लाचित बोड़फुकन

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चाउ लासित फुकनलुंग
Lachit Barphukan's maidam2.JPG
जोरहाट में लाचित बरफूकन की प्रतिमा
जन्म लासित लाउ
24 नवंबर 1622
सेंग-लॉन्ग मोंग, चराइडो
अन्य नाम लासित
जातीयता ताई अहोम
व्यवसाय फुकनलुंग
पदवी फुकनलुंग
प्रसिद्धि कारण फुकनलुंग
धार्मिक मान्यता ताइ आहोम धर्म
माता-पिता सेंग कालुक मो-साई , कुन्दी मरान
राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए), खड़कवासला में लाचित बोड़फुकन की प्रतिमा

लाचित बरफूकन सम्पुर्ण नाम- चाउ लासित फुकनलुंग (असमिया: লাচিত বৰফুকন), आहोम साम्राज्य के एक सेनापति और बरफूकन थे, जो कि सन 1671 में हुई सराईघाट की लड़ाई में अपनी नेतृत्व-क्षमता के लिए जाने जाते हैं, जिसमें असम पर पुनः अधिकार प्राप्त करने के लिए रामसिंह प्रथम के नेतृत्व वाली मुग़ल सेनाओं का प्रयास विफल कर दिया गया था। लगभग एक वर्ष बाद बीमारी के कारण उनकी मृत्यु हो गई।[1][2]

संक्षिप्त जीवन[संपादित करें]

हूलुंगपारा, जोरहाट में लाचित बोड़फुकन का स्मारक

लाचित सेंग कालुक मो-साई (एक ताई-अहोम पुजारी) का चौथा पुत्र था।उनका जन्म सेंग-लॉन्ग मोंग, चराइडो में ताई अहोम के परिवार में हुआ था।उनका धर्म फुरेलुंग अहोम था[3]

लाचित बोड़फुकन ने मानविकी, शास्त्र और सैन्य कौशल की शिक्षा प्राप्त की थी। उन्हें अहोम स्वर्गदेव के ध्वज वाहक (सोलधर बरुआ) का पद, निज-सहायक के समतुल्य एक पद, सौंपा गया था जो कि किसी महत्वाकांक्षी कूटनीतिज्ञ या राजनेता के लिए पहला महत्वपूर्ण कदम माना जाता था। बोड़फुकन के रूप में अपनी नियुक्ति से पूर्व वे अहोम राजा चक्रध्वज सिंह की शाही घुड़साल के अधीक्षक (घोड़ बरुआ), रणनैतिक रूप से महत्वपूर्ण सिमुलगढ़ किले के प्रमुख और शाही घुड़सवार रक्षक दल के अधीक्षक (या दोलकक्षारिया बरुआ) के पदों पर आसीन रहे.

राजा चक्रध्वज ने गुवाहाटी के शासक मुग़लों के विरुद्ध अभियान में सेना का नेतृत्व करने के लिए लाचित बोड़फुकन का चयन किया।[4] राजा ने उपहारस्वरूप लाचित को सोने की मूठ वाली एक तलवार (हेंगडांग) और विशिष्टता के प्रतीक पारंपरिक वस्त्र प्रदान किए. लाचित ने सेना एकत्रित की और 1667 की गर्मियों तक तैयारियां पूरी कर लीं गईं. लाचित ने मुग़लों के कब्ज़े से गुवाहाटी पुनः प्राप्त कर लिया और सराईघाट की लड़ाई में वे इसकी रक्षा करने में सफल रहे।

सराईघाट की विजय के लगभग एक वर्ष बाद प्राकृतिक कारणों से लाचित बोड़फुकन की मृत्यु हो गई। उनका मृत शरीर जोरहाट से 16 किमी दूर हूलुंगपारा में स्वर्गदेव उदयादित्य सिंह द्वारा सन 1672 में निर्मित लचित स्मारक में विश्राम कर रहा है।

लाचित बोड़फुकन का कोई चित्र उपलब्ध नहीं है, लेकिन एक पुराना इतिवृत्त उनका वर्णन इस प्रकार करता है, "उनका मुख चौड़ा है और पूर्णिमा के चंद्रमा की तरह दिखाई देता है। कोई भी उनके चेहरे की ओर आँख उठाकर नहीं देख सकता."

