लघुकथा

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thumb|BBPS|350px|चित्र जो कुछ बताते हैं,पर वो एक बहुत छोटी रूप मे।

लघुकथा का मतलब छोटी कहानी से नहीं है, छोटी कहानी लघु कथा होती है जिसमें लघु और कथा के बीच में एक खाली स्थान होता है।[संपादित करें]

लघुकथा[संपादित करें]

हिंदी साहित्य में लघुकथा नवीनतम् विधा है। हिंदी की प्रथम लघुकथा के बारे में विभिन्न विद्वानों के विभिन्न मत हैं। हिंदी के अन्य सभी विधाओं की तुलना में अधिक लघुआकार होने के कारण यह समकालीन पाठकों के ज्यादा करीब है और सिर्फ़ इतना ही नहीं यह अपनी विधागत सरोकार की दृष्टि से भी एक पूर्ण विधा के रूप में हिदीं जगत् में समादृत हो रही है। इसे स्थापित करने में जितना हाथ रमेश बतरा, जगदीश कश्यप, कृष्ण कमलेश, भगीरथ, सतीश दुबे, बलराम अग्रवाल, विक्रम सोनी, सुकेश साहनी, विष्णु प्रभाकर, हरिशंकर परसाई, योगराज प्रभाकर आदि समकालीन लघुकथाकारों का रहा है उतना ही कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, बलराम, कमल चोपड़ा, सतीशराज पुष्करणा आदि संपादकों का भी रहा है। समकालीन लघुकथाकारों में रवि प्रभाकर, दीपक मशाल, विनय कुमार सिंह, चंद्रेश कुमार छ्तलानी, सुधीर द्विवेदी, ज्योत्स्ना सिंह, वीरेन्द मेहता, विभा रश्मि, पूनम डोगरा आदि कई लेखक हैं जो इस विधा की उन्नति में उल्लेखनीय योगदान दे रहे हैं।

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