चिठियो ना भेजले,तनिको खबरियो ना लेस॥ पुस ए सखि फसे फुसारे गईले, हम धनि बानि अकेली। सुन मन्दिलबा रतियो ना बीते, कब दोनि होईहे बिहान॥ माघ ए सखि जाडा लगतु है, हरि बिनु जाडो न जाई। हरि मोरा रहिते त गोद मे सोबइते, असर ना करिते जाड॥ फागुन ए सखि फगुआ मचतु है, सब सखि खेलत फाग। खेलत होली लोग करेला बोली , दगधत सकल शरीर॥ चैत मास उदास सखि हो एहि मासे हरि मोरे जाई। हम अभागिनि कालिनि साँपिनि, अवेला समय बिताय॥ बइसाख ए सखि उखम लागे, तन मे से ढुरेला नीर॥ का कहोँ आहि जोगनिया के, हरिजी के राखे ले लोभाई॥ जेठ मास सखि लुक लागे सर सर चलेला समीर। अबहुँ ना सामी घरवा गवटेला, ओकरा अंखियो ना नीर॥

पेशा गीत[संपादित करें]

राज्य में विभिन्न पे?शे के लोग अपना कार्य करते समय जो गीत गाते जाते हैं उन्हें 'पेशा गीत' कहते हैं। उदाहरणार्थ - गेहूं पीसते समय 'जाँत-पिसाई', छत की ढलाई करते समय 'थपाई' तथा छप्पर छाते समय 'छवाई' और इनके साथ ही विभिन्न व्यावसायिक कार्य करते समय 'सोहनी, 'रोपनी', आदि गीत गाते-गाते कार्य करते रहने का प्रचलन है।

जातीय गीत[संपादित करें]

समाज के विभिन्न क्षेत्रों की विविध जातियाँ मनोनुकूल अपने ही गीत गाती हैं, जिन्हें 'जातीय गीत' कहते हैं। श्रोतागण उन्हें सुनकर अनुमान कर लेते हैं। कि गायक-गायिका किस जाति विशेष से सम्बन्धित हैं।

उक्त लोक गीतों के साथ ही बिहार में समय-समय पर और विशेषकर संघयाकाल समय भोजनोपरान्त सांझापराती, झूमर, बिरहा, प्रभाती, निर्गुण, देवी-देवताओं के गीत गाने का प्रचलन है।

प्रमुख लोक गायक[संपादित करें]

शारदा सिन्हा, प्रहलाद सिह टिपानिया, तारासिह डोडवे, जण्टू सिंह, बांकेलाल, डॉ॰ शंकर प्रसाद, मोतीलाल 'मंजुल', विंघयवासिनी देवी, नन्द किशोर प्रसाद, कमला देवी, केसरी नन्दन भगत, कुमुद अखौरी, ग्रेस कुजूर, विष्णु प्रसाद सिन्हा, ब्रज किशोर दुबे, भरत सिंह भारती, संतराज सिंह 'रागेश', योगेन्द्र सिंह अलबेला, अजित कुमार अकेला, भरत शर्मा, शम्भूराम, कविता चौघरी, उमाकान्त कमल, ललिका झा, उर्वशी, रेणुका सहाय आदि लोक गायक हैं।

संदर्भ[संपादित करें]

  1. सम्मेलन पत्रिका लोकसंस्कृति अंक. प॰ २५०. 

यह भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]