राष्ट्रीय कुष्ठ रोग उन्मूलन कार्यक्रम

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search
राष्ट्रीय कुष्ठ रोग उन्मूलन कार्यक्रम

राष्‍ट्रीय कुष्‍ठ रोग उन्‍मूलन कार्यक्रम सन 1955 में सरकार द्वारा शुरू की गयी एक योजना है।इस कार्यक्रम को विश्व बैंक की सहायता से 1993-94 से [1] बढ़ाकर 2003-04 तक कर दिया गया और इसका उद्देश्य सार्वजनिक स्वास्थ्य से 2005 तक कुष्ठ उन्मूलन था और इस 1,10,000 की संख्या को कम करना था। एनएलईपी [2] को राज्य /ज़िला स्तर पर विकेंद्रीकृत किया गया और कुष्ठ रोग सेवाओं को 2001-2002 के बाद सामान्य देखभाल प्रणाली के साथ एकीकृत किया गया। इससे कुष्ठ (पीएएल) से प्रभावित व्यक्तियों के कलंक और भेदभाव को कम करने में मदद मिली। मल्टी ड्रग थेरेपी (एमडीटी) सभी उपकेंद्रों ,प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों ,सरकारी अस्पतालों और औषधालयों में सभी कार्य दिवसों पर निःशुल्क प्रदान की जा रही है। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की शुरूआत के बाद कुष्ठ कार्यक्रम भी मिशन का अनिवार्य हिस्सा रहा है। एनआरएचएम के

तहत उपलब्ध [3] संस्थागत तंत्र जैसे रोगी कल्याण समिति , ग्राम स्वास्थ्य समिति एवं स्वच्छता समिति और पंचायती राज संस्थाओं का उपयोग कुष्ठ रोगियों को सेवाएं प्रदान करने के लिए किया जा रहा है। संदिग्ध कुष्ठ मामलों में निकटतम स्वास्थ्य सुविधा की सिफारिश और अनुवर्ती इलाज पूरा करने में आशा भी शामिल है। उन्हें इन सेवाओं के लिए प्रोत्साहन भुगतान किया जाता है। भारत ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2002 में सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर दिसंबर 2005 तक कुष्ठ उन्मूलन (1,10,000 जनसंख्या पर) का लक्ष्य हासिल करना निर्धारित किया। मार्च 2009 तक देश में कुष्ठ [[रोग[] की व्यापकता दर (पीआर) 10,000 की आबादी पर 9.72 प्रतिशत रह गया। आईईसी गतिविधियों को तेज किया गया है और विशेष आईईसी जनवरी 2008 के बाद से कुष्ठ मुक्त भारत की विषय वस्तु के साथ शुरू किया गया। यह कुष्ठ बोझ को कम करने, मामलों की जल्दी पहचान और कुष्ठ सेवाओं के गुणवत्ता परक उपचार और कुष्ठ के कलंक और भेदभाव को दूर करने पर केंद्रीत है।

उद्देश्‍य[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]