सराईघाट की लड़ाई[संपादित करें]

लाचित और उनकी सेना द्वारा पराजित होने के बाद, मुगल सेना ब्रह्मपुत्र नदी के रास्ते ढाका से असम की ओर चलीं और गुवाहाटी की ओर बढ़ने लगीं. रामसिंह के नेतृत्व वाली मुग़ल सेना में 30,000 पैदल सैनिक, 15,000 तीरंदाज़, 18,000 तुर्की घुड़सवार, 5,000 बंदूकची और 1,000 से अधिक तोपों के अलावा नौकाओं का विशाल बेड़ा था।[5][6]

लड़ाई के पहले चरण में मुग़ल सेनापति राम सिंह असमिया सेना के विरुद्ध कोई भी सफलता पाने में विफल रहा. रामसिंह के एक पत्र के साथ अहोम शिविर की ओर एक तीर छोड़ा गया, जिसमें लिखा था कि लाचित को एक लाख रूपये दिये गये थे और इसलिए उसे गुवाहाटी छोड़कर चला जाना चाहिए. यह पत्र अंततः अहोम राजा चक्रध्वज सिंह के पास पहुंचा। यद्यपि राजा को लाचित की निष्ठा और देशभक्ति पर संदेह होने लगा था, लेकिन उनके प्रधानमंत्री अतन बुड़गोहेन ने राजा को समझाया कि यह लाचित के विरुद्ध एक चाल है।

सराईघाट की लड़ाई के अंतिम चरण में, जब मुगलों ने सराईघाट में नदी से आक्रमण किया, तो असमिया सैनिक लड़ने की इच्छा खोने लगे. कुछ सैनिक पीछे हट गए। यद्यपि लाचित गंभीर रूप से बीमार थे, फिर भी वे एक नाव में सवार हुए और सात नावों के साथ मुग़ल बेड़े की ओर बढे. उन्होंने सैनिकों से कहा, "यदि आप भागना चाहते हैं, तो भाग जाएं. महाराज ने मुझे एक कार्य सौंपा है और मैं इसे अच्छी तरह पूरा करूंगा. मुग़लों को मुझे बंदी बनाकर ले जाने दीजिए. आप महाराज को सूचित कीजिएगा कि उनके सेनाध्यक्ष ने उनके आदेश का पालन करते हुए अच्छी तरह युद्ध किया। उनके सैनिक लामबंद हो गए और ब्रह्मपुत्र नदी में एक भीषण युद्ध हुआ।

लाचित बोड़फुकन विजयी हुए. मुग़ल सेनाएं गुवाहाटी से पीछे हट गईं. मुग़ल सेनापति ने अहोम सैनिकों और अहोम सेनापति लाचित बोड़फुकन के हाथों अपनी पराजय स्वीकार करते हुए लिखा, "महाराज की जय हो! सलाहकारों की जय हो! सेनानायकों की जय हो!देश की जय हो! केवल एक ही व्यक्ति सभी शक्तियों का नेतृत्व करता है! यहां तक ​​कि मैं राम सिंह, व्यक्तिगत रूप से युद्ध-स्थल पर उपस्थित होते हुए भी, कोई कमी या कोई अवसर नहीं ढूंढ सका! "

लाचित दिवस[संपादित करें]

लाचित बोड़फुकन के पराक्रम और सराईघाट की लड़ाई में असमिया सेना की विजय का स्मरण करने के लिए संपूर्ण असम राज्य में प्रति वर्ष 24 नवम्बर को लाचित दिवस (साहित्य: लाचित दिवस) मनाया जाता है। राष्ट्रीय रक्षा अकादमी के सर्वश्रेष्ठ कैडेट को लाचित मैडल से सम्मानित किया जाता है, जिसका नाम लाचित बोड़फुकन के नाम पर रखा गया है।[7]

टिप्पणियां[संपादित करें]

  1. http://www.hvk.org/articles/0801/92.html
  2. http://www.rediff.com/news/2003/jun/06inter.htm
  3. "Vikaspedia". as.vikaspedia.in. India Development Gateway (InDG).
  4. 4। 3।
  5. http://www.hvk.org/articles/0801/92.html
  6. http://www.indianfolklore.org/journals/index.php/Ish/article/download/345/376
  7. http://www.hvk.org/articles/0801/92.html

सन्दर्भ[संपादित करें]

  • Bhuyan, S K (1947). Lachit Barphukan and His Times. Guwahati: Lawyer's Book Stall.
  • Dowerah, Swapon (2000). Lachit. Delhi: Macmillan India Ltd.

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]