राजस्थान में जौहर और साके

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जौहर का एक काल्पनिक दृश्य

प्राचीन काल में राजस्थान में बहुत बार साके और कई बार जौहर हुए हैं। जौहर पुराने समय में भारत में राजपूत स्त्रियों द्वारा की [1]जाने वाली क्रिया थी। जब युद्ध में हार निश्चित हो जाती थी तो पुरुष मृत्युपर्यन्त युद्ध हेतु तैयार होकर वीरगति प्राप्त करने निकल जाते थे तथा स्त्रियाँ [2]जौहर कर लेती थीं अर्थात जौहर कुंड में आग लगाकर खुद भी उसमें कूद जाती थी। जौहर कर लेने का कारण युद्ध में हार होने पर शत्रु राजा द्वारा हरण किये जाने का भय होता था। [3]

चित्तौड़गढ़ के साके और जौहर[संपादित करें]

प्रथम साका; सन 1303 में हुआ जब दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने रणथंभौर विजय के बाद [4]चित्तौड़ को आक्रांत किया। अलाउद्दीन खिलजी की साम्राज्यवादी महत्वकांक्षा तथा राणा रतन सिंह की सुंदरी महारानी पद्मिनी को पाने की लालसा इस हमले का कारण बनी।[5][6]

दूसरा साका; सन १५३४-३५ में हुआ जब गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने एक विशाल सेना के साथ चित्तौड़ पर हमला किया। राजमाता रानी कर्णावती दुर्ग की सैकड़ों वीरांगनाओं ने जौहर का अनुष्ठान कर अपने प्राणों की आहुति दी थी। इसी प्रकार तीसरा साका; मुगल बादशाह [7][8][9]अकबर के शासनकाल में चित्तौड़ पर जोरदार आक्रमण किया। यह साका जयमल और फत्ता सिसोदिया के पराक्रम और बलिदान के लिए प्रसिद्ध है।[10]

जैसलमेर के साके[संपादित करें]

जैसलमेर में पहला साका उस समय हुआ जब दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने विशाल सेना के साथ [11]आक्रमण कर दुर्ग को घेर [12][13]लिया था। इसमें भाटी शासक रावल मूलराज, कुंवर रतन सिंह सहित अगणित योद्धाओं ने असिधारा तीर्थ में स्नान किया तथा ललनाओं ने जौहर का अनुष्ठान किया।[14][15]

दूसरा साका फिरोजशाह तुगलक के शासन के प्रारंभिक वर्षों में हुआ रावल दूदा त्रिलोकसी व अन्य भाटी सरदारों और योद्धाओं ने शत्रु सेना से लड़ते हुए वीरगति पाई और दुर्गस्थ वीरांगनाओं ने जौहर किया। [16] तीसरा साका अर्ध साका कहलाता है इसमें वीरों ने केसरिया तो किया (लड़ते हुए वीरगति पाई) लेकिन जौहर नहीं हुआ अतः इसे आधा साका ही माना जाता है यह घटना 1550 ईस्वी की है जब राव लूणकरण वहां का शासक था।[17]

रणथम्भोर के साके[संपादित करें]

रणथंभौर का प्रसिद्ध साका 1301 ईस्वी में हुआ जब वहां के पराक्रमी शासक राव हम्मीर देव चौहान ने अलाउद्दीन खिलजी के विद्रोही सेनापतियों को अपने यहां आश्रय देकर शरणागत वत्सलता के [18]आदर्श और अपनी आन की रक्षा करते हुए विश्वस्त योद्धाओं सहित वीरगति प्राप्त की तथा रानियों का दुर्ग की वीर नारियों ने जौहर का अनुष्ठान किया था।[19][20]

गागरोन के साके[संपादित करें]

