महन्त गंगा दास बैरागी

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महन्त गंगा दास बैरागी वैष्णवों के पूर्ण बैराठी द्वारे के महन्त थे, महन्त गंगा दास रानी लक्ष्मीबाई के धर्म गुरु भी थे, रानी लक्ष्मीबाई का दाह संस्कार उनकी कुटिया को तोड़कर व निर्मोही अखाड़े के हजारों बैरागियों ‌की सुरक्षा में किया गया था[1] जिसमें 745 बैरागी शहीद भी हो गए थे।[2][3]

इतिहास[संपादित करें]

झांसी की रानी ने तो अपनी अंतिम सांस भी ग्वालियर स्थित निर्मोही अखाड़े के स्थान, गंगा दास के मठ में ली थी और यहीं पर उनका अंतिम संस्कार हुआ। झांसी की रानी ने अपनी अंतिम लड़ाई 18 जून 1858 को ग्वालियर रियासत में फूलबाग नामक स्थान पर लड़ी। इसी स्थान पर आज उनका स्मारक भी है, महंत गंगा दास जी की बड़ी शाला ,जो निर्मोही अखाड़े का मठ है और वैष्णव परंपरा की 52 पीठों में से एक है, जो रामानंदी संप्रदाय का द्वारा है। वैसे तो इस पीठ की स्थापना अकबर के काल में हुई, लेकिन वर्ष 1858 में इस पीठ के द्वाराधीश महंत गंगा दास जी थे। अंग्रेजों से लड़ाई के कुछ दिन पूर्व झांसी की रानी द्वारा महंत गंगा दास जी के साथ दार्शनिक वार्तालाप का भी उल्लेख इतिहास में मिलता है। ग्वालियर में 18 जून 1858 को, जब रानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजी सेना से लड़ते लड़ते बुरी तरह घायल हो गई, तो उनके सैनिक उन्हें घायल अवस्था में उठाकर महंत गंगा दास जी की कुटिया में लेकर गए।[4]

गंगा दास जी ने उनका सिर अपनी गोदी में रखकर गंगाजल पिलाया। रानी को जब आभासी हो गया कि उनका अंतिम क्षण अब बहुत निकट है तो उन्होंने महंत गंगा दास जी से निवेदन किया, कि ये अंग्रेज मेरे मृत शरीर को भी हाथ ना लगा पाएं। सैकड़ों हथियारबंद बैरागी साधुओं ने रानी के लिए सुरक्षा कवच बना लिया और दोनों तरफ से घंटों गोलियां चलती रही। जब रानी ने प्राण त्याग दिए तो बाबा गंगादास जी की कुटिया तोड़कर शीघ्रता शीघ्र चिता बनाई गई और बाबा जी ने वैदिक रीति से उनका अंतिम संस्कार कर दिया। इतिहास में उल्लेख है कि मठ के अंदर से दो बंदूकों से तो गोलियां तब तक आती रही जब तक चिता जलकर पूरी तरह शांत नहीं हो गई। इस युद्ध में 745 बैरागी साधुओं ने अपने प्राणों की आहुति दी।

अंग्रेजी सेना के कमांडर जब चिता तक पहुंचे तो उनके हाथ कुछ भी नहीं लगा। यह भी अभी तक एक रहस्य बना हुआ है की झांसी की रानी का खजाना आखिर कहां गया। कालपी से ग्वालियर आने के 15 दिन बाद ही रानी शहीद हो गई थी। चली आ रही जनश्रुतिओं के अनुसार, रानी ने खजाने का पता अपने सबसे निकट बाबा गंगादास को बता दिया था। बाबा गंगादास ने अपने खास शिष्य कुतवार मंदिर के महंत बाबा कालूराम को भी बता दिया था। रानी के शहीद होने के बाद बाबा गंगादास ने, रानी के दत्तक पुत्र दामोदर को सुरक्षित स्थान पर भेज दिया था। रानी लक्ष्मीबाई का साथ देने की वजह से बाबा गंगादास, ग्वालियर छोड़कर हरिद्वार चले गए थे ।

अनुमान के आधार पर कुछ खजाना कालपी में ही रह गया था। जबकि ग्वालियर लाया गया खजाना बाबा गंगादास के मठ और लधेड़ी नामक स्थान में छुपाया गया था। बाबा गंगादास, बाद में जीवाजी राव सिंधिया के आग्रह पर वापस ग्वालियर तो आ गए थे लेकिन इस दौरान खजाने की खुदाई का कोई उल्लेख नहीं मिलता। इस स्थान पर आज भी यह मठ अच्छी स्थिति में है और वहां मंदिर एवं उन बैरागियों की समाधियां बनाई गई हैं। इस मठ में, युद्ध में प्रयुक्त ,साधुओं के चिमटे, भाले, नेजे , बंदूक़े और एक छोटी सी तोप आज भी सुरक्षित है। मठ के साधु और उनके अनुयाई रानी लक्ष्मीबाई के बलिदान दिवस पर हर वर्ष समारोह करके उनको याद करते हैं।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "हिंदी खबर, Latest News in Hindi, हिंदी समाचार, ताजा खबर". Patrika News (hindi में). अभिगमन तिथि 2021-05-27.सीएस1 रखरखाव: नामालूम भाषा (link)
  2. "झांसी की रानी ने इस जगह ली थी अंतिम सांस, यहीं हुआ था अंतिम संस्कार". Jansatta. 2019-12-16. अभिगमन तिथि 2021-05-27.
  3. "Laxmi Bai – झांसी की रानी लक्ष्मीबाई". Jagran blog. अभिगमन तिथि 2021-05-27.
  4. "निर्मोही अखाड़ा का रानी लक्ष्मीबाई से रहा है गहन सरोकार". Dainik Jagran. अभिगमन तिथि 2021-05-27.