गागरोन का पहला साका सन 1422 ईस्वी में हुआ जब वहां के अतुल पराक्रमी शासक अचलदास खींची के [21] शासनकाल में मांडू के सुल्तान अलपखां गोरी उर्फ [22] (होशंगशाह) ने आक्रमण किया। फलतः संग्राम हुआ जिसमें अचलदास ने अपने बंधु बांधवों और योद्धाओं सहित शत्रु से जूझते हुए वीरगति प्राप्त की तथा उसकी रानियों को दुर्ग की अन्य ललनाओं ने अपने को जौहर की ज्वाला में होम दिया। अचलदास खींची री वचनिका में इसका विस्तार से वर्णन हुआ है।

गागरोन का दूसरा साका 1444 ईस्वी में हुआ जब मांडू के सुल्तान महमूद खिलजी ने विशाल सेना के साथ इस दुर्ग पर आक्रमण किया था।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Kaushik Roy (2012), Hinduism and the Ethics of Warfare in South Asia: From Antiquity to the Present, Cambridge University Press, ISBN-978-1107017368, pages 182-184
  2. Lindsey Harlan; Paul B. Courtright (1995). From the Margins of Hindu Marriage: Essays on Gender, Religion, and Culture. Oxford University Press. पपृ॰ 209–210. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-19-508117-6.
  3. Arvind Sharma (1988). Sati: Historical and Phenomenological Essays. Motilal Banarsidass. पपृ॰ 21–22. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-208-0464-7.
  4. Nirbhai Singh (2007). The Philosophical Perspective on Sikh View of Martyrdom. Singh Brothers. पृ॰ 392. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-7205-388-8.
  5. B.S. Nijjar (2008). Origins and History of Jats and Other Allied Nomadic Tribes of India. Atlantic Publishers. पपृ॰ 304–306. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-269-0908-7.
  6. स्पीकिंग ट्री. "Chittorgarh's Jauhar Kund, where Queen Padmini performed Jauhar is haunted!". अभिगमन तिथि 29 सितम्बर 2017.
  7. Kr̥pāśaṅkara Siṃha (1978). Readings in Hindi-Urdu Linguistics. National. पपृ॰ 37–38.
  8. Parviz Morewedge (2015). The 'Metaphysica' of Avicenna (ibn Sīnā). Routledge. पपृ॰ 191–192. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-1-317-36611-9.
  9. Mona Siddiqui (20 May 2013). Christians, Muslims, and Jesus. Yale University Press. पपृ॰ 254 note 44. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-300-16970-6.
  10. Arvind Sharma (1988). Sati: Historical and Phenomenological Essays. Motilal Banarsidass. पपृ॰ 21–22. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-208-0464-7.
  11. Dirk H. A. Kolff 2002, पृ॰ 109.
  12. Mary Storm (2015). Head and Heart: Valour and Self-Sacrifice in the Art of India. Taylor & Francis. पृ॰ 142. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-1-317-32556-7.
  13. Hans-Joachim Aubert (2014). DuMont Reise-Handbuch Reiseführer Indien, Der Norden: mit Extra-Reisekarte (जर्मन में). Dumont Reiseverlag. पृ॰ 307. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-3-7701-7763-9.
  14. Andrea Major (2010). Sovereignty and Social Reform in India: British Colonialism and the Campaign Against Sati, 1830-1860. Routledge. पृ॰ 34. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-1-136-90115-7.
  15. "Main Battles". मूल से 2012-02-06 को पुरालेखित.
  16. Sati, the Blessing and the Curse: The Burning of Wives in India. Oxford University Press, 1994 Oxford University Press, 1994. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9780195360226. अभिगमन तिथि 29 सितम्बर 2017.
  17. Rajasthan-The Largest State of India Page 19. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9781458306982. अभिगमन तिथि 29 सितम्बर 2017.
  18. Dasharatha Sharma 1959, पृ॰प॰ 118-119.
  19. Banarsi Prasad Saksena 1992, पृ॰ 368.
  20. Satish Chandra 2007, पृ॰ 97.
  21. Survey of Kheechi Chauhan History: With Biographical Notes. Kheechi Chauhan Shodh Sansthan, 1990. अभिगमन तिथि 29 सितम्बर 2017.
  22. Rāmānanda paramparā ke udgāyaka, Santa Pīpāj. अभिगमन तिथि 29 सितम्बर 2017.